तीन गीत

बलवीर सिंह करुण


हंसा! गैल बडी अनियारी।
हंसा! गैल बडी अनियारी।
जाने किस विधि मीरा नाची
कौन जतन नूपुर खनकाये
हर जुग एक कबीरा झूमे
सबद सखियाँ गाता जाये
नंगे पाँव आँधारा सूरा
अपनी धुन में पद दोहराये
पाँव हमारे लहूलुहान हैं
चार कदम ना सरका जाये
जो भी गये उछलते दौडे
हम उन चरणों पर बलिहारी।
हंसा! गैल बडी अनियारी।।
अणियों से तो बच भी लें पर
इन फणियों को कैसे साधें
सबके दंश प्राण लेवा हैं
किस मन्तर से इनको बाँधें
कालकूट छा रहा चतुर्दिक
एक साँस लेना भी दूभर
उन्हें नमन जो विजयी होकर
देकर गये मौत को ठोकर
अचरज है वे भी हम जैसे
संसारी थे या घरबारी।
हंसा! गैल बडी अनियारी।।
तू तो गगन-गगन उड लेगा
हमको इसी राह से आना
आगे बढना मजबूरी है
और असम्भव पीछे जाना
ले हम भी सरपट दौडेंगे
जो होगा देखा जायेगा
जो प्राणों की आहुति देगा
वही यज्ञ का फल पायेगा
भले प्रभंजन सम्मुख गरजें
या फिर साँपों की सिसकारी।
जितनी रहे गैल अनियारी
हंसा! आज विजय की बारी।। ?

हंसा! याद भुलाना सीखो
हंसा! याद भुलाना सीखो
यह छोटी सी चिनगारी है
ज्वालामुखियों पर भारी है
दिन दो दिन की चहल पहल है
नाहक ही मारामारी है
भीतर कब्रिस्तान भरा है
हर पग-पग पर एक शिकारी
लेकर तीर कमान खडा है
न*ार चुराने से क्या होगा
सबसे आँख मिलाना सीखो।
हंसा! याद भुलाना सीखो।।
दीर्घ सफर की तैयारी है
इस पर जाना लाचारी है
कोई फर्क नहीं पडता है
गठरी हल्की या भारी है
फेंको यहीं पिटारी झोला
केवल पहन अनसिला चोला
आज सिर्फ सुनते चलना है
किसने मीठा या कटु बोला
अनल ज्वार ललकार रहा है
चरण रोप टकराना सीखो।
हंसा! याद भुलाना सीखो।।
देखो नहीं पलटकर पीछे
पलकें खोल, अधर को भींचे
नक्षत्रों पर ध्यान टिकाये
भू को छोड यहीं पर नीचे
गति में त्वरा अधिक हो मन से
ऊपर जाना नील गगन से
छोडो भी क्या लेना-देना
दिकपालों, उनचास पवन से
शम्पाओं को ठेल ठाल कर
अपनी राह बनाना सीखो।
हंसा! याद भुलाना सीखो। ?
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