मादा

सूर्य प्रकाश मिश्र


क्यों दी है ऐसी आजादी, पाप लगेगा
पंख नोच डालेगा मेरा कौवा कोई
बदला लेगा मुझसे मेरी सुन्दरता का
बाज, गिद्ध बैठे हैं मुझ पर आँख गडाये
कब तक पीडा का प्रतिकार करेगी मादा
छीन लिया जीने का हक सारा का सारा
नाम दिया आधी आबादी, पाप लगेगा
तुम तो निर्णायक बन बैठे धरती नभ के
खुद स्वच्छन्द रहे पर मेरी सीमा बाँधी
मैंने थोडी खुली हवा में साँस क्या लिया
शोर उठ गया मादा ने है सीमा लाँघी
सारे नियम बनाये बिन पूछे ही मुझसे
अब कहते मुझको अपराधी, पाप लगेगा
मैं भी तुमसी बनी हुई हूँ हाड-मांस की
मेरे मन में भी हर इच्छा तुमसी ही है
खुद तो हुए बबूल मगर सपना है पाला
मादा की अन्तिम सीमा बस तुलसी ही है
नैतिकता की परिधि बनी बस मेरी खातिर
युग-युग से चल रही मुनादी, पाप लगेगा
मैंने अपना रक्त पिलाकर पाला तुमको
लगा कभी क्या ? मैंने कोई शाप जिया है
लेकिन तुमने हर पल ये एहसास दिलाया
जैसे मैंने मादा होकर पाप किया है
धरती, बादल, हवा, गगन पर सबका हक है
क्यों ये सच्ची बात भुला दी, पाप लगेगा
विवश अस्मिता पर जब भी उंगली उठती है
दंश झेलती है निन्दा का जब प्रभुताई
तब-तब राम प्रतीक बन गये मर्यादा के
सीता ही बस अग्नि परीक्षा देती आई
भूल गये तुम तिल-तिल करके जलना उसका
फिर से उसकी चिता सजा दी, पाप लगेगा
बी 23/42 ए.के. बसन्त कटरा, गांधी चौक, खोजबां (दुर्गाकुण्ड) वाराणसी-221॰॰1