दास्तान-ए-दफ्तर

डॉ. देव कोठारी


हमारे देश के दफ्तर की दास्तान कुछ अजीब सी है। दफ्तर बडा हो या छोटा। उसमें काम करने वाले कर्मचारी दो-चार हो या शताधिक। साहब का रूतबा रोबदार हो या दागदार। कोई फर्क नहीं पडता। सब कुछ अमरबेल की तरह है। अम्बर से अवनि तक, राजा से रसूखदार तक, अमीर से गरीब तक और समर्थवान तक। सब ओर दफ्तर की दफ्तरी है और दफ्तरी की दरिया है। माया भी है और महामाया भी। फ ाइलों का पूजा पाठ का ठाठ इन दफ्तरों का दैनिक दौर-दौरा है, विशेषता है। ऐसी विशेषता जो सिर के बल चलकर आती है और पांवों के सहारे समय-असमय नत-मस्तक हो जाती है।
इसलिए महानुभावों! नहीं अब खाने-पीने की कोई आखडी लेनी है। नहीं कोई प्रतिज्ञा करनी है। कश्मीर से कन्याकुमारी की पदयात्रा भी अब नहीं करनी है। देश भर में आपने कई दुर्ग, हवेलियां, महल, मीनार या म्यूजियम देखे होंगे। दिल्ली का चाँदनी चौक या मुम्बई की चौपाटी देखी होगी। आगरे का ताजमहल अथवा दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर भी देखा होगा। उन्हें देख-देखकर आपकी आँखें चौंधियाने लगी होंगी, किन्तु आपने यदि एक बार भी किसी दफ्तर के दर्शन नहीं किये। दफ्तर की दास्तान से रूबरू नहीं हुए, तो समझ लो, सब कुछ देखना हो गया व्यर्थ। नहीं रहा उसका कोई अर्थ! आपका जीना हो गया बेकार नहीं होंगे आफ सपने साकार।
मान लिया आपने वेद, उपनिषद, पुराण पढ लिये हैं। आगम, त्रिपिटक और गुरुग्रंथसाहब का अवलोकन कर लिया है। गीता व बाईबल के भी दर्शन कर लिये हैं। मतलब यह कि आपने ऐसे कई धर्म शास्त्रों का अध्ययन कर लिया है, लेकिन यह सब अध्ययन अधूरा है। इन सब की रचना करने में हजारों वर्ष व्यतीत हो गये। हमारे स्वनाम ऋ षि-मुनियों व तपस्वियों ने तन-बदन को कृश करके इन धर्मशस्त्रों के माध्यम से जीवन के सार को खोज निकाला। आत्म-तत्व की शोध-खोज-अनुसंधान में इन ऋ षि-मुनियों ने जी-जान एक कर दी। ये जी-जी कर मरे और मर-मर कर जीये, लेकिन वे भी दफ्तर की दास्तान की नहीं समझ सके। समझते भी कैसे? इन्हें तो आत्म-तत्व की खोज से ही फ ुर्सत नहीं थी, ऐसी स्थिति में दफ्तर की फ ाईलों को समझना तो दूर, दफ्तर की दुनिया को देखना भी उन्हें नसीब नहीं हुआ।
दफ्तर है क्या? रेत, सीमेन्ट, चूना, ईंट, पत्थर से बना एक ढाँचा, जिसमें छोटे बडे कुछ कमरे होते हैं। एक दरवाजा होता है और कहीं-कहीं कमरे में खिडकियां भी होती हैं। इन कमरों में पुराना सा एक पंखा लटका होता है। रोशनी के लिए निखट्टू लट्टू लगा होता है जो कभी जलता है, कभी जलते-जलते रेंगता है। बैठने के लिए कुर्सी, उसके सामने टेबल और पास में रखी अलमरी। बस, इसे ही दफ्तर कहते हैं। अब जमाना बदला है। आधुनिकता की दौड में भागम-भाग हो रही है। दफ्तर को भी आधुनिकता का चस्का लग गया है। वे अल्ट्रा मॉर्डन हो रहे हैं। दफ्तर भी अल्ट्रा मॉर्डन और काम भी अल्ट्रा मार्डन। इलेक्ट्रिक यंत्रों ओर वाई-फ ाई से परिपूर्ण। ऐसे दफ्तरों का काम-काज भी वाई-फ ाई और हवाई। दफ्तर का कम्प्यूटर सब का आका, चहुंओर धुम धडाका। कुर्सी पर अब बाबू नहीं कम्प्यूटर बैठता है। प्राणहीन और दृष्टिहीन। काम के लिए की-बोर्ड पर अंगुलियाँ चलती हैं। अंगुलियों की चाल से अपने काम के हाल को पहचानना ज्यादा दुष्कर नहीं है। ऐसे ही दफ्तर पूरे देश को चलाते हैं। सरकार भी इन्हीं दफ्तरों से चलती है। कभी कछुआ चाल से तो कभी खरगोश की चाल से। इसके लिए अल्लादीन का चिराग जलाने के अलवा कोई चारा नहीं है। वारा-न्यारा भी नहीं है।
ऐसे दफ्तर को दफ्तर नहीं, इसे तो मंदिर कहना चाहिए, जिसमें देश के भाग्य-निर्माता, विकास के पुरोधा, अक्ल के अजीर्ण और जन-गन के जननायक सेवक आरूढ होते हैं यहां कुर्सियों पर। ठीक उसी तरह जैसे मंदिर में देवता अपने सिंहासन पर विराजमान होते हैं। ब्रह्माजी ने अपनी फैक्ट्री में मनुष्य जाति के जितने भी मॉडल तैयार किये हैं, दफ्तर रूपी इस म्यूजियम में आपको वे सब नमूने बदस्तूर हाजिर मिलेंगे।
ऐसे मॉडल में कोई सफेद हाथी जैसा भारी-भरकम तो कोई रेगिस्तानी ऊँट जैसा दुबला-पतला अस्थिपंजर। किसी ने बन्द गले का कोट और धोती पहन रखी है तो किसी ने पजामा और कुर्ते के साथ गले में मफ लर टाँग रखा है। आंखों पर मोटा चश्मा और पैरा में कानपुरी चप्पल। गालों पर घास सी उगी हुई दाढी। मूंछों के बाल लम्बे, काले और सफेद। यही है दफ्तर का बाबू! इन बाबुओं में कोई घोडे जैसा चपल है तो कोई टट्टू जैसा अडियल। कोई कुत्ते सदृश पालतू तो कोई भेडिये जैसा खूंखार। कोई हाल म रात-दिन बैल की तरह जुतने वाला तो कोई बिल्ली के रूप में मलाई चट करने वाला। कोई चुप रहने वाला तो कोई वाचाल। कोई छैल-छबीला रंगदार तो कोई मटमैला बदबूदार। कोई बाबू की खाल में शेर तो कोई अफसर की खाल में गधा। यही है दफ्तर की पहचान और नोट छापने वाला कद्रदान, यानी कि दफ्तर !
इन दफ्तरों की कुछ बातें अजीबोगरीब हैं तो कुछ बातें असाधारण रूप से साधारण भी हैं। जैसे हर बाबू हेड क्लर्क से डरता है और अफसर के सामने काँपता है। धोती ढिली होने लगती है और पेंट खिसकने लगता है लेकिन इसमें बाबू बुरा नहीं मानता। गालियाँ सुनकर भी बाबू गिला-शिकवा नहीं करता। चमचागिरी करना तो कोई इनसे सीखे। चपरासी से ले कर अफसर तक सभी इन मामलों में सिद्धहस्त हैं। चेम्पियनशिप प्राप्त है इन्हें। सब ने चमचागिरी का कोर्स कर रखा है। डिप्लोमा भी प्राप्त है। मक्खन लगाने में माहिर है। विश्वास नहीं है तो पूछ लिजिये दफ्तर के ही हेड क्लर्क या अफसर से कि हे महामहिम! हम किसी से जिक्र नहीं करेंगे, कानों कान खबर तक नहीं होने देंगे, समाचार पत्रों की सुर्खियां बटोरने का भी अवसर नहीं मिलेगा, लेकिन सर! यह तो बताइये, आप जिस कुर्सी पर बिराजमान अनेक ओपमा है उस कुर्सी पर तो किसी दूसरे का हक था। उसका हक छीन कर आप कैसे बैठे हैं? इसका उत्तर जानने की आवश्यकता नहीं हैं। वे बतायेंगे भी नहीं, किन्तु हकीकत यह है कि इनकी नींव में चमचागिरी रूपी यूरिया पडा हुआ है। यह दिगर बात है कि कभी-कभी ऐसे प्रमोशन न्यायालयों की शरण अशरण हो जाते हैं।
ऐसे दफ्तरों से आपका पाला पडा या नहीं, यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन हम भुक्तभोगि अवश्य है। चपरासी से लेकर बाबू, हेड क्लर्क और अफसर, सब के घाट पर एक-एक कर पानी पीया है हमने। हमारे अनुभव के आधार पर यदि आप किसी को लेकर दफ्तर में घुसने का प्रयास करेंगे तो सबसे पहले आपको चपरासी से पाला पडेगा वह टोकेगा, मानो हम कोई आतंकवादी हैं या इनक्रोचमेन्ट करने आये हैं। पूछेगा, किससे मिलना है? बताओगे, तो बोलेगा, अभी वे जरूरी मिटिंग में बैठे हैं, नहीं मिल सकते। दो-चार बार धक्के खाने के बाद चपरासी की आँखें कुछ बोलने लगेंगी। आंखों का अर्थ समझ में आ गया तो काम बन गया। जब बाबू के पास यानी कि क्लर्क साहबान के पास पहुंचे तो उनकी कुर्सी के पास जरा खडा होकर तो देखिये। आफ होश फाक्ता ना हो जाये तो हम अपना नाम बदल दे। सब कानून कायदे उन्हें मालूम है। दफ्तर चलाने और काम कराने की चाबी बाबू के कलम की नोक में है। फाईल के कागज पर उसकी नोटिंग का एक-एक शब्द ऐसा सटीक है कि अच्छे-अच्छों की अक्ल ठीक कर दे। अफसर तो क्या वकील व जज साहब तक उस नोटिंग के मर्म को बमुश्किल समझ पाते है। नोटिंग के सामने कानून के सभी एक्ट खोखले, निष्प्रभावी ओर निष्प्राण! यह दीगर बात है कि दफ्तर के साहब बाबू के काबू में रहते है। फ ाईल के नोटिंग को वेटिंग में डालने का निर्णय भी बाबू की सहमति के बगैर संभव नहीं है। ऐसा समर्थवान बाबू भी घर जाते ही क्लीन बोल्ड! बीबी के सामने घिघियाने लगता है। बीबी के सामने उसकी नोटिंग की करिश्माई फेल! वैसे मियां-बीबी की घरेलू बातों का यहां जिक्र करना आचार संहिता का उल्लंघन करना है।
बहरहाल, दफ्तर में बाबू शेर और उसकी दादागिरी का सवा सेर! दफ्तर का कामकाज उसकी मर्जी से चलता है। वह दफ्तर कब आता है? कब जाता है? लंच के नाम पर कुर्सी खाली क्यों रहती है? दिन में चाय कितनी बार पीता है? कौन पिलाता है? यह सब बाबू के सामर्थ्य पर निर्भर है। इसका कोई पेरामीटर नहीं है।
वैसे बाबू का सामर्थ्य अकूत होता है। टेबल पर फाईलों के अम्बार को देखकर यह कहना ठीक नहीं कि बाबू नहीं स्टोरकीपर है। सच तो यह है कि वह है तो बाबू! सोलह आने सच है कि वह केवल बाबू है। बाबू के सिवाय कुछ भी नहीं इस बाबू के टेबल पर अम्बार रूप में पडी इन फाईलों में तरह-तरह के कागज लगे हैं। एक-एक कागज बडा मूल्यवान है। इन कागज में अंकित पंक्तियों का अर्थ भी अर्थ के बिना समझना असंभव है? सोने का अण्डा है ये फाईलें।
ध्यान से देखिए, फाईल बाबू के टेबल पर पडी है। आप लाख कोशिश करे। दिन-रात सिर पीटे, लेकिन फ ाईल को साहब तक पहुंचाने के लिये बाबू से बहस करना शेर के मुंह में हाथ डालना है। अपना काम करवाने के लिए आप बहस करेंगे तो वह भी करेगा। यह मत सोचिये कि आपकी बहस के दौरान आप द्वारा प्रस्तुत तर्क, पुराने संदर्भ, काम की पारदर्शिता से वह चुप हो जायेगा। वह तो बहस के लिए सिर्फ बहस करता है और इसलिए करता है ताकि पता चले कि सरल काम को करना भी कितना कठिन है? बहस के माध्यम से वह यह बताना भी अपना कर्त्तव्य समझता है कि वह काम को अपनी जोखिम पर करवा सकता है, लेकिन उसके लिए क्या करना है? वह बहस के दौरान बहस में ही संकेत कर देता है। बाबू के हाथ में पेपरवेट जो होता है। पेपरवेट के मायने आपको समझने की आपकी सख्त जरूरत है। यही तो बाबू का पवित्र संकेत है। दफ्तर में जा कर अपने अपना काम निकलवाना है तो संकेत के अर्थ को समझने जितनी अक्ल तो रखनी पडेगी। यह भैंस के सामने तन्दूरा बजाने जैसी बात नहीं है, बहस भी नहीं है। इसलिये हे मनु की सन्तानों! लोकतंत्र में इस तंत्र को मंत्र बना कर रट लो कि काम करना है तो दफ्तर की दास्तान से रूबरू होना होगा। दफ्तर की परम्परा को अपने जहन में उतारना होगा, फिर चिंता मत करो कि आपका काम कैसे होगा? अगर किसी ने शिकायत भी की। अखबारी खबर भी बनी। कोई सूचना के अधिकार की बात भी करे तो चिन्ता कैसी? चर्चा में चर्चित होकर दफ्तर का अफसर सुर्खियों में छाएगा तो उसकी तेजस्वी किस्मत चमकेगी। अगर नहीं चमकी तो उसका रूतबा तो बोलेगा। बाबू का कोई क्या बिगाड लेगा? उसने तो वही किया जो साहब ने चाहा। चाह की राह में भी साहब की मर्जी पर निर्भर। मर्जी के लिए अर्जी तो उसने लगाई नहीं। अब उस कोई भ्रष्टाचार की उपमा प्रदान करे तो करे अपनी बला से। सब कुछ पाक-साफ । सब दूध के धुले। धवल, उज्ज्वल और चमचमाहट की चकाचौंध से चौंधियाए हुए। आप डाल-डाल तो अफसर पात-पात और बाबू सातवें आसमान पर। यही फ ार्मूला है दफ्तर का।
इसलिये दफ्तर से डर कैसा? निडर बनो, निर्भर रहो और अपना काम करने के लिए इस दफ्तर रूपी युद्ध के सैनिक बन जाओ क्योंकि जब दफ्तर की बात चल रही है तो बात बा अदब जान लो, समझ सको तो समझ लो, एक बार की घटना को। बात ही घटना की है, वह भी सच्ची घटना और हकीकत के साथ है। हमारे एक परम आदरणीय महानुभाव को अमुक दफ्तर में काम कराना था। काम कोई बडा नहीं था। काम में कोई रगडा भी नहीं था, लेकिन दफ्तर का बाबू तगडा था। वे महानुभाव लगातार ढाई वर्ष तक दफ्तर के चक्कर पे चक्कर काटते रहे। इस चक्कर काटने में उन्होंने पूरे आधा दर्जन जूते बदल दिये मगर काम था जो होता नहीं। हर बार कोई ना कोई ऐसा तर्क सामने आ जाता कि महानुभाव बेतर्क हो जाते। एक दिन उनका हमारे से सामना हो गया। दफ्तर के काम की दर्दभरी दास्तान सुनाने लगे। हमने उनके चेहरे का हाव-भाव देखा। चेहरे पर उमड के आ रही हवाइयों का अवलोकन किया। यह सब देखकर हमसे रहा नहीं गया। अनायास ही हमने अंगडाई ली और बोल पडे हम। अरे बावले! दफ्तर के मारे क्यों हो रहा है उसके हवाले? अपनी सेहत का तो थोडा ध्यान रख। उसे तो मत गंवा मूर्ख! अपनी पसीने की कमाई को क्यों बाटा कम्पनी को बांट रहा है। चला जा दफ्तर के बाबू के घर। समझ ले उसे काबू में करने के गुर! जूते घिसने के बजाय जबान घिस। फाईल पर पेपर वेट रखने का जुगाड, फिर देख! बाबू तेरे द्वार तक दौडा आयेगा। जैसे वह आपका पालतू कुत्ता हो। यह आजमाया हुआ फार्मूला है, समझ ले इसे और उतार ले अपने जेहन में। इस नुस्खे को तत्काल अपना और अपने काम के किस्से को खत्म कर!
उसने हमारी सलाह स्वीकार कर ली और अब वे महानुभाव अलमस्त हैं। इस नुस्खे को आजमाने में व्यस्त हैं। सलाहकार ऐजेन्सी खोल दी है। दफ्तर के मारे लोगों के उद्धारक बन बैठे हैं। हर अच्छे व बुरे कामों के निस्तारण के विशेषज्ञ बन गये हैं। धन्धा अच्छा चलने लगा है। अब चेहरे पर हवाईया नहीं उडती बल्कि चेहरे की चौखट की रौनक ही बदल गयी है। इस तरह दफ्तर की दास्तान को आत्मसात करने से आफ चेहरे पर भी प्रसन्नता के भाव झलकेंगे। हाथों की उंगलिया भी हरकत में आयेगी। चल पडेगी कलम की नोक और सब कुछ हो जायेगा मन चाहा। कलयुग का यही शरबती सत्य है। आजकल इसी सत्य से देश के हर कोने का दफ्तर व्यस्त है। इस व्यस्तता की बहती गंगा में अपने हाथ धोना ज्यादा मुफीद है क्योंकि अब हम आजाद भारत के निवासी है।अब कैसा डर? अब कैसा संकोच? अब कैसा लिहाज? हमें तो अपने लिये जीना है। ?
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