नौ कविताएं

सुशील व्यास


प्रकृति छटा बिखेर रही थी
प्रकृति अपनी छटा बिखेर रही थी
मौसम खुशनुमा था
पौधे पल्लिवत थे,
चारों तरफ हर्षोल्लास था
हरे भरे पेडों की उपस्थिति
चार चांद बिखेर रही थी,
पौधों में मंत्रणा हुई
विचारों का आदान प्रदान हुआ
एक मंच गठित हो गया था
तय हो गया था एक निश्चित दिवस
पर मिलने का
मेलजोल का सिलसिला
आकार ले चुका था
हर पौधा खुश था
अपनी अभिव्यक्ति के
मंच पर निरन्तरता के साथ! ?

अपनापन
संसार, धरती, लोग
सब अपने हैं
अपनों के बीच
सपने
हो जाते हैं साकार
मिट जाती है
दूरियाँ
संवरती है
जिन्दगी
अपनी कहानी
अपनी कविता
अपने दर्पण में
अपना चेहरा
अच्छा लगता है
सफर तो है लम्बा,
मगर
पास है मंजिल।
अपनी आँखों में
पसरा हुआ शहर
शहर के अपने लोग
इन सब में समाई
इन्सानियत
अच्छी लगती है ?

विजय पथ
मुझे याद है
पिछले दिनों की बातें
जब हो रही थी मुझ पर
अनेक तरीकों से घातें
मैंने खुद का डुबोया है
समय के सागर में
निकल गया मैं सीमा से पार
इस तरह यारों
हुआ मेरा विस्तार। ?
तब बनती है कविता
जब मन के भीतर
आनंद का स्पन्दन होता है
कल्पनाएं
आकार लेती है
प्रकृति अपने
पूर्ण यौवन पर होती है
तब बनती है कविता।
दैनिक जीवन की उथल पुथल
चंचल मन भी हलचल
तूफानी हवा का वेग
मन में उठती हुई तरंगें
कविता के सृजन का संकेत है।
आत्मिक व्याकुलता
मानव मन भी कुलबुलाहट
भीतर से शब्द बाहर आने को आतुर
कविता के आगमन का संकेत है। ?
प्रतीक्षा
तुमने तो व्यक्त कर दी
अभिलाषा अपनी
मुझे अपना लो
गीत खुशी के गा लो
मगर मैं मजबूर हूँ
जिंदगी की खुशियों से बहुत दूर हूँ
अब तलक मिली है मुझको
जमाने भर की ठोकरें
युद्ध का हर मोर्चा न्यौता है मैंने
पराजय की आशंका से त्रस्त हूँ
जिंगदी की जोड बाकी में व्यस्त हूँ
महाभारत के मोड पर अर्जुन सा पस्त हूँ
फिर भी अगर इन सबसे बच पाया
मैं दौडा-दौडा चला आऊंगा
तुम्हें अंकों में भर लाऊँगा
खुशी के हर गीत गाऊँगा
मगर तब तक
क्या कर सकोगी
प्रतीक्षा मेरी ?
पल भर में
कभी-कभी
आदमी
अपने ही
बने बुनाये जाल में
उलझ जाता है
सब कुछ
उलट-पुलट जाता है
एक ही पल में
जाने-पहचाने चेहरे
अन्जाने हो जाते हैं
आदमी कुछ सोच ही
नहीं पाता कि
परदे का दृश्य पलट जाता है
बदल जाता है
अपने ही आस-पास का नजारा
और एक ही पल में
आदमी
हीरो से
जीरो बन जाता है ?
मैं आदमी हूँ
मैं दुश्मनों को दोस्त बनाने आया हूँ
पत्थर दिल को पिघलाने आया हूँ
इंसानों में प्रेम जताने आया हूँ
उदास मन को फिर से लुभाने आया हूँ
सोये हुओं को फिर से जगाने आया हूँ
हर खुशी को मुफ्त लुटाने आया हूँ
उजडे घर को फिर से बसाने आया हूँ
इस महफिल को फिर से सजाने आया हूँ ?
जय नारायण व्यास कॉलोनी, चौका, चाँदपोल, जोधपुर-३४२००१
मो. ९४६०५५१६२८