अब जीवन

डॉ. सावित्री डागा


अब जीवन
एक सागर-मंथन
पग-पग पर है फि सलन उलझन
अमृत घट असुरों की खातिर
देवों के हित विष नित नूतन। ?
चिंतन के क्षण
रोता-रोता आया था, रोना रहता साथ,
रूदन उदासी भूलकर, कर लें कुछ हँस बात,
जिस उर में ना अगन हो, ना आँखों में नीर,
वे कैसे इंसान हैं, छुए ना जग की पीर।
एक तन में दो मन बसे, करते वाद-विवाद
बडी अजब ये बात है, मन-मन को समझात।
हृदय अगन पानी नयन, अधरों पर मुसकान
जाने कैसे जी रहे, कितने ही इंसान।
‘मैं’ सबको प्यारा बहुत, अहम् बने दुखदाय
‘मैं’ को जो पहचान ले, प्रभु उसमें दिख जाय। ?
अन्तर की आवाजें
आते रहते गुजरते, छोटे-बडे महान,
मरता पर कोई नहीं, यात्रा इसको जान।
आओ खुश होके मिलें, कर लें अच्छी बात,
वर्ना तो यह जिन्दगी, दुखडों की सौगात,
जो आया वह जायेगा, सदा रहा है कौन?
कुछ चीखें बदलाव से, कुछ सह लें रह मौन।
जितना खोजा स्नेह-सुख, भोगा दुख संताप,
अनजाने होते रहे, पुन करने में पाप।
जीवन लम्बी यात्रा, इसमें कई पडाव,
इक पडाव इस देह में, दूजा दिख ना पाय।
खुद से जो हम मिल सकें, स्वत; खुदा मिल जाय,
यों जीवन भर खोजते, खुदा ना झलक दिखाय।
आज ना लोगों से मिले, मिले स्वयं से आज,
बाहर कांटे थे बहुत, भीतर आनन्द राज।
प्रेम-जोत उर में जगी, भला दिखा संसार,
जीवन उजियारा हुआ, भागा दुख-अंधियार। ?
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