इश्क में

जेबा रशीद


मौसी के बेटे की शादी में जाना हुआ। शाम होते ही हम सब लोग गाडियों में बैठ कर लडकी वालों के घर पहुँचे। लडकी का घर रोशनियों से जगमगा रहा था। अचानक मेरी नजर लडकी पर पडी। उसे देखते ही मैं उसका दीवाना हो गया। शायद इसे ही कहते हैं पहली नजर में प्यार हो गया। इस लडकी में ऐसी कोई विशेष बात थी। एक कशिश थी। मैं चाहकर भी उस पर से नजर हटा नहीं पाया। मेरी शादी के लिए माँ ने कई लडकियां दिखाई मगर मेरा दिल नहीं धडका। इस लडकी को देखते ही लगा यह जबरदस्ती मेरे दिल के दरवाजे खोल कर वहां बिराजमान हो गई है। वैसे तो मैं लडकियों से दूर भागने वाला था। इश्क, मोहब्बत की हँसी उडाता था। लेकिन अब तो बिसात ही पलट गई।
मैं उसका दीवाना बन चुका था। नींद रूठ गई। मेरी सारी रात करवटें बदलते बीतती। मैं हैरान था। अनहोनी का शिकार हो गया। वह गुलाबी हरे वस्त्रों में बहुत सुन्दर लग रही थी। एक अनजान लडकी को दिल का दर्द बना बैठा।
मां मेरा सेहरा देखना चाहती थी। मैं अभी शादी नहीं करना चाहता था। उसे ढूंढना चाहता था। मेरी मां ने अपनी जान का वास्ता देकर अपनी पसन्द की लडकी से मेरी शादी करवा दी। साधारण घर की लडकी होते हुए भी मां ने सरिता की सादगी को पसन्द किया। मैं एक फैक्ट्री का मालिक था। सरिता सरल हृदय की कुशल गृहिणी साबित हुई। वह सुन्दर होते हुए भी मेरे दिल के बन्द दरवाजे खोलकर उसे बाहर न कर सकी।
सरिता के भाई विनोद की शादी थी। मैं काम से विदेश गया हुआ था। शादी में नहीं पहुंच सका।
घर आते ही सरिता ने खुश होकर बताया। मेरी भाभी बहुत सुन्दर है। कोमल भाभी मुझे बहुत चाहती है। सरिता का भाई एक ऑफिस में क्लर्क है। मकान गलियों के अन्दर होने के कारण मैं कम ही जाता था। सरिता का भाई मिलने आया तो दावत दे गया। मेरा जाने का मन नहीं था लेकिन सरिता मुझे लेकर गई।
दरवाजा खुलते ही मेरी नजर उसकी भाभी पर गई। वह मुस्करा कर बोली ‘‘आइए’’ देखते ही मैंने बडी मुश्किल से खुद पर काबू पाया। सरिता की भाभी....। मैं आह भर कर रह गया। अनहोनी घटना लगी जो मेरे दिल म बसी थी वह किसी और की पत्नी बनी मेरे सामने खडी है। सरिता की भाभी....।
मैं अपने दिल की किरचियों को समेटता चुप खडा रह गया। एक आम सा बंदा एक सुन्दर लडकी का मालिक बन बैठा। मामूली नौकरी वाला...और मैं। मैं तो इसका नाम भी मालूम नहीं कर पाया। विनोद के भाग्य में इतनी सुन्दर पत्नी।
‘‘आइए जीजा जी। लगता है आप बहुत खामोश तबियत के हैं;’’ मुझे चुप देख वह चंचलता से बोली ‘‘हां कोमल भाभी ये जनाब बोलने मे कम...सुनने में अधिक माहिर है।’’ सरिता ने मजाक किया ‘‘इसे शादीशुदा देखकर इसे दिल से निकला देना चाहिए’’ मैंने अपने दिल से कहा। लेकिन इस रूप में मिल कर जैसे मेरी आग और भडक गई। समय बीता। अब जब मैं भूलने लगा था तो यह फिर मिल गई। उस दिन मैं घर जल्दी आ गया। दिल चाह रहा था कोमल को देखने जाए। उसे देखूं, मिलूं, बातें करूं। मैं अनमना सा बैठा कोई उपाय सोच रहा था। सरिता को कैसे कहूं तुम्हारे घर चले। पहले जाने से इनकार करता था।
‘‘अम्मा जी मैं बाजार से सामान ले कर थोडी देर भाई के घर जाऊंगी। गाडी वापस भेज दूंगी। शाम को भैया मुझे पहचा देंगे।’’
‘‘अरे तुम ड्राइवर के साथ क्यों जाओगे। मैं चलता हूं। अकेला बैठा क्या करूंगा।’ मैं शीघ्रता से खडा हो गया। माल के सामने गाडी रोक दी।
‘‘मुझे साडियां खरीदनी है और अम्मा जी के लिए भी एक कॉटन की साडी ले लेती हूं।
वह साडियां दखने लगी। स्टेचू पीला गुलाबी रंग का सूट पहने बडी अदा से खडा था। मैं उसे देख रहा था। सुन्दर सूट पहने स्टेचू कोमल का रूप ले रहा था। मुझे उसके पास खडा देखकर सरिता ने पूछा ‘‘आपको यह सूट पसन्द है तो मैं अपने लिए यह खरीद लेती हूं साडी फिर कभी ले लूंगी।’’
शादी को इतना समय हो गया। मैंने कभी सरिता को कोई कपडा खरीद कर नहीं दिया था। सूट देखकर वह खुश हो गई।
‘‘मैं यह आपकी पसन्द का सूट है ले लेती हूं’’
‘‘नहीं यह कुछ खास नहीं है। तुम दूसरा सूट खरीद लो।’’ मेरा मुंह कडवा हो गया यह सूट तो मैं सरिता को पहने देखना चाहता था। शादी की है तो इसका यह मतलब नहीं कि यह मेरे होश हवास पर छाई रहे। मैं चाहता था बस गृहस्थी की गाडी ठीक-ठाक चलती रहे। वह मान गई।
‘‘अच्छा सुनो तुम्हें पसन्द है तो यह तो तुम्हारी भाभी के लिए खरीद लो। तुम दूसरा कोई पसन्द करो।
‘‘जी’’ वह हैरान सी मुझे देखने लगी ‘‘भाभी
के लिए?’’
‘‘तुम्हारी भाई के घर के जा रहे हैं। तुम्हारे मायके में मैं खाली हाथ जाते अच्छा नहीं लगता।
‘‘लेकिन यह तो बहुत महंगा है। फिर अभी कोई मौका भी नहीं है।’’
‘‘मौका क्या ? तुम्हारा दिल चाहा तो दे दिया बस।’’ मैंने उसे समझाया सूट देखकर कोमल को आश्चर्य हुआ और खुशी भी।
‘‘इतना सुन्दर और महंगा सूट मेरे लिए’’ कोमल के मुंह से निकले शब्द सुनकर मुझे खुशी हुई।
‘‘हां तुम्हारी ननद ने दिया है लेकिन इसमें पसन्द तो मेरी भी शामिल है।’’ मैं बोला ‘‘हां इनके कहने से ही खरीदा है मैंने। यह कहते हैं खाली हाथ कैसे जाएं।’ सरिता ने खुश होकर बताया।
‘‘कोमल मुझे इश्क है तुमसे... मेरा दिल चाहता है कई खजानों की दौलत तुम पर न्यौछावर कर दूं।’’ मैं बेहद खुश था। अब यह सूट कोमल को पहने देख सकूंगा। कोमल दिल की बहुत अच्छी थी। उसकी सोच गहराई तक नहीं पहुंच सकती थी।
मैंने मौका नहीं चूका ‘‘अब आप लोग कल हमारे घर खाना खाने आओगे। क्यों सरिता तुम इनको खाने पर नहीं बुला रही हो। भई तुम्हारी नई-नई भाभी इतना तो तुम्हारा हक बतना ही है’’
‘‘हां भाभी आप दोनों कल हमारे घर खाना खाने आना और हां भाभी यही सूट पहन कर आना।’ सरिता ने मेरी मन की बात कह दी।
कोमल हमारे घर वही सूट पहन कर आई। मेरा दिया सूट पहने देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। फिर तो कभी किसी बहाने-कभी किसी बहाने, कभी उसके जन्मदिन पर महंगे-महंगे तोहफे दिए जाते। सरिता को शॉपिंग के बहाने कुछ दिलाता तो कोमल के लिए भी पर्स, सेन्डिल व मेकअप का सामान लिया जाता। अब सरिता को उसके घर लाने और ले जाने का काम मैं खुद करता। सरिता को खुशी होती। कभी फलों का टोकरा कभी घर की सजावट का सामान।
‘‘तुम्हारे भाई की आमदनी कम है। तुम अगर तुम्हारे भाई-भाभी को तोहफों के बहाने मदद करती हो तो मैं तुम्हें मना नहीं करूंगा।’’ मैं सरिता पर एहसान जताता। वह एहसान मानती। वह नहीं जानती थी कि इसमें मेरा मतलब है। मैं जानता हूं कि मैं इस तरह सरिता को नहीं पा सकता फिर भी एक लालच था। उसे देखने का लालच नहीं छोड सकता था। मेरे दिए कपडे पहने देख कर मुझे खुशी मिलती। दिल कहता कभी तो शायद अपने दिल की बात कहने का मौका मिल जायेगा।
‘‘आज छुट्टी हैं आज हम होटल में बाहर खाना खायेंगे। अच्छा ऐसा करते हैं होटल में पैसा देने से तो तुम्हारी भाभी को ही कुछ दे देंगे। तुम अपने घर फोन कर दो हम आज शाम वहीं खाना खायेंगे।’’
‘‘हां ये ठीक है मैं अभी फोन करती हूं।’’ वह खुश होकर बोली।
‘‘चलो कोई छोटा गिफ्ट खरीद देंगे।’’ और वो छोटा गिफ्ट बडा महंगा होता।
जब सरिता को देने में कोई ऐतराज नहीं तो कोमल को तोहफा लेने में क्यों ऐतराज होता। दोनों खुश सरिता सोचती मेरे भाई की सहायता कर रही हूं। मेरा पति साथ दे रहा है।
‘‘कल भाभी ने अपने जन्मदिन की पार्टी रखी है।’’
‘‘चलो गिफ्ट ले आते हैं। इस बार कोई सेट दे
देते हैं।’’
‘‘गिफ्ट तो हम रोज ही देते हैं लेकिन सेट तो महंगा पडेगा।’’सरिता बोली।
‘‘अरे पगली। महंगा सस्ता क्या...हम तो तुम्हारे भैया की मदद कर रहे हैं। कम आमदनी म वे लोग अपने शौक पूरे नहीं कर सकते हैं।’’
सोने का सेट कोमल को बहुत पसन्द आया। उसे उसी समय पहन लिया।
‘‘वाह कितनी सुन्दर लग रही है....लंगूर की बगल में हूर। काश यह मेरी होती’ मैंने स्वयं से कहा। तोहफे देने का सिलसिला चलता रहा। मैं उलझन में था उसे दिल की बात कहने का कोई मौका नहीं मिल पा रहा था।
ऑॅफस में बैठा सोचा आज अकेला जाता हूं। आज दिल की बात कह ही दूं। ऑफिस से बाहर आया। बहाना बना दूंगा कि इधर कहीं जा रहा था। सोचा तुम से भी मिलता जाऊं। अन्दर बरामदे पहुंचा। अन्दर से आवाजें आ रही थी। अपना नाम सुनकर मैं वहीं रूक कर बातें
सुनने लगा।
‘‘अरे कोमल तुम्हारी ननन्द का पति इतने कीमती तोहफे किस लिए देता है और तुम खुश होकर लेती रहती हो।’’ किसी ने पूछा।
‘‘क्यों दुनिया में बेवकूफों की कमी है क्या ?’’ कोमल ने हँसते हुए कहा।
‘‘इतनी मेहरबानी का क्या मतलब कोमल।’’ दूसरी आवाज आई।
‘‘हां भई कोई गैर को इतने महंगे तोहफे क्यों देगा। मुझे तो आश्चर्य होता है।’’
‘‘और बिना कोई मौका....’’कोमल की हँसी भरी आवाज फिर आई।
‘‘अरे भई जनाब को मुझ से इश्क हो गया है।’’
‘‘क्या मतलब....’एक साथ सबके मुंह से निकला।
‘‘अरे मतलब क्या। वो बेवकूफ मुझे चाहता है। दीवाना हो रहा है।’’ कोमल की व्यंग्य भरी आवाज उसके कानों में तीर की तरह लगी।
‘‘क्या वो तुम्हें चाहता है और तुम...?
‘‘हां भाई अपने बीबी की भाभी को...एक शादीशुदा औरत को....तुम्हें पता नहीं कि दुनिया में कितने बेवकूफ भी रहते हैं।’’
‘‘तुमने कैसे जाना?’’
‘‘औरत मर्द की नजर फौरन पहचान लेती है। मैं भी पहले चौंकी थी कि ये इतने कीमती तोहफे क्यों देते हैं। नहीं समझती तो बेचारी सरिता। वह अच्छे दिल की है उसे समझा दिया तेरे भाई की मदद रहे हैं। वह खुश मेरे भाई की मदद कर रही हूं। जबकि मैं समझ चुकी हूं वह तोहफे दीवानेपन में देता है।
‘‘फिर तो तुम्हें उससे कुछ नहीं लेना चाहिए।’’
‘‘क्यों ना लूं? वह खुशी से देता है। मैं घर आई लक्ष्मी को क्यों ठुकराऊं, वह अपनी दौलत खुशी से लुटा रहा है उससे मुझे कोई लेना देना नहीं। मैं तो अपनी ननद का माल समझ कर कबूल कर लेती हूं।’’
‘‘कहीं तुम भी उसको चाहने तो नहीं लगी...?’’ एक सहेली ने पूछा
‘‘मोहब्बत और उससे। अपनी इतनी अच्छी पत्नी....मासूम बीबी का नहीं हुआ.... वो मेरा क्या होगा? मुझे तो अपने पति से मोहब्बत है; अपने घर से है। भोली-भाली प्यारी ननद से प्यार है। बेवकूफ दौलत के बल पर मुझे खरीदना चाहता है। मौका हो या ना हो तोहफा....’’ सबकी हँसी उसके कानों में गूंजी।
‘‘मैं तो कहती हूं कोमल इतने कीमती तोहफे
मत लो।’’
‘‘कुछ नहीं मैं ननद के समझ कर लेती हूं। इस तरह कीमती कपडे पहन कर अपने पति को सुन्दर लगती हूं। उनकी ख्वाहिशें पूरी करती हूं। मैं तो उसको घास भी न डालूं। समझी तुम...’’ सबकी हँसी की आवाज उसके कानों में जहर घोलने लगी। मैं आज तक बेवकूफ बनता रहा। कोमल की हँसी...उसकी बातें मेरी रगों के अन्दर लावे की तरह उबलने लगी। जैसे तैसे गाडी तक आया। मैं मोहब्बत में लुट चुका था। मेरा दिल टूट चुका था। अब क्या करूं?
ऑफिस में बैठा था। अचानक फोन की घण्टी
बजने लगी।
‘‘भाई के घर आई हूं लेने आइए’’ सरिता की बात सुनते ही मैं ऑफिस से बाहर निकला। माल गया। वहां से तीन-चार सूट व सेट खरीदे। सामान से लदा फदा उसके घर पहुंचा। सामने ही कोमल व सरिता बैठी थी। मेरे हाथ में सामान देख कोमल की आंखों में चमक उभरी।
एक सवाल लहराया ‘‘मेरे लिए इतने सारे गिफ्ट.....’’
जाहिर है मैं वहां कोमल के लिए ही तो तोहफे ले कर जाता था। लेकिन मैंने कोमल को नजर अन्दाज करते हुए सरिता से कहा ‘‘यह लो आज मैंने तुम्हारे लिए शॉपिंग की है।’’
‘‘भाभी के लिए क्या लाए हैं? इनको दे दूं।’’ सरिता ने खुश होकर पूछा।
‘‘इसमें से कुछ भी नहीं....यह सब तुम्हारे लिए है। इनको बहुत दे चुका’’ कोमल की तरफ देखते हुए बोला ‘‘गिफ्ट देने का कोई मौका भी तो होना चाहिए। बिना मौका तो बेवकूफ ही गिफ्ट देते हैं। मगर तुम तो मेरी बीबी हो तुम्हें तो कभी भी दे सकता हूं। गैरों को बेवकूफ देते हैं समझा मेरी भोली...प्यारी बीबी’ मैंने एक-एक शब्द कोमल को सुनाते हुए कहा। उसे यकीन नहीं आ रहा था।
उसकी व्यंग्य भरी हँसी मेरे कानों में गूंज रही थी और मेरे दिल में उसके लिए नफरत उफन रही थी। आज सरिता मुझे कोमल से अधिक सुन्दर लग रही थी। कहते हैं मोहब्बत और नफरत के बीच बहुत कम फासला होता है। मेरे दिल के बंद दरवाजे खुल चुके थे और कोमल बाहर निकल चुकी थी। ?
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