पुष्टिमार्गीय वार्ता साहित्य का महत्व

नीना शर्मा


वैष्णव मत मुख्य रूप से विष्णु का उपासना का मर्म है। इसे ही ‘भागवत-मत‘ की संज्ञा दी गई है। श्रीमद्भागवत में कृष्ण के चरित्र को उजागर कर एक पथ प्रदर्शक का उदाहरण सिद्ध किया है। श्रीकृष्ण के चरित्र में वैष्णव दर्शन के मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन है, यही पुष्टिमार्गीय सम्प्रदाय है।
इस सम्प्रदाय में यह माना जाता है कि भक्ति ईश्वर की कृपा से ही मिलती है। यहीं से ‘पुष्टि‘ शब्द का प्रयोग हुआ है। अनुग्रह को ही पोषण की संज्ञा दी गई है। श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कंध के दशम् अध्याय में चतुर्थ श्लोक में उल्लेखित है। ‘‘पोषण तदनुग्रहः’’। इस श्लोक का भावार्थ है प्रभु से अभिभूत हो कर ही भक्तअपना सब कुछ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है। यही समर्पण पुष्टिमार्ग का दूसरा नाम है।
इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य थे। इनके वेदान्तसूत्र का अणुभाष्य, सुबोधिनी (भागवत टीका), तत्वदीप आदि ऐसे ग्रंथ हैं जो पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों पर आधारित हैं। प्रकाशः सिद्धान्त रहस्य आदि ऐसे ग्रन्थ हैं। जो इस मार्ग के मूलस्रोत हैं। इन्हीं ग्रंथों के आधार पर इस सिद्धांत पर अन्य ग्रंथों का निर्माण हुआ। आज के इस आपाधापी युग में ऐसे ग्रंथ का दिशाबोध है, एक उपलब्धि है। पुष्टिमार्ग की छत्रछाया में संस्कृत, ब्रजभाषा और हिंदी में विपुल साहित्य रचा गया है यह तथ्य सुविदित है। आचार्यों ने साहित्य, संस्कृत और कला को जो प्रेरणा दी है उसका शोधात्मक आकलन अब तक पूरा नहीं हो पाया है। हिंदी साहित्य का इतिहास उनके इस ऋण को तो मानता है कि ब्रजभाषा गद्य की सर्जना में पुष्टिमार्गीय वार्ता साहित्य की जो प्रेरक भूमिका रही उस कारण से ब्रजभाषा गद्य बहुत समृद्ध हुआ। इस प्रेरक भूमिका के सत्परिणाम बीसवीं सदी तक परिलक्षित हो रहे हैं। भक्ति संप्रदायों ने भारतीय चिन्तन, दर्शन और संस्कृति के क्षेत्र में जो अमूल्य निधियाँ दी हैं उनके अतिरिक्त भी उनकी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यह भूमिका है समाज में नये धार्मिक मूल्यों की प्रतिष्ठा और सुधार की नई पृष्ठभूमि तैयार करने की।
कुछ आचार्यों ने किसी ऐसे मार्ग का निर्देश करना आवश्यक समझा जिसमें जनसाधारण आसानी से अग्रसर हो सके। यही मार्ग था भक्ति-मार्ग जिसमें राम-भक्ति आदि सभी धाराएँ समाहित हैं और जिसकी स्थापना का श्रेय रामानुज, वल्लभ आदि आचार्यों को एवं श्रीमद्भागवत जैसे गं*थों को जाता है।
भक्ति मार्ग की सबसे बडी विशेषता थी जाति-पाति, ऊँच-नीच आदि के सभी भेदों से जो धार्मिक परम्पराओं के विद्रूपों के कारण बढते चले गये थे, पर हटकर भक्ति के एक सूत्र में सारे समाज को बाँधने का सफल प्रयत्न। भक्ति के एक सूत्र में सारे समाज को पिरोने की यह भूमिका भक्ति मार्ग के प्रवर्तक आचार्यों में अन्तिम एवं बडे महत्वपूर्ण आचार्य हुए वल्लभाचार्य (प्रा. सं. 1535 नित्य लीला प्रवेश सं. 1587) जिन्होंने इस भक्ति मार्ग में नई कडियां जोडी। उन्होंने भक्ति मार्ग के समर्थक दर्शन का नया पंथ शुद्धाद्वैत नाम से चलाया जिसमें जीव और ब्रह्म के पूर्णतः एकीभाव और भक्तिरूपी सम्बन्ध से दोनों की ऐक्संभावना का सिद्धान्त प्रधान है।
सेवामार्ग का विस्तृत एवं सुनियोजित कार्यक्रम पुष्टिमार्ग के भक्तों के लिए निर्धारित करने का श्रेय वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी श्री विट्ठलनाथजी (प्रा. सं.1575-1942) को जाता है जो गुसाईजी के नाम से पुष्टिमार्ग में विख्यात है और जिन्होंने इस मार्ग के लौकिक स्वरूप को कार्य-प्रक्रियाओंं, क्रियाविधियों तथा आचार संहिताओं से पूर्ण करके पूरे पंथ का रूप दे दिया जिसके कारण आज तक गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और अन्य प्रदेशों के लाखों भक्त ‘बह्म-सम्बन्ध‘ एवं कंठी लेकर प्रतिदिन यमुना जी या सातों स्वरूपों का ध्यान करते हैं। वल्लभाचार्य के सम्प्रदाय के अनुयायियों से सम्बन्धित विभिन्न घटनाओं का संकलन जो ब्रजभाषा में गुसाईजी के समय किया गया था, हिंदी जगत में प्रसिद्ध है ‘‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’’ तथा ‘‘दो सौ वैष्णवन की वार्ता’’। इन दो भागों में बँटा हुआ यह साहित्य ब्रजभाषा गद्य के प्राचीन नमूने के रूप में और ब्रजभाषा गद्य के रूप में हिंदी साहित्य के इतिहास म विशिष्ट स्थान रखता है। मूलतः इन वार्ताओं का संकलन इस उद्देश्य से किया गया होगा कि सम्प्रदाय के अनुयायियों की अद्भुत भक्ति भावना की बातों को सुनकर नये अनुयायियों को पे*रणा मिले। पृष्टिमार्ग के भक्तों में भागवत कथा की तरह ही इन वार्ताओं की कथाएँ भी सुनी-सुनाई जाती रही हैं। कथाओं को वार्ताओं की ‘भावना‘ कहा जाता है और इनका भी प्रचुर साहित्य पुष्टि मार्ग में उपलब्ध है। प्रमुखतः चार दृष्टिकोणों से ये वार्ताएँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं- (1) साम्प्रदायिक दृष्टि (2) ऐतिहासिक दृष्टि (3) साहित्यिक दृष्टि (4) सामाजिक दृष्टि से (1) वार्ताओं का साम्प्रदायिक महत्व- साम्प्रदायिक दृष्टि से वार्ताओं का महत्व इस कारण भी है कि इनमें जिन सेवकों का वर्णन है उनकी भक्ति भावना और जीवन में सम्प्रदाय के समस्त सिद्धान्त और कार्य विधि स्पष्ट हो जाती है। लोकभाषा में इनके लिखने का आशय ही यह है कि जनसाधारण में सम्प्रदाय का महत्व और जानकारी फैले और कथा के रोचक माध्यम से उसे स्त्रियों और छोटे-बडे सभी वैष्णव हृदयंगम कर सके। (2) वार्ताओं का ऐतिहासिक महत्व- इन वार्ताओं के अध्ययन करने से पता चलता है कि इनमें वर्णित अनेक घटनाएँ सत्य हैं और ऐतिहासिक महत्व की हैं। विशेषकर तत्कालीन सेवकों और विद्वानों के संदर्भ से उनके समय निर्धारण में और उनके कृतित्व के बारे में कई ऐतिहासिक तथ्य पुष्ट हो जाते हैं। जैसे- ‘दो सौ बावन वैष्णवन ‘‘की वार्ता में कृष्णदास कुम्भनदास, गोविन्द स्वामी आदि अष्टछाप के कवियों तानसेन, बीरबल रानी दुर्गावती, टोडरमल आदि व्यक्तियों के संदर्भ मिलते हैं जो इतिहास पुष्ट हैं।
जोधपुर के, राठौर राजा कल्याणसिंह के पुत्र पृथ्वीराज जो (पीथल) के नाम से राजस्थान के डिंगल कवि के रूप में विख्यात हैं और जिनका ‘बेलि कृष्ण रूकमणिरी‘ राजस्थानी में प्रसिद्ध है। इस वार्ता में वर्णित है। पीथल का कृष्ण भक्त होने के कारण गुसाई जी सम्फ होना स्वाभाविक था। (3) वार्ताओं का साहित्यिक महत्व सुविदित है। अतिप्राचीन ब्रजभाषा गद्य के उत्कृष्ट नमूने के रूप में हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनके स्थान अमर है। तैलुगू-भाषी वल्लाभाचार्य ने केवल अपने आराध्य की भाषा होने के कारण तथा कुछ अन्य कारणों से ब्रजभाषा को इस सम्प्रदाय में इस प्रकार अपना लिया कि वह आचार्यों की और वैष्णवों की मातृभाषा सी बन गई। मिश्रबन्धु आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामशंकर शुक्ल ‘रसाल‘ सभी साहित्य इतिहासकारों ने अपने-अपने इतिहासों में वार्ताओं का उल्लेख किया है और इसे उत्कृष्ट गद्य का नमूना बताया है। (4) वार्ता का सामाजिक महत्व- वार्ताओं का सामाजिक महत्व आज के संदर्भ में सर्वाधिक उल्लेखनीय है। सामाजिक एकता और भावात्मक एकता की प्रेरणा तत्कालीन समाज को भक्ति मार्ग ने दी थी यह सुविदित है, पुष्टि मार्ग ने भाषात्मक एकता की भी प्रेरणा दी। भक्ति के सूत्र में जाति-पाति और ऊँच-नीच कर भेदभाव समाप्त कर सभी हरिभक्त एक साथ पिरो दिये गये थे। पुष्टिमार्ग में सवर्णों-हरिजन, हिन्दू, मसलमान स्त्री-पुरुष सब को प्रविष्ट होने और साथ-साथ चलने का समान अधिकार था। ‘‘दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता’’ में भी व्यापारी सेठ, हरिजन, मुसलमान, राजा-रंक सब आचार्य जी के सेवक और भक्त बतलाये गये हैं। यहाँ तक कि दिल्ली के चोर (वार्ता 112), द्वारका के भील (वार्ता12॰), महावन के म्लेच्छ (वार्ता 118) द्वारका के मोची (वार्ता 124) आगरे को कायस्थ (वार्ता 153) इत्यादि अनेक व्यक्तियों का भी उल्लेख है। वार्ता 218 में रसखान की भक्ति का प्रशंसापूर्वक विस्तार से वर्णन है। सामाजिक एकता की इस प्रेरणा से उन दिनों के विघटित होते हुए समाज को संगठित करने का बहुत बडा कार्य भक्ति मार्ग ने किया। इसके अतिरिक्त समस्त भाषा भाषियों को अपने आराध्य की भाषा ब्रजभाषा को समान रूप से स्वीकार करने की प्रेरणा देकर भाषात्मक एकता की जो शुरुआत स्वयं हिंदी भाषी आचार्यों ने की थी वह भी आज के भाषावादी युग के लिए एक उदाहरण है। ?
संदर्भ
1. पुष्टि मार्ग (त्रैमासिक पत्रिका) नाथद्वारा, 1999
2. चौरासी वैष्णवन की वार्ता
3. दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता
4. अयोध्यासिंह उपाध्याय, हिन्दी भाषा और उसके साहित्य
का विकास।
5. आर. के. भट्ट, श्रीमद् वल्लभाचार्य के दार्शिनिक आचार की परम्परा, सुरेन्द्र निवास विलै पार्ले, मुम्बई
6. उमेश शास्त्री, हिन्दी ग्रन्थ साहित्य का विकास क्रम, देवनागर प्रकाशन जयपुर, प्र. सं. अगस्त 1983
7. उपेन्द्रनाथ राय, चौरासी वैष्णवन की वार्ता, अमिताप राय, कलकत्ता, 2॰13
8. कुमार सर्वेश, हिन्दी साहित्य का इतिहास, सार्थक प्रकाशन, दिल्ली 2॰11
9. कलानाथ शास्त्री, पुष्टिमार्गीय वार्ता (साहित्य प्रेरक
भूमिका), श्यामलाल गुर्जर, (मुख्य निष्पादन अधिकारी,
नाथद्वारा, 1999)
1॰. कण्ठ मणि शास्त्री, कांकरोली का इतिहास।
11. कण्ठमणि शास्त्री, संप्रदाय प्रदीप।
12. कृष्णशंकर शुक्ल, आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास, 1934
13. गौरीशंकर द्विवेदी, सुकवि सरोज, 1927
14. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, मध्यकालीन भारतीय संस्कृति, प्रकाशक हिन्दुस्तान एकेडमी, इलाहबाद, 1951
15. गोपाल कृष्ण पाठक, 84 वैष्णव वार्ता, श्री गिरिवर प्रकाशन, वाराणसी, 2॰॰6
73-डी, सावित्री विला, सुखाडिया नगर, नाथद्वारा, राजसमन्द
मो. ०992952852॰