लेखक बने न कोय

प्रभाशंकर उपाध्याय


यदि किसी नव लेखक की कुछ रचनाएं छप जाती हैं तो वह स्वयं को स्थापित साहित्यकार समझने का मुगालता पाल लेता है और हमने भी कुछ ऐसा ही मुगालता पाला हुआ था। यद्यपि हमारी अनेक रचनाएं जानी मानी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थीं। दो पुस्तकें भी छप गयी थीं। अतः अपने मुगालते को हम गलत नहीं समझते थे। कोई ओर समझे तो भले समझे। फिर हम पर एक तुर्रा और था कि हम सरकारी नौकरी करते थे अतः जीवन यापन की कोई समस्या नहीं थी। इसके अलावा एक बात और थी जिसका हमें बडा ठसका था, वह यह कि हम उस सरकारी विभाग के हेड ऑफिस में कार्यरत थे। यानी नीम चढा और करेला गोया नौकरी और वो भी हेड ऑफिस की। दरअसल हेड ऑफिस की नौकरी के नजारे ही कुछ और हैं। नीचे के दफ्तरों पर आपका रूआब कायम रहता है कि आप हेड ऑफिस वाले हैं। वहां होने का हमें एक फायदा और मिला। हमारा विभाग एक सरकारी मासिक पत्र प्रकाशित करता था। उस विभागीय पत्रिका में रचना छपवाने का जुगाड भी बडी आसानी से हो गया। लिहाजा, हरेक अंक में अपनी रचना आने लगी। इससे हमारी लेखकीय प्रतिष्ठा और बढ गयी थी।
एक दिन महकमे के महाप्रबंधक महोदय का कॉल आया, ‘‘मि. उपाध्याय! क्या आप मेरे चेम्बर में आ
सकते हैं?’’
महाप्रबंधक पुकारे तो किसी मातहत की क्या मजाल जो मना कर दे? फि र हम तो महज क्लर्क ही थे अतः बोले, ‘‘यस सर! अभी हाजिर होते हैं।’’ अपने इमीडिएट अफ सर को सीना फु लाकर सूचित किया, ‘‘जी.एम. साहब ने अर्जेंट याद किया है, अपन वहां जा रहे हैं। वे विस्मित हुए क्योंकि महाप्रबंधक जैसी सख्शियत बाबू लोगों को कम ही घास डालती है। वे अमूमन, अधिकारियों को ही कॉल करते हैं। बहरहाल, उनको विस्मय विमूढ छोडकर मैंने महप्र*बंधक के केबिन में प्रवेश किया।
‘‘मे ऑय कम इन, सर? शिष्टाचारवश मैंने अनुमति चाही।
‘‘यस!, प्लीज कम एण्ड सिट देयर।’’ सामने रखी कुर्सियों की ओर इंगित करते हुए वे बोले, ‘‘मेरे पी.ए. ने तुम्हारे बारे में बताया था एण्ड आई एम हैप्पी टू नो दैट यू आर ऐ जीनियस राइटर।’’
अहा...! जनरल मैनेजर के मुखारविन्द से अपनी प्रशंसा सुनकर, मेरी प्रसन्नता का पारावार न था। ‘‘थैंक्स सर!’’ मैंने कहा।
‘‘मिस्टर उपाध्याय, हम जल्द ही कुछ नयी ब्रांचेज खोल रहे हैं। तुम उनके कार्ड्स का मैटर ड्राफ्ट्स कर दो।’’
मैं...मानो आसमां से गिरा, ‘‘सर! इसे तो कोई भी प्रिंटिंग प्रेस बडी आसानी से तैयार कर देगा। यह सब उनकी
हैबिट है।’’
मन में घमासान मच गया, रे लेखक! देख ले तेरी औकात। पर करता क्या ? अपन थे अदना से बाबू और वे थे, उच्चाधिकारी। अपना वजूद चूहे सा और उनका हाथी सरीखा। चुपचाप, उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर, अपना सा मुंह लेकर चले आए।
दो दिन तथा तीन रातें खपा कर हमने वह ड्राफ्ट्स तैयार किया। दो दिन और तीन रात इसलिए कि हमें ऐसे काम का अभ्यास जो न था। कोई लेख या कहानी लिखनी होती तो एक रात ही काफ ी थी। बहरहाल, उस मैटर को दे कर जैसे तैसे अपनी जान छुडाई। लेकिन जान भी इतनी आसानी से छूटने वाली थोडे ही थी। कुछ दिनों बाद जी.एम. साहब की पुत्री की शादी तय हो गयी तो उसके निमंत्रण का प्रारूप बनाने का काम भी अपने ही मत्थे पडा।
इसके बाद तो अन्य अधिकारियों के ऐसे ही आदेशों और सहकर्मियों के अनुरोधों का सामना हमें करना पडा। कुछ ही माह में हम निमंत्रण पत्र लेखन के विशेषज्ञ के तौर पर विख्यात हो गए।
इसी विषय पर कुछ दिनों बाद हमारे पास एक रोचक प्रस्ताव आया। मेरे महकमे के एक सज्जन अपनी कंजूस प्रवृत्ति के लिए जाने जाते थे। एक दिन वे बोले, ‘‘यार उपाध्याय! मेरे नये मकान का गृह प्रवेश तय हो गया है। मैं चाहता हूं कि सिर्फ हवन-पूजा से ही काम चल जाए। दावत देकर फालतू खर्च मैं करना नहीं चाहता मगर घर वाले मानते ही नहीं हैं। अतः तुम ऐसा निमंत्रण पत्र बनाओ कि कम से कम मेहमान मेरे यहां आएं। यानी सांप भी मरे और लाठी भी नहीं टूटे।
चूंकि उनके कंजूस स्वभाव से मैं भली भांति परिचित था लेकिन वे इतने आला मक्खीचूस होंगे इसका गुमान भी न था। लिहाजा, उन्होंने एक कठिन टॉस्क मुझे दे दिया था। चुनांचे, कुछ घंटों की मगजमारी के पश्चात मैंने
गृहप्रवेश का वह न्यौता तैयार कर दिया। उसे पढकर वे अति आनंदित हुए।
बहरहाल, कार्ड छपे और उन्होंने दिल खोलकर उनको बांटा। मगर, मेहमान पहुंचे महज दस। दरअसल, निमंत्रण पत्र की भाषा ऐसी विकट थी कि पढने वाले को यह पता नहीं लगता था कि उसे न्यौता भी गया है कि नहीं। प्रथमदृष्टया वह सूचना परक पत्र नजर आता था। अतः, ऐसा संशय उत्पन्न होना स्वाभाविक था। इसके बाद भी उसमें एक पेच और था, वह यह कि कार्ड पर नविनिर्मित घर का पता भी भ्रामक था। चुनांचे, जो दस लोग वहां पहुंचे उनमें से आधे तो उनके नजदीकी रिश्तेदार ही थे और वे उनके नए मकान का पता अच्छी तरह जानते थे। शेष पांच अतिथि इतने दीढ प्रतीत होते थे कि वे सारी बाधाओं को पार कर भी वहां जा ही पहुंचे।
खैर जो भी हो, महाकंजूस गृहस्वामी अत्यन्त प्रसन्न थे क्योंकि उनके अनुसार सांप भी मरा आर लाठी भी सलामत रही। मगर, मेरी शामत आ गयी क्योंकि इस प्रकरण के पश्चात् मेरे पास आये दिन, ऐसे ही प्रस्ताव आने लगे थे और एक दिन तो हद हो गयी। मेरे एक अफसर ने उस दिन मुझसे कहा कि उनके किरायेदार की पुत्री एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग ले रही है। वे चाहते हैं कि उनकी बेटी हर हाल में उस प्रतियोगिता में जीते। अतः, मैं इस विषय पर कुछ इस प्रकार का लिखूं कि जजों को यह पल्ले न पड सके कि वह विषय के पक्ष में बोल रही है अथवा विपक्ष में।
वह अजीब और अहमक किस्म का प्रस्ताव था लेकिन वे मेरे महकमे के बॉस थे अतः बगैर प्रतिवाद मैंने प्रश्न किया, ‘‘प्रतियोगी को अपना नाम पक्ष अथवा विपक्ष में बोलने हेतु देना होता है। ऐसा नहीं करने पर वह प्रतियोगिता में भाग कैसे ले सकेगी?’’
वे निश्चिंतता से बोले, ‘‘इसकी फिक्र तुम मत करो। दरअसल, उन्हें अभी जजों के नाम मालूम नहीं हुए हैं लेकिन उन्हें यकीन है कि प्रतियोगिता से पूर्व किसी एक पक्ष के निर्णायकों का पता वे लगा ही लेंगे लेकिन हमें तो मैटर तैयार रखना ही होगा।’’
मित्रों, टू-इन-वन स्पीच बनाना कोई हँसी खेल तो था नहीं। लेकिन मना भी नहीं किया जा सकता था। यानी हलाल तो हर हालत में होना ही था और हुआ भी। दो दिन की कठिन मेहनत से मैंने उस कठिन डगर को पार किया। कुछ दिनों बाद उन्होंने मुझे केबिन में फिर बुलाया। अब, कोई नयी बला सिर न आ पडे? इस आशंका से ग्रसित होकर, मैं उनके सम्मुख हाजिर हुआ।
वे चहकते हुए बोले, ‘‘थैंक्स मिस्टर उपाध्याय! वह लडकी जीत गयी।’’
मैंने जिज्ञासा जतायी, ‘‘जजों का जुगाड हो
गया था?
बॉस बोले, ‘‘नहीं, उसका जुगाड तो नहीं जमा। बहुत ट्राई किए बेचारे। आखिर, निराश होकर उन्होंने बेटी को कहा कि वह किसी भी पक्ष में अपना नाम लिखा दे और उस मैटर को पढ दे। उन्होंने पुत्री के जीतने की आशा ही छोड दी थी किन्तु जब निर्णय आया तो उसको दो प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुए।’’
मैं चौंका, ‘‘यह कैसे हुआ, सर?
‘‘यह तुम्हारी कलम का चमत्कार है। उस वाद-विवाद प्रतियोगिता के जजों में इस बात पर वाद-विवाद हो गया था कि इस कैंडीडेट ने प्रतियोगिता के कौन से पक्ष में बोला है। दोनों ही पक्ष उसकी स्पीच को श्रेष्ठ बता रहे थे तथा उसे ही अपनी ओर के प्रथम पुरस्कार का हकदार मान रहे थे। जब, बहस ज्यादा बढी तो बीच का रास्ता अख्तियार किया गया और उस लडकी को दोनों ओर के प्रथम पुरस्कार प्रदान कर दिए गए।’’
दोस्तों! उस दिन तो मेरी इच्छा वाकई ऐसी हुई कि अपनी पीठ स्वयं थपथपाने लगुं और अपनी कलम को बार बार चूम चूम कर यह गाऊं, ‘‘या..ऽ..ऽ..हू..ऽ....ऽ..चाहे कोई मुझे जंगली कहे...कहता है तो कहता रहे...।
मगर मेरी वह खुशी भी कुछ ही दिनों में काफूर हो गयी क्योंकि अब ऐसा ही सिलसिला शुरू हो गया था। हेड ऑफिस में सैंकडों कर्मचारी थे और उनमें से कभी कोई निबंध तो कोई कविता या शेरो-शायरी लिखाने आ जाता था। एक दिन तो कए नौजवान द्वि-अर्थी प्रेम पत्र लिखाने ही आ धमका।
आखिरकार, एक दिन मुझे इन सबसे निजात मिल ही गयी। मेरा तबादला हेड ऑफिस से दूर एक शाखा कार्यालय में कर दिया गया। यहां बहुतेरे हाकिम और हुक्मरान नहीं थे। एक अधिकारी और महज तीन सहकर्मी थे। चुनांचे, मैंने राहत की सांस ली। बॉस बडे मितभाषी थे और अपने काम से काम रखते थे। गर्ज यह कि सुकून से दिन गुजरने लगे।
एक दिन दफ्तर में प्रवेश करते ही बॉस ने बुलाया और बोले, ‘‘छुट्टी की अर्जी लिख दो।’’ मैं हैरत में हो गया, क्या ऑफिस आने में विलम्ब हो गया है? केबिन में लगी घडी की ओर देखा, वह दस बजा रही थी।
मैंने प्रश्न किया, ‘‘सर! मेरी एप्लीकेशन?’
साहब ने मुझे घूरा, ‘‘तुम्हारी नहीं मेरी...समझे?
ये...लो...यहां आकर अपन तो अर्जीनवीस ही हो गए। लानत है, हमें।
मुझे विचारमग्न देखकर साहब जोर से बोले, ‘‘और क्लीयर करूं क्या ? यहां बैठो और फ टाफ ट हिन्दी में मेरी लीव एप्लीकेशन लिख डालो।’’
मरता क्या न करता आखिर साहब का आदेश था, हुक्म तो बजा ही लाना था। ‘नौकरी में नाक नहीं’ उक्ति का स्मरण कर मैंने कागज-कलम संभाली और पूछा, ‘‘सर किस प्रयोजन हेतु छुट्टी चाहिए?’’
उन्होंने भृकुटि को पुनः वऋ किया, ‘‘मैंने सुना था कि तुम बडे अच्छे लेखक हो। हेड ऑफिस में तुमने बहुत से मैटर ड्राफ्ट्स किए हैं और तुम एक छोटी सी एप्लीकेशन नहीं लिख पा रहे हो। कोई अच्छा सा रीजन सोच समझकर लिख दो।’’ यह कहकर वे एक फाइल पढने लग गए। मितभाषी बॉस का इतना बोलते हुए मैं, पहली बार देख रहा था। अब समझ आ रहा था कि संभवतः संकेतिक शब्दों का प्रयोग ही उनका मितभाषण था।
खैर, मैंने कुछ पंक्तियां कागज पर लिखीं और
फिर अटक गया, ‘‘सर कितने दिन की छुट्टियों की
आवश्यकता होगी?’’
वे फिर उखडे, ‘‘देखो, मुझे बार-बार डिस्टर्ब मत करो, जो पूछना हो एक बार में ही पूछ लो।’’
मैंने तनिक रूक कर विचारा तत्पश्चात् पूछा, ‘‘कितने दिन का और किस प्रकार का अवकाश चाहिए?’’ उन्होंने बताया कि उन्ह चार दिन का आकस्मिक अवकाश चाहिए। लिहाजा, उनका अवकाश आवेदन लिखकर, उनके सामने रखकर मैं चुपचाप खिसक आया। बाहर आने पर मेरे साथियों ने मुझे प्रश्न सूचक दृष्टि से देखा। मैं निगाहें चुराता चुपचाप अपनी सीट पर आ बैठा। पास में बैठे सहकर्मी ने आखिरकार पूछ ही लिया, ‘‘साहब, बडे जोरों से बोल रहे थे, ऐसी क्या बात हुई?’’
अब, उसे मैं क्या बताता? बताकर, अपनी फजीहत करवाने की अपेक्षा चुप रहना ही हितकर समझा। ‘‘कुछ विशेष नहीं कहकर’’, मैंने चुप्पी साध ली। अपने लेखन की बात गुप्त रहने में ही भलाई थी, फिर मैं तो दूध का जला भी था। लेकिन एक दिन गोपनीयता का भांडा भी फूट गया।
हुआ यूं कि एक रोज एक युवा पाठिका मेरी एक रचना को पढकर, अपनी प्रतिक्रिया जताने मेरे दफ्तर आ गयी। घटते हुए पाठकों के इस दौर में आजकल ऐसा होना नामुमकिन ही है, मगर उस पाठिका को कुछ ऐसा जुनून चढा कि पत्रिका के सम्पादकीय कार्यालय से मेरा पता पूछकर, वहां आ धमकी। अब, सबकी निगाहें हम दोनों की ओर थीं। यहां तक कि साहब भी एक बार बाहर आकर ताक झांक कर गए थे। उसके जाने के बाद मेंरे सहकर्मी आस-पास आ बैठे और मामले की तफसील चाहने लगे। मैंने टाला, ‘‘ऑफिसियल परपज से आयी थी।’’
तभी हमारा चपरासी रसिक बिहारी बाहर से अंदर आया और मेरे चरण छूने का उपक्रम करते हुए बोला, ‘‘वाह गुरु! मान गए। आपने भी ऐसा हुनर पाया है कि
हुस्न आफ पास मंडराता है। थोडा गुरु ज्ञान हमें भी दे
दो, उस्ताद!’’
मैंने कहा, ‘‘बिहारी तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है। ऐसा कुछ भी नहीं है।’’
रसिक बिहारी बोला, ‘‘गुरु, हमें चलाओ मत। हमने बाहर जाकर उस लडकी से सब पूछ लिया है। वह आपकी किसी कहानी को पढकर ही यहां आयी थी। हमें भी कहानी लिखना सिखा दो, उस्ताद!’’ मैं यूं बेपर्दा हो जाऊंगा? इसकी कल्पना भी नहीं की थी। रसिक बिहारी को टालने की गरज से मैंने उसके कान में कहा, ‘‘ठीक है, अपने मन से एक कहानी लिखकर लाओ।’’
और उसी रात रसिक बिहारी एक कहानी लिखकर ले आया। मैंने, माथा पीट लिया क्योंकि वह, मेरी उसी कहानी को नकल कर लाया था जो पिछले रविवार को एक अखबार में छपी थी और जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप वह कन्या कार्यालय में आयी थी। रसिक बिहारी ने यह सब अनजाने में किया था क्योंकि वह मेरे तकल्लुस से वाकिफ नहीं था। ?
193, महाराणा प्रताप कॉलोनी, सवाईमाधोपुर (राज.)-322॰॰1
मो. 9414॰45857