गीत नज्म

अहद ‘प्रकाश’


एक अल्हड चली....
सर पे गागर लिए
किससे वादे किए
सोचती गुनगुनाती नदी की तरह
एक अल्हड चली एक अल्हड चली
बांसुरी की तरह
फु लझडी की तरह
जलती बुझती किसी सुरसुरी की तरह
एक अल्हड चली एक अल्हड चली
रूप को औढकर, धूप में तरबतर
स्वर्ण किरणें समेटे सहेजे हुए
एक अल्हड चली एक अल्हड चली
झिलमिलाती हुई जगमगाती हुई
गीत प्रियतम के यूँ गुनगुनाती हुई
कुछ लजाती हुई मुस्कुराती हुई
एक अल्हड चली एक अल्हड चली.....
रेत पर लफ्ज
रेत पर नाम लिखा, लहरों पे तारीख लिखी
धूप को रूप की चूनर देकर,
सूर्य ने नदियों के हर छोर पे ये सीख लिखी
हौसले हों तो खिला करते हैं हर रंग के फू ल
और फूलों में लटकते हैं कई किस्म के फल
इन फलों से ही चमकते हैं मुकद्दर अपने
जिन्दगी तेरे लिए, तेरी अना की खातिर
हौसले हों तो सभी कुछ मुमकिन
गैर मुमकिन भी पिघल जाता है कुछ लम्हों में
सिर्फ हिम्मत हो तो हर पार नई मंजिल है
हौसले लिखते हैं हर शै का मुकद्दर लेकिन
पास जो भी हो मेरे यार बडा सा दिल हो
बस इसी जज्बे को सीने में खिलाये रखना
अपनी हिम्मत से नई शम्मे जलाये रखना
रेत पर फू ल खिलाने के म*ो और भी हैं
ऐ खुदा तू तो हरके सिम्त चमकता है, जरूर
ऐ खुदा तेरे चमकने के म*ो लूटेंगे
आंखों में तुझको सजाने के म*ो और भी हैं
अपनी पतवार नजर आंखों की बुसअत तेजी....
एक दिन तुझको बहरहाल मिलेगा सब कुछ
और यह भी तो सच है कि किनारे पे मिलेगा इतना
तू समेटेगा, सहेजेगा बांटेगा उसे
तेरे अंदर जो कलंदर है वह सब कुछ देगा
भूलना मत वह इनायत वह करम उसका रहम
अपने सिजदों में यकीं, दिल में तलब और उमंगों का हिसाब
बस वही रखता है तू उसकी अदा क्या जाने
जिसपे आ जाए तो हर रेत का जर्रा नायाब
तू अगर समझे तो हर्रा *ोर *ाबर भी नायाब
ये हकीकत है कभी पानी पे लिखा हुआ लफ्ज
करने वाला जो करे अपने करम से नायाब..... ?
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