स्मृति‘ और ‘चिंतन’ के औजारों का कथाशिल्पीः निर्मल वर्मा

निर्मल कुमार माली


‘सृजन सृष्टि की सतत् प्रक्रिया है। शिल्पकार अपने औजारों से निर्जीव मृदा को भी सजीव रूप प्रदान करता है तथा अपने अन्तःकरण की कल्पनाओं को साकार करता है। जिस प्रकार एक शिल्पकार अपने औजारों से अमूर्त कल्पनाओं का मूर्तिकरण करता है उसी प्रकार साहित्यकार अपने ‘स्मृति’ एवं ‘चिन्तन’ के औजारों से कथाशिल्प का सृजन करता है। निर्मल वर्मा का सम्पूर्ण साहित्य हमें इन दोनों औजारों से निर्मित जान पडता है। निर्मल स्वयं कहते हैं- ‘‘मुझे हमेशा वह अपना अतीत, अपनी भुली हुई स्मृतियों, उन स्मृतियों में गुम्फि त लोकों का जाल जान पडता है। समय की धारा में ठहरे हुए संकेत और सूत्र जिनका जिक्र मैंने ऊपर किया था। वे अन्तहीन प्रतीक्षा के दरवाजे पर ताले की तरह पडे है और जब कोई अनुभव, कोई तनाव, कोई और उस तर्क को दिवालिया बनाने वाली असह्य चुनौती सामने आकर ‘‘खुल जा सिम-सिम’’ का जादू-मन्त्र कह डालती है, तब ताला हिलता है, दरवाजा खुल जाता है और कच्चे-पक्के अनुभव, धूल पसीने में लथपथ हमारी दैनिक औसत अनुभूतियां अपने को समेट देहरी लाँघकर उस ‘गुफा‘ में दाखिल हो जाती है, जिसे हम लेखक का ‘रचना लोक’ कहते हैं।
यदि हम निर्मल वर्मा के रचना लोक पर दृष्टि डाले तो हम पाते हैं कि आपकी प्रत्येक रचना निःसन्देह किन्हीं स्मृतियों का अहसास कराती है। आफ उपन्यास हो या कहानियाँ दोनों में स्मृति तत्व की समरूपता पायी जाती है। अपने व्यक्तिगत साक्षात्कार में निर्मल वर्मा बताते हैं कि ‘‘जब मैंने ‘वे दिन’ लिखना शुरू किया था तो उसका स्थान बिल्कुल अलग था। यह मेरी पहली बार अकेलापन और बहुत ही बेकारी के दिनों की स्थिति और जब मैंने हिन्दुस्तान आकर ‘वे दिन’ लिखना शुरू किया तो अजीब बात यह थी कि रोम में मिली उस महिला का एक गठित रूप प्राग शहर के परिप्रेक्ष्य में मेरे भीतर जन्म लेता है। शायद आपको यह एक दिलचस्प चीज लगेगी कि प्राग और एक व्यक्ति का पारस्परिक सम्बन्ध पूरे मूर्त और ठोस रूप में जब तक, मेरे भीतर सही बना तब तक ‘वे दिन‘ के समूचे कथानक ने अपना आकार ग्रहण नहीं किया, हालांकि उपन्यास का रिश्ता न तो रोम से है और नहीं इस महिला से।’’२ मनुष्य अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों एवं स्मृतियों को अपने लेखन का हिस्सा बनाता है, चाहे वह अच्छी हो या बुरी किन्तु वह अपने प्रभाव को अवश्य परिलक्षित करती है। ‘लाल टीन की छत’ की प्रधान पात्र काया की मनः स्थिति का निर्मल अपने बाल्यावस्था की स्मृतियों का प्रतिफ ल मानते हैं।
‘‘हमारे परिवार के साथ एक दिक्कत यह रही कि वह एक तरह से उन्मूलित परिवार रहा। चूंकि हमारे पिता अंग्रेजों के जमाने में सरकारी अफ सर थें तो उन्हें शिमला और दिल्ली में रहना पडता था। हम अपने परिवार की पूरी धार्मिक पीठिका से अलग हो गए थे। पिता के परिवार से भी और माँ के परिवार से भी । उन्मूलन का यह भाव मेरे परिवार में बराबर बना रहता था जैसा कि थोडा बहुत वह ‘लालटीन की छत’ में आया है।’३
‘‘अपने बाल्यकाल की इन्हीं स्मृतियों को निर्मल वर्मा अपने उपन्यास में व्यक्त करते हैं। चूंकि बाल मन की स्मृति व अनुभव व्यक्ति के अन्तःकरण पर दीर्घावधि तक अंकित हो जाते हैं। मनुष्य उन्हें चाह कर भी अपने से पृथक नहीं कर सकता है। वर्मा जी के अन्तिम अरण्य उपन्यास में अनुभूति एवं स्मृति दोनों ही स्तरों पर अद्भुत रचना है। निर्मल वर्मा एक व्यक्तिगत साक्षात्कार में कहते हैं ‘‘मेरे लिए ‘अन्तिम अरण्य’ का सबसे बडा मतलब वह है कि यह अनकहे का उपन्यास है। कितना कुछ कहा जा रहा है और कोई भी क्षण ऐसा नहीं रहता। सम्भवतः एक क्षण ऐसा आता है, लगता है कि अब कुछ कहा जा रहा है, किन्तु कुछ कहा नहीं जाता। वह कुछ न कुछ कह सकने का जो भाव है ‘अन्तिम अरण्य’ में बडे ही सशक्त तरीके से आया है।’’4
जहां शब्दों की अभिव्यक्ति गौण हो जाती है वहीं जन्म होता है आत्मानुभूति का। वर्मा जी के सभी उपन्यासों में उनका अनुभूतियां एवं चिंतनपरक दृष्टिकोण हमेशा छाया रहता है। इसी दृष्टिकोण से आपकी कहानियों को यदि देखा जाए तो उनका कथानक एवं लेखकीय दृष्टि अद्भुत है आपका सुप्रसिद्ध कहानी संग्रह ‘परिन्दे’ इसका सटीक उदाहरण है। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह के अनुसार ‘‘उनकी कहानियों के बारे में बात करनी हो तो उसका एक सूत्र है-‘‘स्मृति’ उनके वाचन का बीज स्मृति में है। उनकी सभी कहानियों का एक ही शीर्षक हो सकता है-‘‘बीते हुए की स्मृति’’५।
चिन्तन और स्मृति वर्मा जी के कथाशिल्प के मुख्य आधार हैं। ‘परिन्दे’ कहानी की प्रधान पात्र लतिका अपनी पुरा-स्मृतियों में ही खोयी रहती है। अपनी खण्डित स्मृतियों में वह मेजर गिरीश नेगी को याद करती है। ‘‘एक पगली-सी स्मृति एक उद्भान्त भावना-चैपल के शीशों के परे पहाडी सूखी हवा, हवा में झुकी हुई वीपिंग विलोज की काँपती टहनियां पैरों तले चीड के पत्तों की धीमी सी चिर-परिचित खड-खड’’6। मेजर नेगी की स्मृतियां ही लतिका के शेष जीवन का सहारा है। आपकी कहानियों की स्मृतिशीलता पर वीर भारत तलवार का कहना है कि ‘‘यह कहना गलत न होगा कि निर्मल की कहानियां काफी हद तक स्मृतियों की कहानियां हैं। पर, ये स्मृतियां कुछ खास किस्म की हैं। निर्मल की कहानियों में कोई चीज-मौसम, संवेदना, जीवन स्थितियां, अनुभव या भाषा आप और विविध रूपों को आसानी से पहचाना जा सकता है, बल्कि उनकी पहचान अपने आप उनकी आवृत्तियों से कायम हो जाती हैं। उनकी कहानियों में स्मृतिशीलता की एक स्थित यह मिलती है कि पात्र स्वयं स्मृतिशील होते हैं। बात-बात पर उन्हें पुरसी बातों की स्मृतियां आती रहती है स्मृतियां कुछ खास चीजों की अधिक आती है, जैसे-पत्तों के झरने की किसी रात की या गंध की।’’7
यानी यह कहा जा सकता है कि आपकी कहानियों का प्रत्येक पात्र किसी न किसी स्मृति में हमेशा खोया रहता है। आपका कथा साहित्य समृद्ध है, आपने अपने उपन्यासों, कहानी संग्रहों तथा निबन्धों में अपने विशिष्ट लेखन शैली से पृथक स्थान बनाया है। निर्मल वर्मा के कथा शिल्प का गढने का दूसरा प्रमुख औजार है ‘चिंतन।’ आफ निबन्धों की विषयवस्तु में चिन्तन की अद्भुत अनुभूति होती है, आफ चिंतन का फलक विस्तृत है। आफ जीवन का आधे से अधिक समय आपने विदेश प्रवास में गुजारा है। विभिन्न संस्कृतियों से जुडाव रहा है, और इन्हीं का प्रभाव आफ कथा साहित्य की विषय-वस्तु पर रहा है। अपनी इन्हीं विदेश प्रवास के संस्मरणों को आपने अपने निबन्धों में मुखरित किया है। वर्मा जी के चिंतन का फ लक विस्तृत है, कभी आप देश-विदेश की विभिन्न संस्कृतियों से परिचित होते दिखते हैं। तो कभी यूरोप की पाश्चात्य संस्कृति में भी भारतीय आध्यात्मिकता को प्रतिष्ठित करते हैं अपने कथा साहित्य में चिंतन का सबसे महत्वपूर्ण विषय मुझे आपका आध्यात्मिक दर्शन जान पडता है। अपने ‘वे दिन उपन्यास में वह कहते हैं कि ‘‘पहली बार उस शाम मुझे आभास हुआ मानो हम तीनों के अलावा और कोई व्यक्ति है, जो हमारे बीच में है उसे हम देख नहीं सकते, किन्तु वह अलग नहीं हो सकता.....वह नहीं है, इसलिए वह शायद हम सबसे अधिक है।’’8
यहां निर्मल वर्मा के आध्यात्मिक चिंतन का स्वरूप देखा जा सकता है। निःसन्देह निर्मल वर्मा अपने चिंतन के भिन्न-भिन्न पहलुओं से अपने कथा-साहित्य को मुखरित करते हैं।
एक शिल्पकार अपनी कला को अपने औजारों से शैल्पिक वैशिष्ठ्य प्रदान करता है जिनके कला प्रेमी स्पर्श मात्र से देखकर समझ सकते हैं किन्तु निर्मल वर्मा के शैल्पिक औजारों को केवल सहृदय पाठक ही अनुभूतिजन्य स्पर्श से महसूस कर सकता है। ?
सन्दर्भ
1. निर्मल वर्मा ः ‘शब्द और स्मृति’- भारतीय ज्ञानपीठ, प्रकाशन, नई दिल्ली, पांचवां संस्करण,? 2॰144, पृ.सं. 19
2. अशोक वाजपेयी, मदन सोनी (साक्षात्मकारकर्ता) ‘मेरे साक्षात्कार’-निर्मल वर्मा, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली संस्करण-2॰1॰, पृ.सं. 77
3. वही पृ.सं. 57
4. सम्पा. गगन गिलः संसार में निर्मल वर्मा’-रेमाधव प्रकाशन, पृ.सं. 76
5. वही पृ.सं. 121
6. निर्मल वर्माः परिन्दे’-भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली, तीसरा संस्करण-2॰12, पृ.सं. 119
7. सम्पा. वीर भारत तलवारः ‘सामना’ वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण, 2॰॰5, पृ.सं. 138
8. निर्मल वर्माः ‘वे दिन’, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 112
3/43, बडा भोईवाडा, उदयपुर (राज.) 313॰॰1,
मो. 92521373॰4