चार कविताएँ

राजेन्द्र शर्मा ’मुसाफि र’



आस्था की तपत
मेरी रग-रग में
बहते खून को
बहुत बार करता हूँ
महसूस
जमता हुआ
लेकिन फि र कोई
आस्था की तपत
कर देती है
निष्प्रभावी जमने को।
विश्वास का सम्बल
देता है
प्रवाह को तेज गति
और फि र बहता है रक्त
मेरी रग-रग में
जीवन्त हो कर
नदी की तरह।
महसूस करता हूँ
नदी का स्वर
कल-कल छल-छल
जो समा जाता है
आखिर
अन्तस-सागर में। ?
बुजुर्ग
ईंट पत्थर-सीमेंट से
बना ये मकान
मेरे से भी ज्यादा
हो गया है कमजोर
पता नहीं कब
भरभरा जाए।
ये पेड अब
विष उगलता है
जिसे मैंने लगाया
सींचा जतन से
फू ल-फ ल-बीज
कितने दूषित इसके।
सबसे अलग-थलग
दरवाजे के पास
टूटी खाट पर
करवट लेता कोई
बहकता है
यदा-कदा। ?
पैमाने
(1)
चीखते हैं
चिल्लाते हैं
रूदन भी करते हैं
वे लोग
भीतर ही भीतर।
दिखाई देता है
फकत मुरझाया चेहरा
सूखी आँखें
सिले होंठ।
(2)
वे शोषण
अत्याचार
दुराचार से उपजी
पीडा लेते हैं उधार
दर्द को सजाते हैं
दुकानों पर।
किसी की सिसकियां
कराहटें और
आंसू भी
विदीर्ण करते हैं हृदय
बडे समूह का।
भीतर ही भीतर कहीं
साकार होते हैं उनके
सपने
युद्ध जीतने के। ?
निबाह
दोनों हाथ फैलाए
वह मांगती रही
ढेर सारा प्यार
वह भी इंतजार में था
कब वे हाथ
ले उसे आलिंगन में
जहां उगा था
प्यार का बिरवा।
खडे रहे ता-उम्र
आमने-सामने दोनों ही
बिना देखे-झांके
भीतर
वे खडे ही रहे
मौन-अनथक
आमने-सामने
पतझड तक
हाथ सहला न सके
मुरझाते पौधे को
सब कहते हैं
वे करीब थे
अनन्य थे
दो होकर भी
एक जान ही थे
किसी ने नहीं देखा
उगते बिरवे को
मुरझाते पौधे को
बसंत में पतझड को। ?
सावित्री सदन सी-122, अग्रसेन नगर, चूरू (राज.)
मो. ॰941435॰848