चार कविताएँ

प्रो. राजेन्द्र गर्ग


तुम और मैं
एक मार्ग पर चले जा रहे
भिन्न-भिन्न गन्तव्य हमारे
तेज धूप से पिघली पिघली
कोलतार की इन लम्बी सडकों पर
हरी दूब का कोई अंकुर
मुझे न दीखा कभी कहीं पर
धूल भरी लंबी राहों पर
चारों ओर रेत और कंकर
तुम कहते हो बात लता कुंजों की
लहराते झरनों मकरंद लुटाये मत्त पवन की
इस टपकाते फ लों तितलियों के नर्तन की
देख रहे हम एक दिशा में
भिन्न-भिन्न हैं दृश्य हमारे
बदहवास मैं भाग रहा हूँ
फू ली साँस पसीना लथपथ
राहों के कंकर पत्थर
उठा-उठा कर अपनी जेबें
टोकरियां भरता जाता मैं
तुम गद्गद् उल्लास तरंगित
कथा सुनाते शिशु की पावन मुस्कानों की
लज्जारूण मुग्धा के मुंदे हुए नयनों की
नील गगन में पंख फैलाए राजहंस की
गिरि शिखरों पर उतर रहे श्यामल बादल की
कहते सुनते एक कहानी
भिन्न-भिन्न हैं कथ्य हमारे
मेरे कंध पर सिर रख कर
नहीं बहाये अश्रुकिसी ने
गीत नही थिरका कोई मेरे कंठों में
बोझ उठाये चलता हूँ मैं डरता-डरता
मैं हताश आकुल एकाकी
तुम आह्लादित नृत्य मग्न
रोमांच प्रफु ल्लित स्नेहसिक्त
गीत चांदनी गाते गाते
हर्ष विभोर रहे तुम पल-पल
भोजन साथ किया है हमने
भिन्न-भिन्न हैं स्वाद हमारे ?
हवा
किस अनन्त गुहा से दौड आती है यह
और किस अबूझ अनजान लोक की तरफ
दौडी चली जाती है?
शाश्वत पथ पर गतिमान
यह अनादि अनन्त हवा
वह जो ध*ुव से धु*व तक
महासागरों महाद्वीपों देशांतरों
की सनातन यायावार है
वह जो तब भी अट्ठहास करती थी
समुंद्रों और पर्वतों में उमडती घुमडती
जब मनुष्य नहीं था
और न होगा कोई भी प्राणी
निर्जीव मिट्टी का ढेला नहीं है धरती
स्पंदित है इसका तन और मन
वेग से लहराती, थरथराती
धडधडाती चली जाती है धरती
किस अज्ञात गन्तव्य को धाती है यह?
किस स्पर्धा में?
और इसके समुंद्रों पर सवार
दौडी जाती है यह हवा भी
धरती के नासापुटों से निकली
धरती की सांस ?
चला जाना यहाँ से
कोई घटना नहीं होती
महासागर की उछलती लहरों से
किसी एक बूंद का छिटक जाना
और किनारे की रेत में जा मिलना
या विशाल और घने किसी जंगल में
एक पत्ते का धरती पर गिर जाना
किसी वृक्ष की डाल से
कोई घटना नहीं होती
कोई खबर नहीं बनती
पर्वतराज हिमालय की श्ाृंखलाओं से
किसी रेत के कण का हवा में उड जाना
और गहरी अंधेरी घाटी में जा गिरना
या झर जाना एक बूंद का
पर्वतों नगरों और पठारों को
अंधेरे में डुबो देने वाली
उमडती घुमडती किसी काली घटा से
कोई खबर नहीं बनती
जान ही नहीं पायेगा कोई
दूर-दूर तक फैले किसी खेत से
एक अन्न का दाना
बैठ कर किसी चिडिया की चोंच में
कब वहां से चला गया
और जान ही नहीं पायेगा कोई
मेरा या तुम्हारा
चला जाना यहाँ से
क्योंकि
यह कोई खबर नहीं होती ?
मेरा एकांत प्रेम
बना ही रहा यह डर हमेशा
कि कहीं पीना ना पड जाये
अपमान का घूंट
झेलना ना पड जाये
तिरस्कार का दंश
कि अस्वीकृत न हो जाय
मैं या मेरा कोई मत या तर्क
कि मैं दोस्ती की पहल करूं
और अपेक्षा से देखा जाऊं
कि उम्मीदों पर खरा ना उतरूं
और भी नीचा गिर जाऊं निगाहों से
हँसी का पात्र बन बैठूं
कि मुझे एहसास करा दिया जाए
असमर्थ या छोटा होने का
कि दूसरों से बोदा दिखाई दूं
और कोई प्रभाव ना छोड पाऊँ
कि वे भी जो मेरा सम्मान करते हैं
इधर आ निकले ठीक उसी समय
जब मेरा अनादर हो रहा हो
या कि ऐसी खबर उन तक पहुँच जाये
भयभीत रहा कि मेरा स्वांग ना उतर जाये
देख न ले मेरे अभिनय को कोई पैनी निगाह
और बिखर ना जाये जैसे तैसे जुटाया यह सम्मान
बना ही रहा यह डर हमेशा
और मेरे डर ने एकान्त-प्रेम के वस्त्र पहन लिये। ?
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