प्रताप का विश्रामः ग्यारह मुक्तक

रमेश कुमार शर्मा


वह चला सोने सदा जो जागता है
तुरत वीर प्रताप निद्रा त्यागता है
शीश नीचे खड्ग धर दृग मूँदते ही
स्वप्न देखा, देश शोणित माँगता है।
देश की दुर्दशा का तुझको स्मरण है
बता राणा, कर रहा क्यों विस्मरण है
स्वप्न में भी प्रश्न है, संदेश है यह
वीरता का मंत्र पहला जागरण है।
स्वप्न में अवतरित होकर अदितिनंदन
सूर्यनारायण स्वयं करते प्रबोधन
‘‘सूर्यवंशी वचन पर रहते अटल हैं’’
प्राणपण प्रणपालना रघु-बप्प-कुलधन।
स्वप्न उतरा पद्मिनी का प्रखर जौहर
दिवाकर की दिव्य तेजस्विता भरकर
‘‘पुत्र बलि दी घाय ने जिसको बचाने
उस उदय का पुत्र तू’’ गुंजित हुआ स्वर।
दुलहनों के हाथ की हल्दी न उतरी
बजी रणभेरी तुरत तलवार पकडी
स्वप्न में चित्रित हुई वीरांगनाएँ
युद्ध लडती खेत पति की बाँध पगडी।
हल्दिया कोमल करों का युद्ध कौशल
देखकर भयभीत विस्मित शत्रु का दल
नाम ‘‘हल्दी’’ पा गई वह समर घाटी
स्वप्न रेखांकित हुआ देवियों का बल।
स्वप्न में चितौडगढ चित्रित हुआ है
पितामह के घाव, रक्तिम खानवा है
सखा मन्ना, अश्व चेतक स्वप्न उतरे
तन गये भुजदंड, भिंचती मुष्टियाँ हैं।
स्वप्न में अनगिनत रणनितियाँ बनतीं
भौंह तनती, भुजाएँ रह रह कर फडकतीं
श्वास वीर प्रताप की हुंकार भरती
करवटें कुछ कर गुजरने की कसकतीं।
स्वप्न में आया स्मरण अपना किया प्रण
सकल सुख, निद्रादि भोगों का विसर्जन
‘‘मेवपाट समस्त हो स्वाधीन तब तक
वनविहार करूं, रहे आहार सेवण’’।
चित्त बसती सदा जिनकी धारणा है
श्वास की लय मात्र जिनकी प्रेरणा है
एकलिंग भवेश देते स्वप्न दर्शन
हृदय पाता जागरण की मंत्रणा है।
जागता रह वीर राणा, जागता रह
धार शस्त्रों की सदा ही जाँचता रह
परमपावन ध्वज लहराता कह रहा है
ठानता रह युद्ध रिपु से, ठानता रह। ?
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