मुन्नी पातर

सुधीर केवलिया


मौसम का मिजाज फिर बदलता जा रहा था। शहर ने कई बार खुद को बादलों में छिपा लिया था। बादलों की आवाजाही से धूप और बादलों के बीच लुकाछिपी का खेल चलता रहा। दोपहर तक सूरज अपनी पूरी जवानी पर था। चलती ट्रेन की खिडकी से आती गर्म रेतीली हवा अमर के चेहरे को झुलसा रही थी। गर्म हवा फेंकते, डिब्बे में लगे पंखे भी अपना दम तोड चुके थे। मुख्य शहर से कस्बे को जाने के लिए सही साधन इस ट्रेन में ए.सी. कोच भी नहीं था। बाबूजी की तबियत अचानक बिगड जाने का मां का फोन आने के कारण वह कस्बे जा रहा था। मुख्य शहर तक तो वह हवाई यात्रा करके आ गया था लेकिन आगे का रास्ता थोडा कठिन था। हालांकि कस्बे में उसने ज्यादा वक्त नहीं गुजारा फिर भी उसके बचपन से जुडी कुछ यादें वहां बिखरी पडी थी। शुरू से ही वह बोर्डिंग स्कूल में पढा और बाद में कॉलेज की पढाई के लिए हॉस्टल में रहा। नौकरी के लिए उसे दूसरे राज्य के शहर जाना पडा।
कस्बे की ओर जाती ट्रेन उसे उस जगह की ओर धकेल रही थी, जहां वह लगभग अजनबी ही था। ट्रेन के सफर में कस्बे की ओर जाने वाले, शुरुआती बातचीत के बाद एक दूसरे के जानकार हो गए थे। उसके सामने की सीट पर बैठा कस्बे का रिटायर्ड डॉक्टर था। अमर को डॉक्टर अन्य लोगों से अलग लगा। अमर चुप बैठा सभी की बातें सुन रहा था। कुछ देर बाद डॉक्टर उससे भी बातचीत करते हुए उसके माता-पिता का नाम सुनकर कहने लगा कि, ‘‘जो नाम तुम अपने माता-पिता का बता रहे हो, इन नाम के कोई व्यक्ति कस्बे में नहीं रहते।’’ अमर से घर का पता पूछकर वह चौंक गया और कहा, ‘‘मेरा मकान भी उसके पास ही है। लेकिन मैंने तुम्हें आज तक वहां नहीं देखा। देखता भी कैसे, वह मकान जो नाम तुम बता रहे हो उनका नहीं, वह तो मुन्नी पातर का है।’’
यह सुनकर अमर के माथे पर परेशानी की लकीरें साफ दिखने लगी। उसने हिम्मत जुटाकर बुजुर्ग डॉक्टर से पूछा, ‘‘ये मुन्नी पातर कौन है?’’ डॉक्टर ने खोजी निगाहों से अमर का चेहरा टटोला और गहरी सांस लेकर बोला, ‘‘बेटे यह एक अजीब दास्तान है, जो वक्त के साथ परवान चढती गई और आज भी अपने आप में एक मिसाल है। जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।’’ अमर के बार-बार पूछने पर डॉक्टर बीते हुए दिनों की धारा में बहकर उसे मुन्नी पातर की दास्तान सुनाने लगा।
‘‘देश की आजादी के बाद छोटी-बडी रियासतों का विलय होने लगा था। राजाओं और रजवाडों का युग खत्म होने वाला था। उस वक्त राज दरबार और महलों में काम करने वाले सभी लोगों के लिए रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया था। हमारा कस्बा जिस रियासत में आता था, वहां भी यही हाल था। हर कोई अपनी रोजी-रोटी की तलाश में इधर-उधर भागने लगा था। सबसे ज्यादा समस्या तो राजमहल परिसर में बनी जनानी ड्योढी में रहने वाली, राजदरबार में नाचने वाली पातरों (नर्तकियों) के लिए हो गई थी। यहां की चार दीवारी में ही उनकी दबी-छिपी दुनिया थी। जब राजा और राजदरबार ही नहीं रहे तो उनका कोई ठोर ठिकाना नहीं बचा था। कुछ पातरें, तो कस्बे, शहर में जाकर कोठे पर बैठ गई और कुछ पातरें लोगों के घर पर काम करने लगी थी। राजदरबार की नर्तकियों में सबसे खूबसूरत थी मुन्नी पातर।
मुन्नी पातर का चांद से भी सुंदर चेहरा, अमावस के अंधेरे से ज्यादा काली आंखें, स्वाभाविक, दिलकश मुस्कान और मानो सांचे में ढला, तराशा हुआ संगमरमरी बदन था। उसकी मादक आंखों में हमेशा एक मौन निमंत्रण सा रहता था, जिसके पीछे हर कोई उसकी ओर खिंचा चला जाता। उसकी मादकता और चेहरे की मासूमियत का अपना ही प्रभाव था। उसमें एक मुकम्मल औरत नजर आती थी, जिसकी मादकता कभी मर्यादा भंग नहीं करती थी, लेकिन दरबार के लोगों में इच्छा और सपने जरूर जगाती थी। उसकी मौजूदगी महफिल में अपनी अलग ही दमक बिखेरती थी। उसने किसी को भी अपने शरीर के स्तर पर निकट नहीं आने दिया।
नृत्य के बनाव सिंगार कर आती मुन्नी पातर बेहद लापरवाह तरीके से खूबसूरत थी। उसने नृत्य के विशेष अंदाज को अपनाया, क्योंकि उसके कद्रदान उसे पसंद करने लगे थे। स्वयं को वह जन्मजात नर्तकी मानती थी। नृत्य के बिना रह जी नहीं सकती थी, नृत्य ही उसका जीवन था। अपनी बिंदास अदाओं और नृत्य के कारण वह राजमहल में महफिल की जान हुआ करती थी। उसे नृत्य करता देख ऐसा लगता था मानो बिजली कौंध रही है और उसके घुंघरुओं की झंकारों में दरबार में सभी रस-विभोर हो जाते थे। मुन्नी पातर के सामने राजदरबार की सभी पातरों की चमक फीकी पड गई थी।
दरबार में बिछे बेशकीमती कालीन, छत पर टंगे क्रिस्टल के झाड फानूसों से छनकर आती जलती हुई मोमबत्तियों की रंग-बिरंगी रोशनियों के साथ तरह-तरह के इत्र की मदहोश कर देने वाली खुशबू और मुन्नी पातर का नृत्य माहौल में जादू पैदा कर देते थे। सभी उसके नृत्य पर फिदा हो जाते थे। सभी की नजरें ओस सी मासूमियत भरी ताजगी लिए, कुलीन परिधानों में सजी खूबसूरत मुन्नी पर जमी रहती थी।
महाराजाओं का दरबार रात में लगता था। वहां पर मंत्री, खबरची, चंद विदूषक, रसूखदार, और नगर सेठ आदि भी होते थे। कभी पातरे इनसे बतियाती तो खुश हो जाते थे। महाराजा नृत्य के लिए कभी भी पातरों को तलब कर सकते थे इसलिए मुन्नी और अन्य पातरें बुलावे की प्रतीक्षा में सजधजकर रात भर सजग रहती थी। नृत्य की शालीनता और मर्यादा को उसने कभी नहीं छोडा। नृत्य के बाद जनानी ड्योढी में कमरे में जाकर निढाल होकर पसर जाती। थकान के मारे उसका बदन टूटने लगता लेकिन महाराज और दरबारियों द्वारा बजाई हुई तालियों की गूंज सुनाई देते समय यह थकान कुछ महसूस नहीं होती थी। कभी-कभी तो उसे तन्हाई और खामोशी में भी यह गूंज सुनाई पडती थी। कई नर्तकियों और खामोशी में भी यह गूंज सुनाई पडती थी। कई नर्तकियों की दास्तानें कभी खत्म नहीं हुई, गुजरते वक्त के साथ कुछ ऐसा ही मुन्नी पातर के साथ हुआ।
रियासतें और रजवाडे नहीं रहने से मुन्नी पातर के लिए भी अपने भविष्य को लेकर गंभीर संकट पैदा हो गया था। हाशिये पर धकेली गई औरतों को जिस तरह तौहीन भरा जीवन गुजारना पडता है, वह शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। समाज अपने द्वारा तय सच और झूठ के मापदंडों में ही उलझा रहता है। समाज में मौजूद अनगिनत लपंट लोगों की टपकती लार और इच्छाओं के रेलों की बीच ये औरतें उनका शिकार बन हवस का निवाला बन जाती है। या फिर वे कहीं दूर-दराज के इलाकों में अनजान सी जिंदगी जीती हैं। समाज में इंसानियत से दूर तत्वों को जहां कहीं सुंदर औरत दिखती, वे लोलुप निगाहों से उसे घूरने लगते हैं, औरत समाज में मौजूद अपने प्रति विषमताओं और अन्याय को देखकर खुद को ठगा हुआ महसूस करती है।
मुन्नी पातर इन हालातों से अनजान नहीं थी। इससे पहले कि वह खुद को संभालती और भविष्य के बारे में सोचती, कभी राजदरबार में आने वाले नगर सेठ कन्हैयालाल, जिसका मुन्नी की तरफ हमेशा रुमानी नजरिया रहा, ने अकेले में उसके सामने एक प्रस्ताव रखा। उसने मुन्नी का ताउम्र साथ निभाने का वायदा करते हुए उसका हर तरह का खर्च खुद उठाने का जिम्मा लेने का कहा। मुन्नी को रहने के लिए पास के ही कस्बे में मकान की व्यवस्था के बारे में भी बताया। मुन्नी को यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। वह जानती थी कि नगर सेठ कन्हैयालाल शादी-शुदा था। वह उससे विवाह भी नहीं करना चाहता था। अपने भरे पूरे परिवार को नजरअंदाज कर उसके साथ रहना चाहता था। अपना वैवाहिक जीवन चौपट होने और लोकलाज का उसे जरा भी ख्याल नहीं था।
यह सोचकर मुन्नी के दिल और दिमाग में भावनाओं का टकराव उभरने लगा। नगर सेठ कन्हैयालाल खूबसूरत गबरु जवान था। दरबार की ज्यादातर पातरें उसकी दीवानी थीं। लेकिन इतने वर्षों में दोनों एक दूसरे के जज्बात को समझने लगे थे। वह मुन्नी के वजूद को मिट्टी होने से बचाकर एक बेहतर इंसान का वजूद देना चाहता था। वह उसके मन में सुनहरे भविष्य की उम्मीद की एक किरण के रूप में आया था। मुन्नी को लगा कि उस पर मंडराते संकट के बादल छंटने लगे थे। उसे खूबसूरत और निहायत पुख्ता सहारा मिलने जा रहा था, जिसके सहारे वह अपनी पूरी जिंदगी सुकून से गुजार सकती थी। उसके हां कहने पर नगर सेठ ने पास के ही एक कस्बे में रहने की और अन्य व्यवस्थाएं करवा दी। कुछ ही पलों में उसकी जिंदगी आम से खास हो गई और इस घटना ने उसकी तकदीर बदल दी थी। उसे करवट लेती जिंदगी में प्यार के पलों की आहट सुनाई देने लगी।
शुरू में अपरिचित और अनजान कस्बे में रहते हुए किसी अज्ञात भय की छाया मुन्नी के चेहरे पर दिखने लगी थी। नगर सेठ के समझाने पर धीरे-धीरे सब सामान्य होता चला गया। आज भी कस्बे में बहुत लोगों को नहीं पता कि उस मकान में कौन रहता है। इतने बरस बीत जाने के बाद भी नगर सेठ रोज शाम को अंधेरा होते ही, हमेशा की तरह अपनी कार में, कस्बे में मुन्नी के घर पर आता है और देर रात तक रुक कर चला जाता है। उसके अलावा किसी और आदमी को वहां आने की इजाजत नहीं है। घर की चार दीवारी में ही मुन्नी की दुनिया है। उसके जीवन का दायरा बहुत सिमट गया है और वह इसी संसार में डूब सी गई है।
बहुत बरस पहले मैंने मुन्नी पातर और नगर सेठ को, कस्बे से दूर नदी के किनारे सूर्यास्त के समय, साथ-साथ बहुत खुश देखा था। बीमार चल रही मुन्नी के ठीक होने पर मेरी सलाह पर ही वे वहां गए थे। मैं भी उनके साथ था। नदी में मुन्नी का अक्स बहुत सुन्दर लग रहा था। वह नगर सेठ से कह रही थी, ‘आप मेरे लिए इस सूरज की तरह हो, शाम होते ही रोज मुझमें ढल जाते हो।’ यह कहकर वह हँसने लगी थी। उसकी आंखों में प्यार और श्रद्धा साफ दिखाई दे रही थी। उसके बाद कई बरसों तक वे नदी के किनारे आते रहे और नदी का संगीत सुना।
गुजरते वक्त के साथ मुन्नी की चमक फीकी नहीं पडी है। उसके साथ दूसरी पातरों ने तो भले ही बुढापे को स्वीकार कर लिया होगा, लेकिन उम्र को चकमा दे रही है। उम्र उस पर अपनी छाप नहीं छोड पा रही। मुन्नी और नगर सेठ की एक दूसरे के प्रति दीवानगी और पूरी तीव्रता के साथ जिंदगी जीने की भावना अपने आप में एक मिसाल है। आज भी रोज शाम को अंधेरा होते ही मुन्नी के घर से, भले ही कुछ देर के लिए, घुंघरुओं की आवाज आने लगती है।
एक समय मुन्नी के लिए जिंदगी जीने के लिए आगे बढने का रास्ता पथरीला और फिसलन भरा था। नगर सेठ ने उसे सहारा दिया। विवाह भले ही नहीं किया लेकिन दोनों ने एक दूसरे के प्रति अपने फर्ज को बखूबी निभाया और आज तक निभा रहे हैं। दोनों की मजबूती, साफगोई और साफ सोच ने जिंदगी को मुश्किल से आसान और नामुमकिन को मुमकिन बना दिया है। नगर सेठ के परिवार वालों से रिश्ते जरूर तल्ख हुए होंगे, लेकिन इसके बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता। परिवार वाले इन संबंधों से आज तक अनजान बने हुए हैं, जबकि यह संभव नहीं कि उन्हें कुछ भी पता
न हो।
एक डॉक्टर होने के कारण, मुन्नी की तबियत बिगडने पर मुझे कई बार उसके घर जाने का मौका मिला है। उसके घर में लगे घने पेड और फूलों के कुंज की खुशबुओं ने वहां रोमानी दुनिया आबाद कर रखी है। जहां आज भी एक विवाहित प्रेमी अपनी प्रेमिका से मिलने रोज आता है और दोनों अपने में खो जाते हैं। उनके बारे में सोचकर मुझे हमेशा लगता है कि उनके लिए मनुष्य शरीर मात्र इच्छाओं और भोग कामना का वाहक नहीं है। एक संपूर्ण और स्वतंत्र विचार है।
वक्त के साथ मुन्नी भी अपने सपनों की सुंदर दुनिया में विचरती रही। उसने भी अपनी पलकों के किनारे सपने बसाए, वो मुकम्मल हुए या नहीं यह तो केवल उसे ही पता। अपने दिल के जज्बात उसने कभी किसी को नहीं बताए। उसके यहां काम करने वाली महिलाओं से जरूर वह कभी हँसी मजाक कर लिया करती है। वह अपनी ही दुनिया में खुश है। सुना है उसके एक लडका भी है, जिसका पिता नगर सेठ है। लडका किसी दूसरे शहर में रहता है, उसे आज तक कस्बे में किसी ने नहीं देखा, और न ही उसके बारे में कोई कुछ जानता है।
वक्त भी जिंदगी में कठिन इम्तिहान लेता है। पिछले कुछ दिनों से नगर सेठ बीमार है, लेकिन मुन्नी उससे मिलने नहीं जा सकती। समाज के मानदंड और मूल्य बदलते रहे के बाद भी कुछ मूल्य कभी नहीं बदलते। इनके बदलने की प्रक्रिया समंदर के ऊपर दिखने वाली लहर है, परन्तु समंदर की गहराई में इन लहरों का कोई असर नहीं। समाज जहां था, आज भी वहीं है। उसमें विसंगतिया जरूर कई गुना बढ गई है। कई गुना कलुषित हो चुका है।
मुन्नी की जिंदगी की कहानी भी धूप-छांप और सुख-दुख से बनी है। गुजरते वक्त के साथ मौसम बदलता है, दुनिया बदल जाती है, लेकिन मुन्नी के लिए कुछ नहीं बदला उसकी अपनी ही दुनिया है। इतना सब कुछ होने के बावजूद उसके जीवन में एक तरह अधूरापन है, ब्याहता न होने का, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उसे इस अधूरेपन के सहारे उम्र भर जीना होगा। हालांकि इसने अपनी जिंदगी में सही वक्त पर सही रास्ते का चयन किया। नगर सेठ ने भले ही उससे ब्याह नहीं किया लेकिन मान-सम्मान उसे ब्याहता का ही दिया।’’
इससे पहले कि बुजुर्ग डॉक्टर उसे कुछ और बताता, ट्रेन उनके कस्बे के स्टेशन पर पहुंच गई थी। यह कस्बा उसके लिए अनजान ही था, क्योंकि वह यहां कभी रहा ही नहीं और शायद एक या दो बार ही यहां आया था। वह किसी तरह प्लेटफॉर्म पर उतरा। उसके पांव कांप रहे थे। उसकी आंखें नम हो गई। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा फूट पडी। अपने दिमाग में चल रहे द्वंद्व का वह समाधान नहीं ढूंढ पा रहा था। उसके अपने भीतर के शोर के कारण तरह-तरह के विचारों की भीड में चेतना की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। उसने अपने को संभाला और तांगे पर घर के लिए रवाना हो गया। शाम होने को थी। तांगे में बैठा वह सोचने लगा कि ट्रेन में उसका सामना एक कडवे सच से हुआ था। आज तक झूठ की शक्ल में सच उसके सामने आ गया था। वह जान गया था कि मां का नाम सरला और पिता का नाम राजन नहीं, जो उसके स्कूल और कॉलेज के सर्टिफिकेट में था। उसका पिता राजन कोई सरकारी अधिकारी और मां सरला स्कूल टीचर नहीं, जैसा उसे आज तक बताया गया था। सच तो यह था कि उसकी मां मुन्नी पातर और पिता नगर सेठ कन्हैयालाल थे। वह समझ नहीं पा रहा था कि उससे यह सब कुछ क्यों छिपाया गया। एक झूठ को छिपाने के लिए मुन्नी को कई सारे झूठ बोलने पडे। आज जब झूठ उजागर हो गया तो अमर का अस्तित्व रेजा-रेजा हो गया।
अमर की मां, मुन्नी पातर, घर के दरवाजे से बाहर निहारते हुए उसी का इन्तजार कर रही थी। घर का ड्रांइग रुम काफी सलीके और नफासत से सजा हुआ था। मुन्नी का आकर्षण भी कम नहीं हुआ था। लम्बे रेशमी बाल, चमकता चेहरा, काजल लगी गहरी आंखें और वही सुंदरता आज भी उसमें थी। घर में अजीब सी खामोशी छाई थी। ऐसा लगता था मानो वह किसी मरघट में आ गया हो। अचानक फोन पर आई। घन्टी ने वहां की खामोशी को तोडा। अमर ने फोन पर बात करी तो उसे पता चला कि उसके पिता का निधन सुबह हो चुका था और उनका दाहसंस्कार भी कर दिया गया था। इसका मुन्नी को पता नहीं था। मुन्नी की आंखें आंसुओं से भर गई। रुंधे हुए गले से वह कुछ कहना चाह रही थी, लेकिन कह नहीं पा रही थी। ऐसा लग रहा था मानो वह सजी हुई, बिना आत्मा का शरीर लिए वहां बैठी थी। अमर के जेहन में सवालों का जो बवंडर उठा हुआ था, जिनका जवाब उसकी मां के पास था, कुछ समय के लिए शांत हो गया था।
शाम हो चुकी थी। अमर ने डॉक्टर को फोन करके उसके साथ शमशान चलने का अनुरोध किया। उसे पिता की चिता के दर्शन करने थे। उसे कस्बे में कोई नहीं जानता था। कुछ ही देर बाद डॉक्टर को अपने घर पर अमर के साथ देखकर मुन्नी की आंखें आंसुओं के धुंधलके में मुंद-सी गई। शमशान में अमर अपने पिता की बुझ चुकी चिता को हाथ जोडकर बहुत देर तक देखता रहा। वह याद करता रहा अपने पिता के साथ गुजरे हर लम्हे को, जो अब यादें बन चुके थे।
अमर जब घर लौटा तो अंधेरा हो चुका था। बुजुर्ग डक्टर भी उसके साथ घर के अन्दर चला आया। मुन्नी पातर अपने कमरे में सफेद साडी पहने पलंग पर लेटी थी। कमरे में शोक और उदासी पसरी हुई थी। मुन्नी के चेहरे पर पसीने की बूंदें चमक रही थी। अमर के बार-बार आवाज देने पर भी मुन्नी के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई तो डॉक्टर ने उसे जाकर देखा, चैक किया। ढंग से चैक करने के बाद डॉक्टर ने कहा कि मुन्नी का निधन हो चुका था। वह अपने प्रेमी की मौत का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई और मौत उसको भी अपने साथ ले गई। बिन ब्याही मां, मुन्नी पातर अपने प्रेमी के साथ इंसानी पहुंच के बाहर, कहीं दूर, बहुत दूर चली गई थी।
अमर की आंखों में कुहासा सा छाने लगा। उसकी जिंदगी में अचानक खालीपन आ गया था। दीवार पर लगे उसे माता-पिता के चित्र उसे कई भागों में बंटे दिखने लगे थे। अपनी मां की मृत देह देखकर तो मानो उसका वजूद पिघले मोम की तरह बहने लगा। उसके दिल की धडकने बेकाबू हो गई और सांस धौंकनी की तरह चलने लगी। उसकी आंखों का बांध टूट गया और आंखों से आंसू छलक आए। अपने सिर को हाथों में थामकर वह रात भर अपनी मां की मृत देह के पास बैठ रहा था। रात भर वह चिंता के समंदर में डूबा रहा। उसके माता-पिता की मौत उसका सब कुछ वीरान कर गई। उसकी जिंदगी की हरी भरी भूमि एक पल में रेगिस्तान में तब्दील हो गई थी।
सुबह होने को थी। लेकिन वह जानता था कि उसके माता-पिता की इस रात की कभी सुबह नहीं होगी। कुछ देर बाद जिस बिन ब्याही मां ने उसे सब कुछ दिया, उस मुन्नी पातर की, चिता जल रही थी। साथ ही जल रहे थे वे सभी सवाल जो उसके जेहन में थे और उनके जवाब। दुनिया के लिए गुमनाम लेकिन उसके लिए एक अनमोल रिश्ता हमेशा के लिए भस्म हो रहा था। अमर के गले में अटकी सिसकी और आह को सुनने वाला अब वहां कोई नहीं था। उसके चारों और निराकार शून्य था, और उसके अनंत आकाश में चौतरफा अंधेरा पसरा हुआ था। अपनों के साथ बिताए पल यादें बन गए थे।
अमर भारी मन और बोझिल कदमों से रिश्तों के ढह चुके खंडहर की हकीकत की तरह, जिंदगी की सच्चाई की रेत पर हवा के तेज झौंके के साथ, अपने पैरों के मिटते निशान छोडते हुए कुछ दिन बाद अपने शहर वापिस
चला गया। ?
४ ई-६०, जयनाराण व्यास नगर, बीकानेर (राज.) ३३४००३
मो. ०९४१३२७९२१७