हमारे लिए प्रकाश स्तम्भ हैं डॉ. रणजीत

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल


हिंदी साहित्य के सुपरिचित हस्ताक्षर डॉ. रणजीत अपनी जीवन यात्रा के अस्सीवें पडाव पर आ पहुंचे हैं। २० अगस्त १९३७ को राजस्थान के भीलवाडा *ाले के छोटे-से गांव कटार में एक पंजाबी सिख परिवार में जन्मे रणजीत की जीवन यात्रा बेहद रोचक, रोमांचक और उतार-चढावों से भरी रही है। इस तरह अर्जित जीवनानुभवों ने स्वभावतःसोच और साहित्य को समृद्ध किया है। उनके लेखन से गु*ार कर ही इन वैविध्यपूर्ण अनुभवों के महत्व और प्रभाव को जाना-समझा जा सकता है।
डॉ रणजीत की अब तक तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें से दस तो काव्य संग्रह ही हैं। हिंदी समाज ने उन्हें सबसे पहले जाना भी एक कवि के रूप में ही है। १९६४ में उनका पहला कविता संग्रह आया था - ‘ये सपने ये प्रेत’ और इसके बाद तो जैसे कविता संग्रहों की एक श्ाृंखला ही बनती चली गई। इतिहास दर्द (१९६७), जमती बर्फ ः खौलता खून (१९६८), इतना पवित्र शब्द (१९८५), झुलसा हुआ रक्तकमल (१९८६), पृथ्वी के लिए (१९९१), अभिशप्त आग (१९९३), खतरे के कगार तक (१९९९), जूझती संकल्पनाएं (२००८) और रणजीत ः प्रतिनिधि कविताएं (२०१०)। इन मौलिक कविता संग्रहों के अतिरिक्त डॉ. रणजीत ने अनेक कविता संकलनों का सम्पादन भी किया, जिनमें प्रमुख ये हैंः प्रतिश्रुति पीढी (१९६८), प्रगतिशील कविता के मील-पत्थर (१९७६), खामोशी भयानक है (पर्यावरण चेतना की कविताएं-१९९०), आधी दुनिया का उद्वेग (नारी संचेतना की कविताएं-१९९३), विश्व काव्य के विद्रोह स्वर (१९९३) और समकालीन कविता के बदलते सरोकर (१९९८) यह बहुत स्वाभाविक है कि१९६४ से अब अब फैले उनके रचना संसार में बहुत बदलाव आये हैं। उनकी कविताओं का रंग-रूप आज वैसा ही नहीं है जैसा शुरुआती दौर में था। लेकिन कुछ स्वरूपगत बदलावों के बाव*ाूद उनकी कविता के सरोकार और उनका मूल स्वर आज भी वही है। उनकी कविताओं पर कभी की गई शिवदान सिंह चौहान की टिप्पणी मुझे आज भी प्रासंगिक लगती है। उन्होंने लिखा था, ‘‘रणजीत एक अनुभूति-प्रवण कवि हैं। उनकी अनुभूतियाँ मात्र वैयक्तिक नहीं, बल्कि एक मानी में देश और विदेश के हर पीडित, उपेक्षित और आक्रान्त व्यक्ति के साथ वे अपनापा महसूस करते हैं और उसके साथ स्वयं भी पीडा झेलते हैं। यह उनके सच्चे मानववाद का प्रमाण है। ‘टोकियो में मजबूरन टूटी हुई एक हडताल’ और ‘लियोपोल्डविल में एक गिरफ्तारी के प्रति उनका हृदय उतना ही संवेदनशील है, जितना ‘एक हिन्दुस्तानी लडकी’ की मजबूरियों के प्रति। हर अन्याय को देखकर उनके मन में आदि विद्रोही स्पार्टकस की याद ताजा हो जाती है और ‘छह हजार गुलामों की लाशें’ उनके दिमाग में बिछ जाती है। ....प्रगतिशील काव्यधारा में रणजीत ने जो तरुण और सशक्त हस्ताक्षर जोडा है, वह अभिनंदनीय है।’’ एक अन्य टिप्पणी में डॉ. गणपति चंद्र गुप्त ने उन्हें आम प्रगतिवादियों से अलग एक समतावादी और मानववादी साहित्यकार बताया था। और यह बात सही भी है। बेशक वे प्रगतिवादी हैं, लेकिन जड प्रगतिवादियों से उन्हें बेहद चिढ हैं। वे बदलते समय की आहटों को सुनते और अपनी कविताओं में अंकित करते हैं। बहुत स्वाभाविक है कि हिंदी समाज ने डॉ. रणजीत की कविताओं को बहुत सं*ाीदगी से लिया है और उस पर गम्भीर चर्चाएं की हैं। हिंदी कविताओं के अनेक अध्ययनों में उनके काव्य सृजन पर बहुत गम्भीरता से विचार किया गया है। इतना ही नहीं, नागपुर विश्वविद्यालय से उनके कवित्व और व्यक्तित्व पर शोध कार्य कर श्रीमती कला मुंजे ने पी-एच.डी. की उपाधि भी प्राप्त की है। श्रीमती मुंजे का यह शोध प्रबंध साहित्य रत्नालय, कानपुर से प्रकाशित भी हो चुका है। उनके काव्य संग्रहों को अनेक पुरस्कारों से भी नवा*ाा जा चुका है, जिनमें प्रमुख ये हैंः ‘इतिहास का दर्द’ पर उत्तर प्रदेश शासन पुरस्कार, ‘पृथ्वी के लिए’ पर बिहार राजभाषा विभाग का प्रभात पुरस्कार और उनके समग्र कृतित्व पर राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा विशिष्ट साहित्यकार सम्मान।
डॉ. रणजीत की रचनाशीलता का दूसरा आयाम है उनका आलोचनात्मक और शोधपरक लेखन, जिसका सीधा रिश्ता उनके अध्यापन कर्म से जुडता है। जुलाई १९५९ में एम. ए. करते ही उन्होंने उच्च कक्षाओं को पढाना शुरु कर दिया। डूंगर कॉलेज बीकानेर से शुरु इुई उनकी अध्यापन यात्रा पाली, उदयपुर और वनस्थली होती हुई राज्य की सीमाओं से बाहर निकल कर बांदा उत्तर प्रदेश जाकर थमी जहां उन्होंने १९७७ से १९९२ तक अध्यापन किया। और उसके बाद वे बांदा छोडकर सीतापुर चले गए। साहित्य के अध्यापक के अपने कर्म के विस्तार के रूप में उन्होंने अपने शोध प्रबंध ‘हिंदी की प्रगतिशील कविता’ और कुछ अन्य पुस्तकों जैसे ‘हिंदी के प्रगतिशील कवि’ तथा हिंदी के प्रगतिशील और समकालीन कवि’ के रूप में हिंदी की प्रगतिशील कविता को समझने-समझाने के लिए अपना मूल्यवान सहयोग प्रदान किया। मुझे रणजीत के गद्य लेखन की सबसे बडी विशेषता यह लगती है कि वह मह*ा कविता तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने हमारे समय और जीवन से जुडे बहुत सारे मुद्दों को अपने लेखन का विषय बनाया है। यही देखिये कि वे पर्यावरण और विकास पर भी लिखते हैं तो साम्प्रदायिकता, धर्म और बर्बरता तथा जातियों के मकडजाल को भी अपने लेखन का विषय बनाते हैं। अगर वे शहीद-ए-आ*ाम भगतसिंह के चुने हुए लेखों और पत्रों का संकलन कर उसे छपवाते हैं तो हिंदी प्रगतिशील आंदोलन के एक संगे-मील बांदा सम्मेलन के दस्तावे*ाों को भी सामने लाते हैं। इस तरह उनका वैदुष्य किसी एक सांचे और खांचे में बंधा न रहकर जीवन के विविध क्षेत्रों तक पहुंचता है।
आज भले ही डॉ. रणजीत सक्रिय अध्यापन से मुक्त हो चुके हैं, अपनी कलम से वे अभी भी निंरतर समाज शिक्षण का काम कर रहे हैं। हाल में उन्होंने धर्म और बर्बरता, साम्प्रदायिकता का *ाहर और भारत के प्रख्यात नास्तिक जैसी अत्यधिक महत्व की पुस्तकों का सम्पादन कर समाज में वैज्ञानिक चेतना के प्रसार की दिशा में बहुत बडा कदम उठाया है। ?
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