अंतहीन प्रतीक्षा

डॉ. अरविन्द पारिक


सूखे खेतों में
मिट्टी की दरार में पडे बीज की तरह
जोहता रहा बाट,
पानी की इक बूंद की
कि कभी तो मिलेगी
इस अंधेरे से मुक्ति
वो स्नेह सिक्त नीर बिंदु देगा शक्ति
हो अंकुरित, प्रकाश कीओर बढने की
और ऐसा भी नहीं कि
बदली से कभी गिरा ही ना हो
मेरे हिस्से का स्नेह नीर
पर जब भी गिरा, सींच नहीं पाया मेरा अंतर्मन
नहीं हो पाया अंकुरित संभावित प्रेम पादप
क्योंकि वातावरण में तपिश बहुत थी
कभी रस्मों की
कभी बन्धनों की
कभी अहम्, तो कभी वहम
और मैं
आज भी वहीं
वही सूखी दरकती मिट्टी की दरार
और वहीं उसी अँधेरी दरार में
लिए हुये
कदाचित वही अंतहीन प्रतीक्षा। ?
वर्द्धमान महावीर खुला वि.वि., रावत भाटा रोड, कोटा-324॰21
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