दलित लेखन का अन्तर्विरोध

डॉ. शैलेन्द्र स्वामी



हिन्दी के स्वनामधन्य विद्वान् प्रो. नामवर सिंह के अनुसार, जैसे लोकतन्त्र की परिभाषा दी जाती है- ‘ऑफ द पीपुल, बाइ द पीपुल, फॉर द पीपुल’ इसी तरह दलितों के द्वारा, दलितों के बारे में, दलितों के लिए जो साहित्य रचा जा रहा है और जो केवल अम्बेडकरवाद से प्रभावित हैं, उसमें न गांधी की मिलावट है, न माक्र्सवाद की-वह है दलित साहित्य।१. कंवल भारती दलित साहित्य से अभिप्राय उस साहित्य से मानते हैं, जिसमें दलितों ने स्वयं अपनी पीडा को रूपायित किया है। अपने जीवन संघर्ष में दलितों ने जिस यथार्थ को भोगा है, दलित-साहित्य उनका उसी की अभिव्यक्ति का साहित्य है। ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है कि दलित समस्या पर गैर दलित नहीं लिख सकते।२. श्री धर्मवीर स्वयं मानते हैं कि दलित साहित्य के बारे में धुंध छाई हुई है। दलित साहित्य की वर्तमान अवधारणा से अनावश्यक पेचीदगियाँ पैदा होती हैं।३. पिछले पचास वर्षों के हिन्दी साहित्य में दलित साहित्य लेखन सहानुभूति बनाम स्वानुभूति के द्वन्द्व से गुजर रहा है। हिन्दी साहित्य में अनेक महान् साहित्यकारों ने दलितों पर रचनाएँ लिखी हैं, लेकिन दलित साहित्यकार प्रेमचन्द से लेकर निराला और नागार्जुन तक की रचनाओं को दलित साहित्य से खारिज कर देता है।४.
‘हंस’, ‘युद्धरत आम आदमी,’ ‘राष्ट्रीय सहारा’ आदि जैसी पत्रिकाएँ और राजेन्द्र यादव, मैनेजर पाण्डेय, रामशराण जोशी,राजकिशोर, अजय तिवारी जैसे साहित्यिक चिन्तकों के कारण हिन्दी में दलित साहित्य की चर्चा हो रही है, परन्तु अभी पारम्परिक अध्यापकों और आलोचकों की एक लम्बी कतार ऐसी है जो दलित साहित्य को स्वतन्त्र अथवा हिन्दी साहित्य की एक नई मुख्य धारा नहीं मान केवल सामान्य प्रवृत्ति के रूप में व्याख्यायित कर रही है, वह भी एक सीमा के अन्दर ही। परिणामतः चाहे वह ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’ हो अथवा डॉ. धर्मवीर की ‘कबीर के आलोचक’, ये पुस्तकें पाठकों द्वारा बहुत धीरे-धीरे पढी जाएँगी, क्योंकि अब तक की परम्परा यही बताती है कि बिना शिक्षण संस्थानों से जुडे और अध्यापकों द्वारा व्याख्यायित हुए किसी भी कृति ने कालजयी होने का गौरव नहीं प्राप्त किया है, चाहे वह प्रेमचन्द कृत ‘गोदान’ हो अथवा फणीश्वरनाथ रेणु कृत ‘मैला आँचल’।५.
‘जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विजो भवेत’ अर्थात् जन्म से हर आदमी शूद्र होता है और संस्कार से द्विज बनता है। कोई लेखक दलित कुल में जन्म लेने से ही दलित चेतना का संवाहक नहीं हो जाता। यह भी हो सकता है कि आगे चलकर दलितों पर अत्याचार और शोषण करने वाला सिद्ध हो जाये। बहुत से दलित आईएएस या आईपीएस अधिकारी बन जाते हैं। उन्हें कितनी अपनी नौकरी की चिन्ता है और कितनी दलितों की-यह हम सब जानते हैं।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की प्रो. (डॉ.) रामकली सर्राफ दलित लेखन आन्दोलन पर टिप्पणी लिखती हैं-‘‘यह बिडम्बनात्मक ही है कि वर्णव्यवस्थाजन्य ऊँच-नीच, जाति-पाँति के विरोध-भाव के साथ जो आन्दोलन शुरु हुआ था, आज वह उसी की गिरफ्त में है। बुनियादी नौकरियों में पहुँचे आरक्षित सुविधाओं से लैस सुसभ्य बने दलित लेखकों द्वारा अपने बीच ही जातिगत ऊँच-नीच के विभेद को जीने, खुलकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने, अलग-अलग खेमे बनाकर मठाधीशी करने की प्रवृत्ति में लिप्त होना अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। दलितों का एक समूह स्वयं दलितों के लिए ही अस्पृश्य हो जाए, इससे बढकर ट्रेजेडी क्या हो सकती है ? यह भी गौरतलब है कि बार-बार दलित पीडा के मुखारित होने के बावजूद दलितों की ऐतिहासिक स्थिति में कोई बडा बदलाव नहीं आया। दलित लेखकों को अपनी आत्मसन्तुष्ट जडता पर ध्यान देना चाहिए कि केवल सवर्ण विरोध, उनके प्रति आक्रोश, क्षोभ, घृणा या व्यथा-कथा के अंकन के इकहरे यथार्थ अथवा सिर्फ स्वानुभूति तक सिमटी रचनाशीलता में पुनरावृत्ति की सम्भावनाएँ बढेंगी और नए विकल्प की तलाश क्षीण पडती जाएगी।६.
दलित स्त्रियों की हैसियत को लेकर भी अन्तर्विरोध दिखलाई देता है। इसकी ओर संकेत करती हुई दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. निर्मला जैन लिखती हैं-‘दलित साहित्य और आलोचना में एक दिक्कत तलब बात स्त्रियों की हैसियत को लेकर भी है। दोहरे शोषण की शिकार-सवर्णों के हाथों और अपने ही वर्ण के पुरुषों के हाथों। स्त्री पात्रों के बारे में दलित चिन्तकों का रवैया पर्याप्त विवादास्पद है। इस समुदाय की स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक समाज के मेहनतकश/श्रमिक वर्ग में आती हैं। श्रम वे करती हैं और कमाई पर अधिकार शराबी, जुआरी, नशेडी पुरुष का होता है। इसके अलावा परिवार में उसकी भूमिका के बारे में इस वर्ग का सोच सवर्णों से अलग नहीं है। दलितों में इस ‘दलित’ वर्ग के बारे में अलग से ध्यान दिया जाना बहुत जरूरी है।’’७.
दलित साहित्यकार सवर्णों की आलोचना तो करते हैं किन्तु की स्वयं की आलोचना सुनने को तैयार नहीं होते। इस अन्तर्विरोध पर प्रो. मैनेजर पाण्डेय कहते हैं-‘‘दलित साहित्य से अधिक दलित साहित्य-आन्दोलन के भीतर एक प्रवृत्ति मुझे चिन्तित कर रही है, वह यह है कि अनेक दलित लेखक किसी तरह की अपनी आलोचना सुनने के लिए, सहने और उस पर विचार करने को तैयार नहीं लगते। प्रायः कमजोर रचनाकार आक्रामक आलोचक बन जाता है। यह स्थिति दलित साहित्य लेखन में भी दिखाई देती है, जो दलित साहित्य के विकास को बाधित करती है और करेगी। मैं बहुत पहले से यह कहता चला आ रहा हूँ कि जो लोग रचनाशीलता की दुनिया में नई राहें खोज रहे हैं-उनको अपनी आलोचना सुनने और उस पर विचार करने की आदत भी डालनी चाहिए।’’८.
दलित समाज भी अन्तर्विरोध से ग्रसित है। दलित समाज के भीतर एक और वर्णवाद विस्तार ले रहा है जहाँ उच्च और निम्न वर्ग की नई श्रेणीबद्ध श्ाृंखला निर्मित हो चुकी है। चमारों का वर्ग मेहतरों को कतई अपने समकक्ष मानने को तैयार नहीं होता। दलित समाज की विभिन्न जातियों में आपसी रोटी-बेटी का सम्बन्ध निषेध है। पढा-लिखा दलित अनपढ दलित को गले लगाना नहीं चाहता। उच्च पद प्राप्त दलित व्यक्ति स्वयं को विशिष्ट मानने लग जाता है। शहरी दलित व्यक्ति ग्रामीण दलित व्यक्ति से स्वयं को श्रेष्ठ मानता है।
दलित लेखन का अभिव्यक्ति पक्ष कमजोर है। गाली-गलौच से साहित्य निर्मित नहीं किया जा सकता। प्रो. कुंवर पाल सिंह बताते हैं-‘‘साहित्य में दलित चेतना को लेकर भ्रम की स्थिति है, जिसके परिणामस्वरूप सार्थक रचनाएँ सामने कम आ रही हैं। गाली-गलौज साहित्य नह होता। दलित रचनाकार दलित राजनीति की ओर अधिक उन्मुख हैं, साहित्य की ओर कम। साहित्य के लिए गहरी संवेदना की आवश्यकता होती है। उपन्यास जैसी विधा के लिये तो वृहद् दृष्टिकोण का होना नितान्त आवश्यक है। प्रेमचन्द के समय से शुरू हुए दलित चेतना के स्वर अभी बहुत आगे नहीं गए हैं, जिनका सामाजिक समरसता के लिए तीव्र होना जरूरी है।’’९. भारत म ९० प्रतिशत दलित गाँवों में रहते हैं। गांवों में शोषण, पीडा और उत्पीडन अधिक है, किन्तु दलित चेतना के साहित्य को ग्रामीण दलित समझ नहीं पाता है, क्योंकि अधिकांशतः ग्रामीण दलित शिक्षित नहीं है। दलित साहित्य सम्मेलन भी बडे-बडे शहरों तक ही सीमित है, जिनमें केवल लिखने पढने वाले लोग ही शामिल होते हैं। परिणामस्वरूप दलित लेखन सीमित क्षेत्र में ही बँधा रह जाता है।
आज के बाजारवाद के युग में आर्थिक वैषम्य मुख्य है, जिसके निष्क्रिय प्रतिबिम्बों के निकट खडे मौजूद दलित-विमर्श में इसकी धमक नहीं मिलती, न ही राजनीति के भीतर दलितों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का कोई चिन्तन या पुख्ता कार्यक्रम मिलता है। मात्र वर्ण व्यवस्था विरोध से आर्थिक वैषम्यपूर्ण स्थितियों से छुटकारा मिल जायेगा, यह समझना निरा भ्रम है, जबकि पूरे दलित लेखन में इसी भ्रम की गूँज है। इस समझ से बाहर आकर उन्हें गरीबी, भूख, बेकारी, भ्रष्टाचार आदि से कतराने की बजाय उससे रूबरू होना चाहिये। बाजार के लिये जातिवाद-दलितवाद कोई मायने नहीं है। ............केवल सवर्ण विरोध, गुस्सा, आक्रोश आदि प्रतिक्रियावादी साबित होगा। जाहिर है कि प्रतिरोध भाव के साथ संघर्षशील विकल्पभाव बनाए रखना होगा, तभी दलित का लेखन का यह जीवन्त महनीय उभार अपने महत्त्व को अक्षुण्ण बनाए रखने में समर्थ होगा।१०. ?
सन्दर्भ-
१. प्रो. नामवर सिंह, दलित लेखन का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और वर्तमान सन्दर्भ (आलेख), ‘दलित लेखन के अन्तर्विरोध’-(सं.) डॉ. रामकली सर्राफ, पृष्ठ १५ (प्रकाशक-शिल्पायन, दिल्ली, वर्ष २००९)
२. कंवल भारती, दलित साहित्य की अवधारणा, पृष्ठ १७३
३. धर्मवीर, दलित साहित्य की परिभाषा, पृष्ठ ३८
४. डॉ. रेणु वर्मा, दलित विमर्श (साहित्यिक निबन्ध), पृष्ठ ४९-५०
६. डॉ. रामकली सर्राफ, दलित लेखन का अन्तर्विरोध, पृष्ठ ९-१०
७. प्रो. निर्मला जैन, दलित प्रसंग ः विमर्श और साहित्य,
पृष्ठ ३३-३४
८. प्रो. मैनेजर पाण्डेय, हिन्दी साहित्य का लोकतंत्रीय दलित साहित्य, पृष्ठ ४१
९. प्रो. कुंवरपाल सिंह, दलित चेतना और हिन्दी उपन्यास, पृष्ठ ६५
१०. डॉ. रामकली सर्राफ, दलित लेखन का अन्तर्विरोध,
पृष्ठ १९८-१९९
राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, जोधपुर (राज.)