तीन-गीत

डॉ. हरीश निगम


फिर हुये तीखे
हवा के बोल
बर्छियों-सा
लग रहा
हर शब्द
दूब रोयी
झील है
स्तब्ध,
सर्द मौसम के
लिफाफे खोल
कांपती सुबहें
ठिठुरती
शाम
दिन हुये फिर
कोहरे के
नाम,
धूप के पल
लग रहे अनमोल
एक साल और
बीत गया
एक साल और!
खामोशी
बोलती रही,
आंखों में
जंगली उदासी
पर अपने तोलती रही,
साथ लिये
टीसों का दौर!
हिलती परछाइयां वही
ठूंठे-मन
ताकते रहे हम
सूखी
अमराइयां वही,
आई ना
आमों में बौर!
मरुथलों में
मरुथलों में
खो गये
सारे हिरन!
छल गये मिल
धूप-बादल,
खुशबुओं का
फटा आंचल,
भागती फिरती
अंधेरों से
किरन!
खेत-जंगल
नेह झरने,
अब लगे हैं
रेत भरने,
ब्लेड-से दिन
छोड कर
जाते चिरन!
प्रेम बिहार कॉलोनी, प्रेमनगर, पो.बा. नं. 96, सतना-485॰॰1 (म.प्र.)