जहां देखना ही जानना हो जाए..... ः नन्दकिशोर आचार्य

मुकेश कुमार शर्मा


मुकेश शर्मा- अक्सर रचनाकार के सामने के माध्यम चुनने का संक्रमण, पहचान की समस्या आती है यह जानना अपने आप में दिलचस्प है कि आपकी सृजन यात्रा गद्य से प्रारंभ होती है और कालान्तर में आप उच्च कोटि के काव्य सर्जक के रूप में समादृत होते हैं। भाषा का कौनसा रूप आफ लिए अधिक आकर्षक बना है? वैसे देखा जाय तो भाषा ही आफ आकर्षण का मुख्य केन्द्र रही है। मेरे इस कथन को आप किस तरह से देखते हैं?
आचार्यजी- देखिए...! एक तो ये सूचना आपकी गलत है कि मेरी लेखन की शुरूआत गद्य से हुई है। ये ठीक है कि वो प्रकाशित रूप में जो चीज पहले आई है वो...। (उसको माने) लेकिन मैं अपने बचपन से कविता लिख रहा हूँ और गद्य के रूप में मैंने कुछ लिखा तो... वो भी नाटक था।... वह आज मेरे पास सुरक्षित नहीं है और वे मेरी अकेले की रचना नहीं थी। हम दो मित्रों ने साथ मिलकर एक नाटक लिखा। जैसे बच्चे नाटक करते हैं। मोहल्लों म उस तरीके से हम दो मित्रों ने मिलकर लिखा था जो मंचित भी हमने ही किया। हम सातवीं-आठवीं क्लास में पढते थे उस समय। और कविता मैं भी तभी से लिख रहा हूँ तो इसलिए मेरा पहला प्रेम तो कविता से ही मानना चाहिए। गद्य की प्रक्रिया अलग है। वैसे तो हमारे यहाँ जब हम काव्य को परिभाषित करते हैं। उसमें गद्य और पद्य दोनों ही चलते हैं। एक हमारे सामने जो हम अक्सर जिस पर हम गौर नहीं करते हैं वो ये है-गद्य व पद्य साहित्य की दो विधाएँ नहीं है, वे भाषा के दो रूप हैं। साहित्य की विधाएँ आप कहेंगे कविता है, उपन्यास है, नाटक है, आलोचना है ये सब साहित्य की विधाएँ हैं। ये गद्य अथवा पद्य किसी में हो सकती हैं। मैं मानता हूं कि जो हमारे यहां नेरेटिव्ज हैं या जो कथात्मक महाकाव्य या काव्य लिखे गए हैं वो सब में हमारे यहाँ उपन्यास ही है। वो गद्य में नहीं है पद्य में सही। और जिन्होंने गद्य में हमारे यहाँ जैसे ‘कादम्बरी’ संस्कृत में गद्य का ग्रंथ है। पर बाण को कवि कहा गया। क्योंकि अगर आप भाषा में कुछ भी रचनात्मक काम करना चाहते हैं तो वो काव्य का काम है अब वो आप भाषा के किस रूप में करते हैं। गद्य में करते हैं कि पद्य में करते हैं। इसके आधार पर आपने (हमने) मान लिया कि ये कविता है और यह गद्य है। तो कविता और गद्य को अलग-अलग करने की जरूरत नहीं है। जरूरत इस बात की है कि पद्य और गद्य को अलग-अगल किया जाए। ऐसे बहुत से नाटक हैं जो आपको छन्द में मिलेंगे। नाटकों में बहुत से काव्य का प्रयोग मिलेगा आपको, गद्य भी मिलेगा आपको। इसलिए हम कह सकते हैं कि ये जो विभाजन हम करते हैं या वर्गीकरण करते हैं ये थोडा मुझे उसका कोई खास औचित्य नहीं दिखाई देता। आप किसी में भी... अब आप देखिए हमारे यहाँ पर बहुत-सा दर्शन पद्य में लिखा गया। बहुत-सा आयुर्वेद पद्य में लिखा गया। इससे वो कविता नहीं हो गया। पद्य और कविता दो अलग-अलग चीजें हैं या काव्य कह लीजिए दो अलग-अलग दो अलग-अलग चीजें हैं। मेरा जो प्रारंभ आकर्षण था। वो मैंने कहा कि कविता से है और ये उपन्यास एक तरीके से... (गहन चिंतन की मुद्रा में) मैं जब इतिहास में एम.ए. कर रहा था।... प्राचीन भारतीय इतिहास में एम.ए. किया और उससे पहले भी बुद्ध के व्यक्तित्व का मुझ पर बचपन से बहुत गहरा असर रहा। और जब मैंने एम.ए. किया तो मैंने उसमें दर्शन को भी, बुद्ध के जीवन को भी जितना उस समय मैं कर सका था गहराई से, कर सकता था कोशिश की। तो मुझे यह लगा कि... हिन्दी साहित्य लिख रहा था, कविता भी लिख रहा था, उर्दू में ग*ालें वगैराह भी..., तो मुझे लगा कि मुझे इम्तिहान... देकर छुट्टियों में आया तो मुझे लगा कि बुद्ध के जीवन पर कुछ लिखना चाहिए तो एक उपन्यास...? उसको वे उपन्यास क्या जीवनी-परक उपन्यास है एक तरीके से। उसमें औपन्यासिकता कला की दृष्टि से शायद बहुत कम है। मूलतः वो जीवनी है जो थोडा औपन्यासिक तरीके से कथा के तरीके से... जैसे सामान्यतया जीवनियाँ होती है उस तरह की कथात्मकता भी उसमें है साथ ही उसमें एक रोचक पठनीयता भी है।
मुकेश शर्मा- जब भी कोई कवि नई जमीन तोडता है तो पुराने संस्कार भी टूटते हैं। नये संस्कारों का उदय होता है। इस प्रक्रिया में काव्य की भूमिका के बारे में जानने की जिज्ञासा है।
आचार्यजी- एक तो मैं यह मानता हूँ कि कोई... यह अंगे*जी का मुहावरा है ‘नयी जमीन तोडना’ तो जब आप उस मुहावरे का इस्तेमाल करते हैं तो उसको उन अर्थों में मत करिए कि कोई वाकई जमीन तोड रहा है। कोई कलाकार या कवि कोई नई जमीन नहीं तोडता यानी जिसे हमें पुरानी जमीन को तोड के नई जमीन तोडना कहे। ये पुरानी जमीन... नयी जमीन तोडने की प्रक्रिया में पुरानी जमीन को तोडता है ऐसा नहीं होता है। हम यों कह सकते है वो नई जमीन का अविष्कार करता है... तो नई जमीन का आविष्कार करता है इसका मतलब पुरानी जमीन को कोई नष्ट नहीं करता है। वो उसी को एक्स्टेण्ड करता है... उसी का विस्तार आगे... करता है। इसीलिए आप देखेंगे, कि हर नई से नई रचनात्मकता में परम्परा की अनुभूतियाँ बराबर बनी रहती है। आप मान लीजिए कविता का उदाहरण, हम लोग लें। आप अगर किसी भी शब्द का प्रयोग करते हैं उसको एक अर्थों में प्रयोग करते हैं। नया संस्कार उसमें भरते हैं। अगर सामान्य काव्यशास्त्रियों की भाषा में... लें। तो आप शब्द का नया संस्कार करते हैं तो ऐसा नहीं की पुराने संस्कारों से वो शब्द मुक्त हो जाता है। बल्कि एक नया संस्कार उसका होते हुए भी उस शब्द की जो पुरानी स्मृतियाँ हैं वो उसमें बनी रहती है। और वो स्मृतियाँ आपको भी उस यात्रा पर ले जाती है, जिन..., जिस यात्रा से वो शब्द गुजरा होता है... तो इसलिए ऐसा नहीं कि वो ऐसा कुछ कर रहे हैं कि पुराने से आपका कोई रिश्ता नहीं रह गया है। देखिए...! इवोल्यूशन की जो प्रक्रिया है उसमें भी ऐसा कुछ नहीं होता। मनुष्य आज जो कुछ... जैविक विकास की दृष्टि से देखा जाए तो मनुष्य आज जिस रूप में विकसित है उसमें विकास के वे सारे चरण.... वे सारे स्टेजेज शामिल हैं जिनमें से होकर वो गु*ारा है। आपकी बायोलॉजी में वे सब शामिल है। आप उनस मुक्त नहीं हो सकते... ठीक वैसे ही संस्कृति में भी, भाषा म भी, दूसरी कलाओं में भी आप उससे मुक्त नहीं होते हैं... आप उसको आगे ले जाते हैं... तो इसलिए ये कोई एक चीज को छोडकर दूसरी को ग्रहण करना नहीं होता...।
मुकेश शर्मा- देखना और जानना इन दो क्रियाओं से काव्य सत्य के विकसित होते जाने की प्रक्रिया जुडी रहती है। रचनाकार के रूप में आफ लिए अपने काव्य सत्य के विकास में इनकी भूमिका के बारे में कुछ अनुभव साझा करें।
आचार्यजी- देखिए....! जहाँ तक देखना और जानना ये दोनों क्रियाएँ अलग-अगल नहीं है। (चितन की मुद्रा में) अगर हम कविता की या कला की बात करें तो। सामान्य रूप देखना-जानना आप अलग-अलग कह सकते हैं लेकिन ये देखना एक प्रकार से जानने की प्रक्रिया में संभव होता है और जानना देखने की प्रक्रिया में ही संभव होता है। दोनों एक दूसरे से इन्टीग्रेटेड हैं। (दोनों हाथों की ऊंगलियों को एक-दूसरे से मिलाते हुए समझाते हैं) एक-दूसरे से जुडे हुए है क्योंकि आप क्या देखते हैं? आप मान लीजिए एक पेड देखते हैं? फूल देखते हैं? या एक सामाजिक यथार्थ का कोई चित्र देखते हैं? दृश्य देखते हैं समाज का, घटना देखते हैं, सभी लोग देखते हैं। आपका देखना उस देखने से कुछ अलग है। यानी एक कलाकार का, एक लेखक का, एक कवि का देखना उस सामान्य देखने से कुछ अलग है। क्यों अलग है? क्योंकि वो उसमें से कुछ ऐसा जानता है या जान पाता है जो सामान्य देखने से नहीं जाना जा सकता या नहीं जाना जाता तो इसलिए पहले के समय में इसको हम जीवनानुभूति या कलानुभूति या जीवनानुभूति और काव्यानुभूति कहते थे। पर ये कला में दोनों चीजें अलग नहीं है। जीवन के बिना तो कुछ है ही नहीं। नहीं... तो इस पर बार-बार जो जोर दिया जाता है, मुझे वो अनावश्यक लगता है। कहीं ऐसा लगता है जैसे हम कला की बजाय... हम कला को महत्त्व नहीं दे रहे हैं। और उसके बजाय... केवल जीवन की बात कर रहे हैं। जीवन की बात तो बहुत-सी जगह पर की जा सकती है। इसके बिना कुछ होता ही नहीं है। पर एक कलाकार... जीवन को एक कलाकार कैसे देखता है? यह महत्त्वपूर्ण है। उसी से कला उपजती है। तो इसलिए... कला की दृष्टि में या कविता की दृष्टि में देखना और जानना दो अलग-अलग क्रियाएँ है ही नहीं। (जोर देते हुए) वे दोनों मूलतः एक-दूसरे से जुडी रहती है। एक-दूसरे में से ये आप नहीं कह सकते कि कहाँ आप देख रहे हैं और कहाँ जान रहे हैं। ऐसा नहीं है कि पहले आपने कुछ देखा है फिर उसमें सोच-विचार कर उसमें से कुछ निष्कर्ष निकाला है, वो बहुत कृत्रिम होगा, बनावटी होगा? लेकिन जब देखना ही जानना हो जाए जब कला या कविता का उदय होता है। इसलिए मैं तो यह मानता हूँ कि जो भी कविताएँ या जो भी रचनाएँ जैसी-तैसी भी मेरे द्वारा हुई है....
मुकेश शर्मा- आपने जो प्रारंभिक कविताएँ लिखी उनके अनुभवों को साझा करें।
आचार्यजी- कुछ भी मुझे याद नहीं है लेकिन हाँ मुझे यह याद है कि मैंने एक कविता महात्मा गाँधी पर लिखी और एक कविता पन्द्रह अगस्त पर लिखी थी। स्कूलों में जैसे... ऐसे अवसर होते है कि उसमें बच्चों को बोलने के लिए कहा जाता है। तो जनरली मेरी इच्छा यह रहती थी। मैं किसी ओर की रचना पढने की बजाय अपनी ही कुछ तुकबंदी से कुछ कर दिया करता था एक अंत्याक्षरी हुआ करती थी। आज कल पता नहीं क्यों स्कूलों में फिल्मी गाने गाते हैं? हम जब पढते थे उस समय अंत्याक्षरी में फिल्मी गाने नहीं गा सकते थे। (जोर देकर) वो नहीं समझ सकते थे... हमें कविता ही सुनानी पडती थी। तो मैं जिस समूह में होता था विद्यार्थियों के, स्कूल के दिनों में अक्सर वो समूह जीतता था क्योंकि मैं तत्काल कुछ गढ देता था..., कविता की तरह कुछ बना देता था। तो अब मुझे याद नहीं वो सब तो, तब कब क्या...? बन गया होगा।
लेकिन बना देता था? लेकिन कई बार उसमें आपत्ति भी की जाती थी। हमारे दूसरे ग्रुप के बच्चे होते थे गुरुजी ये है नहीं इसने बनाई है। तो मेरा आरग्यूमेन्ट उस समय यह होता था कि भाई सभी कविताएँ बनाई गई हैं। तो दूसरे बना सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं बना सकता हूँ...? मैं दूसरों की सुना सकता हूँ... तो अपनी क्यों नहीं सुना सकता और ज्यादा अच्छी चीज है कि... तो अपनी क्यों नहीं सुना सकता और ज्यादा अच्छी चीज है कि... तो हम इससे पार पा ही नहीं सकते है ये तो, कुछ भी तत्काल गढ के सुना देगा। ऐसी थोडा बहुत हँसी-मजाक में चलता था। आपस में तो वो काम शुरू से करता आ रहा हूँ। वो जो मुझे कविताएँ थी जो मुझे थोडी-सी मुझे याद है जो गाँधीजी के जन्म दिन पर सुनाई थी। मैं उसको तो वो पूरी याद नहीं है। सुरक्षित भी नहीं है लेकिन उसमें यह था कि-‘‘गाँधी जी तुम को नमस्कार...!’’ ऐ भारत माता के सपूत/अहिंसा मंत्र के अग्रदूत/अब कौन करेगा हमें प्यार? गाँधी जी तुम कों नमस्कार...!!’’ ऐसे करके और इसी तरह से-‘‘पन्द्रह अगस्त...! पन्द्रह अगस्त...!! अंग्रेजी सूरज हुआ अस्त।’’ ये दो पंक्तियाँ मुझे आज भी उसकी आती है। (हँसकर)। तो ये है लेकिन मैं आठवीं-नवीं क्लास में जब था उस समय। मेरी करीबन बारह-तेरह साल की उम्र थी। किसी भी कवि कलाकार के द्वारा होती हो उसमें इन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता।
मुकेश शर्मा- परिचितों से कुछ ऐसा सुनने में आया है कि आपने पहले उर्दू में लिखा था और उर्दू से हिंदी में आने का प्रयोजन क्या रहा?
आचार्यजी- दरअसल उर्दू कविता के प्रति मन में बहुत गहरा आकर्षण था और आज भी है। मेरी सर्वाधिक पसन्द के कवि गालिब है। तब भी थे, आज भी हैं।.... लेकिन क्योंकि मैंने उर्दू कविता पढी बहुत है... उर्दू कविता भी और गद्य भी। नागरी लिपि में जितना छपा लगभग वह सारा मैंने पढा है। कोई मेरे ध्यान में नहीं आया हो... अलग बात है। लेकिन जितने भी कुछ प्रकाशक थे उस जमाने में जैसे भारतीय ज्ञानपीठ था, राजपाल एण्ड संस था। इन्होंने लगभग सारी उर्दू कविता नागरी में... अयोध्या प्रसाद गोयली ने संपादित की थी, ज्ञानपीठ के लिए और प्रकाश पण्डित ने जो थोडा लोकप्रिय काम था वो संपादित की थी, राजपाल एण्ड संस ने...। बाद में हिन्द पॉकेट में छपी थी और फिर दूसरी और जगहों से भी जो भी प्रकाशित हुए वो लगभग मैंने पढी थी। उर्दू कविता के बारे में भी जो नागरी में छपा था। वो मैंने पढा... उसका इतिहास वगैरह भी। शुरू में कुछ गजलें, नज्में भी मेरे साथ समस्या यह थी कि मैं लिपि नहीं जानता था और या तो यह था कि वो लिपि सीखूं। फिर लिपि का ही सवाल नहीं उसके साथ उसकी पूरी व्याकरण है। जिस में से बहुत सी चीजें अरबी-फारसी से आती है। या तो मैं उस सबको सीखूं। जैसे हमारे मित्र सिंह का मूल्यान्वेषण हमारे मित्र सत्यनाम निष्णात पण्डित लेकिन... मुझे यह लगता था कि मैं जिस तरह की भाषा लिख रहा था, उर्दू की भी उस समय में। उसको भी एक तरह से हिन्दुस्तानी कहते हैं गांधीजी। उस तरह की भाषा थी वो। तो आप चाहें तो उसको उर्दू कह लीजिए, चाहे तो हिन्दी भी कह लीजिए, चाहे तो नागरी लिपि में लिखी गई हिन्दुस्तानी कह लीजिए। पर मुझे... धीरे-धीरे महसूस हुआ कि वह मेरी... कहीं उसको सीमित करती है। एक फॉर्म (रूप) जो उसका था, उसका जो वो भी सीमित करता था। ‘तथागत’ (उपन्यास) के लिखने का एक असर यह भी हुआ क्योंकि वो एक... प्राचीन भारतीय इतिहास से संबंधित उपन्यास था। तो उसने मेरी उस समय की भाषा में बहुत परिवर्तन किया क्योंकि वो सचेत रूप से उस भाषा से जो सामान्यतः उस में प्रयोग करता, लिखता था उससे हट करके एक दूसरे तरह की शब्दावली का इस्तेमाल करना पडा। नहीं तो में सामान्यतया अपने बातचीत में भी उर्दू शब्दावली का ज्यादा इस्तेमाल करता था। मैं पत्र नहीं कहता था खत कहता था, मित्र नहीं कहता या दोस्त कहता था उसमें कुछ गलत नहीं था, आज भी कह देता हूँ। और तो और कोई भी गलत नहीं है। लेकिन वो उदाहरण के लिए मैं कह रहा हूँ ऐसी मेरी मनःस्थिति उस समय चल रही थी। (चिंतन की मुद्रा में) इतना मैं पढता था। पर धीरे-धीरे देखा और मुझे लगा की शायद मेरे लिए... या मेरी रचनात्मकता के लिए... जो हिंदी में आजकल लिख रहा हूँ उसमें भी बहुत सी उर्दू आती है... वो शायद मेरे लिए ज्यादा उपयोगी थी। उसमें लिपि वाला बंधन तो था ही था आ जाती है। तो उसको सीखना, फिर व्याकरण को सीखना तो फिर सारी काव्यात्मक प्रक्रिया नहीं रहती एक दूसरे तरह का काम हो जाता है जो बचपन... अगर बचपन से मैंने उस तरह से सीख लिया होता। सीख सकता था जिस मोहल्ले में मैं रहता हूँ। सारा पीछे जो रहने वालों पडौसी... भी जानने वाले हैं। मेरे पिछले पडौसी भी जानते थे। बच्चा जो मेरी उम्र का था वो सीखते थे खैर... जो नहीं हुआ, तो नहीं हुआ।
मुकेश शर्मा- भाषा, काव्य भाषा और नाट्य भाषा में सूक्ष्म अंतर होता है। तो क्या हम यह माने की अनुभव के साथ, विधा के साथ, भाषा की संरचना पर भी पर्याप्त फर्क पडता है।
आचार्यजी- नहीं तो विधाएँ अलग-अलग है ही क्यों...? ये जो विधाएँ साहित्य में इतनी है-कहानी की, उपन्यास की, व्याकरण की, कविता की और यहाँ तक की ललित निबंध की, संस्मरणों की, यात्रावृत की। ये जो अलग विधाएँ हैं ये अलग-अलग विधाएँ क्यों हैं...? अगर सब की भाषाएँ एक हो तो...? (प्रश्न की मुद्रा में एवं मौन) कैसे हो सकता है कि सब की भाषा एक जैसी हो और वे अलग-अलग विधाएँ नहीं हो... (मौन)?
मुकेश शर्मा- अभी-अभी आफ जो पिछले चार-पांच काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं, उनमें मृत्यु और ईश्वर से संबंधित जो धारणा पाई जा रही है वो एक अलग ही प्रकार की है? ईश्वर से कहीं टकराहट है? कहीं को अपने अंदर समाहित माना गया है। कहीं मृत्यु से टकाहट की बात की गई है, इसमें क्या आपका विशेष प्रयोजन रहा है? इस बारे में अवगत कराए।
आचार्यजी- प्रयोजन इस में जैसा कि मैंने आपसे कहा कि ये मेरे आस्तित्विक सवाल है? मनुष्य मात्र के इसमें आस्तित्विक सवाल है? जो एक संवेदनात्मक स्तर पर आपको परेशान करते हैं, बेकल करते हैं। कभी आपको लगता है, कि आपने उनका उत्तर पा लिया है। कभी लगता है कि नहीं उत्तर अधूरा है? कभी वो उत्तर आपको संतुष्ट नहीं करता है, तो उनसे असंतुष्टि का अनुभव होता है, वो भी कविता में व्यक्त होता है। तो ये कोई ऐसा नहीं है जैसा कि मैंने पहले भी आफ दर्शन वाले सवाल के उत्तर के संदर्भ में भी कहा था कि ये कोई दार्शनिक सवाल नहीं है। दर्शन शास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार किया जाएगा तो दार्शनिक सवाल बनेंगे।... पर हमारे यहाँ तो दर्शन भी अनुभूति से निकलता है। हमारी प्रक्रिया में तो ऐसा माना गया है कि दर्शन जो, यह वे है जो आप अनुभव करते, अनुभूत करते हैं, वह ज्ञान है। जो आप अनुभव नहीं कर पाते वो ज्ञान नहीं है, वो केवल सूचना है। जैन दर्शन में जीव को ज्ञान स्वरूप कहा है... यानी वो चेतना है। अब आपकी ये जो चेतना है, जो आपसे सवाल पूछती है कभी उसको लगता है कि यह ऐसा रिश्ता है... कभी उसको लगता है कि मेरे अलावा कुछ नहीं है, कभी उसको लगता है कि मैं तो कुछ हूँ ही नहीं, कभी उस को लगता है कि काल मुझी में से ही निकलता है, कभी उसे लगता है कि मैं काल का शिकार हूँ... ये जितने भिन्न-भिन्न प्रकार के पहलू उसके उभरते हैं, जो मेरे अपने अस्तित्व से और मनुष्य मात्र के अस्तित्व से और सृष्टि मात्र के अस्तित्व से संवेदनात्मक स्तर पर जुडते हैं या संवेदनात्मक स्तर पर कहना चाहिए कि पैदा होते हैं। ये सब वो सवाल हैं जो सहज रूप से आना चाहिए कविता में...!
मुकेश शर्मा- इतिहास के साथ आफ रचनाकार का रिश्ता विशिष्ट रहा है। इस पर आप क्या कहना चाहते हैं? या आफ क्या विचार हैं?
आचार्यजी- इतिहास मैं पढता रहा हूँ...! अकादमी स्तर पर भी पढता रहा हूँ और इतिहास के बिना तो मनुष्य कुछ है ही नहीं। मेरे जैविक अस्तित्व में मेरा सारा जैविक इतिहास छिपा है। मेरे सामाजिक अस्तित्व में मेरा सारा सामाजिक इतिहास छिपा है। मेरे संवेदनात्मक अस्तित्व में मनुष्य मात्र का संवेदनात्मक इतिहास छिपा हुआ है। तो इसलिए इतिहास तो... उसके बिना तो जीवन की कुछ समझ हो नहीं सकती। इस दृष्टिकोण से मैं हमेशा यह देखता हूँ। इसलिए क्योंकि उनसे परिचित हूँ। बार-बार उसके बारे में सोचता रहता हूँ, तो इसलिए बहुत संभव है कि मेरी रचनात्मकता में या जो मैंने काम किया है, खास तौर से नाटकों को लेकर के, तो उसमें कुछ इतिहास की घटनाएँ भी... जिसे आप ऐतिहासिक घटनाएँ कहते हैं या ऐतिहासिक चरित्र कहते हैं तो उसमें आए हैं लेकिन वे मेरे लिए किसी युग विशेष को प्रस्तुत करने के माध्यम नहीं हैं। उनके माध्यम से मैं उसी सनातन मनुष्य की जो भावनाएँ है, सनातन मनुष्य की जो तलाश है, सनातन मनुष्य की जो समस्याएँ है वो उसमें से जिन्हें मैं... फिर मैं दुबारा कहूँगा कि जिन्हें मैं संवेदनात्मक स्तर पर महसूस करता हूँ वो उसको... एक आकार देने की कोशिश उन नाटकों में या दो-चार ऐसी कविताओं में मिलता है।
मुकेश शर्मा- आपकी कविताओं को पढा, पढने के पश्चात् यह अनुभव हुआ है कि खण्डहर, रेत और बीकानेर की श्ाृंखला, जैसलमेर की श्ाृंखला के अतिरिक्त ‘रेत’ के प्रति जो आपका एक अनुराग रहा है, इससे थोडा सा अवगत करवाए।
आचार्यजी- देखिए...! (चिंतन की मुद्रा में) मैं जिस वातावरण में रहा हूँ। बचपन से जिस परिवेश में रहा हूं। उस परिवेश का प्रभाव तो पडेगा। उससे मेरा एक रागात्मक संबंध भी होगा, उससे मेरा कभी-कभी।... झगडे का सम्बन्ध भी होगा उससे मेरा कभी कभी एक उस परिवेश और मेरे बीच में रिश्ते की सार्थकता का भी अनुभव होगा। यह ठीक वैसे ही होगा जैसे परिवार में रहते हुए होता है। आप अपने माता-पिता के साथ में रहते हैं, भाई-बहिनों के साथ में रहते हैं और दूसरे मोहल्ले के लोगों के साथ म रहते हैं, स्कूल के मित्रों के साथ में रहते हैं तो आप लोग उससे रागात्मक अन्तक्रियाकरते हैं। तो उसी तरह से भौगोलिक परिवेश के साथ भी क्योंकि भौगोलिक परिवेश, केवल भौगोलिक परिवेश नहीं रहता है। मतलब भूगोल का अध्ययन करेंगे तब भौगोलिक परिवेश है। आफ लिए वो जीवन्त परिवेश है क्योंकि आपका उससे रिश्ता है। आप उसमें रहते या उसको अनुभव करते हैं। तो एक रागात्मक रिश्ता उससे पैदा होता है और ये रागात्मक रिश्ता जो पैदा होता है वो फिर केवल भौतिक नहीं रहता, फिर उसके कुछ दूसरे आप अस्तित्व के अपने परिवेश के साथ रागात्मक अन्तःक्रिया है जो मैं समझता हूँ कि रेगिस्तान से घिरे हुए इलाके में रहने वाले व्यक्ति के लिए सहज स्वाभाविक है। ?
शोधार्थी हिंदी विभाग, मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय
उदयपुर (राज.)