माँ शाश्वत अनुराग

भगवती प्रसाद गौतम


गीला-सुखा बिसरकर, धर छाती पर भार।
माँ ने ही साधा सदा, ममता का संसार।
जाजम, कथरी, गोदडी, माँ वह लीर-लिबास।
जिसके बूते हो चला जीवन ही मधुमास।।
तुलसी-दल सी सरसती, उमगे नैनर नीर।
शैशव खुद किलके यहां, है माँ वह जागीर।।
क्या नगरी, क्या बस्तियाँ, क्या कस्बे, क्या गाँव।
जन्नत से भी है घनी, उस आँचल की छांव।।
कालिंदी की कोकिला, मुरली की मृदु तान।
घर-आँगन सब के लिए माँ मोहक मुस्कान।।
अमित आस वो भोर की, संध्या का विश्वास।
सच, कितने धनवान वे, माँ है जिनके पास।।
ज्ञानी-ध्यानी संत-सी, मूरतीमान मनीष।
जडी फ्रेम में आज भी, माँ देती आशीष।।
माँ श्रद्धा, माँ समर्पण, माँ निजता, माँ त्याग।
उसको क्या-क्या नाम दें, माँ शाश्वत अनुराग।।
पिता स्वयं प्रभु-रूप
अनुभव का सागर सघन, घर-भर का विश्वास।
कुनबे की पगडी पिता, खुशियों का मधुमास।।
अंतस अकुलाहट भरा, अंखियन पल-पल जाग।
रहे सिरजते पर पिता, हर बिरवन के भाग।।
प्रखर सूर्य-सा तन-बदन, दिल जैसे आकाश।
द्वार-दरीचों को दिया बरबस परम प्रकाश।।
प्रीति-रीति क्या नीति संग कुछ झिडकी-फटकार।
ऐसे ही मुखरित हुआ, उस दिग्गज का प्यार।।
सख्त बिछौनों-से नियम, पिता प्रबल आवाज।
कल तक था जो कष्टप्रद, वही सुहावन आज।।
सदा जुटे खट-कर्म में, पर लब साधे मौन।
पौध-पौध सींचा किए, पिता सरीखा कौन?
समय चाल उल्टी चला, गया दुलत्ती झाड।
लाँघ गये फिर भी पिता, हँस-हँस कई पहाड।।
बापू, वालिद, तात क्या, पाप, जनक अनूप।
नाम अगिन लेकिन पिता स्वयं धरे प्रभु-रूप।।
जल जीवन अनमोल
दिल से कभी दुलारती, कभी थपेडे मार।
सपनों में बहती रही, ईक नदिया हर बार।।
पपडाए-प्यासे अधर, अकुलाया संसार।
बिन पानी कैसे रहे जीवन पानीदार।।
गंग-जमन की धारा हो या चंबल का तीर।
अमृत तो वह जो हरे जन-मन-गण की पीर।।
रूंख-रूंख थी जिंदगी, साँसों महे प्रसून।
निठुर कुल्हाडे जब चले, खारिज सब मजमून।।
बिसरे निर्झर धुन मधुर, पनघट बिसरे गीत।
धरती पर जब से बढी जल-दोहन की रीत।।
नीम गया अवसाद में, पिटी पीपली छांव।
मंजिल-दर-मंजिल उठा जब से मेरा गांव।।
कुंड, कुएं, सर, बावडी, ताल, तलैया, झील।
किन चिडियों के नाम ये? पूछे नन्हा नील।।
कितनी भारी पड गई सूरज की हर घात।
त्रस्त धरा पर तरस जा, अब तो ओ बरसात ।।?
1-त-8, ‘अंजलि’ दादाबाडी, कोटा-324॰॰9 (राज.)
मो. ॰9461182571