इलोक

डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी


इलोक चौपाल-१
सुचना क्रांति के नवोन्मेषी स्फोट का समय और साहित्यिक-संवाद के लिए सशक्त मंच अब प्रत्येक व्यक्ति के पास उपलब्ध है। ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक, वाट्सअप सहित अनेक माध्यमों ने अभिव्यक्ति के बहुआयामी अवसर दिए हैं। साहित्यिक विषयों पर परिचर्चाएँ खूब लोकप्रिय हैं। ख्यातनाम साहित्यकार अथवा नवोदित साहित्य प्रेमी सभी इसमें भाग ले रहे हैं। पिछले दिनों जिन विषयों पर ‘इे लोक ‘ में चर्चाएँ हुईं, कतिपथ अंश प्रस्तुत है-
कृष्ण काव्य परम्परा में ‘उद्धव’ महत्वपूर्ण पात्र है। इन्दौर दो सुशोभित सक्तावत ने उद्धव के चरित्र का मौलिक दष्टि से मूल्यांकन किया है। वे लिखते हैं। ‘‘जब-जब मैं ‘‘भ्रमर गीत’’ प्रसंग सुनता हूँ।, उद्धव के प्रति करुणा से मेरा वक्षस्थल भर आता है। श्री कृष्ण का यह अनन्य सखा जब स्वयं को ही बरजकर गोपियों के समक्ष प्रेम के विरुद्ध तर्क रख रहा होता है, तो क्या वह आत्मत्याग और आत्मविलोपन के महानतम क्षणों में से एक नहीं है?’’ इसके साथ ही ‘कृष्णवल्लभा’ शीर्षक में उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया है कि ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ के १२ स्कंध, ३३५ अध्याय और १८ हजार श्ा*ोकों में कहीं भी ‘राधारूप’ का वर्णन नहीं है। वे प्रश्ा* करते हैं ‘‘श्री कृष्ण के व्यक्तित्व में जैसी उदासीनता है, जैसा निरुद्वेग और अनासक्ति है, क्या वह राधारूप के अक्षय प्रेम के आलम्बन के बिना संभव हो सकती थी?’’
कश्मीरी विस्थापितों की पीडा को सशक्त ढंग से व्यक्त करने वाले कवि एवं आलोचक अगि*शेखर ने कवि मंगलेश डबराल के नाम खुला खत लिखा जिसमें कश्मीरी विस्थापितों की त्रासद स्थिति का मार्मिक एवं यथार्थ चित्र उपस्थित होता है। कविता ‘लू से मरे पिता की याद’ में उन्होंने अपना दर्द साझा किया- तपी हुई धरती पर रखे/ चिनार से मेरे पिता ने/ अपने हरे पाँव- हे राम। राशन, पानी और टेंटों के लिए / निकाले गये विस्थापितों के जुलूस में चलते हुए / कहा उन्होंने / ‘मेरी जल रही पलकें- मैंने उनके सर पर रख दी गीली रूमाल..../ पुलिस ने छोडे आँसू गैस के गोले / भाग गये विस्थापित।/ पिता बैठ गए एक गली में / खम्भे के साथ / बोले../ ‘चलो करते हैं धर्म परिवर्तन ही / और लौट जाएँगे कश्मीर / घने चिनारों की छाँह में / वही मरेंगे अपनी मातृभूमि में / ‘एक ही बार’ पिता देखते रहे धूप में आवाक/ और वहीं पर / हो
गए ढेर।
इन दिनों मुक्ति बोध पर काफ ी चर्चाएँ हो रही हैं। शिलांग से भरत प्रसाद ने कविता में फ ैंटेसी पर टिप्पणी करते हुए लिखा ‘अपने चरमोत्कर्ष पर फैंटेसी न अर्थ के स्तर पर कठिन रह जाती है, न भाषा के स्तर पर, न शिल्प के स्तर पर और न ही बिम्ब या प्रतीक के स्तर पर। इस स्तर की फैं टेसी को पढते जाइए और गहराई में धँस जाने वाले अर्थों से अपनी आत्मा को भरते जाइए। ‘मुक्तिबोध’ की ‘सूखे कठोर नंगे पहाड’ की पंक्तियों को उद्धृत किया-’ मार्ग तिलस्मी है, है जादुई देस...।। / निज अन्ध गुहा की छत में तान्त्रिक ने / असंख्य आत्माएँ लटका दीं चिमगादड के समूह सी उलटी...।
राँची से सुशील कुमार ने ‘आउटडेटेड’ काव्य-भाषा में कवि विजेन्द्र का बिम्ब मोह और लोक का नया रूपवाद प्रस्तुत किया। आलोचना कर्म पर उनकी टिप्पणी दिलचस्प है। ‘‘ जब आलोचना के टूल्स काव्य-तत्व से तय न होकर जाति व अहमन्यता से तय हो, पक्षधरता काव्यात्मक अन्तर्वस्तु को ताक पर रखकर निजी रिश्ते तय करें, प्रतिबद्धता लेखक संगठनों के एजेंडे से निसृत हो, तर्क पूर्वाग्रह द्वारा गढे गये हों तो समझ जाइए कि सहमति और असहमति के द्वन्द्व से बाहर निकलकर वह कुकवि को कवि और कवि को कुकवि बनाने पर तुला है और उसकी आलोचना अपने पथ से भटक चुकी है।
झाँसी से पुनीत बिसारिया ने आचार्य अभिनव गुप्त के प्रत्याभिज्ञा दर्शन की वर्तमान समय म प्रांसगिकता निरूपित करते हुए लिखा कि आज से लगभग १००० वर्ष पहले अपनी नवोन्मेष शालिनी प्रतिभा से अनेक दार्शनिक मान्यताओं का कौशलपूर्ण समन्वय करते हुए एक ऐसे दर्शन का सूत्रपात किया, जिसमें समाज की सहस्नों वर्षों से चली आ रही मान्यताओं से मुक्त होने, तथा ब्राह्मण और शूद्र दोनों को बराबरी पर ला खडा किया। उन्होंने साधना के मार्ग में जातीय श्रेष्ठता की विसंगति को दूर किया। डिग्बोई, आसाम से हरेराम पाठक ने संत कबीर का स्मरण करते हुए लिखा ‘‘संत कबीर ने हिन्दू और इस्लाम दोनों धर्मों की रूढियों एवं प्रगतिबाधक परम्पराओं की कटु आलोचना करते हुए उन्हें सद्मार्ग पर चलने एवं एक स्वस्थ समाज के नव निर्माण हेतु प्रेरित किया था। इसलिए कबीर को मात्र एक कवि, धर्म सुधारक और समाज संस्कारक के रूप में
ही न देखकर एक निष्पक्ष समालोचक के रूप में भी
देखना चाहिए।
मनीषा कुलश्रेष्ठ ने ईद के अवसर पर अपनी बचपन की स्मृतियाँ साझा करते हुए कहा कि बचपन की ईद याद आ रही है। ‘हामिद का चिमटा’ ने हम सब बच्चों के लिए ईद प्यारी कर दी, कि बचपन म तरह-तरह की सिवाइयों के भरे छोटे-छोटे कटोरदान घर आते थे। सबमें स्वाद अलग। नूरजहाँ आँटी, रेहाना, इल्मास, नूरमहल स्कूल के टीचर्स के यहाँ से। वह बचपन, वो माहौल लौटा दो मुझे ईदी में। संभावना चित्तौडगढ के समाचारों में माधव हाडा का यह कथन अवलोकनीय है-‘‘ हिन्दी का आधुनिक साहित्य परम्परा से नहीं जुडता। हमारी संस्कृति और संस्कार में हमारा जातीय साहित्य नहीं है। मुनि जिनविजय का सबसे महत्वपूर्ण अवदान यह है कि वे यूरोपीय समझ के समानांतर भारतीय ज्ञान और परम्परा की पुनर्प्रतिष्ठता करते हैं।
राजस्थान साहित्य अकादमी के नए अध्यक्ष का स्वागत करते हुए डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल लिखते हैं ‘‘अकादमी के नए बने अध्यक्ष की छवि एक सरल, सौम्य व्यक्ति की है। राजस्थान की साहित्यिक बिरादरी उनसे यह आस रखती है कि वे प्रांत के भिन्न-भिन्न रूझानों और स्वरों वाले साहित्यकारों की बिरादरी को पूरा मान देते हुए अकादमी का खोया वैभव लौटाने के लिए काम करेंगे। तमाम वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद राजस्थान की साहित्यिक बिरादरी में जो सहजता, सदभाव और अपनापा मौजूद है, वह उन्हें उनके प्रयासों में भरपूर सहयोग देगा। ‘जीवन की पाठशाला’ शीर्षक से फेसबुक वाल पर लोकप्रिय रचनाकार सवाई सिंह शेखावत ने युवा रचनाकार को अकादमी अध्यक्ष बनाए जाने का स्वागत करते हुए कविता के मर्म में पैठती उनकी टीप साझा की। यथा- ‘अस्ति की समग्रता के स्वीकार की जगह कविता में ही संभव है। / कल्प और विकल्प/ दृश्य और अदृश्य, अनुभूत और अननुभूत/ आकृतियाँ और परछाइयाँ- इन सभी सत्ताओं की जगह कविता में सुरक्षित है।....कविता ही है जो तथ्यों और विश्वासों को, इनमें से बिना किसी एक को वरीयता देते हुए सहज ही स्वीकार कर लेती है- माँ की तरह।’
शेष आगामी अंक में....