सम्पादकीय...?



शब्दों के निश्चित-निर्धारित अर्थ होने के बावजूद प्रयोगभूमि और प्रसंग-विशेष के कारण कुछ शब्द अप्रत्याशित अर्थबोध के संवाहक बन जाते हैं। उनके अर्थों की छवियाँ और परछाईयाँ उनकी कद-काठी से बहुत आगे निकल कर अपने में एक बडा परिदृश्य समेट लेती हैं। ‘पन्द्रह अगस्त’ एक ऐसा ही शब्द ह,ै जिसे सुनते ही हमारे चित्त में एकाएक बहुत से दृश्य, घटनाएं, बिम्ब, गूंजें-अनुगूंजें उमग उठते हैं। यहां तक कि, इस शब्द को सुनते हुए हमें यह भी आभास नहीं रहता कि पन्द्रह एक संख्यावाचक शब्द है और अगस्त एक कालवाचक। यह इन संज्ञाओं से परे जा कर एक विराट परिदृश्य का साक्षात्कार कराता है।
<br/>लाउड-स्पीकरों पर गूंजते देशभक्ति के गीतों की स्वर लहरियां, यूनिफार्म में सजे-धजे, हाथों में छोटे-छोटे तिरंगे लिए सडकों पर आते-जाते नौनिहाल, घरों में सुबह पहले से ही होने लगती चहल-पहल, टी.वी. चैनलों पर होती सेना की परेड के चित्र मानस में तैरते हुए देश-प्रेममय वातावरण की सृष्टि करते हैं। कानों में पडती जन-गण-मन की धुन रोमांचित और भावविभोर कर देती है। यह सारा परिदृश्य अल्प-संवेदी या भावविहीन व्यक्ति को भी भावुक बना देता है। उसके मन में देश के प्रति रागात्मक संवेदना जगा जाता है।
<br/>इधर स्वतंत्रता को लेकर टी.वी. चैनलों, अखबारों तथा समारोह-आरोहियों के भाषणों में हर बार की तरह की चिन्ताएं और उपदेश जारी रहते हैं। समारोह समाप्त हो जाने पर जैसे, टेंट हाउस वाले अपनी कुर्सी, कनात, शामियाने समेट ले जाते हैं, वैसे ही यह चिन्ता-चर्चाएं भी उत्सव-अवसान के साथ ही हाथों-हाथ सिमट जाती हैं। देश में विद्यमान अनेकानेक समस्याओं से त्रस्त होते हम लोग भी इस अवसर पर किसी न किसी को इसका जिम्मेदार ठहरा कर आवेशित होते हैं, उसे कोसते हैं, गरियाते हैं, अपना गुस्सा प्रकट करते हैं और कुछ समय बाद स्वयं भी उस अव्यवस्था के सनातन व्यवस्थापक बन जाते हैं।
<br/>पन्द्रह अगस्त के दिन हमने गुलामी की काली कोठरी से बाहर निकलकर आजादी की खुली हवा में सांस ली थी। यह गौरवशाली दिन निस्सन्देह हमारी सदियों से चली आ रही राजनीतिक दासता से मुक्ति का दिन बन गया किन्तु, यह हमारी राष्ट्रीय एकता के खण्ड-खण्ड होने का दिन भी है। यह एक साथ गौरवास्पद और किंचित् लज्जास्पद होने का दिन भी है। आत्मा को मरोडता हुआ-सा यह सवाल उद्विग्न करता है कि हजारों वर्षों से अखण्डित रहे हम इस दिन जिस तरह खण्डित हुए वह क्या, क्यों और कैसे हुआ ? सहस्राब्दियों से भारत एक जीवित राष्ट्र रहा है। बेशक हम जय-पराजय झेलते रहे, संघर्ष करते रहे, उतार-चढाव आते रहे, पर हमारी सांसें कभी नहीं थमी। लुटते-पिटते भी रहे किन्तु हमारी धडकनें पल भर के लिए भी अवरुद्ध नहीं हुई। हम इस तरह टूक-टूक कभी नहीं हुए, जैसा अगस्त 1947 में हो गए । सन् 19॰5 में ब्रिटिश सत्ता ने हमारे देश के एक प्रान्त मात्र का विभाजन कर दिया था तो सारे भारत में प्रतिरोध के स्वर गूंज उठे। बंग-विभाजन के विरोध में पूरा देश एक साथ उठ खडा हुआ और ब्रिटिश सत्ता को अन्ततः अपने निर्णय से पीछे हटना पडा। फिर 4॰ वर्षों में ऐसा क्या घट गया कि पूरा देश खण्डित हो गया और हमने इसे शीश झुकाकर स्वीकार कर लिया ! क्या यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के शव पर राजनीतिक राष्ट्रवाद के वैताल के नर्तन का क्षण नहीं था ? क्या यह नेशन-स्टेट और मजहबी राष्ट्रवाद का कुटिल संयोजन नहीं था ? हजारों वर्षों से सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की छत्र-छाया में फलने-फूलने वाले, एक-राष्ट्रीयता से आप्लावित भू-भाग को पश्चिम के विकृत राष्ट्रवाद के आधार पर हमने खण्डित क्यों हो जाने दिया ? आश्चर्य और खेदभरा सवाल यह भी है कि ये सवाल देश के अधिकांश बुद्धिजीवियों को परेशान नहीं करते, जबकि देश विभाजन के जो कारण उस समय थे, वे आज भी निःशेष नहीं हुए हैं।
<br/>इन प्रश्नों के उत्तर में एक आसान-सी टिप्पणी यह की जाती रही है कि भारत इससे पहले कभी इस तरह एक-राष्ट्र नहीं रहा। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय भावना भारत और सारे विश्व में आधुनिक युग की देन है। अर्थात् हजारों वर्षों से भारत एक देश तो था या रहा होगा पर वह एकता कुछ दूसरी तरह की थी। ’’इस तरह से एक राष्ट्र’’ नहीं था जैसा अंग्रेजों के शासन में निर्मित हुआ। भारत के सन्दर्भ में राष्ट्रवाद को समझने के लिए यह ‘इस तरह’ और उस ‘दूसरी तरह’ के अन्तर को समझना बहुत आवश्यक है। इस अन्तर पर ध्यान न देने के कारण ही भारतीय राष्ट्रीयता और पश्चिमी राष्ट्रीयता अथवा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राजनीतिक राष्ट्रवाद अथवा नेशन-स्टेट और जियो-कल्चरल-स्टेट का अन्तर अनदेखा रह जाता है और अनेक भ्रामक अथवा सतही धारणाओं को जन्म देता है। इस अन्तर को न समझ पाने के कारण ही कुछ लोग वैश्विक मानवता के विरुद्ध खडे हुए ‘अधिनायकवादी’ पश्चिमी राष्ट्रवाद और भारत के ‘एकात्म मानववादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को एक ही समझ लेते हैं। यह सच है कि आधुनिक राष्ट्रवाद के पश्चिमी संस्करण ने विश्व में बहुत आतंक मचाया और मजहबी राष्ट्रवाद के साथ मिल कर इस महादेश भारत के रक्तरंजित टुकडे करवा दिए। इस आधुनिक राजनीतिक राष्ट्रवाद के कारण बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में धरती पर जितना खून बहा, उसका हजारवां हिस्सा भी नहीं बहा होगा, हजारों वर्षों से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति आस्थावान् एवं सैकडों राजे-रजवाडों से भरे हुए इस भारतवर्ष में। यह एक विचारणीय प्रश्न है कि हम आज भी पश्चिमी चिंतन पद्धति के इतने पिछलग्गू क्यों हैं कि हमें राजनैतिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा का अंतर समझ में नहीं आता!
<br/>राष्ट्रवाद की पश्चिमी परिभाषा के व्यामोह में हमारी यह धारणा बन गई कि किसी भी भू-खंड पर राष्ट्र का स्वरूप उसकी सांस्कृतिक परम्पराओं से नहीं, वरन राज्य सत्ता से निर्धारित होता है। जहां-जहां तक राज्यसत्ता की सीमाएं एवं उनका अधिकार व्याप्त रहता है वहां-वहां तक राष्ट्र का अस्तित्व रहता है। इसकी विचित्र परिणति यह हुई कि राज्य गया तो राष्ट्र गया। राज्य बदला तो राष्ट्र भी बदला। सुप्रसिद्ध चिंतक डॉ. महेश चन्द्र शर्मा इस पर बडी मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि, ’’किसी आदमी के साथ यह कैसा मजाक है कि जब वह पैदा हुआ तब उसकी राष्ट्रीयता भारतीय थी, जब वह थोडा जवान हुआ तो पाकिस्तानी हो गई और जब प्रौढ होने लगा तो उसकी राष्ट्रीयता बंग्लादेशी हो गई। क्या राष्ट्रीयता इस तरह बदलती है, क्या राष्ट्रीयता इतनी कृत्रिम चीज है ?’’ एक व्यक्ति अपने जीवन काल में तीन-तीन राष्ट्रों को बदलते देख लेता है। उसका घर नहीं बदलता, मोहल्ला नहीं बदलता, गांव नहीं बदलता, नाते-रिश्तेदारियां नहीं बदलती, समाज नहीं बदला, हां, राष्ट्र जरूर तीन बार बदल गया। किसी भूखंड को राष्ट्र मानने, न मानने के मापदंड इतने असंगत अथवा दुराग्रहग्रस्त हैं कि आज दुनिया में राष्ट्र की एकमात्र कसौटी यही नजर आती है कि जिस भू-भाग को संयुक्त राष्ट्रसंघ पट्टा जारी कर दे वही राष्ट्र है। देश के बुद्धिजीवियों में यह राष्ट्र-विमर्श होना चाहिए।
<br/>इधर आजादी के सात दशक पूरे होने पर भी हम अपनी विपत्तियों और दुरवस्थाओं के गड्ढों से बाहर निकल नहीं पा रहे, बल्कि दलदल में और अधिक गहरे धंसते जा रहे हैं, तो यह हमारी चाल-ढाल पर ही नहीं हमारी दिशा-दृष्टि पर भी सवाल खडे करता है। वस्तुतः आधुनिक व्यवस्था में राजनीति का दायरा बढा दिए जाने और सामाजिक दायरे के कम हो जाने के कारण जो समस्याएं सामने आई हैं, वे इतनी भीषण और दुर्घर्ष हैं कि उनका समाधान असम्भव-सा लगता है। लोकजीवन में यह धारणा घर कर चुकी है कि सब कार्य राज्य द्वारा ही सम्भव है। ऐसा सोचना यद्यपि उत्तरदायित्व के प्रति मुक्तिकामी हमारे मन को राहत देता होगा तथापि यह एक विकृत धारणा है। यह अविकसित मानसिकता हमें किन खतरों की ओर ले जा रही है, इसका हमें अहसास भी नहीं है। अपने सामान को बोझ समझकर दूसरों की पीठ पर लादने की प्रवृत्ति के चलते अक्सर हम ठगा ही बैठते हैं। आंखें जब खुलती हैं तब तक या तो हमारा अपना सामान चम्पत हो चुका होता है या नष्ट-भ्रष्ट। विचारणीय है कि यदि हम सारी जिम्मेदारी सरकार को देते हैं तो सारे अधिकार भी सरकार को देने होंगे और यह स्थिति सरकारों के सर्वसत्तावादी और अधिनायकवादी हो जाने के अवसर प्रदान करती है। ऐसा नहीं हो सकता कि जिम्मेदारी किसी अन्य की और अधिकार किसी और के पास। जिम्मेदारी और अधिकार परस्पर समानुपाती और सापेक्ष
<br/>होते हैं।
<br/>यदि हम चाहते हैं कि सरकार सर्वसत्तात्मक न बनें, लोकजीवन के सारे अधिकार और सारे नियंत्रण सरकार के पास न रहें तो जिम्मेदारी भी सरकार पर नहीं वरन् समाज या ऐसी ही किसी सरकार-निरपेक्ष संस्थाओं के पास रहे; ऐसी संरचनाएँ बनानी होगी। प्राचीन भारत में समाज का नेतृत्व सत्ताधीशों ने कभी नहीं किया। यह नेतृत्व मानवीय मूल्यों से भरे हुए चारित्रिक गुणों से संपन्न श्रेष्ठ साधकों ने किया। जिन महामानवों को हमने अपना पथ-प्रणेता माना, वे अगर शासक भी थे तो हमने उनका नेतृत्व उनकी शासकीय हैसियत के कारण नहीं अपितु उनके नैतिक, आत्मिक बल के कारण स्वीकार किया। उनके उदात्त और उच्च मानवीय मूल्यों के कारण किया। लोकजीवन का नेतृत्व राज्येतर नैतिक मूल्यपरक सत्ताओं के हाथ में होने के कारण ही भारतवर्ष हजारों वर्षों से एक जीवन्त राष्ट्र के रूप में अस्तित्ववान् रहा। यहां हम यह भी देख सकते हैं कि जिन प्राचीन राष्ट्रों का नेतृत्व राज्यसत्ताओं पर आधारित रहा वे गौरवशाली सभ्यताएं भी उन राज्यों के नष्ट होने के साथ ही काल-कवलित हो गई। ‘‘यूनान, मिश्र, रोमां सब मिट गए जहाँ से । कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ।’’ अल्लामा इकबाल कि यह ‘‘कुछ बात’’ - जो हमारी हस्ती को मिटने नहीं देती - की जड इसी विचारभूमि में मिलेगी। भारत की अटूट जीवन्तता का आधार यहंा की सांस्कृतिक-सामाजिक सत्ता ही रहा है, न कि राज्य-सत्ता।
<br/>आधुनिक लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में देखें तो हमें कुछ और विसंगतियां भी दिखाई पडती हैं। समता, स्वतंत्रता और बन्धुता लोकतंत्र के आधार बिन्दु हैं। लोकतंत्र की पूर्ण सफलता इस बात में निहित है कि, प्रत्येक नागरिक का विकास होना चाहिए। उसे विकास के निर्बाध अवसर मिलने चाहिए। इसके लिए स्वतंत्रता प्राथमिक आधार है। किन्तु नैसर्गिक अथवा मानवनिर्मित क्षमताओं और स्थितियों के कारण कुछ लोग अत्यधिक विकास कर लेते हैं और कुछ लोग बहुत कम विकास कर पाते हैं। समाज में यह अन्तर विषमताओं को जन्म देता है। विषमता की इस खाई को पाटने के लिए ‘समता’ दूसरा आधार बिन्दु है। प्रयासपूर्वक स्थापित की गई समता की इस भावना को बाहरी स्तर पर ही नहीं बल्कि आन्तरिक स्तर पर भी महसूस किया जाना आवश्यक है। पारस्परिक संघर्ष और द्वंद्व के कारण इसे छिन्न-भिन्न होने से बचाया जाना बडी कठिन चुनौती है। इसके लिए ‘बंधुता’ इसका तीसरा अपरिहार्य आधार बिन्दु है। लोकतंत्र के ये सर्वमान्य आधार बिन्दु हैं। इसे व्यावहारिक रूप में देखें तो हम पायेंगे कि सरकार व्यक्ति की स्वतंत्रता तो सुनिश्चित कर सकती है किन्तु स्वाधीन चेतना विकसित करने के लिए एक स्वस्थ और विवेकशील समाज का होना आवश्यक है। केवल सरकार के भरोसे स्वाधीन चेतना विकसित होना असंभव है। इसी प्रकार कोई भी सरकार ‘समता’ तो स्थापित कर सकती है किंतु ‘बन्धुता’ की स्थापना सामाजिक प्रत्रि*या के द्वारा ही संभव है। समता और बन्धुता का समुचित भाव ही ‘समरसता’ है जो सरकार द्वारा नहीं, समाज द्वारा ही प्रतिष्ठापित की जा सकती है।
<br/>वस्तुतः 1947 में हमने राजनीतिक स्वतंत्रता तो हासिल की किन्तु बौद्धिक दृष्टि से हम गुलाम ही बने रहे। राजनीति के सर्वग्रासी वर्चस्व के कारण हमने जीवन के अन्य पक्षों पर भी स्वाधीन चेतना से विचार न करके पश्चिमी परिपाटी का अनुसरण करने में ही अपनी शान समझी और लोकजीवन में रची-बसी भारतीय चिन्तन परम्परा की घोर उपेक्षा की ।
<br/>स्वतंत्रता-परतंत्रता को राजनीतिक फलक पर ही देखना न केवल अधूरा बल्कि, भ्रामक भी होता है। जैसे राजनैतिक स्तर पर स्वतंत्रता होती है, उसी तरह उतनी ही महत्वपूर्ण सांस्कृतिक-आर्थिक-नैतिक आदि स्तरों पर स्वतंत्रता होती है। हालांकि ये परस्पर निर्भर होती हैं किन्तु इनकी अपनी निजी स्थितियां भी होती है। बहुत संभव है कि कोई देश अथवा जाति एक प्रकार की स्वतंत्रता को भोगती हुए दूसरे प्रकार की परतंत्रता में जकडी रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक और भारतीय लोकचित्त को समझने में पारंगत महात्मा गांधी इस बात को आंरभ से ही समझ लेते हैं। ‘हिन्द स्वराज’ में वे
<br/>लिखते हैंः -
<br/>‘सारा हिन्दुस्तान गुलामी से घिरा हुआ नहीं हैं। जिन्होंने पश्चिमी शिक्षा पायी है और जो उसके पाश में फंस गए हैं वे ही गुलामी से घिरे हुए हैं।’
<br/>यह बात वह शख्स कह रहा है जिसने सारे देश में आजादी के आन्दोलन का अलख जगा दिया। सारे देश पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया और गांधी जी कह रहे हैं कि सारा हिन्दुस्तान गुलामी से घिरा हुआ नहीं है, कुछ लोग अभी भी आजाद हैं। भौगोलिक-राजनैतिक दृष्टि से सारा देश परतंत्र हो जाने पर भी गांधी का ऐसा कहना इसी तथ्य को इंगित करता है कि परतंत्रता के अनेक रूप होते हैं। किन्तु दुर्भाग्यवश 19 वीं-2॰ वीं शताब्दी के नये विचारों के प्रभाव में हमारे सोचने के ढंग में ऐसा बदलाव आया कि, हमने स्वतंत्रता का सम्पूर्ण भाष्य राजनीति के अध्यायों में ही समेटकर रख दिया। यहां अज्ञेय का एक कथन स्मरण करना प्रसांगिक होगा। ‘‘मानव के रचे हुए और मानव निर्मित होकर भी मानव से बडे इन मूल्यों में एक मूल्य स्वतंत्रता है बल्कि,स्वतंत्रता न केवल अनेक मूल्यों में से एक मूल्य है, वह दूसरे मूल्यों की आधारभित्ति भी है। स्वतंत्रता को एकमात्र राजनैतिक संदर्भ दे देने से हमारी स्वतंत्रता सीमित हुई है, उसको समझना भी कठिनतर हो गया है।’’
<br/>अपने प्रसिद्ध निबंध ‘‘खुले में खडा पेड’’ में अपनी इस अवधारणा को विस्तार देते हुए अज्ञेय आगे लिखते हैंः-
<br/>‘राजनैतिक आजादी हमारा यात्रान्त नहीं थी, केवल एक नया यात्रारंभ थी। पर उसकी देहरी पार करते ही मानो सब आराम करने बैठ गए या और भी अधिक आरामदेह कुर्सियों-गद्दियों की खोज में लग गए। यह नहीं कि फिर उसके आगे चलना बिल्कुल नहीं हुआ, लेकिन जितना चलना हुआ सब राजनीति की दिशा में। और इतना ही नहीं, चलना सब उस राजनीति की दिशा में हुआ जिसकी लीकें पश्चिम ने निर्धारित कर दी थी। और शासन की राजनीति का विरोध भी हुआ तो वह भी उन्हीं लीकों पर और उस परिधि के भीतर बंधा हुआ।’’
<br/>आजाद भारत में भी बौद्धिक गुलामी हम पर किस तरह छायी हुई रही इसका एक मामूली-सा उदाहरण लें। भारत उष्ण जलवायु-प्रायः देश ह। यह जानना रोचक होगा कि छह ऋतुओं में से हेमन्त, शिशिर, बसन्त, शरद और वर्षा नामक संज्ञाएं भारतीय लोकचित्त को इतना आकर्षित करती रही कि सदियों से अभिभावक अपनी संतानों का नामकरण इन ऋतुओं के नाम पर करते आ रहे हैं। किन्तु शायद ही कभी किसी भारतीय दम्पती ने अपनी किसी संतान का नाम ‘ग्रीष्म’ रखा हो। यह उदाहरण हमारे लोकमन को समझने के लिए पर्याप्त होगा। ऐसे में जब हम भारतीय अदालतों में चिलचिलाती गर्मी में भी वकील साहबों को काला कोट धारण किए हुए देखते हैं तो इसके औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगे बिना नहीं रहता। इसी तरह सरकारी कार्यालयों का समय -दस बजे से पांच बजे तक- अंग्रेजों ने अपनी जीवन-शैली के अनुरूप किया था। हमारे गांव-कस्बों में भोर होते ही किसान अपने खेतों की ओर चल पडते हैं, चरवाहे, ढोर-ढंगरों को जंगल की ओर हांक ले जाते हैं, दूधवालों की साइकिलें-मोटर साइकिलें सूरज उगने के पहले दनदना उठती हैं। मालिनें खेतों से सब्जियां चोंट कर अपने टोकरे भर लेती हैं। कुम्हार अपने गदहों को लेकर मिट्टी ढोने के लिए चल पडता है, लुहार की धौंकनी, बढई की आरी और कारीगर की छैनी-हथौडा का स्वर दिनारंभ के साथ समूचे परिवेश में घुल जाता है। ठाकुर जी की मंगला आरती से फूट पडता घंटे-घडियाल-शंख का निनाद सारी बस्ती को जगा देता है। लोगों के अलसाये प्राणों में चैतन्य और स्फूर्ति भर देता है। सारा जन-समुदाय सूर्योदय के साथ ही अपने दैनन्दिन कार्य में प्रवृत्त हो जाता है। और तो और छोटे-छोटे बच्चे सुबह-सवेरे तैयार होकर स्कूल के लिए चल पडते हैं। पर अफसरों-बाबुओं के लिए उनके दफ्तर प्रातःकाल नहीं खुल सकते, वे दस बजने पर ही आरंभ होते हैं !
<br/>अगणित बातें हैं; ऐसी छोटी-छोटी बातों से लेकर राष्ट्र की प्रतिष्ठा को निर्धारित करने वाली बडी-बडी बातों तक जो दिन पर दिन बढती जाती हमारी मानसिक गुलामी को दर्शाती हैं। कोई नहीं जानता, इनका ठीक-ठीक उत्तर हम किस विधि से दे पाएंगे, किन्तु एक नेत्रोन्मीलक टिप्पणी गांधी ने की थी, अपने एक मित्र को पत्र लिखकर - ‘‘यदि अंग्रेजी शासन के स्थान पर कल ही भारतवर्ष में आधुनिक प्रणाली के अनुसार भारतीय शासन स्थापित हो जाए, तो भी भारत की दशा न सुधरेगी, उस दशा में केवल इतना ही होगा कि जो धन यहां से इंग्लैण्ड खिंचता जाता है, उसका कुछ अंश यह अपने यहां रोक सकेगा। पर उस समय भारतवर्ष केवल यूरोप या अमेरीका का दूसरा या पांचवां संस्करण हो जाएगा।’’
<br/>दुर्भाग्य से आजादी मिलने के साथ ही गांधी जी की हत्या हो गयी । स्वतंत्र भारत की रूपरेखा और चुनौतियों को भारतीय दृष्टि से देखने-समझने और विदेशी तौर-तरीकों को पूरी दृढता एवं तेजस्विता के साथ प्रश्नों के घेरे में खडा करने वाला गांधी की ही तरह का कोई और न रहा। कुछ कालान्तर में एक मनीषी विचारक हुआ जिसने वैचारिक स्वतंत्रता के भारतीय आख्यान को परिभाषित और भारतीय राजनीति में प्रवर्तित करने का जी-तोड प्रयास किया किन्तु इसे प्रतिष्ठापित करने के पूर्व ही वह भी गांधी की सी गति को प्राप्त हो गया। वह विभूति थी पं. दीनदयाल उपाध्याय, जिनके बारे में विस्तार से चर्चा आगामी अंक में की जावेगी।
<br/>पिछले अंक से हमने तीन नये स्तम्भ प्रारम्भ किए थे। पाठकों द्वारा इन तीनों का उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया। इस संबंध में हमें अनेक पत्र, फोन एवं ईलोक सूचनाएं प्राप्त हुई हैं। यह हमारे लिए संतोष की बात है।
<br/>इस अंक से हम एक और नया स्ंतम्भ आंरभ कर रहे हैं। हमारे बीच में अनेक कवियशःप्रार्थी किशोर या नवतरुण होते हैं जो कविता, कहानी, निबंध आदि लिखते हैं। यथोचित अभ्यास और अपेक्षित माहौल के अभाव में उनकी रचनाओं में एक कच्चापन भले ही होता हो, किन्तु लिखने का ज*बा कम नहीं होता, बल्कि वयसुलभ उत्साह कुछ अधिक ही रहता है। ऐसे नयी पीढी के रचनाकारों को एक मंच प्रदान करने के उद्देश्य से प्रोत्साहन-स्वरूप यह स्ंतभ होगा- ‘अनगढ बानी’। इस स्तंभ में केवल उन्हीं रचनाकारों की रचनाएँ छापी जाऐगी जो अभी पूरे इक्कीस वर्ष के नहीं हुए हैं। उनकी किसी भी विधा में लिखी गई रचनाएं आमंत्रित हैं। रचनाकार को अपनी रचना के मौलिक एवं अप्रकाशित होने की घोषणा के साथ ही आयु का प्रमाण भी प्रेषित करना होगा। हमारे पाठकों से और विशेषकर शिक्षक महानुभावों से निवेदन है कि वे ऐसे सर्जनशील छात्रों और किशोरों को अपनी रचनाएं भेजने के लिए प्रेरित करें। इतिशुभम् ! ?
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