हाइकू

डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय ‘विजय’


(1)
रूपाली सृष्टि
खींच ही लेती दृष्टि
दूर हो भले।
(2)
अनकहे ही
वरता स्थायी कीर्ति
निष्काम कर्म।
(3)
कब आती है
विपत्ति अकेली ही
दो चार साथ।
(4)
छुडा देता है
सिंहासन तक को
रूपसी मोह।
(5)
आकार में ही
बसा है निराकार
कहाँ ढूँढते?
(6)
फू ल गिराये
रखे काँटे सहेज
डाली का प्रेम।
(7)
ऋ ण की मार
बना देती व्यक्ति को
आत्म हन्ता ही।
(8)
फ ाड देती है
थोडी सी खटाई भी
औटाया दूध।
(9)
सत्यवती दे
हारा था लोकतंत्र
राज तंत्र से
(1॰)
वृद्धाता गात
जन प्रति प्रभु का
विश्वासघात।
(11)
पसीना नहीं
देखा है आलस्य ही
माँगते भीख।
(12)
अवश्य होगा
आज का ग्राम चोर
कल किलों का।
(13)
राम शर से
लिखी है आश्विन ने
धर्म की जय ?
सिविल लाइन्स, कोटा-324॰॰1 (राज.)
मो ॰946॰57॰883