राष्ट्रीय गीत की परम्परा में एक हिन्दी कवि की राष्ट्र वन्दना

कुंदन माली



कवि नागार्जुन अपनी प्रसिद्ध कविता ‘भारत माता’ के अन्तर्गत भारतभूमि के प्रति अपनी भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभूतियों को अनेकविध व्यंजित करते हैं। इस कविता के निमित्त हम कतिपय दिलचस्प तथा प्रेरणास्पद निष्कर्ष या कि निष्पत्तियां निकाल सकते हैं, यथा- इसमें कवि भारतमाता का मानवीकरण करते हुये इससे सम्बद्ध अनेक घटक तत्वों का मानकीकरण करता न*ार आता ह। इसके अतिरिक्त यह भी है कि उक्त कविता पर हम एकाग्रचित्त होकर गौर करें तो इस कविता की अन्तर्वस्तु के अन्तःप्रवाह से विन्यसित होकर कवि इसमें लोक चेतना, लोक तात्विकता, लोक चाहना, लोक संस्कृति, लोक व्यापकता इत्यादि के साथ-साथ वह भारतमाता के निवास की विविधता को भौगोलिक एवं वैज्ञानिक धरातल से समन्वित करके भारतीय जनसमाज की विविधतापरक-एकरूपता एवं एक रूपतापरक विविधता के बरक्स यहां की कृषिप्रधान समृद्धि को भी अभिव्यक्त करता है। कविता के समग्र विन्यास के धरातल पर देखें तो स्पष्ट होता है कि यहां कवि अपनी स्वाभाविक पुत्रवत भावना के साथ भारतमाता का गुणगान करता दिखाई पडता है, लेकिन वह कहीं भी आत्ममुग्धता, आत्मप्रवंचना, आत्म प्रलाप या कि आत्मालाप का शिकार नहीं होता वरन् वह भारतमाता की असंख्य संतानों के साथ ठोस भांति की लोकलय को साधने में भी सफल रहता है। कविता की अन्तर्वस्तु, संरचना, शिल्प तथा संधान के स्तर पर यह रचना गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित राष्ट्रगीत ‘‘जनगण मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता’’ के साथ आर्श्चयजनक साम्य स्थापित करती न*ार आती है तो फिर ऐसा मानने में भी क्या गुरे*ा होगा कि उक्त कविता हिन्दी में रचित राष्ट्रगीत कहलाने का दावा करने की दृष्टि से सक्षम है। बहरहाल यदि राष्ट्रगीत के अनेक रूप या किस्में हो सकती हैं तो ऐसे में ‘भारत माता’ कविता का दावा इनमें सबसे मुखर तथा सिरमौर माना जाना चाहिये, कम से कम हिन्दी की समकालीन कविता के परिप्रेक्ष्य में तो निश्चित तौर पर यह उचित ही होगा।
व्यापक लोक स्वीकार्यता, स्वाभाविकता तथा नैसर्गिक उर्वरता को अपने चिंतन की धुरी बना कर मातृवन्दना में संलग* कवि नागार्जुन की उक्त कविता की गतिशीलता एकाधिक आयामों पर सक्रिय तथा संचालित कविता का उदाहरण प्रस्तुत करती है और इस दृष्टि से ‘भारतमाता’ की प्रारंभिक पंक्तियां ध्यान आकृष्ट किये बिना नहीं रहतीः-
जय जय जय हे भारत माता!
नभनिवासिनी जलनिवासिनी
हरित भरित भूतल-निवासिनी
गिरि-मरू-पारावारवासिनी
नील-निविड कांतार वासिनी
नगर वासिनी ग्रामवासिनी
अमल-धवल हिमधामवासिनी
जय जय जय हे भारतमाता!
इन पंक्तियों में एक तो प्रास की छटा का प्रभाव दिखाई पडता है तो वहीं दूसरी ओर भारतवर्ष के भूखण्ड के कण-कण तक, जहां बसने की गुंजाइश दिखाई देती है वहां तक कवि की निगाह पहुंच जाती है। इसी के बरअक्स अगर हम बंकिमचन्द्र चटर्जी की राष्ट्रगान की दर्जा प्राप्त कविता का स्मरण करें तो बेहतर होगाः-
वन्दे मातरम!
सुजलाम् सुफलाम मलयज शीतलाम्
सस्य श्यामलाम् मातरम्! वन्दे मातरम्
शुभ्र ज्योति पुलकित यामिनी, दु*मदल शोभिनी
सुहासिनी सुमधर भाषिनी.......
तो क्या यह अर्थ निकालना उचित नहीं होगा कि रवीन्द्रनाथ तथा बंकिमचन्द्र के काव्यत्व में जो लोक व्यापकता, गहराई, समृद्धि, लोकसंवेदना तथा भावबोध की सघनता विद्यमान है, वही नागार्जुन के यहां भी देखी जा सकती है क्योंकि प्रत्येक स्तर पर, प्रत्येक संस्कृति मं् उर्वरशक्ति को ही श्रेष्ठ मानकर मातृवन्दना का विधान मिलता है और यह भी कि रवीन्द्र, बंकिम तथा नागार्जुन तीनों ही कवि प्रकृति, जन्मभूमि तथा माता को परस्पर पर्याय मानकर चलते हैं।
‘भारतमाता’ अपने अर्थग्रहण, वस्तुविन्यास तथा शिल्पगत सौंदर्य के स्तर पर संश्लिष्टता तथा अर्थबहुलता से समृद्ध कविता है। आकाश, भूमि, जल, गुरु पर्वत, घने जंगल, नगर, ग्राम तथा स्वच्छ धवल हिमालय का उल्लेख करके कवि भारतमाता को स्वर्ग सदृश निवास मान कर इसका गुणगान करता है और वह भी अत्यंत मुखर स्वर में। देश के प्रत्येक स्थल को रहने योग्य मानकर कवि भारतवर्ष की भौगौलिक सम्पदा की अन्यतम महत्ता का प्रतिपादन करता है। इस देश की चारों दिशाओं के वैविध्यपूर्ण तथा महत्वपूर्ण स्थलों से सुशोभित एवं गौरवान्वित महसूस करके कवि आह्वान करता हैः-
दक्षिण में है नारिकेल-पूगीवन वलयित केरल जनपद
तमिलिनाडु की धनुष्कोटि कन्या कुमारीका
पश्चिम जलनिधि सिंध-कच्छ-सौराष्ट्र
और गुर्जर-परिशोभित
उत्तर का दिक्पाल तुम्हारा महानाम उत्तुंग भाल
गौरीपति शंकर-तपःपूत कैलाश शिखर दंडायमान है
प्राची में हैं वरुणालय वह बंग विभूषण
और वक्ष पर कौस्तुभ मणि-सा विंध्य पडा है
जाने कब से!
नारियल तथा सुपारी के वनों से सुशोभित केरल की हरियाली धरती को कवि संस्कृतनिष्ठ भाषा से मुखरित करता है, जबकि आगे जाकर वह पाठकों को कन्याकुमारी के प्रवाह हेतु लालायित करता न*ार आता है, और इसके बाद वह पश्चिम दिशा में अरबी समुद्र, कच्छ-सौराष्ट्र की भौगौलिक-प्राकृतिक सम्पदा की मुक्त कंठ से प्रशंसा करता है। उत्तर दिशा को कवि भारतमाता के उंत्तुग ललाट की संज्ञा देकर भारतीय संस्कृति की एकरूपता से समन्वित करने को प्रतिबद्ध न*ार आता है। इन पक्तियों में प्रयुक्त दिक्पाल तथा भाल का प्रास स्थापित करके कवि पाठक के मन में आह्लाद का भाव उत्पन्न करने में सफल होता है। ‘‘गौरीपति शंकर......’’ इत्यादि पंक्तियों में कवि पार्वती के साथ तादात्म्य साधने वाले शंकर के अर्द्धनारीश्वर रूप में इसे उनकी तपोभूमि बतलाता है। उधर पूर्व दिशा में बंगाल के वक्षस्थल पर कौस्तुभमणि-सरीखा विध्यांचल पर्वत शोभायमान है जो कि उपमा अलंकार का सटीक उदाहरण लगता है। इस प्रकार, उत्तर-दक्षिण-पूर्व तथा पश्चिम इन चारों दिशाओं की समृद्धि के साथ-साथ इस भूमि की खनिज-सम्पदा की प्रशंसा करते हुऐ भारतभूमि के अंतस्थल में छिपे मणि-रत्न, स्वर्ण-रजत, लोहा-अभ्रक, तांबे-जस्ता-कोयला इत्यादि का उल्लेख करते हुए कवि कहता हैः-
जाने क्या-क्या ढंका पडा है।
देवि, तुम्हारी वसुन्धरा का बित्ता-बित्ता रत्नाकार है!
उक्त पंक्तियों में प्रयुक्त ‘‘क्या-क्या’’ शब्दों के द्वारा कवि अपूर्व विशेषोक्ति को साधता है जिसके जरिये भारतभूमि की अपार, अमाप, अथाह खनिज सम्पदा की व्यंजना होती है। साथ ही साथ यहां प्रयुक्त ‘बित्ता-बित्ता’ शब्दों के द्वारा पाठक के कानों में अपूर्व नाद माधुर्य की सृष्टि संभव होती है। भूमि के कण-कण को रत्नाकर बता कर कवि रूपक अलंकार के द्वारा भारतभूमि की अपार समृद्धि को व्यंजित करता है। इस भूमि को उपजाऊ-उर्वरा बनाने वाली गंगा, यमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, नर्मदा, कोसी, गंडक तथा सरयू इत्यादि तमाम नदियों की जलसम्पदा की बदौलत खेतों की माटी स्वर्णधान्य बनकर लहराती न*ार आती है, तभी तो कवि गा उठता हैः-
नदी मातृका भूमि तुम्हारी अति उर्वर है
मिट्टी का कण-कण खेतों में स्वर्णशस्य बन लहराता है
नदियों के जल द्वारा फलद्रूप बनने वाली जमीन की बदौलत लहराते धनधान्य का संवेदनात्मक संस्पर्श पाठक के समक्ष होने से शस्यश्यामला भारतभूमि की छवि जीवंत हो उठती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत की प्रकृति मौन न होकर मुखर है, इसलिये कवि कहता हैः-
कूक-कूक उठती है, कोयल, मेंढक रह रहकर टर्राता है
झींगुर तो अविराम एक रस झंकारों से कभी न नीरव पडने देते। मुखर तुम्हारी प्रकृति धन्य हो!
कृषिप्रधान भारतभूमि वस्तुतः पशुधन के कारण ही अनुपम बनती है, और इसी क्रम में कविता में नागार्जुन इंगित करते हैं कि इसी भूमि पर प्राचीन काल में दूध-दही की नदियां बहा करती थी लेकिन वर्तमान दौर में औद्योगीकरण के कारण कृषि व्यवसाय को केन्द्र से परिधि की ओर धकेल दिया जाने के कारण पशुधन सम्पदा म भी खासी कमी देखी जा सकती है, यही वास्तविकता है लेकिन कवि को अब भी विश्वास है कि इसी भूमि पर भविष्य में भी वापस दूध-दही की नदियां बहेंगीः-
दूध-दही की नदियां यदि पहले बहती थीं
आगे भी बहने वाली हैं।
लेकिन प्राचीन काल में इस यथार्थ को स्मरण करते हुए कवि वर्तमान परिपे*क्ष्य में लोगों को कृषि व्यवसाय तथा पशुपालन के क्षेत्र में आगे आने का आह्वान करता है। यही तथ्य कवि नागार्जुन को हमारे समयखंड का बडा कवि बनाने में सहायक बनता है, इसमें कोई संदेह नहीं हैं। भारत भूमि की समृद्धि का गुणगान करते वक्त कवि यह भी कहता है कि इस भूमि पर खाद्य-पेय-षट्रस व्यंजन-कव्य-गव्य इत्यादि तमाम जीवन के आवश्यक तत्वों के बीच समरसता मौजूद है। जीवनयापन के लिये प्रत्येक खाद्य पदार्थ-पेय इत्यादि के साथ ही साथ इस भूमि पर औषधियों का भी अथाह भंडार है जिसकी बदौलत यहां का जनसमूह स्वस्थ-तंदुरूस्त रह सकता हैः-
नहीं कृपण है भूमि तुम्हारी
नहीं कृपण है गगन तुम्हारा
हृदय विमल है, सक्षम इंद्रिय
वाणी विकसित, स्फीत चेतना
व्यक्ति मात्र तथा जन्मभूमि के प्रति कवि की आस्था और संकल्पबद्धता का ही यह परिणाम है कि उसे भारतभूमि के व्यक्तिमात्र का हृदय विमल और ज्ञानेंद्रियां तथा कर्मेन्द्रियां सक्षम न*ार आती है, जिसकी वाणी भी विकसित है और चेतना व्यापक, तब ऐसी परिस्थिति में इस भारतभूमि की संतति की मनोशारीरिक दृढता इसकी जननी को गरिमा प्रदान करती है। यही नहीं, बल्कि आगे जाकर यह कवि भारतभूमि के साहित्यशास्त्र से रहे सम्बन्ध की अटूटता को भी व्यंजित करता है, और वह भी मुखर स्वर में, कुछ इस प्रकार सेः-
अभिधा और लक्षणा व्यंजना
लय ताल और स्वर।
यह कहना उचित होगा कि ऐसी गौरवपूर्ण भारतभूमि के समक्ष कवि सम्पूर्ण समर्पण करता दिखाई पडता है और कविता के अंतिम भाग में वह स्वयं को रिक्त-हस्त बतलाकर अपना मस्तक झुका कर भारतभूमि को प्रणाम करता है।
साहित्यशास्त्र की अपार समृद्धि तथा नृत्य, नाट्य एवं वाद्यों के अद्भुत संयोग से व्यक्ति को ‘‘जीवंत’’ ‘‘रंगीन’’ तथा सक्रिय रखने वाली भारतभूमि अत्यंत गौरवकारी है। ताल-लय के समन्वय से कवि का मन नर्तन करने लगता है तथा वह ‘और’ के स्थान पर ‘‘औ’’ विनियोजन करके काव्य माधुर्य के साथ नादमाधुर्य का प्रवाह संभव करता है।
समग्रतः कहा जाये तो नागार्जुन अपनी इस कविता में भारतमाता के रमणीय, आह्लादकारी भौगौलिक स्थलों, अपरिमित शोभायुक्त चारों दिशाओं, अपार खनिज युक्त भूमि, इस भूमि को उपजाऊ बनाने वाली विविध नदियां, समग्र परिसर को मुखरित करते प्राणी-पक्षी, दूध-दही की नदियां बहाने वाली पशु-सम्पदा, खाद्य-पेय-व्यंजनों की विविधता, यहां की औषधियां दृढ मनोशारीरिक क्षमता वाले यहां के निवासी और इन सबके सक्रिय सान्निध्य म साहित्यशास्त्र के साथ-साथ नृत्यादि मनोरंजक विधाएं भारतभूमि को समग्र विश्व में रमणीय बना देती है। इस प्रकार की बहुमुखी समृद्धि युक्त भारतभूमि की जय जयकार करके कवि अपनी मातृभूमि के प्रति अपना अहोभाव प्रकट करता है और साथ ही साथ वह पाठक को अपनी मातृभूमि के प्रति अहोभाव का भागीदार बनाने को प्रयत्नशील न*ार
आता है।
‘भारतमाता’ कविता एक तरफ से नागार्जुन सरीखे जनकवि को लोकतक ले जाने का काम तो करती ही है लेकिन साथ ही साथ यह कविता पुत्र के मन में विद्यमान उस भारतीय संस्कारशील परम्परा के पुनरवगाहन का काम भी करती है जिसके तहत एक पुत्र अपनी माता के प्रति प्रणाम निवेदित करता है। क्यों कि वह यही कर सकता है और क्योंकि कोई भी पुत्र अपने मातृऋण से कदापि उऋण नहीं हो सकता। यही तो वह चिरकालिक सचाई है जिसके बल पर भारतीय संस्कृति का परचम बाकी संस्कृतिय से अलग, ऊंचा और अनुपम दिखाई पडता है। ?
१७०, टेकरी, उदयपुर (राज.)-३१३००२