चार कविताएँ

लक्ष्मी रूपल


पानी-पानी
नभ में पानी थल में पानी
सब ओर दिखा पानी-पानी
बह गये लोग टूटी सडकें
पशु-पक्षी सुविधा के साधन
बह गये भवन व्यवसाय क्षेत्र
बाजार दुकानें प्रतिष्ठान
उजडा ईश्वर का अपना घर
श्रद्धा के पथ पर अटल खडे
भक्तों का डोल गया साहस
सैंकडों, हजारों घर उजडे
पृथ्वी पर हाहाकार मचा
प्रकृति का यह रौद्र रूप था
पर्वत के मन का गुस्सा था
मृत्यु की घाटी बना हुआ
देखा केवल पानी-पानी
अपनों के खोने का गम
सबको मर जाने का डर था
बेबस, दुर्बल, अभिशापित से
सब मौन, नियति के हाथों में।
बाँधों में बन्दी रहकर भी
ऊफ नी नदियाँ, फि सले पहाड
बह गये उसूलों के नारे
निर्माण, प्रगति की दीवारें
बह गये आस्था के सम्बल
आशा विश्वास हुआ खंडित
नश्वरता का ताण्डव नर्तन
मलबे में दबे पडे शव थे।
बिजली के टूटे खम्भों पर
उलटा लटका विज्ञान चकित
कहने सहने की सीमा पर
देखा केवल पानी-पानी
सब ओर दिखा पानी-पानी। ?
पानी
पानी कि चर्चा है
सारे विश्व में
पानी की बहुत
कमी हो गई है।
इन्सान की प्यास
पी गई है
झील, नदीयाँ, तालाब सारे।
अब तो ‘पानीदार आँखों’ में भी
पानी की कमी हो गयी है। ?
नदी
एक दिन मैंने
वृक्षों, पहाडों, नदियों से
अपने घर का
ठिकाना पूछा था।
आज सुबह-सुबह
एक क्षीण, मलीन नदी
मुझसे पानी का
पता पूछ रही थी।?
मेरी पाती नदी के नाम
तुम जब कभी उधर जाओ
दे देना मेरी पाती
उस छोटी सी नदी को जो
बहती है मेरी गांव की सीमा पर
एक समय खूब भरी पूरी थी
युवा थी, चंचल थी।
रीत गई होगी अब तो
मिट गयी होगी उसकी
नाचती, उछलती
छोटी, बडी लहरें।
अब तो सिकुड गई होगी
निचुडे हुए गीले कपडे सी
ऊपर से सूखी, गीली भीतर से
थक गई होगी/ लोगों की
प्यास बुझाते-बुझाते
हार गई होगी/शहरों का
मैला ढोते-ढोते
मर मिटी होगी अब तक
किसी बाँध का हिस्सा बन कर
या लुप्त हो गया होगा
उसका सारा अस्तित्व
खारे समुद्र में डूब कर
अंधी, बहरी भीड से हटकर
कभी तुम चले जाओ तट पर
तो अवश्य कह देना
मेरा ‘सलाम’ उसको। ?
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