यादों से जुडा शहर

के. एल. दीवान


आज पत्र मिला है- ‘तुम्हारी भाभी स्वर्गवासी हो गई है। उन्नीस अक्टूबर को उठाला है।’ ‘मैं सोचता हूं। आज क्या तारीख है? आज उन्नीस ही तो है।’ पत्र पर तारीख देखता हूं। चौदह अक्टूबर को लिखा गया है। आजकल पत्र मिलने में इतनी देर तो हो ही जाती है।
‘‘मैं भैया के पास जाऊंगा।’’
एक ऐसी बात सोची है जो साधारण हालात में होनी ही थी। सोचने की जरूरत ही न थी। पर मुझे सोचना पडा क्योंकि मैं उस शहर में पैंतीस साल के एक लम्बे अन्तराल के बाद जाऊंगा।
घर में कोशिश की गई कि मैं न जाऊं। कुछ दिन बाद मां और बाबूजी चले जाएंगे। पर मन में उठे विचार को बदल न सका। मेरे साथ है ही ऐसा। जो सोच लिया सो किया।
हैरानी हो रही है उस शहर को छोडे पैंतीस साल का लम्बा समय बीत गया और मुझे पता ही न चला। अचानक मुझे लगता है- ये पैंतीस साल मेरे जीवन का वह सब निगल गए हैं जिसे जीवन कहते हैं और बाकी रह गया है एक खण्डहर। जिसमें कुछ पल पहले सारे जहान का सूनापन समेटे यादों की अनेक कब्रें खामोश पडी थीं। पैंतीस सालों की तह को अपने ऊपर मनो मिट्टी की तरह डाले हुए। भैया का पत्र मिलते ही कब्रों के बीच में दबी लाशों में कुछ हलचल सी मच गई। फिर कब्रें फट गई और यादों ने रुहों का रूप ले लिया। वे कब्रों से बाहर निकल आईं। धीरे-धीरे हाथ में हाथ डाले इधर-उधर टहलने लग। फिर उन्होंने हाथ छोड दिए। एक गोले का रूप ले लिया। तीव्र गति से गोले में नृत्य करने लगीं।
मुझे चक्कर आने लगता है। लगता है दिमाग में सैंकडों घोडे अपनी पूरी शक्ति से दौड लगा रहे हैं। सब कुछ मेरे काबू से बाहर होता जा रहा है। सोचने समझने की शक्ति खो गई है। जाने से पहले कुछ काम निपटाने ह। कुछ तैयारी करनी हैं कुछ पता नहीं। अन-मना सा कभी यहां बैठता हूं कभी वहां तभी पत्नी बेचैन देखकर कहती है-
‘‘अकेले सफर नहीं करना चाहते, तो मैं साथ चलूं।’’
कोई और समय होता। वह ऐसा कहती तो मैं उसे खींच-कर बाहों में भर लेता और साथ ले उडता। लगातार चौबीस घंटे एक साथ मजा आ जाता। पर मैं उस शहर में अकेले जाना चाहता हूं। इसलिए कहता हूं-
‘‘ऐसी कोई बात नहीं। मैं अकेले ही हो आता हूं। वहां रुकने के लिए तो समय ही नहीं है। तुम्हें वैसे ही थकान हो जाएगी।’’
तभी अनिल कहता है-
‘‘चली जाओ न मम्मी। अकेले पापा बोर हो जाएंगे। चौबीस घंटे अकेले ट्रेन में।’’
मिन्नी साथ जाना चाहती है। मां से कहती है- इनका अकेले जाने का बिल्कुल मन नहीं है। सोचती हूं मैं भी साथ चली जाऊं। बडे परेशान नजर आते हैं।’’
डरता हूँ, कहीं मां हां न कर दें। इसीलिए उनके बोलने से पहले ही कहता हूं-
‘‘मैं बिल्कुल परेशान नहीं हूं। तुम्हें बहुत परेशानी होगी। एक ही दिन तो ठहरना है। दूसरे दिन सवेरे-सवेरे तो मैं वहां से चल पडूंगा।’’
मां जानती है ‘‘मैं परेशान हूं।’’
मिन्नी जानती है ‘‘मैं परेशान हूं।’’
मैं जानता हूं, ‘‘मैं परेशान हूं।’’
पर जीवन एक समझौता है। इसीलिए सबने धारण कर लिया है, मैं परेशान नहीं हूं।
मैं मां से पूछता हूं-
‘‘मां, पिछली बार आप जब भईया के पास गई थीं तो क्या क्वाटरों की तरफ भी गई थीं।’’
‘हां! गई थी।’ छोटा सा उत्तर।
‘क्वाटर का नम्बर देखा था? याद था आपको?’
‘नम्बर तो याद नहीं था। पर घूमते-घूमते पहुंच गई थी। अब तो वहां बहुत से क्वाटर बन गए हैं।’
और कोई खास बात?’
‘पीपल का पेड बहुत बडा हो गया है’
मां ने आगे कुछ कहा पर मैं सुन न पाया। मुझे लगा कि मैं पीपल के पेड के पास खडा हूं- मैं। उसे अपनी बाहों में भर लेता हूं और प्यार करने लगता हूं-
‘आप अपनी अटैची तो तैयार कर लो।’
‘मिन्नी तुम्हीं ठीक कर दो। मैं सोना चाहता हूं।’
मिन्नी चुप रहती है। कुछ कहती नहीं। मैं लेट जाता हूं। चादर ओढ लेता हूं। आंखें मूंद लेता हूं। फिर भी मुझे दिखाई दे रहा है।
भईया ने तभी-तभी अपना काम शुरू किया था। उनकी शादी का पैगाम दो घरों से आ गया। उनमें से एक लडकी को मैं प्यार करता था। उसका नाम कम्मो था। भैया और मुझमें एक नजदीकी और भी थी। हम दोनों दोस्त भी थे। भैया जानते थे मैं कम्मो से प्यार करता था। फिर भी मैंने पूछ लिया-
‘क्या सोचा है आपने?’
‘मैं कम्मो के लिए राजी नहीं हूंगा।’
‘विवाह तो मेरा भी कम्मो के साथ नहीं होगा। मेरा मन कुछ ऐसा ही कहता है। पर उसका हर समय सामने रहना-कैसा होगा वह जीवन।’
हर प्रकाश से कम्मो चुनाव योग्य होते हुए भी भैया दूसरी लडकी के लिए राजी हुए थे।
‘आप तेईस को लौट तो आएंगे?’
मिन्नी पूछती है।
‘क्या पता बिल्कुल न लौटूं- शायद भिक्षु बन जाऊँ।’
न जाने कैसे कह गया। शायद वर्षों पहले मन में जन्मा, फिर सोया एक विचार अनजाने फिर जाग उठा।
‘घर से जाते समय ऐसी बातें नहीं करते।’
मुझे अपनी भूल का अहसास हो आता है। यह सब कहकर जाऊंगा तो मां और मिन्नी दोनों परेशान रहेंगे। इसीलिए कहता हूं-
‘हां तेईस को लौट आऊंगा।’
रात गाडी में बर्थ पर लेटते ही नींद आ गई थी। सवेरे आंख खुली, प्रतिदिन के कार्य से निपटा, चाय पी और फिर एक लम्बी नींद। फिर जब आंख खुली तो बनारस आ चुका था। कुछ घंटों बाद मैं उस शहर में पहुंच जाऊंगा। मुझे ठीक वैसे ही लगने लगा जैसे आज से पैंतीस वर्ष पहले उस शहर में लौटने पर लगता था-
वह मेरा इंत*ाार कर रही होगी। मेरी आवा*ा सुनते ही बगीचे में आ जाएगी। मुलाकात होगी। होंठों पर मुस्कुराहट होगी, आंखों में पैगाम होंगे। कुछ गिला और शिकवा भी होगा। मुझे और उसको छूने वाली हवा एक होगी, हवा में घुली-मिली हमारी सांसें होंगी। दिल की धडकन तेज हो जाती है। बाहों में एक सरसराहट जाग उठती है। लगता है बाहें पंख बन गई हैं और मैं उडकर क्वाटरों में उसके पास जा पहुंचा हूँ। हर बीतते पल के साथ लगता है, हम एक दूसरे के निकट आते जा रहे हैं, दूरियां मिटती जा रही हैं।
आज भी ऐसा ही लग रहा है।
जानते हुए भी अब वहां क्या रखा है। पर कभी-कभी ऐसा भी तो होता है कि जो हम जानते हैं वह कहां सही होता है। संसार की जितनी चीजों को हम देख सकते हैं उससे कई गुणा चीजें तो ऐसी हैं जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ठीक है, देखने जैसा सुनने जैसा, अपना वहां कुछ भी नहीं रखा। पर फिर भी वहां कुछ ऐसा है जिसे मन सुन सकता है। देख सकता है, महसूस कर सकता है।
वह शहर आ गया है। मैं रेलवे स्टेशन से बाहर आता हूँ। रिक्शा द्वारा भैया के घर की ओर चल देता हूं। लगता है कोई मुझे क्वाटरों की ओर खींच रहा है।
भैया के घर पहुंच चुका हूं। मन तूफान से पहले वाली शान्ति से घिरा है। कुछ देर भाभी की बातचीत चलती है। फिर सब खाना खा सो जाते हैं। सोने से पहले भैया से पूछता हूं-
‘यहां एक माडल स्कूल था।’’
‘शहर के अन्दर।’
‘हां।’
‘अब भी है।’
‘कभी क्वाटरों की तरफ गए हैं।’
‘हां।’
‘नहीं। अब वहां क्या रखा है?’
फिर कोई बात न हुई।
सवेरे नाश्ता करने के बाद मैं शहर घूमने निकल पडा। सडक पर आते ही मुझे एक अजीब सा एहसास होता है। सडक पर चलते फिरते लोग, अपनी छतों पर खडे लोग, खिडकी से झांकते लोग, सभी मेरी ओर देख रहे हैं, सभी मेरी बातें कर रहे हैं- देखा यह पैंतीस वर्ष पूर्व यहां रहता था- इस शहर में इसकी एक महबूबा थी- दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। यह माडल स्कूल में पढता था- वह पास के ही गर्ल्स स्कूल में पढती थी। माडल स्कूल के पास की कपडे वाली दुकान पर बैठा यह उसका इन्त*ाार किया करता था।
मैं चौराहे पर पहुंचता हूं। जब वह बस से आया-जाया करती थी तो उसकी बस इसी चौराहे से निकलती थी। वह हमेशा खिडकी के पास वाली सीट के पास बैठा करती। होली के दिनों में मैंने एक बार उस पर कई सारे टमाटर फेंक दिए थे। बाद में सोचा था शायद उसे बुरा लगा हो। हो सकता है घर पर कुछ हंगामा खडा हो जाए। शंकाओं से घिरा घर पहुंचा था पर सब कुछ ठीक मिला।
पर ठीक रहा नहीं।
आज मुझे मालूम भी तो नहीं वह कहां है। मन पर गहरी उदासी छा जाती है। मुझे लगता है सारा शहर उदास हो उठा है। खुशियां खो गई हैं। आवा*ाों को सांप सूंघ गए हैं, उम्मीदें कहीं नीचे गहराई में दब गई हैं।
मुझे ध्यान आता है, पहले तो इस शहर का यह चौराहा साफ सुथरा हुआ करता था और आज चारों और गन्दगी ही गन्दगी है। शायद शहर के लोगों से उनका प्यार छिन गया है और उन्होंने गन्दा रहना शुरू कर दिया। ठीक मेरी तरह जैसे मैं महीना-महीना भर नहीं नहाता।
चौराहे से मैं क्वाटरों की ओर चल पडता हूं। सडक की ओर बने मकान, मेरी तरह पुराने हो गए हैं। कहीं कोई नयापन या उत्साह न*ार नहीं आता। चारों ओर एक बुझापन सा छाया है। ऐसा सचमुच है या केवल मेरा एक वहम। कहीं ऐसा तो नहीं मन में सुलगती यादों का धुंआं सारे शहर पर छाता जा रहा है।
मुझे ध्यान है दो मोड मुडने के बाद मुझे काफी दूर तक एक कच्ची पक्की सडक से सीधा जाना होगा। फिर रेलवे फाटक आएगा। जिसके एक किनारे पर के थडे पर एक कसाई बैठा करता था और मांस बेचता था। फाटक पार कर कुछ दूर आगे जाने पर क्वाटर हैं। सोचता हूं, शायद वह सडक पक्की बन गई हो। पर वक्त उन पर अपनी एक गहरी छाप जरूर छोड गया होगा।
फाटक के पास पहुंचता हूं। थडे पर मीट-शाप है। अब वहां पन्द्रह सोलह वर्ष का एक लडका बैठा है। फाटक पार करता हूं। कोई विशेष परिवर्तन नहीं दीखता। पहले यहां सडक के किनारे एक नाई और दो तीन सब्जी वाले बैठे रहते थे। अब यहां आठ दस खोखे लगे हैं। खोखों में बैठे लोगों में आज के प्रति कोई उत्साह या कल के प्रति कोई सपना नहीं दीखता।
क्वाटरों में भी अब पहले जैसी कोई बात नहीं दिखाई पडती। पहले खुले वातावरण में नए-नए साफ सुथरे क्वाटर बहुत अच्छे लगते थे। अब वह पुराने पड गए हैं। पहले जैसा खुला वातावरण भी नहीं है। लोगों ने अपने अपने क्वाटरों के सामने मिट्टी के कमरे डाल दिए हैं। खुलापन समाप्त हो गया है। हर क्वाटर के आगे बना बगीचा उत्साह विहीन जीवन की गाथा कह रहा है। चारों ओर बढी घास, मुरझाए पौधे, जीवन पर छाई उदासी की ही तो कहानी है। लगता है पिछले पैंतीस साल ने मेरी तरह से इनका भी बहुत कुछ निगल लिया है। जो कुछ दिया है वह अधूरापन लिए है। मिठास के बदले कडवाहट। विश्वास के बदले विश्वासघात। खुशी के बदले उदासियां। आशा के बदले निराशा। लगन, काम और मेहनत के बदले मजबूरियां, शिक्षा के बदले बेकारी। पिछले पैंतीस वर्षों ने यह कैसी सौगात दे दी है इस शहर को। अभी कुछ देर पहले जब मैं मेन बाजार में था तो सोच रहा था यह क्या हो गया है इसको, पहले तो यहां सडकों पर सुबह शाम छिडकाव हुआ करता था और आज चारों ओर कूडे करकट के ढेर पडे हैं।
घूमता फिरता मैं अपने पुराने क्वाटर के पास पहुंच चुका हूं। वहां का एक-एक कण एक कहानी को दोहराने लगता है। मेरा वहां बैठना उसका उधर खडा होना, खामोश-चुपचाप एक दूसरे को ताकते रहना। मेरी इच्छा होती है- पीपल के पेड को बाहों में भर लूं- आगे बढता हूं-तभी क्वाटर के किवाड खुलते हैं। एक व्यक्ति बाहर आता है। पूछता है-
‘किससे मिलना है?’
समझ में नहीं आता उसे क्या उत्तर दूं।
मैं पीपल की ओर देखने लगता हूं।
वह फिर पूछता है-
‘किससे मिलना है? बोलते क्यों नहीं।’
‘मुझे किसी से मिलना नहीं।’
‘फिर क्यों खडे हो यहां पर?’
‘इस पीपल के पेड को देख रहा हूं।’
‘इस पीपल को देख रहे हो। पर क्यों?’
‘आज से लगभग पैंतीस साल पहले इसे मैंने लगाया था।’
चार पांच लोग और आसपास आकर खडे हो गये हैं। उनमें से एक पूछता है- ‘क्या बात है?’
‘कहता है इस पीपल के पेड को मैंने लगाया है।’
‘फिर?’
‘मैं इसे देखने आया हूं।’ मैं कहता हूं।
‘अब देख लिया-चलो यहां से।’
‘चलो भाई रास्ता नापो। यहां परिवार वाले रहते हैं।’
लगता है और अधिक रुकना ठीक न होगा। हसरत भरी निगाहों से इधर-उधर देखता हुआ चल पडता हूं। तभी उनमें से एक कहता है।
‘कुछ क्रक लगता है।’
‘चोर है कोई। दिन में तांक-झांक करते हैं और रात को सफाई कर जाते हैं।’
‘हालात बडे खराब हैं। आदमी का कुछ पता
नहीं चलता।’
मैं आगे निकल आया हूं। अब उनकी बातें सुनाई देना बन्द हो गई हैं पहले सोचा था रात भी एक चक्कर लगाऊंगा। पीपल के नीचे एक दीपक जलाऊंगा। तब तक मन में परायेपन का एहसास नहीं था। अब लगा और सब चीजों के साथ पीपल भी पराया हो गया है। यादों के साथ जुडा तो रह सकता है पर अपना नहीं बन सकता। अनुमति मांग सब कुछ किया जा सकता। अधिकारपूर्वक कुछ
भी नहीं।’
भैया के घर लौट आया हूं। सब को शिकायत है दिन भर कहाँ घूमता रहा। बताता हूं- ‘पैदल ही क्वाटरों की ओर चला गया था और पैदल ही लौटा हूं।’
‘अब कौन है वहां पर? है कोई अपना?’ भैया पूछते हैं। मैं उत्तर नहीं दे पाता। शायद वह नहीं समझ पाएंगे, वहां का कण-कण मुझसे जुडा है। कुछ कहने में लाभ भी नहीं दिखाई देता। चुप रहना ही अच्छा लगता है। मुझे तो पैदल आने-जाने में अपनेपन का एक अजीब एहसास मिला। क्यों? पहले ऐसे ही पैदल तो आता जाता था।
खाना खाने के बाद लेट जाता हूं। गहरी नींद घेर लेती है। आंख खुलती है तो पाता हूं चारों ओर अंधेरा छा चुका है। मन में तीव्र इच्छा है जाने से पहले मैं एक बार माडल स्कूल हो आऊं। चाय पीकर घर से निकलता हूं तो उधर ही चल पडता हूं। माडल स्कूल की गली के सिरे पर पहुंच पुरानी दूकान को खोजना चाहता हूं। मुझे विश्वास है खोज भी लिया है। दुकान के अन्दर जाता हूं। काउंटर के पास खडे हो बाहर की ओर देखने लगता हूं, एकटक। न जाने कितना समय बीत गया है। तभी दुकानदार की आवाज सुनाई देती है-
‘मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं्?’
मैं चौंकता हूं। अपनी भूल का अहसास हो आता है। उसे कहता हूं कुछ सामान लेना था। पर मैं किसी की प्रतीक्षा कर रहा हूं। मैं देखता हूं उन्हें।’
मैं दुकान से उतर आता हूं। एक ठंडी साँस निकल कर वातावरण पर छा जाती है। मैं माडल स्कूल की गली में चला जाता हूं। फाटक खुला है अन्दर जाता हूं। चारों तरफ अन्धेरा ही अन्धेरा है। तभी एक आवाज आती है-
‘कौन है?’
‘मैं हूं। जरा इधर आना।’
एक आदमी मेरे पास आ खडा होता है।
शायद चौकीदार है।
‘क्या बात है। आज बिजली खराब है क्या।’
‘बिजली तो ठीक है। पर जलाने की इजाजत नहीं।’
‘किसने रोक लगाई है।’
‘प्रिंसिपल साहब ने।’
‘अजीब बात है। रात को बिजली जलाने की इजाजत नहीं।’
‘आपको किससे मिलना है साहब।’
‘मैं तो वैसे ही चला आया। आज से पैंतीस साल पहले यहां पढा करता था।’
‘सुना है तब तो स्कूल बहुत अच्छा था।’
‘हां तब तो बहुत अच्छा था।’
‘अब तो बुरी हालत है। हर समय लडाई झगडे होते रहते हैं। बच्चों को कोई पढाता नहीं। खूब नकल
चलती है।’
‘इधर कुछ नए कमरे आदि भी नहीं बने।’
‘नहीं साहब कुछ नया नहीं बना। कमरों के दरवाजे, खिडकियां सब टूट चुके हैं। फर्नीचर की बुरी हालत है।’
मन पहले से अधिक बोझल हो उठता है।
स्कूल के मैदान की मिट्टी उठाकर माथे से लगाता हूं। और भारी मन लिए लौट पडता हूं। कल प्रातः की ट्रेन फिर मुझे इस शहर से दूर ले जाएगी। ?
ज्ञानोदय अकादमी, निर्मला छावनी, हरिद्वार