दो गजलें

सोहन प्रकाश ‘सोहन’


बडी-बडी बस्तियाँ
नभ छूते भवनों से, भरी-भरी बस्तियाँ।
अपने ही लोगों से, डरी-डरी बस्तियाँ।।
कहीं-कहीं रात में भी, करती हैं हंगामा।
कहीं-कहीं दिन में भी, मरी-मरी बस्तियाँ।।
देवराज तक को भी, होता है आश्चर्य।
सुरपुर के जैसी हैं, सजी-धजी बस्तियाँ।।
आप जहाँ जा करके, सांस भी न ले पायें।
कचरे के ढेरों से, दबी-दबी बस्तियाँ।।
सारे सुख मिल जाते, उन्हें बिना काम किये।
ऐसे भी लोगों से, भरी पडी बस्तियाँ।
दो रोटी पाने को, लग जाती मेहनत में।
शाम तलक हो जाती, थकी-थकी बस्तियाँ।।
कभी मौन रहने को, हो जाती विवश भी।
और कभी कहती हैं, खरी-खरी बस्तियाँ।।
बाहर के लोगों को, आसन पर बिठलाती।
अपनों से अपरिचित, बनी रही बस्तियाँ।।
अपनों ही खून जहाँ पीता है खून रोज।
ऐसे में जीती हैं, ठगी-ठगी बस्तियाँ।।
आदमी का मिल पाना, मुश्किल से होता है।
कहने को ‘सोहन’ हैं, बडी-बडी बस्तियाँ।।
इस धरा के सभ्य प्राणी
भाई का भाई यहां, दुश्मन बना है।
खो गई जाने कहां, संवेदना है?
खैंच ली दीवार फिर भी शेष झगडा
भाग्य की माँ के ये क्या विडंबना है?
देह से तो ये मनुज ही दिख रहे हैं
मनन से कितने हैं मनुज यह देखना है।।
बन चुके हम इस धरा के सभ्य प्राणी
फिर भी भाये जा रहा वहशीपना है।।
जी नहीं सकते जो बिन, महिला के जीवन
उनके घर बेटी का आना ही मना है।।
राज करलो सब ग्रहों पर चाहे ‘सोहन’
अन्त में तो बस चिता पर लेटना है।। ?
45, शिव नगर, जनता कॉलोनी, जयपुर-3॰2॰॰4 (राज.)
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