चार कविताएँ

सुरेन्द्र ‘अंचल‘


अक्कड बक्कड बम्बे बो
सो जा मुनमुन अब ना रो।
देऊँगी री ऐसी गुडिया, घुंघर वाले बाल हों।
देख देख कर कुन्नू मेरा, नाचे दे दे ताल हो।
चंदा मामा नीचे आओ।
तारे लाओ पूरे सौ।
अक्कड बक्कड बम्बे बो, सो जा मुनमुन अब ना रो।
निंदिया रानी चादर ला, मुन्ने को होले ओढा।
सपनों की बगियों में जा, लायेगा मुन्ना घोडा।
रास जो खींचे मुन्ना तो
घोडा दौडे अंगुल नौ।
अक्कड बक्कड बम्बे बो, सो जा मुनमुन अब ना रो।
नहीं हठीला मुन्ना मेरा, कहना सबका मानता।
पहले पहले राजा देखे, कौन आँख मूँदता।।
सो जो बेबी, एक दो
अस्सी नब्बे पूरे सौ।
अक्कड बक्कड बम्बे बो, सो जा मुनमुन अब ना रो। ?
लो गरमी के दिन आए
सूरज दादा आँख दिखाए
पोखर का जल सूखा जाए।
हवा गरम कपडे, ना भाए
लूँए बतुले, बहुत सताए।
कहां छिपें, छाया ना दिखे।
हाफे, पशु-सभी घबराए।
गरमी कडवी दवा की पुडिया
जिए बैचारी कैसे बुढिया।
सभी समुंदर उबले जाए
बने भाप फिर वर्षा लाए।
सब पेडों के पत्ते सुखे
बाग बगीचे, सब कुम्हलाए।
वर्षा गरमी की बेटी
पर वह अभी ना आएगी।
मानसून की डोली जाए
तब वर्षा जी आएगी।
सब वर्षा की बाट निहारे।
बहे पसीना-मन घबराए।
गरमी के दिन आए भैया
गरमी के दिन आए । ?
सूरज भैया
क्यों गुस्से हो?
थोडा हमें बताओ ना।
देखो, बहा पसीना जी।
लगी नहाने मीना जी।
जीना भारी, धूप दुधारी।
लू के तीर चलाओ ना।
सूखा दिए क्यों नदिया-नाले,
पानी पीने के भी लाले।
कुल्फी खाएं, खूब नहाएं
किन्तु तन की तपन न जाए
गुस्से को पी जाओ ना।
छाया ढूंढे-कमल भैया।
हांफे तरूवर, हांफे गैया।
प्यास ना जाए, सब मुरझाए
इतना गुस्सा दैया दैया।
ना इतनी तपन, बढाओ ना।
सूरज भैया क्यों गुस्सा हो?
थोडा हमें बताओ ना । ?
काम का गीत
काम करेंगे- हाँ भैया।
नाम करेंगे- हाँ भैया।
हम भरत-
हम हिम्मत वाले-
मातृभूमि के-
हम रखवाले-
नहीं डूबने देंगे हम-
भारत की नैया।
हम खेवैया-ता-ती-थैया
नहीं भटकने देंगे जी भारत की नैया।
पार करेंगे-हाँ भैया।
अपना पथ
हम आप बनाएं
हम भागीरथ
से, बन जाएं
पर्वत तोड बहा लाएं
हर-हर गंगा भैया
बीच राह विश्राम करेंगे-ना भैया
हर कदम साथ चलेंगे- हाँ भैया।
कदम रूकेंगे-ना भैया।
काम करेंगे-हाँ भैया
नाम करेंगे-हाँ भैया । ?
२/१५२, साकेत नगर, ब्यावर, अजमेर (राज.)