द्विवेदी युगीन स्व. पं. गिरधर शर्मा ‘नवरत्न’

ग्यारसी लाल सेन


हिन्दी के लिए वे सब कुछ करने को तैयार थे। उन्होंने हिन्दी के लिए अपना जीवन ही समर्पित कर दिया। हरिभाऊ उपाध्याय के शब्दों में कहा जाये तो महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी विकास के लिये जिस राज प्रासाद के निर्माण के आधारभूत स्तम्भों की रचना की थी, उनमें से एक स्तम्भ थे स्व. पं. गिरधर शर्मा ‘नवरत्न’। वे वास्तव में देखा जाये द्विवेदी युग के सच्चे प्रतीक थे, नवयुग के संदेश वाहक तथा नवयुग एवं पुरातन युग की संधि के सच्चे प्रतिनिधि थे। गुजराती भाषा भाषी थे लेकिन फिर भी उन्होंने खडी बोली में प्रथम प्रबन्ध काव्य ‘सावित्रि’ की रचना की। हिन्दी काव्य में खडी बोली की जो नूतन धारा प्रवाहित हुई उस परम्परा में ‘नवरत्न’ जी ने अपने कई ग्रन्थ लिखे। जो प्रकाशित हुए उनमें उल्लेखनीय हैं सावित्रि (पद्य), रजप्रभा, फल संचय, गीतान्जलि, राई का पर्वत (नाटक),जया जयन्त (नाटक) अमर वचन सुधा, प्रेमकज, भीष्म प्रतिज्ञा, युग पलटा (काव्य) आदि। उनके द्वारा संस्कृत, अंगे*जी, गुजराती विभिन्न भाषाओं में १२५ ग्रन्थ लिखे गए जिनमें कई अप्रकाशित रहे। नेत्र ज्योति चले जाने से २४ वर्ष तक उन्होंने बोलकर साहित्य रचना की। उन्हें हिन्दी, गुजराती, राजस्थानी के अतिरिक्त मराठी, बंगला, उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञान था। उन्होंने जो लिखा कोरी कल्पना के आधार पर ही नहीं बल्कि तप के आधार पर लिखा। वर्ष १९४६ में कराची में हिन्दी साहित्य सम्मेलन हुआ उसमें इन्हें ‘‘साहित्य वाचस्पति’’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष ५८ में उनका सम्मान करना चाहा लेकिन उनके पुत्र ईश्वर लाल के सन् १९५६ में निधन ने उनको जर्जर बना दिया था, इसलिए कहीं आने जाने का उनमें उत्साह नहीं रह गया था। इसके अतिरिक्त इन्दौर की विंध्य सभा ने ‘प्राच्य विद्या महार्णव’, वैष्णव महासभा पटना ने ‘व्याख्यान भास्कर’, सनातन धर्म सभा कलकत्ता ने ‘काव्यालंकार’ तथा झालावाड राज्य ने ‘वाचस्पति’ की उपाधियों से अलंकृत किया था।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की विश्व प्रसिद्ध ‘गीतान्जलि’ का बंगला से सर्वप्रथम इन्होंने हिन्दी में पद्यमय अनुवाद किया, जिसे महाकवि टैगोर ने २७वें हिन्दी साहित्य सम्मेलन भरतपुर में सुना। सुनकर टैगोर ने कहा था ‘‘मेरे भावों को व्यक्त करने में जितनी सफलता आपको मिली अन्य को नहीं मिली।’’ गुरुदेव ने उन्हें संस्कृत में भी अनुवाद करने का आदेश-अनुरोध करने के कारण उन्होंने संस्कृत में भी अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने टैगोर की जिन अन्य कृतियों का हिन्दी अनुवाद किया वे हैं- गार्डनर, झीसेन्ट मून, फ्रूट गेदरिंग, चित्रा (वागवान, बालचन्द्र, फलसंचय एवं चित्रांगदा)। अवलोकें गीतान्जलि से अनुदित गीत की कुछ पंक्तियां-
पूजा पाठ भजन आराधना, साधन सारे दूर हटा,
द्वार बंद कर देवालय के, कोने में क्या है बैठा। (हिन्दी अनुवाद)
भजन, पूजन, साधन, आराधना, समस्त थाक पोडे,
बंद द्वारे देवालयेर कोने के नो रे आछिस ओरे। (मूल पंक्ति)
इसके अतिरिक्त उन्होंने उमर खैय्याम की रुबाइयों का हिन्दी, गुजराती एवं संस्कृत में पद्यमय अनुवाद किया। जिन अंग्रेजी के चयनित रचनाकारों के काव्य उन्होंने हिन्दी में अनुवाद किया वे हैं वड्र्स वर्थ, शेक्सपीयर, कीट्स, शैली, मिल्टन एवं टेलीसन आदि। गोल्ड स्मिथ के प्रसिद्ध काव्य ‘हरमिट’ को संस्कृत में ‘योगी’ शीर्षक से रूपान्तरित किया। नानालाल दलपतनाय गुजराती कवि के साहित्य का हिन्दी अनुवाद किया।
उमर खैय्याम की रुबाइयों से एक पद-
हो अपूर्व रस काव्य लता तरु की छाया हो
सुधा पूर्ण हो कुम्भ, रोटी-टुकडा हो तू हो
गाती सुमधुर गान विजन में बैठ पास मम
आह वही, तो निर्जन वन है मुझे स्वर्ग सम
वर्ड्स वर्थ की कविता से-
उछलता करता बहुत नृत्य है
हृदय होकर मग्न प्रमोद में
विविध रंग भरे सुर चालकों
गगन मंडल में जब मैं लखूं
इसी की अंग्रेजी मूल में कविता
My heart leaps up when I behold
A rainbow in the sky.
मातृभूमि किसी से कुछ मांगती नहीं, लेकिन जिस देश में हम पैदा हुए इसके प्रति हमारा भी दायित्व बनता है। इनकी मौलिक रचनाएं बहुत हैं, इन्हीं में मातृ वंदना से कृछ अंश इस प्रकार हैं- मेरा देश, देश का मैं, देश मेरा जीवन प्राण/मेरा सनमान देश की बढाई में/जीऊंगा स्वदेश हित मरूंगा स्वदेश काज/देश के लिए न कभी करूंगा बुराई मैं।
झालावाड के तत्कालीन नरेश राजेन्द्र सिंह ‘सुधाकर’ (जो स्वयं कवि एवं शायर थे) के महाप्रयाण के समय उन्होंने ‘शोक गीत’ (Mourning song)
लिखा, जो अंगे*जी में प्रचलित (श्वद्यद्गद्द4) के अनुसार हिन्दी में पहली रचना थी।
महाकवि ‘ग्रे’ के सुप्रसिद्ध काव्य ‘‘एलिजी’’ का संस्कृत भाषान्तर ‘‘करुणा प्रशस्तिः’’ के नाम से इन्होंने किया। इसी को हिन्दी में शोक काव्य नाम को सार्थक करने वाली किसी कृति का प्रणयन अभी तक नहीं हुआ। ‘ग्रे’ कहता है श्मशान वह भूमि है जहाँ मानव के सभी सम्बन्धी चिर निद्रा में मग्न होते हैं। न ठण्ड, हवा, न मुर्गों की बांग, न पक्षियों की चहचहाट और न सूरज की किरणों का स्पर्श उन्हें जगा सकता है। यहाँ लोग सोये हैं जिन्होंने हँसी खुशी सम्मान संतोष के साथ जीवन जीया, उच्च कुल, प्रतिष्ठित पद, सुन्दरता और वैभव को भोगा किन्तु अन्त में उन्हें यहीं आना पडा। जीवन का यही अन्त है तो दीनों को क्यों सताया जाये। ‘‘नवरत्न जी ने संस्कृत में बहुत सुन्दर’’ अनुदित किया है।
तकनीकी विषयों पर भी उन्होंने अर्थशास्त्र, व्यापार शिक्षा, सुश्रुषा एवं कठिनाई में विद्याभ्यास आदि युग भावना की बोधक पुस्तकें लिखीं एवं नवरत्न नीति, नागरतन्त्रम, प्रश्नोत्तर रत्नमाला तथा गिरधर सप्तशती उनकी अन्य संस्कृत रचनायें हैं। ‘‘सद्वृत्त पुष्प गुच्छ’’, ‘‘कारक रत्नम’’, ‘‘अभदेरस’’ आदि उनकी कई कृतियां गद्य एवं पद्य की तो अप्रकाशित ही रह गई हैं। उनकी १२५ से अधिक पुस्तकें हैं, जिनमें उनकी जीवनदृष्टि, उनकी अद्भुत मनीषा, उनके विश्वास एवं अध्ययन के दर्शन होते हैं। साहित्य, धर्म दर्शन, भाषा-शास्त्र जैसे अनेक अनुशासनों में उनकी सर्जनात्मकता व्याप्त है। संस्कृत, हिन्दी, गुजराती एवं अंग्रेजी के अतिरिक्त उर्दू, फारसी, मराठी जैसी कई भाषाओं के वे निष्णात विद्वान थे। वे साहित्य के ऐसे बूढे भीष्म थे जिनसे काल भी हार गया और अकाल बन कर छल किया। उन्होंने जैन धर्म दर्शन से सम्बद्ध श्रेष्ठ संस्कृत, प्राकृत कृतियों के अनुवाद
भी किये।
हिन्दी के प्रति पे*म एवं निष्ठा
नवरत्न जी की हिन्दी के प्रति निष्ठा अद्वितीय थी वे इसके लिए निरंतर जूझते रहे। वे चाहते थे एक ऐसे विश्वद्यालय की स्थापना हो जिसमें प्रत्येक विषय की शिक्षा का माध्यम हिन्दी हो। उनकी मान्यता थी कि हिन्दी ही एक मात्र ऐसी भाषा है जो राष्ट्रभाषा का स्थान ले सकती है, क्योंकि उसमें ही वह क्षमता है कि वह देश के करोडों लोगों के बोलचाल की भाषा बन सकती है। उन्होंने कई बार ये विचार प्रकट किये भी कि प्रान्तीय भाषाएं अपने अपने प्रांत में चलें तथा अखिल भारतीय शिक्षा का माध्यम हिन्दी ही होनी चाहिए।
इस सम्बन्ध में एक रोचक संस्मरण बताया जाता है कि मुम्बई में उस वर्ष हिन्दू महासभा का अधिवेशन आयोजित हो रहा था तथा उसकी अध्यक्षता पूज्य महामना मदन मोहन मालवीय कर रहे थे और लोगों के बोलने के बाद जब ‘नवरत्न जी’ की बारी आई तो उन्होंने भाषण में कहा ‘‘मानवीय जी आपको दुनिया आदर देती है तो दे! परन्तु गिरधर शर्मा से तो आप आदर तभी पा सकेंगे जब हिन्दू विश्वविद्यालय की जगह हिन्दी विश्वविद्यालय बनायेंगे, हिन्दू नाम काफी नहीं। हिन्दी के माध्यम से सब विषयों की शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।’’ इस घटना से इनकी तेजस्विता और हिन्दी के प्रति प्रेम का परिचय मिलता है। पंडित जी की प्रबल महत्त्वाकांक्षा रही कि देश में हिन्दी विश्वविद्यालय बने। उन्होंने म. भा. हिन्दी साहित्य समिति की स्थापना सन् १९१४ में इसी दृष्टि से की थी कि उसका विकास ‘‘हिन्दी विश्वविद्यालय’’ में में हो सके। इसलिये उन्होंने परिपूर्ण योजना भी तैय्यार की, सैनिक शिक्षा भी जिसके पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य अंग थी। इस योजना को इन्दौर के तत्कालीन नरेश श्री तुकाजीराव होल्कर एवं बडौदा के विद्याव्यसनी नरेश सयाजीराव गायकवाड के सम्मुख प्रस्तुत भी की गई लेकिन किन्हीं कारणों से खटाई में पड गई एवं होल्कर सरकार का संरक्षण न पा सकी। फलतः म.भा. साहित्य समिति हिन्दी विश्वविद्यालय के रूप में विकसित न हो सकी।
संस्कृत के प्रति उनकी निष्ठा एवं भक्ति अत्यधिक थी। उनका मत था कि संस्कृत में ऐसी शक्ति है वह गागर में सागर भर सकती है। लेकिन संस्कृत को मृतभाषा कहने वालों के प्रति उनका रोष अपार था। उन्होंने डिंगल-पिंगल -वयण, सगाई, सणाई गीतों की रचना संस्कृत भाषा में की तथा संस्कृत की शक्तिमता को सिद्ध कर दिखाया।
कोटा की भारतेन्दु समिति के वे १९३५ में अध्यक्ष बने एवं इस संस्था को नवजीवन दे स्थायित्व प्रदान किया। सन् १९०६ में झालरापाटन में (झालावाड जिला) तथा १९१२ में आपने भरतपुर में साहित्य समिति की स्थापना की तथा वहाँ के साहित्यकारों को हिन्दी के प्रचार प्रसार एवं संवर्धन हेतु कार्य सौंपा।
जीवनी
राजस्थान में झालावाड जिले की एक छोटी सी धर्मिक एवं व्यापारिक नगरी झालरापाटन (जो ४ मील दूरी पर स्थित है) में आपका जन्म ६ जून १८८१ को विद्वान पिता पं. ब्रजेश्वर शर्मा एवं माता श्रीमती पन्नादेवी के यहाँ हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा का प्रबन्ध अनेक गरुओं को नियुक्त कर घर पर ही किया। ये गुरुजन इन्हें हिन्दी, अंगे*जी, संस्कृत, फारसी एवं प्राकृत आदि विभिन्न भाषाएं पढाकर शिक्षा प्रदान करते थे। बाद में इन्हें जयपुर भेजा गया जहाँ इन्होंने कान्हे जी व्यास तथा परम वेदज्ञ द्रविड श्री वीरेश्वर जी शास्त्री के पास संस्कृत पंचकाव्य एवं व्याकरण (महाभाषा) का अध्ययन किया। तत्पश्चात् बनारस चले गये जहाँ इन्होंने म.म.पं. गंगाधर शास्त्री से संस्कृत की शिक्षा ली। १९ वर्ष की अवस्था में अपनी शिक्षा पूर्ण कर वे वापस झालरापाटन लौट आये। बाद में झालावाड स्टेट के राजगुरु बने तथा यहाँ के नवरत्नों में से एक थे।
उन्होंने राष्ट्रभाषा ‘‘हिन्दी’’ के प्रचार प्रसार एवं साहित्य संवर्धन का संकल्प लिया। द्विवेदी मंडल के वे एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे। एक बार वे द्विवेदी जी से मिलने उनके निवास स्थान कानपुर से जूही भी गए थे और द्विवेदी जी ने तब उनका बहुत सम्मान किया था। उन पर हर्षातिरेक से विमुग्ध हो गए। नयनों से प्रेमाश्रु छलक आए। दौडकर स्नेहालिंगन में बांध लिया। उन दिनों साहित्यकार किसी के लेख अथवा काव्य में कोई गुण देख उसमे प्रभावित हो उनसे मिलने जाया करते थे। इसी प्रकार एक बार वे हरिवंश राय बच्चन से भी झालावाड नरेश को साथ लेकर मिलने गये थे। इस प्रकार की यात्राएं करना साहित्यकार धर्म का मुख्य अंग माना जाता था। आज तो साहित्यकारों के दृष्टिकोण बदल गये हैं, दूर-दूर बैठकर एक दूसरे पर अपनी कलमों से विष उगला करते हैं। क्या यह संभव नहीं कि सभी अपनी अपनी अभद्र कटुता से मुक्त हो लेखनी से रस बरसाने लगें, फिर से ऐसी यात्राओं का महत्व नव पीढी के लेखकों में बढाया जा सके।
अन्त में
नवरत्न जी को आधुनिक कविता की उच्छृंखलता एवं सस्तेपन वाला पक्ष पसंद नहीं था। कविता के विषय में उनका दृष्टिकोण था ‘‘कविता वह जो हिय धंसे’’ जो काव्य ‘‘हिय ना धंसे’’ वह उन्हें पसंद नहीं था। निश्चय ही काव्य की आत्मा रस ही स्वीकार की गई।
उनका अंतिम समय अत्यंत कष्टमय बीता। मृत्यु के चौबीस वर्ष पूर्व उनकी नेत्र ज्योति चली गई, बडा परिवार था। मृत्यु से पूर्व ही उनके ज्येष्ठ पुत्र ईश्वर लाल का स्वर्गवास हो गया। अत्यंत विकट परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना धीरज नहीं खोया। अर्थ कष्ट अवश्य सहे पर दीनता नहीं दिखलाई। एक जुलाई सन् १९६१ को साहित्यकाश पर चमकता यह नक्षत्र अस्त हो गया। रेडियो पर यह दुखद समाचार प्रसारित हुआ था।
वे व्यक्ति नहीं रह गये थे। समष्टि होकर व्यक्ति की सीमाओं को तोडकर व्यक्तित्व हो गये थे। इस संसार सागर से अंततः जाना नियति है ही, लेकिन ऐसे अद्वितीय व्यक्तित्व के चले जाने के पश्चात् जो उन्हें स्मरण करने के लिए पीछे शेष रह जाते हैं उनकी स्थिति यही रह जाती है कि वे स्मृतियों के गगन की ओर सदा देखते रहें, निहारते रहें। इन स्मृतियों से मोह जो हो जाता है, इसलिये ये सहज आकर चली जाने वाली नहीं होतीं। अत्यन्त कठिन है इस मोह से मुक्त होना। बडे बडे निर्मोही एवं कठोर हृदयी भी इससे मुक्त नहीं हो पाते। स्मृतियों का यह आकाश जब बादलों से भरपूर होता है तो वे ऊपर से बरसकर भिगो रहे होते हैं, पर बादल कम आँखें ज्यादा भिगो रही होती हैं।
पंडित जी ने अपनी मृत्यु पश्चात् समाधि पर लिखने हेतु यह छंद लिखा था, जिसमें उनके जीवन दर्शन व कर्म क्षेत्र की अभिव्यक्ति है। लेकिन ना ही उनकी समाधि बन पाई और न ही ये पक्तियां वहाँ उकेरी जा सकीं-
अनुचित सत्ता वशीभूत हो शीश झुकाना।
कायरता का काम था जिसने माना।।
रहा सदा स्वाधीन किया मन का चाहा।
दिया सत्य उपदेश उच्चतर चरित्र निभाया।।
दुःखों से नहीं डिगा
न फूला सुख में आकर।
सोता इस ठौर वही
कवि गिरधर नागर।। ?
पोस्ट ऑफिस के पास, मंगलपुरा, झालावाड (राज.)