उपेक्षिताओं का साकेत

डॉ. रवीन्द्र कुमार उपाध्याय




मैथिलीशरण गुप्त ने रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रसिद्ध निबन्ध ‘‘काव्येर उपेक्षिता’’ से प्रेरित हो कर ‘साकेत’, ‘विष्णुप्रिया’ और ‘यशोधरा’ काव्यों का सृजन किया। गुप्त का दृढ विश्वास था कि-
राम तुम्हारा वृत्त आप ही काव्य है,
कोई कवि बन जाए, सहज समभाव्य है। (साकेत, सर्ग ५)
गुप्त के लिए भारत भूमि जमीन का एक भूखण्ड नहीं थी, बल्कि यह तो धर्म और आदर्श का निकेतन है जो स्वर्ग के समान हो कर भी निराश्रयों के आश्रय का स्थान है। गुप्त ने साकेत नगरी के माध्यम से भारतवर्ष की भव्यता का वर्णन किया है-
देख लो, साकेत नगरी है यही,
स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही। (साकेत, सर्ग ढ्ढ)
गुप्त का एक ही प्रश्ा* था कि भारत भूमि पर पापियों का थाना क्यों?
भरत खण्ड का द्वार विश्व के लिए खुला है,
भुक्ति-मुक्ति का योग जहाँ पर मिला जुला है।
पर जो इस पर अनाचार करने आवेंगे,
नरकों में भी ठौर न पाकर पछतावेंगे। (साकेत, सर्ग १२)
रामकथा का सर्वाधिक उपेक्षित पात्र उर्मिला रही है। दशरथ की तीनों रानियाँ-कौशल्या, सुमित्रा व कैकेयी उनके साथ थीं। सीता वनवास में भी राम के साथ रहीं। माण्डवी और श्रुतकीर्ति अयोध्या में अपने-अपने पति क्रमशः भरत और शत्रुघ्न के साथ थी। वैवाहिक जीवन में पति-वियोग की सर्वाधिक पीडा उर्मिला ने सहन की। मैथिलीशरण गुप्त ने उर्मिला की मूक पीडा को ‘साकेत’ में मुखर किया और उर्मिला के अप्रतिम सौंदर्य को लेकर उसके उदात्त विचारों को अभिव्यक्त किया। गुप्त ने उर्मिला को ‘‘स्वर्ग का सुमन’’ कहा जिसे देखकर लक्ष्मण ही नहीं, शुक (तोता) जैसे पक्षी भी भ्रान्तिमान हो जाते हैं-
नाक का मोती अधर की कान्ति से,
बीज दाडिम का समझकर भ्रान्ति से।
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है,
सोचता है, अन्य शुक यह कौन है। (साकेत, सर्ग ढ्ढ)
अग्रज-सेवा हेतु राम के साथ वनगमन को आतुर लक्ष्मण के प्रति उर्मिला दुविधाग्रस्त हो जाती है। यदि उर्मिला लक्ष्मण के साथ वन जाती है तो पति के संकल्प-‘‘प्रभु श्रीराम की सेवा’’ में बाधा उत्पन्न होती है और अयोध्या में रहती है तो उसे १४ वर्ष का पति से वियोग सहन करना पडेगा। उर्मिला क्या करे? पति के साथ जाए या वियोग सहन करे।
उर्मिला अपने पति लक्ष्मण के भावी जीवन को विचार कर पति-वियोग को सहर्ष स्वीकार करती है-
कहा उर्मिला ने- ‘‘हे मन!
तू प्रिय-पथ का विघ्न न बन।
आज स्वार्थ है त्याग भरा।
हो अनुराग विराग-भरा। (साकेत, सर्ग ४)
उर्मिला द्वारा अयोध्या में रह कर सास-ससुर की सेवा करने के महाव्रत की सीता भी प्रशंसा करती है, किन्तु उर्मिला के पति-वियोग को कष्टकर मानती है-
सीता ने अपना भाग लिया,
पर इसने वह भी त्याग दिया।
गौरव का भी है भार यही,
उर्वी भी गुर्वी हुई यही।
नव वय में ही विश्लेष हुआ,
यौवन में ही यति-वेश हुआ।
किस हत विधि का यह योग हुआ।
सुख-भोग भयंकर रोग हुआ।। (साकेत, सर्ग ६)
उर्मिला को भयंकर दुःख है कि उसे अपने पति का साथ-हाथ नहीं मिला, किन्तु पति का प्रेम सदैव उसके
साथ होगा-
आराध्य युग्म के सोने पर
निस्तब्ध निशा के होने पर
तुम याद करोगे मुझे कभी,
तो बस फिर मैं पा चुकी सभी। (साकेत, सर्ग ६)
जब अयोध्यावासी राम-लक्ष्मण-सीता से मिलने हेतु चित्रकूट पहुँचते हैं तब सीता के आग्रह पर लक्ष्मण उर्मिला से मिलने के लिए कुटिया में जाते हैं तो वियोगी-विरहिणी रेखा समान कोणस्थ उर्मिला को पहचान नहीं पाते हैं कि यह उर्मिला की काया है या उसकी छाया। लक्ष्मण अपने पवित्र दाम्पत्य का परिचय देते हुए उर्मिला से विनती करते हैं कि मुझे तपस्या करके तुम्हारे योग्य बनने दो-
भाभी की भगिनी तुम मरे
अर्थ नहीं केवल उपभोग्य। (साकेत, सर्ग ८)
उर्मिला की करुण प्रार्थना से द्रवित लक्ष्मण उर्मिला के चरणों में गिर पडते हैं-
मेरे उपवन के हरिण, आज वनचारी,
मैं बांध न लूंगी तुम्हें, तजो भय भारी।
गिर पडे दौड सौमित्रि प्रिया-पद-तल में,
वह भींग उठी प्रिय-चरण धरे दृग-जल में (साकेत, सर्ग ८)
‘साकेत’ में कवि ने उर्मिला की स्थिति मकडी के समान दिखलाई है। उर्मिला को आठ पहर चौसठ घडी अपने प्रियतम का ध्यान है जिसके वियोग में उर्मिला ने स्वयं को भुला दिया। पति के वियोग में उर्मिला ने अपने मन-मन्दिर में प्रियतम की प्रतिमा स्थापित कर ली और स्वयं आरती बन कर जलने लगी थी। महलों के भोग उर्मिला के लिए रोग एवं विषम प्रयोग बन चुके थे। उर्मिला ने श्ाृंगार, सौन्दर्य, सुगन्धित द्रव्य आदि सब सुख-सुविधाओं का परित्याग कर दिया था। उर्मिला अपने प्रेम की तुलना दीपक और पतंग से करती है-
दीपक के जलने में आली,
फिर भी है जीवन की लाली,
किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली
किसका वश चलता है। (साकेत, सर्ग ९)
उर्मिला पति के वियोग को सहर्ष स्वीकारती हुई कहती है कि मैंने उनके साथ सुख भोगे हैं तो फिर उनके लिए दुःख क्यों नहीं भोगूँ? उर्मिला रात्रि में स्वप*ों की प्रतीक्षा करती है और लक्ष्मण के लिए संदेश भेजती है-
मन को यों मत जीतो,
बैठी है यहाँ मानिनी, सुध लो इसकी भी तो! (साकेत, सर्ग ९)
विरहिणी उर्मिला का दुःख असह्य है-
मेरी छाती दलक रही है,
मानस-शफरी ललक रही है,
लोचन सीमा झलक रही है
आगे नहीं सहारा!
सखि, निरख नदी की धारा। (साकेत, सर्ग ९)
उर्मिला महलों में सभी के लिए भोजन बनाती, उन्हें खिलाती और स्वयं तृप्त हो जाती है। एक बार कोई सखी उर्मिला को खीर देती है, किन्तु उर्मिला खाने से मना कर
देती है-
आँखों का नीर ही क्या कम फिर मुझको?
चाहिए और क्या हा! (साकेत, सर्ग ९)
सीता के अनुसार उर्मिला को न पति के साथ वन मिला और न पति के साथ भवन मिला। उर्मिला कामदेव को चुनौती देती है-
नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो,
बल हो तो सिन्दुर-बिन्दु-यह हरनेत्र निहारो!
रूप-दर्प कन्दर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,
लो, यह मेरी चरण-धूलि उस रति के सिर पर धारो! (साकेत, सर्ग ९)
स्वयं रोकर भी लक्ष्मण के लिए हँसते रहने की कामना करने वाली उर्मिला ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ के भाव प्रकट करती है-
तरसूँ मुझ-सी मैं ही, सरसे-हरसे-हँसे प्रकृति प्यारी,
सबको सुख होगा तो मेरी भी आयेगी बारी । (साकेत, सर्ग ९)
शिला को काटती उर्मिला को पति से मिलन की आशा है-
मेरे चपल यौवन-बाल!
अंचल अंचल में पडा सो, मचल कर मत साल।
बीतने दे रात, होगा सुप्रभात विशाल,
खेलना फिर खेल मन के पहन के मणि-माल।
पक रहे हैं भाग्य-फल तेरे सुरम्य-रसाल,
डर न, अवसर आ रहा है, जा रहा है काल। (साकेत, सर्ग ९)
उर्मिला नहीं चाहती है कि लक्ष्मण ‘‘भातृसेवा’’ का धर्म त्याग कर उससे मिले। उर्मिला तन से दूर रहकर भी सदैव मन से लक्ष्मण से साथ थीं। उर्मिला ने १४ वर्ष तक महलों में रहकर भी जल ग्रहण नहीं किया था, यह माण्डवी-भरत वार्तालाप से ज्ञात होता है-
नाथ, यहाँ कह कर माँओं को
किसी भाँति कुछ खिला सकी,
पर उर्मिले बहन को यह मैं
आज न जल भी पिला सकी। (साकेत, सर्ग ११)
लंका विजय के पश्चात श्रीराम को उर्मिला की चिन्ता सताती है जो लक्ष्मण के वियोग में व्याकुल है-
चलो, समय पर मिलें अयोध्या जा कर सबसे,
वधू उर्मिला मार्ग देखती है घर कब से। (साकेत, सर्ग १२)
उर्मिला ने पति के वियोग में १४ वर्ष रो-रो कर व्यतीत कर दिये किन्तु अब मिलने के अवसर पर वह रोना नहीं चाहती है। लंका विजय करके घर आये लक्ष्मण से मिलने के लिए उर्मिला सजना-संवरना नहीं चाहती है-
हाय! सखी, श्ाृंगार? मुझे अब भी सोहेंगे?
क्या वस्त्रालंकार मात्र से वे मोहेंगे? (साकेत, सर्ग १२)
मैथिलीशरण गुप्त को दुःख एवं आश्चर्य है कि सहधर्मचारिणी के भी ऊपर धर्मस्थापना करने वाली उर्मिला की मूक वेदना को किसी भी लेखक व कवि ने अपने काव्य में स्थान नहीं दिया। गुप्त ने ‘साकेत’ में उर्मिला के साथ-साथ रामकथा के अन्य उपेक्षित पात्रों कैकेयी, माण्डवी, श्रुतकीर्ति आदि की पीडा-वेदना को स्थान दिया।
रामकथा के सर्वाधिक गर्हित नारी पात्र कैकेयी के प्रति भी मैथिलीशरण गुप्त ने गहरी संवेदना प्रकट की है जिसकी पीडा इतनी-सी है कि राम के राजतिलक पर भी भरत जैसे भाई को चक्रवर्ती सम्राट दशरथ ने बुलाना उचित नहीं समझा-
भरत-से सुत पर भी सन्देह,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह। (साकेत, सर्ग २)
राम और भरत में तनिक भी भेद नहीं मानने वाली कैकेयी अपनी दासी मंथरा के बहकावे में आकर भरत के लिए अयोध्या का राज्य और राम के लिए १४ वर्ष का वनवास दशरथ से मांग तो लेती है किन्तु कैकेयी इसके लिए आजीवन पछताती है-
करके पहाड-सा पाप मौन रहा जाऊँ,
राई भर भी अनुताप न करने पाऊँ?
भरत को जन्म देकर भी कैकेयी भरत के मन की बात नहीं जान पाती है और रामवनवास के लिए स्वयं को अपराधी ठहराती है और चित्रकूट की भरी सभा में भरत की माता होने का पद चाहती है-
थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके,
जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चुके?
छिने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे?
हे राम, दुहाई करूँ और क्या तुझसे? (साकेत, सर्ग ८)
‘साकेत’ में कैकेयी द्वारा रामवनवास के लिए किया गया पश्चाताप और अनुताप कैकेयी के लिए वरदान बन जाता है और सारे अयोध्यावासी कैकेयी की जयकार करने लगते हैं-
युग युग तक चलती रहे कठोर कहानी-
रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी।
निज जन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा
धिक्कार! उसे था महास्वार्थ ने घेरा।
‘‘सौ बार धन्य वह एक लाल की माई
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।’’ (साकेत, सर्ग ८)
दशरथ के साथ देवासुर संग्राम में भाग ले चुकी कैकेयी हनुमान के मुख से राम-रावण युद्ध का समाचार सुनकर भरत के साथ लंका जाने को तैयार हो जाती है। लंकाविजय के पश्चात अयोध्या लौटने पर राम सर्वाधिक प्रशंसा कैकेयी की ही करते हैं-
समझी प्रभु ने कसक भरत-जननी के मन की,
‘‘मूल शक्ति माँ, तुम्हीं सुयश के इस उपवन की।’’ (साकेत, सर्ग १२)
दशरथ के राज परिवार में होने वाले महाभारत के लिए अक्सर कैकेयी की दासी मंथरा को दोषी ठहराया जाता है किन्तु मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार मंथरा ने कैकेयी को दशरथ से दो वरदान मांगने के लिए उकसा कर अपने कर्तव्य का निर्वाह मात्र किया था-
देखकर किन्तु स्वामि-हित-घात
निकल ही जाती है कुछ बात। (साकेत, सर्ग २)
मंथरा कैकेयी की दासी हो कर भी राजनीति की कुटनीतियों को अच्छी तरह समझती थी। कैकेयी का स्वभाव बहुत ही सरल एवं सहज था, इसलिए कैकेयी के सुरक्षित राजनैतिक भविष्य हेतु चतुर दासी मंथरा को कैकय नरेश ने कैकेयी के साथ अयोध्या भेजा था। राम के राज्याभिषेक के अवसर पर राम को सर्वाधिक प्रेम करने वाले भरत की अयोध्या में अनुपस्थिति मंथरा को रास नहीं आती है और यहीं से स्वामीभक्त मंथरा के मन में शंका की चिनगारियाँ सुलगने लगती है। मंथरा कैकेयी को समझाती है-
सरलता भी ऐसी है व्यर्थ
समझ जो न सके अर्थानर्थ।
भरत को करके घर से त्याज्य
राम को देते हैं नृप राज्य।
भरत-से सुत पर भी सन्देह,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह। (साकेत, सर्ग २)
भरत-पत्नी माण्डवी का जीवन अयोध्या के राजमहलों में भी भरत जैसा तापसी और सात्विक था। राम के वियोग में दुखी भरत की भाँति माण्डवी ने भी १४ वर्ष तक निरन्तर निराहार रह कर अपने पतिव्रत्य का परिचय दिया था। (साकेत, सर्ग ११), क्योंकि भरत ने १४ वर्ष तक नंदीग्राम में उपवास किया था।
राम-वनवास से दुखी भरत अयोध्या के बाहर नन्दीग्राम में कुटिया बना कर रहते थे तथा माण्डवी प्रतिदिन भरत के दर्शन करने वहाँ आती थी। राम के ध्यान में लीन भरत को कई बार भान भी नहीं होता था कि माण्डवी उनके दर्शनार्थ बाहर खडी है और माण्डवी दो बूंद आँसू छलका कर वहाँ से चली जाती थी, यह सोचकर कि पति की भातृ-भक्ति में विघ्न उत्पन्न नहीं हो।
सहसा शब्द हुआ कुछ बाहर
किन्तु न टूटा उनका ध्यान
कब आ पहुँची वहाँ माण्डवी,
हुआ न उनको इसका ज्ञान (साकेत, सर्ग ११)
रामकथा में उपेक्षित अधिकश नारी पात्र ‘साकेत’ में अपनी मुखर उपस्थित दर्ज कराते हैं। हनुमान के मुख से राम-रावण युद्ध का समाचार सुन कर श्रुतकीर्ति अपने पति शत्रुध्न को लंका जाने हेतु प्रेरित करती हैं-
जाओ स्वामी, यही माँगती मेरी मति है
जो जीजी की, उचित वही मेरी भी मति है।(साकेत, सर्ग १२)
लंका की अशोक वाटिका में बन्दिनी सीता विभीषण की पत्नी सरमा से प्राप्त सहानुभूति-सेवा सुश्रुषा से प्रसन्न होकर सरमा को लंका की साम्राज्ञी होने का आशीर्वाद
देती है-
सरमे, क्या दूँ तुम्हें, जियो लंका की रानी।
वसुधा का राजत्व निछावर तुम पर साध्वी,
रक्खे मुझको मत्त इन्हीं चरणों की माध्वी।(साकेत, सर्ग १२)
‘साकेत’ की सीता वन म स्वावलम्बन की शिक्षा ग्रहण करती है-
औरों के हाथों यहाँ नहीं पलती हूँ,
अपने पैरों पर खडी आप चलती हूँ। (साकेत, सर्ग ८)
कौशल्या राम के राज्याभिषेक नहीं होने का दुःख नहीं मनाती है-
मुझे राज्य का खेद नहीं,
राम-भरत में भेद नहीं
मँझली बहन राज्य लेवें
उसे भरत को दे देवें (साकेत, सर्ग ४)
राम-रावण युद्ध का समाचार प्राप्त कर भरत और शत्रुध्न सहित कई अयोध्यावसी लंका जाने हेतु तैयार हो जाते हैं किंतु कौशल्या अब अपने पुत्रों (भरत-शत्रुध्न) को खोना नहीं चाहती है। वह भरत-शत्रुध्न को लंका नहीं जाने देना चाहती है। कौशल्या के विपरीत सुमित्रा अपने दूसरे पुत्र शत्रुध्न को भी राम-रावण युद्ध में भाग लेने हेतु लंका भेजना चाहती है-
जीजी जीजी उसे छोड दो, जाने दो तुम।
सोदर की गति अमर-समर में पाने दो तुम।(साकेत, सर्ग १२)
राजा दशरथ के परिजन एक-दूसरे की कमियाँ नहीं निकालते थे। माण्डवी भरत से कहती है-
नाथ, देखती हूँ इस घर में
मैं तो इसमें ही सन्तोष
गुण अर्पण करके औरों को,
लेना अपने सिर सब दोष। (साकेत, सर्ग ११)
राम के वियोग में १४ वर्ष तक कई अयोध्यावासियों ने उपवास, फलाहार व निराहार रह कर अपनी राम-भक्ति का परिचय दिया। माण्डवी कहती है-
कोई तापस, कोई त्यागी
कोई आज विरागी है।
घर संभालने वाले मेरे
देवर ही बडभागी है। (साकेत, सर्ग ११)
मैथिलीशरण गुप्त ‘साकेत’ में माताओं के माहात्म्य का वर्णन करते हैं-
होता कुछ भी वहाँ कहाँ से
जहाँ न होती माताएँ? (साकेत, सर्ग ११)
निषाद सीता को अपनी कुलदेवी मानता है तथा राम से अपना आतिथ्य स्वीकार करने की प्रार्थना करता है-
त्रुटियों पर पद-धूलि डालिए आइए,
घर न देख कर, मुझे निहार निभाइए।
न हों योग्य आतिथ्य, अटल अनुरक्ति है,
चाह मुझमें शक्ति न हो, पर भक्ति है।
उपेक्षिताओं के आश्रय ‘साकेत’ में श्रीराम धरती पर अपने आगमन का उद्देश्य बताते हुए कहते हैं-
मैं आर्यों का आदर्श बताने आया।
जन-सम्मुख धन को तुच्छ जताने आया।
सुख-शन्ति-हेतु मैं क्रान्ति मचाने आया,
विश्वासी का विश्वास बचाने आया,
मैं आया उनके हेतु कि जो तापित हैं
जो विवश, विकल, बल-हीन, दीन शापित हैं।
हो जायं अभय वे जिन्हें कि भय भासित हैं।
जो कोणप-कुल से मूक-सदृश शासित हैं।(साकेत, सर्ग ८)
श्रीराम इस संसार में वैभव तथा मनुष्य को ईश्वरता प्रदान करना चाहते हैं-
सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया। (साकेत, सर्ग ८)
महिला सशक्तिकरण ‘साकेत’ का प्रबल पक्ष है, जहाँ अबला का अपमान बलवानों का अपमान है-
अबला का अपमान सभी बलवानों का है,
सती-धर्म का मान मुकुट सब मानों का है।(साकेत, सर्ग १२)
सीता जनक की सभी पुत्रियों को सौ पुत्रियों से अधिक पूतशीला मानती हैं जो वंशों को पवित्र करती है। उर्मिला का पालन-पोषण लडके की भाँति हुआ था-
कहते है- ‘हम चौक पूरते।’
‘लडकी हो?’- हँस तात घूरते।
करती जब नाट्य ठाठ का,
घर में भी करवाल काठ का।
तब माँ अति मोद मानतीं,
मुझको वे ‘लडका’ बखानती। (साकेत, सर्ग १०)
लक्ष्मण ने उर्मिला को कभी ‘‘अवश-अबला’’ नहीं समझा। वे उसे ‘‘सकल बलवीरता, विश्व की गम्भीरता, ध*ुव वीरता’’ आदि कहकर सम्बोधित करते। लक्ष्मण के अनुसार दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी की हार ही एक दूसरे की जीत होती है-
हार जाते पति कभी, पत्नी कभी,
किन्तु वे होते अधिक हर्षित तभी।
प्रेमियों का प्रेम गीतातीत है
हार में जिसमें परस्पर जीत है। (साकेत, सर्ग १)
समाज में उपेक्षित किसानों की भी गुप्त ने प्रशंसा की है तथा राजपरिवारों को किसानों से शिक्षा ग्रहण करने का संदेश दिया
हम राज्य लिए मरते हैं!
सच्चा राज्य परन्तु हमारे कृषक ही करते हैं।
जिनके खेतों में है अन्न
कौन अधिक उनसे सम्पन्न?
पत्नी सहित विचरते हैं वे, भव-वैभव भरते हैं।
हम राज्य लिए मरते हैं। (साकेत, सर्ग ९)
‘साकेत’ के माध्यम से राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने भारतीय जनमानस में स्वाधीनता के भाव जाग्रत करने का प्रयास भी किया-
भारत लक्ष्मी पडी राक्षसों के बन्धन में,
सिन्धु पार वह बिलख रही है व्याकुल मन में
बैठा हूँ मैं भण्ड साधुता धारण करके
अपने मिथ्या भरत नाम को नाम न धर के (साकेत, सर्ग १२)
असहाय और उपेक्षितों को उर्जावान एवं उत्साहित करने के लिए गुप्त ने ‘साकेत’ में जीवन के कई सूत्र प्रदान किये हैं-
जीवन क्या है, एक जूझना मात्र जनों का,
और मरण? वह नया जन्म है पुरातनों का (साकेत, सर्ग १२)
क्लीव-कापुरुष जाग जाग कर भी है सोता,
पर साके को शूर स्वप्न में भी कब खोता? (साकेत, सर्ग १२)
शंकाएँ है जहाँ, वहीं धीरों की मति है,
आशंकाएँ जहाँ, वहीं वीरों की गति है।(साकेत, सर्ग १२)
नाथ, बली हो कोई कितना
यदि उसके भीतर है पाप,
तो गजभुक्तकपित्थ-तुल्य वह
निष्फल होगा अपने आप। (साकेत, सर्ग ११)
मरण है अवकाश, जीवन कार्य। (साकेत, सर्ग ८)
कवि का आशावाद ‘साकेत’ में सभी को प्रेरित करता है-
तदपि रात चाहे जिनती हो
उसके पीछे एक प्रभात। (साकेत, सर्ग ११)
दिन बारह वर्षों में
घूडे के भी सुने गये हैं फिरते? (साकेत, सर्ग ९)
तप में तप कर ही वर्षा में
होती है उर्वरा धरा। (साकेत, सर्ग ११)
बाधाओं के भीतर ही तो
कार्य-सिद्धि करती है वास। (साकेत, सर्ग ११)
जीवन में सुख-दुःख निरन्तर
आते जाते रहते हैं
सुख तो सभी भोग लेते हैं,
दुःख धीर ही सहते हैं। (साकेत, सर्ग ११)
सत्य सदा शिव होने पर भी
विरूपाक्ष भी होता है,
और कल्पना का मन केवल
सुन्दरार्थ ही रोता है। (साकेत, सर्ग ११)
पास पास ये उभय वृक्ष देखो, अहा!
फूल रहा है एक, दूसरा झड रहा।
‘‘ऐसी ही दशा प्रिये, नर लोक की,
कहीं हर्ष की बात, कहीं पर शोक की। (साकेत, सर्ग ५)
माना आर्य, सभी भाग्य का भोग है,
किन्तु भाग्य भी पूर्वकर्म का योग है। (साकेत, सर्ग ५)
बांध सकता है कहाँ परन्तु-
राघवों को अदृष्ट का तन्तु?
भाग्यवश रहते हैं बस दीन
वीर रखते हैं उसे अधीन। (साकेत, सर्ग २)
मनुज दुग्ध से, दनुज रूधिर से
अमर सुधा से जीते हैं,
किन्तु हलाहल भव-सागर का
शिव-शंकर ही पीते हैं। (साकेत, सर्ग ११)
आनन्द हमारे ही अधीन रहता है,
तब भी विषाद नरलोक व्यर्थ सहता है।
करके अपना कर्त्तव्य रहो सन्तोषी,
फिर सफल हो कि विफल, न होंगे दोषी। (साकेत, सर्ग ८)
अब उठो हे वत्स, धीरज धार,
बैठते हैं वीर क्या थक-हार?
शत्रु-शर-सम तुम सहो यह शोक
सतत कर्मक्षेत्र है नर लोक। (साकेत, सर्ग ७)
गौरव क्या है, जन-भार वहन करना ही
सुख क्या है, बढकर दुःख सहन करना ही। (साकेत, सर्ग ८)
समग्रतः कहा जा सकता है कि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ साहित्य में उपेक्षित पात्रों का आश्रयस्थल है जहाँ निबलों-विकलों और अबलाओं को भी सबल बनाया है तथा उन्हें गरिमा प्रदान की गई है। भारत की पहचान बन चुकी रामकथा पर आधारित महाकाव्यों में सदा उपेक्षित रहने वाली उर्मिला जैसे नारी पात्र ‘साकेत’ में अपना गरिमामय स्थान प्राप्त करते हैं और लक्ष्मण जैसे शूरवीर उर्मिला के चरणों में शीश झुकाते हैं-
तुम रहो मेरी हृदय-देवी सदा,
मैं तुम्हारा हूँ प्रणय-सेवी सदा।
फिर कहा- ‘‘वरदान भी दोगी मुझे?’’
मानिनी, कुछ मान भी दोगी मुझे? (साकेत, सर्ग ।)
‘साकेत’ से बढकर नारी-सशक्तीकरण के भाव और विचार हिन्दी साहित्य में दुर्लभ हैं। ?
४०, महेश नगर, निम्बाहेडा-३१२६०१ (जिला-चित्तौडगढ), राज.