तीन गजलें

जहीर कुरेशी



(१)
जिसको चलना भी दूभर लगा,
सबसे अच्छा उसे, ‘घर’ लगा।
माँ के चेहरे पे सुख था अलग,
पुत्र जब नौकरी पर लगा।
कितनी सिहरन हुई झील को,
देह पर जब भी कंकर लगा।
फिर तो हर स्वप्न मुश्किल ही है,
रोज...सपना बदल कर लगा।
भीड में उनको राहत मिली,
जिनके पीछे कोई डर लगा।
रोज दफ्तर से आने के बाद,
उनके घर में ही दफ्तर लगा।
एक कलयुग के इन्सान को,
अपना कलयुग ही सुन्दर लगा।
(२)
संकट में भी वो खुल के हँसा है कभी-कभी,
उत्साह उसके मुख पे दिखा है कभी-कभी!
रिश्ता भी बातचीत से आगे न बढ सका,
बेशक...वो मुझसे मिलता रहा है कभी-कभी।
हम सोचते नहीं थे कि इतना गुबार है,
लेकिन, वो खुल के व्यक्त हुआ है कभी-कभी!
रोमाँच के लिए बडा साहस भी चाहिए,
रोमाँच का भी अपना मजा है....कभी-कभी।
चालीस साल ने मुझे बूढा बना दिया,
अलबम में खुद को देख लिया है कभी-कभी।
कुछ लोग जिन्दगी में बहुत बोलते नहीं,
जो सोचते हैं, सिद्ध किया है कभी-कभी।
संन्यासियों के मन में ये अपराध-बोध है-
हमने ‘निषिद्ध फल’ को चखा है कभी-कभी!
(३)
हम समझते थे कि जाएगी सरोवर की तरफ,
आत्म-हत्या को नदी दौडी समंदर की तरफ।
शाँति, सुख, आनंद के क्षण प्राप्त करने के लिए,
कोई बाहर को चला तो कोई भीतर की तरफ।
उनको अवसर भी कभी देता नहीं है अहमियत,
दौड कर जाते नहीं जो लोग अवसर की तरफ।
इसलिए भी तीर ने छोडी नहीं अपनी कमान,
घर से निकला तो कभी लौटा नहीं घर की तरफ ।
प्रश्न चाहे घर में हो, दफ्तर में हो, संसद में हो,
प्रश्नकर्ता देखता रहता है उत्तर की तरफ।
वायुयानों से उसे करनी पडेगी दोस्ती,
पंख बिन उडना हो जिसको नील-अम्बर की तरफ ।
अपने पुरखों की विरासत के बिना हम कुछ नहीं,
इसलिए हम लोग हैं अपनी धरोहर की तरफ । ?
1॰8, त्रिलोचन टावर, संगम सिनेमा के सामने भोपाल-462॰॰1 (म.प्र.)
मो. ॰942579॰565