हम प्रवासी हर घडी

स्व.डॉ. मनोहर प्रभाकर


उम्र का यह मोड, ये घिरती उदासी हर घडी।
पर नजर उनके लिए, हर रोज प्यासी घडी।।
तीर्थ से पावन अभी भी अहर्निश लगते मुझे।
हैं वही हरिद्वार मेरे और काशी हर घडी।।
देखिए तो दोस्ती का कौनसा अन्दाज ये।
एक ही नगरी में रहकर हम प्रवासी हर घडी।।
चन्द वे एहसास चिकने, हैं अभी आजाद जो।
वस्तु हर कंचन की अब है क्रीत दासी हर घडी।।
सौ बखेडे जान को, पर भूल ये पाते नहीं
बह रही कोई नदी-मन में ‘प्रभाकर‘ हर घडी।।

हम प्रवासी के रचनाकार डॉ. मनोहर प्रभाकर ख्यातनाम गीतकार दिनांक १० जून, २०१७ को हमें छोडकर अनन्त कालीन प्रवास के लिए प्रस्थान कर गए। किसे पता था कि उनका यह प्रवासी गीत उनके अन्तिम प्रवास का प्रमाण गीत बन जाएगा।
डॉ. मनोहर प्रभाकर मधुमती को उनका यह फर. १७ में जोडा गया। उनका यह गीत उनको स्मरणांजलि के रूप में साथार प्रकाशित किया जा रहा है।

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