आत्मसमर्पण

जसविंदर शर्मा


तरसेम बाबू ने अखबार के पहले पेज पर छपी वह खबर पढी तो उनका दिल डूब गया। अपनी व अपनी पत्नी के लिए बैड-टी बना कर वह अभी-अभी बालकनी में आ कर बेठे थे। हाथ-मुंह धोकर व नजर का चश्मा उठाए हुए उनकी पत्नी भी बालकनी में आ पहुंची।
एक बार तो तरसेम बाबू के दिल में आया कि क्यों न पहले सफे की खबर अपनी पत्नी को पढकर सुना ही दें। उनके दिल का बोझ कुछ तो हल्का हो मगर अगले ही पल वह संभल गए। उसे यह बात अभी बताना ठीक नहीं। उनका मानना था की उलझन वाली बात जब तक छिप सकती है, छिपा लेनी चाहिए। बहुत से गहरे राज तरसेन बाबू से सीने के कोने में बरसों से दफन हैं। उनकी पत्नी में इतना धैर्य नहीं कि सारी कडवी बातों को पचा सके।
अखबार के सारे पन्ने देने के साथ ही तरसेन बाबू ने अपनी पत्नी को बातों में उलझा लिया ताकि उसकी नजर उस खास खबर पर न पडे। उन्होंने पत्नी को आदेश दिया कि वह जल्दी से सब्जी छौंककर नाश्ता बना दे तथा दोपहर का टिफिन तैयार कर दें क्योंकि आज ऑफिस में हैडक्वार्टर से निरीक्षण टीम आ रही है और तरसेम बाबू का समय से पहले ही ऑफिस पहुंचना जरूरी है।
अखबार का मुख्य पन्ना वह अपने साथ ही ले गये। पूरा दिन उनके दिल में धुकधुकी लगी रही। पत्नी से कोई बात कहां छिपती है। आस-पडोस से सारी खबर उसे मिलती रहती है।
सारी स्थिति की टोह लेने के लिए लंच टाईम के आस पास तरसेम बाबू घर फोन किया तो पत्नी चहकती हुई बोली ‘‘अरे, आपने आज मेन न्यूज पढी आज के अखबार में?’’
तरसेम बाबू के चेहरे का रंग उड गया। वह असंयत स्वर में चीखें, ‘ हां, हां, पढी है सारी खबरें। अखबार में नेताओं के बयान के सिवा और क्या छपता है। तीन मरे और तेरह घायल। वही खेल जगत और मंडियों के भाव। कोई खास
बात नहीं।
तरसेम बाबू की पत्नी उत्साहित स्वर में बोली ‘अरे, वह नहीं। मैं तो अपने सरकारी अस्पताल की बात कर रही थी। पडोस की मिसेस कौशल ने बताया है कि आज के अखबार में खबर आई है की हमारे मुख्यमंत्री ने यहां हमारे शहर के अस्पताल में एक खास विंग का उद्घाटन किया है। अब दिल्ली के अपोलो अस्पताल की तरह यहां भी हार्ट की बाई-पास सर्जरी होने लगेगी और वह भी आधे दामों पर। अब कोई समस्या नहीं।‘
तरसेम बाबू ने मन ही मन सोचा कि तुम्हें क्या पता कि समस्या कितनी बडी है। पत्नी का उत्साह देखकर उन्हें भी तुरूप की चाल चली, ‘भई, दिल्ली फिर दिल्ली है। अपोलो ठहरा प्राइवेट अस्पताल, वहां मोटा खर्च करने पर इन्टरनेशनल स्तर की सुविधाएं मिलती ह। हमारे शहर का ठहरा खैराती खच्चर टाईप अस्पताल को काट-पीट कर आफ हवाले कर देंगे। चलो, घर आकर सारी बात करेंगे। फिर भी यहां अपने शहर से सर्जरी करवाना मूर्खता होगी। यार, हमने भी बहुत दुनिया
देखी है।’
शाम पांच बजे थके मांदे व खिन्न मन से तरसेम बाबू घर पहुंचे। आते ही चाय थमाते ही पत्नी बोली, ‘ मैंने बाबू जी को फोन कर दिया है की छोटे चाचा जी को कल ही हमारे घर भेज दे। यहां आकर कार्ड बनवाकर सारे टेस्ट करवा लें। बाबूजी बता रहे थे की चाचाजी ने एक लाख रुपय का इन्तजाम तो कर रखा है। अब बाकी...। मैंने तो कह दिया कि चिन्ता की बात नहीं है। ये है न इधर कोई
न कोई इन्तजाम कर ही लेंगे। फिर बाद में आप पैसे
लौटा देना...।’
तरसेम बाबू ने चाय सेटी पर रख दी। तमतमाए हुए बोले, ‘बाकी क्या? यहां मेरे चाचा का बैंक खुला है क्या? मैंने अपने प्रॉविडेंट फंड के पैसों का हाथ नहीं लगाना। समझी क्या? बच्चे तो अपने-अपने परिवारों में जा कर मस्त हो गए हैं। बीमारी बता कर थोडा ही आती है। कल मैं भी दरक गया तो चार पैसे तेरे पास होंगे तो कोई पूछेगा तुझे। बुढापे में पैसा ही आदमी को इज्जत दिलाता है।
तरसेम बाबू की पत्नी ने मुलायम स्वर में कहा,
‘और कौन है चाचा जी का। शादी नहीं की तो सारी उम्र कमा कर हमारे परिवार पर ही लगाते रहे। जमीन भी तो है, कल मेरे मां-बाप का ही देंगे। फिर साल दो साल में
सारा पैसा आप को लौटा ही देंगे। आपका इतना मान
करते हैं....।’
बाबू तरसेम लाल दहाडे,‘ इतना ही मान करता है मेरा तो एकाध एकड जमीन बेचकर दो-तीन लाख रुपए साथ क्यों नहीं लाते। पहले लाएं और मजे से बाई पास करवाएं। मेरे प्रॉविडंट फंड के पैसों के दम पर आए, इसके लिए मैं कतई तैयार नहीं हूं। सारी उम्र हो गई तेरे रिश्तेदारों के लिए शहर में मरते खपते। किस किस का ईलाज नहीं करवाया मैंने। तुम्हारे चाचा के और भी भाई भतीजे होंगे।‘
तरसेम बाबू के दोनों बेटों ने अन्य शहरों में जाकर घर बसा लिए थे। वे अच्छी जगह नौकरी करते थे। कभी-कभार वे भी तरसेम बाबू से मदद मांग लेते थे। अपने बेटे-बहुओं की तरफ तरसेम बाबू की पत्नी का झुकाव कम ही था। अपने मायके वालों के लिए ज्यादा ही मरती-खपती थी वह। अपनी बहुओं में कोई न कोई नुक्स निकाल ही लेती थी, तभी उसके बेटे उससे कटे-कटे रहते।
सारी रात तरसेम बाबू की पत्नी मुंह फुलाए पडी रही। घर में खाना नहीं बना, न ही टी वी ऑन हुआ। तरसेम बाबू टकराव की स्थिति में पहुंच गए थे।
सुबह उठकर उन्होने चाय बनाई तथा बालकनी में रख दी। पत्नी को रोजाना की तरह आवाज लगाई, ‘निर्मला, उठ जा चाय पी ले, अखबार आ गया है।‘ मुंह धोकर नजर की ऐनक उठाए उनकी पत्नी बालकनी में।
तरसेम बाबू खबरे पढने में तल्लीन थे और पत्नी का सामना करने से कतरा भी रहे थे। एक गहरी नाराजगी भरी कटुता और खामोशी दोनों के बीच तनी हुई थी। उनकी पत्नी ने चाय का घूंट भरते हुए कहा, ‘ आपकी जिद है तो ठीक है, मैं अपने दहेज का गहना बेचकर दो लाख रुपए आपको ला देती हूं। यह गहना तो मेरा अपना ह। अब तो सोने का रेट आसमान छू रहा है।‘
तरसेम बाबू का दिल बैठ गया। उन्हें लगा कि आत्मसर्मपण की घडी आ गई है। अब तो हां करनी ही पडेगी वरना....। आखिर बडी दुनिया देखी है उन्होंने भी। ?
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