चार गजलें

केशव शरण


(१)
दिगन्त आगे दिगन्त होता
कहीं धरा का न अन्त होता
सुशस्य होता अगर नगर ये
सरस यहां भी वसन्त होता
सुसन्त होता न ब्रह्मचारी
अवश्य मठ का महन्त होता
समय बदलता मनुष्य को यूं
विहीन नख से अदन्त होता
कुलीन उत्तर उडेलता जल
सवाल जन का ज्वलंत होता
न स्वप्न खंडित न मन सशंकित
अनन्य मोहन अनन्त होता
उपाय क्या है विरह दशा का
प्रभाव जिसका तुरन्त होता
(२)
काया विष का रस लेती है
माया नागिन डस लेती है
मुक्त नहीं हो पाता मानव
आदत ऐसा कस लेती है
प्यार न चाहो महबूबा से
महबूबा तो बस लेती है
दण्ड लगाती है भटिहारिन
चादर जस का तस लेती है
जाने कितने पण लेगा रथ
खच्चर गाडी दस लेती है
हँस बतियाती पावन मूरत
मेरा सब अपजस लेती है
ऐसी भी होती है चितवन
खींच हृदय की नस लेती है
(३)
विजय का क्यों नहीं आसार मानूं
लडाई लड रहा क्यों हार मानूं
लदा आपादमस्तक मुश्किलों से
चलूंगा क्या अगर मैं भार मानूं
कयामत तक सितम ढाते रहें वो
कयामत तक जिसे मैं प्यार मानूं
पुराना बैर चुकता कर रहा है
उसे अब तो पुराना यार मानूं
हुकूमी नाज-नखरे कम नहीं हैं
सजीले हुस्न को सरकार मानूं
यहां आधार अनुभव का रहा है
किसे मैं फूल मानूं खार मानूं
हसीनाएं गयी हैं दाद देकर
स्वयं को क्यों नहीं फनकार मानूं
(४)
बनूंगा क्या सफल इन्सान मैं भी
अगर खुदग*ार् बेईमान मैं भी
हसीनों के लिए ये दिल बना है
बसाऊं क्यों यहां हैवान मैं भी
पतन खुद का अगर मैं चाहता हूं
करूं फिर शौक से अभिमान मैं भी
निशाना नफरतों का बन गया हूं
मुहब्बत का लिये अरमान मैं भी
अगर तुम यार इक उंगली करोगे
करूंगा हाथ का बलिदान मैं भी
गमों को भूल जाओगे सुखन में
मजे का पा गया वरदान मैं भी
मुकम्मल इक कहानी भी न होती
रखे हूं सैंकडों उन्वान मैं भी ?
एस 2/564, सिकरौल, वाराणसी-221॰॰2, मो. ॰9415295137