गोरख योग और हिन्दी भक्ति काव्य

डॉ. कन्हैया सिंह


योग का सम्बन्ध वेदों से है। छः दर्शनों में योग दर्शन एक प्रमुख दर्शन है। पतंजलि ने अपने योग-सूत्र के भाष्य में योग का जो निरूपण किया है, उसी को आधार बनाकर आगे चलकर योग के सिद्धान्त बने और उसकी पद्धति का निरूपण हुआ। श्री मद्भगवतगीता के छठे अध्याय में योग शास्त्र का निरूपण है। यहाँ योग के क्रियात्मक पक्ष की चर्चा नहीं है, पर साधना से योगी कैसा बनता है, उसका विस्तार है। योगी को अपनी इन्द्रियों पर संयम करना और अभ्यास द्वारा उस परम स्थिति को प्राप्त करना होता है जहाँ अपने-पराये का अन्तर समाप्त हो जाता है, सुख-दुख में समभाव हो जाता है। इन सारे लक्षणों के निरूपण के पश्चात् योग की महत्ता प्रतिपादित करते हुए श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन योगी बनोः
तपस्विभ्यो अधिको योगी, ज्ञानिभ्योऽपि मतोधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी, तस्माद्योगी भवार्जुन।। (गीता ६/४६)
योगी के जो विधि-निषेध गीता में बताये गये हैं, वही गोरखनाथ ने अपने अनुयायियों के लिए बताया है। गीता में कहा गया हैः ‘यह योग न तो बहुत खाने वालों का है और न बिलकुल न खाने वालों का है। इसके लिए यथायोग्य आहार-विहार, शयन-जागरण, यथायोग्य कर्म ही विहित है।’ गीता (६/१६-१६१)
गोरखनाथ का कथन है-
अति अहार एंन्द्री बल हरै। नासै ज्ञान मैथुन चित धरै। गो. बा., सबदी ३६
हिन्दी के भक्तिकाल के कवियों के पाथेय भी उपनिषद्-गीता और पुराणों से प्राप्त होते हैं। निर्गुण भक्ति के संत कवियों में प्रथम स्थान कबीर का है। कबीर पर गोरख और उनके योग का विपुल प्रभाव है। इसे सभी आलोचकों ने स्वीकार किया है। कबीर की साधना षट् (अथवा अष्ट) चक्रभेदन और उन्मनी की अवस्था में स्थिर होने की है। साखियों और पदों में बार-बार इसके रूपक वे बाँधते हैं। कही ‘झीनी चदरिया बीनने’ के रूपक से ‘अष्ट कमलदल चरखा’ और ‘सुखमन’ तार से बीनने की बातें कहते हैं और कई पदों में इसकी व्यापक क्रियाओं का संकेत करते हैं। एक ही पद उदाहरण में प्रस्तुत हैः
अवधू! नादेव्यंन्द गगन गाजै, सबद अनाहद बोले।
अन्तरगति नहिं देखै नेडा, ढूंढत बन बन डोलै।।
सालिगराम तजौ सिव पूजौ सिर बरम्हा का काटूँ।
सायर फोडि नीर मुकलाँऊ, कुवां सिला दै पाटूँ।।
चंद-सूर दुइ तूंबा करिहूं चित चेतन की डांडी।
सुखमन तँत्री बाजन लगी एहि विधि त्रिष्णा खांडी।।
जपूं न जाप हनू नहि गूगल, पुस्तक लेइ न पढाऊँ।
कहै कबीर परम पद पाया नहीं आऊँ नहि जाऊँ।।
पद ४२ राग रामकली
इसी साधना से जब आत्म सिद्धि प्राप्त होती है तब कबीर की साधना की दूसरी श्रेणी प्रारम्भ होती है-सहज समाधि की। वे कहते हैंः
आंख न मूंदूं कान न रूंधू काया कष्ट न धारूं।
खुले नयन से हंसि देखूं सुंदर रूप निहारूं।।
कबीर के अनुसार जब जीव को जीवनमृतकता प्राप्त हो जाती है अर्थात् सम्पूर्ण कामनाओं से परे वह जीते जी मृतक बन हो जाता है तभी सहज साधना संभव होती है और जीवनमृतकता योग की वैध साधना द्वारा प्राप्त होती है।
गुरु गोरखनाथ भी जीवनमृतकता के द्वारा ही सच्ची दृष्टि प्राप्त होने की बात कहते हैं। (गोरख बानी सबदी २६) साथ ही वह सहजरहनी का उपदेश भी इसी क्रम म देते हैं। (वही सबदी २७) गोरख योग साधना के पारिभाषिक शब्दों से कबीर की रचनाएं भी भरी पडी हैं। उन्मनी दशा (अब मन उलटि सनातन हुआ), तीनों नदियों के मिलन को त्रिवेणी (बंकनाल के अंतर पश्चिम दिसा भी बाट/ नीझर झरै रस पीजिए भँवर गुफा के घाट/ त्रिवेणी मनाह न्हवाइए, सुरति मिलै जे हाथि। वहाँ न फिर मधजोइए सनकादिक मिलिहैं साथ।) इत्यादि पदों से कबीर वाणी भारी पडी है। पर कुछ पद ऐसे हैं जो गोरख बानी से बहुत मिलते-जुलते हैं और उनमें कबीर ने गोरखनाथ भी महत्ता को स्वीकारा हैः
रामं गुन बेलडी रे, अवधू गोरखनाथि जांनी।
मा तिस रूपन छाया जाके, विरिध करै बिनु पांणी।।
बेलडियाँ दै अडी पहूंची, गगन पहूँची सैली।
सजग बेलि तव फुलन लागी, डाली कूपल मेल्ही।।
पद ११ रामकली
गोरखनाथ बानी में यह पद इस प्रकार हैः काटते बेली कूपण मेल्ही, सीचतडा कुम्हिलाणी। तत बेली लो, ततबेली लो, अवधू गोरख जांनी। डालन मूल पुहुप नहिं छाया बिरिधा करै बिन पांणी।
काटत बेली कूपण मेल्ही सीचतंडा कुम्हिलाए।
ङ्गङ्ग ङ्गङ्ग ङ्गङ्ग
मछीन्द पसादै गोरख बोल्या नित्त नेबलडी थाए।। गो. बा. पद १७
उपर्युक्त पद कबीर का प्रमाणिक पद है जो कबीर-वाणी की सभी शाखाओं और संग्रहों में उपलब्ध है।
कबीर की ही भाँति दादूदयाल, दरिया साहब (बिहार वाले), बावरीपंथ के कवि, गुलालपंथ के कवि और उनके शाखाओं के संतों में योग का यही प्रभाव हमें दीख पडता था। आधुनिक काल तक यह क्रम चलता है- संत सदफल देव जिनका शिवलोक गमन १९५४ ई. में हुआ विहंगमयोग के सिद्ध संत थे जिनका विहंगम योग आश्रम झूंसी प्रयाग में है। योगी आदित्यनाथ ने अपने ग्रंथ योग में इस बात का विवेचन किया है कि पिपीलिकायोग सिद्धि के पश्चात ही विहंगम योग की स्थिति आती है। खास बात यह है कि राम भक्ति, कृष्ण भक्ति, सूफी भक्ति की धाराएं तो रीतिकाल के पूर्व तक चली (स्फुट काव्यों को छोडकर) पर योग की यह निर्गुण भक्ति का प्रवाह आधुनिक काल तक चलता रहा और आज योग विश्व की एक विश्वसनीय साधना और क्रिया बन गया है।
कृष्ण भक्ति कवियों मे शिरोमणि सूरदास ने ‘अलख’ की मान्यता को अस्वीकार नहीं किया, हाँ उसकी विकटता की चर्चा करके अपने लिए सगुण भक्ति को सुगम माना हैः
मेरो मन अनत कहाँ सचु पावै ।
ङ्गङ्ग ङ्गङ्ग ङ्गङ्ग
मान-बानी अगम अगोचर सो जानै जो पावै।
ङ्गङ्ग ङ्गङ्ग ङ्गङ्ग
सब विधि अगम विचारै ताते सूर सगुन लीला पद गावै।।
कृष्ण भक्तों ने प्राय ‘भ*मरगीत’ लिखा है जिसमें उद्धव-गोपी संवाद है। इस संवाद का केन्द्र है- योग और प्रेमी यानी प्रेमाभक्ति। यहाँ गोपियाँ उद्धव के योग-संदेश का प्रतिवाद करती हैं पर वे यह नहीं कहती कि योग बुरी चीज है। उनका कहना है कि वे योग के लिए पात्र नहीं हैं- ‘हम अहीर अबला सठ मधुकर’ हमहिं योग कहँ मावै।’ यही ध्वनि प्रायः सभी भ्रमरगीतों की है। तात्पर्य यह कि गोरखनाथ प्रवर्तित-प्रचारित योग की ऐसी धाक समय पर थी कि किसी अन्य उपासना पद्धति के पूर्व योग की कठिनाई बताना अनिवार्य सा हो गया था।
गोरखनाथ और उनके योग के प्रति गोस्वामी तुलसीदास के विरोध को रेखांकित करने का प्रयास प्रायः देखा जाता है। वस्तुस्थिति बिलकुल इसके विपरीत है। कवितावली के उत्तरकाण्ड के छंद ८४ में तुलसी ने लिखा-
गोरख जगायो जोग भगति भगायो लोग।
निगम-नियोग से तो कलि ही छरो सो।।
यह प्रसंग कलिकाल वर्णन का है जिसमें कवि कहता है कि कलिकाल ने वर्णाश्रम को समाप्त कर दिया। कर्म और उपासना में कुबासना आ गई तो ज्ञान भी हर लिया गया है। ऐसे में गोरखनाथ ने योग को जागृत किया जो वेद विहित है पर कलिकाल से योग भी छला गया है और योग के प्रभाव से लोगों ने भक्ति से भी पल्ला झाड लिया है। यह ‘जगाया’ शब्द बहुत महत्व का है- जगाया अर्थात् पतंजलि के योग-सूत्र को पुनः जागृत किया। पर इस वेद-विहित योग को कलिकाल में लोगों ने छल-कपट का माध्यम बना लिया है। इस अर्थ की सिद्धि रामचरित मानस के कलिकाल वर्णन प्रसंग से भी होती है ः
असुभ वेष भूषन धरे, भच्छाभच्छ जे खाँहि।
तेइ जोगी तेइ सिद्धनर पूज्य जे कलियुग माँहि।।
उत्तर का.
यहाँ कवितावली की भांति बात प्रारम्भ करते हैं, ‘बरन धरम नहिं आश्रम चारी’ से और फिर जोगी और सिद्ध का कलियुग में लक्षण बताते हैं। तात्पर्य यह कि तुलसी ने योग और सिद्धियों के आडंबरी लोगों की बात की है। यही स्थिति उनके एक और पद में भी है-
हम लख हमहिं हमार लख, हम हमार के बीच।
तुलसी अलखहिं का लखै राम नाम लखु नीच।।
पहली पंक्ति का अर्थ है हम, हमार के बीच फंसा हुआ संसारी जीव ‘अलख’ को क्या लख पाएगा- उससे अलख-निरंजन की सिद्धि नहीं होगी। अतः वे ऐसे संसारी जीवों से कहते हैं कि सांसरिकता के निम्न पंक में फँसे व्यक्ति के लिए ‘रामनाम’ सम्भव है अलख और योग नहीं। कलियुग केवल नाम अधारा।
वह तुलसी जो योग की श्रेष्ठता का क्रियात्मक वर्णन करता है वह योग की अथवा योग को पुनर्जीवन प्रदाता गोरखनाथ की निन्दा कैसे कर सकता है। उत्तर कांड में ‘ज्ञानि-भक्ति प्रकरण’ में तुलसीदास कहते हैंः
भगतिहि ग्यानहिं नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।
नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोइ सुनु बिहंगवर।।
वह भेद सुनिये पहले ‘सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई’ से प्रारम्भ करके गोस्वामी जी जप, तप, यम, नियम से बढते हुए निर्मल मन और निवृत्ति के साधनों से ‘परमधर्ममय दूध’ को निर्मलता से पकाकर मक्खन रूपी तत्व और फिर उसे तपाने के लिए कहते हैं-
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ जारि।
चित दिया भरि धरै दृढ समता दियटि बनाइ।।
अबजो दिया की जोति है। सोहमस्मि इति वृत्ति आखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा की जोति।
यही सोऽहं, शिवोहं, अहं ब्रह्मामास्मि, अनलहक शब्दों से व्यक्त भावना ही योग साधना की चरम अवस्था। अब इतना रूपक बांध कर तुलसीदास कहते हैं कि पर यह मार्ग तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन है और
कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन विवेक।
होइ घुनाच्छर न्याय जौ पुनि प्रत्यूह अनेक।।
इस प्रकार सूरदास की भांति तुलसी भी योग की श्रेष्ठता मानते हुए उसकी कठिनता के कारण भक्ति के सरल मार्ग का आग्रह करते हैं। मजे की बात यह है कि हर भक्ति सम्प्रदाय पर गोरखनाथ का आतंक छाया है। यह गोरख की लोकप्रियता का प्रमाण है। यह सही है सब कोई योगी नहीं हो सकते पर योग के प्रति श्रद्धा और योगी द्वारा प्रशस्त जीवन के सहज मार्ग का अनुगमन तो सभी कर सकते थे।
गोरखनाथ की योग साधना को आत्मसात किया सात समुन्दर पार से आए हुए सूफी विचारक, कवियों और संतों ने। कई सूफी संतों की एकान्त में तपस्या करने का उल्लेख प्रामाणिक स्रोतों से मिलता है। कवि मंझन के गुरू शेख मुहम्मद गौस चुनार के किले में १२ वर्ष तपस्या करते रहे और ९० वर्ष की अवस्था तक जीवित रहे। मंझन ने अपने प्रेमाख्यान ‘मधुमालती’ के नायक को गोरखनाथ की योग साधना करने की बात कही हैः
ज्ञान, ध्यान औ आसन, स्नवन नैनन्ह लौ लागि ।
दरसन लागि भेस सब कीन्हा मकु गोरख गा जागि।।
सहस उदित अपान साधिके लीन्हि सिद्धि अवराधि।
बारह बरिस रहे बन पर्वत लाए जो ब्रम्ह समाधि।।
अल बदायूँनी ने भी ‘मुन्तखबउत्तवारीख’ म इस बात का उल्लेख किया है। सूफीसंत मंसूर-अल-हल्लाज तो प्रसिद्ध ब्रह्मवादी था, उससे पहले बायजीद बिस्तामी नामक सूफी हुआ जिस पर उपनिषदों का प्रचुर प्रभाव था। तत्पश्चात् इब्नुल आरबी और अब्दुल करीम अल जिली पर भारतीय दर्शन का इतना प्रभाव है कि उन्हें वेदान्ती कहा जा सकता है। मंसूर और आरबी तो भारत आए भी थे और इन्होंने यहाँ के योगियों और साधकों से सम्फ भी किया था।
सभी सूफी प्रेमख्यानों के नायक योगी बनकर अपने प्रेम मार्ग पर निकलते हैं। उस समय ये कानों में कुण्डल, हाथ में धंधारी चक्र, आदि नाथ योगियों की वेश भूषा धारण करते हैं। साथ ही कई कवियों ने उनकी यात्रा के पडावों में ‘गोरखपुर’ को दूसरे पडाव के रूप में बताया है। उसमान ने चित्रावली में चार पडाव- (१) भोगपुर (२) गोरखपुर (३) नेहनगर (४) रूपनगर बताया है। कुतुबन की मृगावती में नायिका नायक योगी से पूछती है कि तुम कहाँ से आए हो, तो वह कहता है- ‘रंगनाथ’ मेरे गुरु हैं और मैं गोरखपुर से चला हूँ।
पूछेसि कवन देस से आए, को गोरख का चेला।
रंगनाथ हैं गुरु हमारे गोरखपुर से खेला।
इन सब बाहरी बातों के अतिरिक्त जायसी ने साधना के अन्तरंग पक्षों का भी बडा सटीक निरूपण किया। उनकी दृष्टि में परमरूप की प्राप्ति के लिए योग-साधना द्वारा सिद्ध होना अनिवार्य है।
जायसी ने अपने महाकाव्य ‘पदुमावति’ में यह दर्शाया है कि योगमार्ग की साधना सूफी प्रेमसाधना के चरम लक्ष्य को पाने के लिए अनिवार्य है। हीरामन तोता योगी रतनसेन से कहता हैः
कठीन आहि सिंहल कर राजू। पाइअ नाहिं राज कर साजू।
वहि पंथ जाइ जो होइ उदासी। जोगी जती तपा संन्यासी।
भोग जोरि पाइअ वह जोगू। तजि सो भोग कोइ करत न जोगू।।
इस सिद्धावस्था भी प्राप्ति के लिए रतनसेन योग-साधना प्रारम्भ करता हैः
गही पिंगला सुखमन नारी। सुन्नि समाधि लागि गो तारी।
बुन्दहिं समुद्र होइ जस मेरा। गा हेराइ तस मिलै न हेरा।।
रतनसेन जब पदुमावती से सुहाग रात्रि में मिलता है तो यहाँ चाँद-सूर्य का मिलन होना कहा गया है। स्पष्ट है कि चाँद-सूर्य हठ योग के प्रतीक शब्द हैं। चाँद रूपी नायिका से सूर्य रूप नायक मिलते ही मूर्छित हो जाता है- समाधि की अवस्था में चला जाता है। तब सखियाँ उसके कान में कहती है-
बोलैं सबद सहेली कान लागि गहिं माँथ।
गोरख आइ ठाढ था उठ रे चेला नाँथ।।
गोरख सबद शुद्ध भा राजा। रामाँ सुनि रावन होइ गाजा। छंद ३०३-४
स्पष्ट है कि इन सूफियों पर गोरखनाथ का इतना प्रभाव था कि उन्होंने अपनी प्रेम साधना (इश्क हकीकी) के लिए योग द्वारा स्थिरचित्तता और परम आनंद स्वरूप पे*म तत्व के लिए सिद्धता अनिवार्य माना है। इतने प्रमाणों के बाद भी यदि किसी को सूफियों के योग मार्ग से प्रभावित होने में शंका है तो मैं यही कहूँगा-
एतनेउ पर करिहैं जे अशंका। मोहुँ ते अधिक ते जडमति रंका। ?
राहुल नगर, मडया, आजमगढ