तीन कविताएँ

चन्द्रदेव भारद्वाज


बडा पेड और हवा
बडे पेड अब
दिखाई नहीं देते जो
सामना करते थे
मुश्किल समय का
आँधी-तूफ ान में
हिम्मत दिलाते थे
सीख देते थे,
डटे रहो
अविचल खडे रहो।
नई पीढी के लिए
नजीर बनते थे।
दूर-दूर बहुत दूर तलक
नजर नहीं आता साया
बडे पेड का जिससे
अश्वस्त हो जाएं
अब कोई हवा
झंझावत नहीं बनेगी,
हवा नहीं बदलेगी हवा में,
डरेगी बडा पेड खडा है।
दृढ इच्छा शक्ति से अडा है।
दूर ही सही
बडा पेड खडा है,
प्रतिबद्धता के साथ। ?
चिडिया
मुडेर पर बैठी
चिडिया को देख लगा
कुछ लिखूं
कविता में ही सही
चिडिया बन उडूं। ?
कविता का नाम-
‘चिडिया मन और उडान’
लिखा ही था कि
सूर्य उदय हुआ।
क्या रच रहे हो
एक ही शब्द पर्याप्त है।
तीन खर्च रहे हो
मन ही उडान चिडिया है।
चिडिया ही मन उडान है,
उडान से ही
मन चिडिया को जान लो।
शब्द तीनों समभाव है,
कवि हो पहचान लो।
चिडिया बनने के लिए
मन को समझाओ,
स्थिर करो।
मुडेर-मुडेर बैठो,
फु नगियों पर इठलाओ।
आम नहीं, अमराई में,
रघु नहीं रघुराई में।
पंख खोलो
विचरण करो।
अनन्त में उडते जाओ,
उडते जाओ, उडते जाओ
चिडिया बन जाओ। ?
शब्द अर्थ बदल रहा
शब्द छोटे थे
अच्छे थे।
जैसे-
‘थोडा’
थोडा पुष्ट था
स्वयं में सन्तुष्ट था।
‘जरा’ ‘मरा’ ‘करा’ और
‘धरा’ जैसे शब्द
निःशब्द।
शब्द स्वयं ही उच्चारण बदलता था,
सुर कैसा हो
तय करता था।
न लाग लपेट, न दुराभाव
परस्पर जानते थे,
एक दूजे की मानते थे।
शब्दों का भरपूर संसार था,
सुखद नैतिक संस्कार था।
शब्दों की हवा चली,
शब्द उडने लगे।
शब्द तैरने और
बिखरने लगे।
शब्दों के खेल खेल में,
शब्दों के मेल में
मिल गया और
अंग्रेजी का ’मोर’
‘और’ के आ जुडने से
खेल आनन्दमय हो गया।
कोई बुराई नहीं
‘मोर’ साथ ही रहेगा
तय हो गया।
‘और’ के आ जुडते ही
‘थोडा’ मचल गया।
ये समय कि क्रांति में
शब्दों की भ्रांति है।
‘और’ के आ जुडने से
संदर्भ बदल गए हैं।
‘जरा’ के आमंत्रण पर
और भी आ जाता है,
‘थोडी’ प्रतीक्षा के साथ
‘और’ ‘मोर’ रहता है।
ये शब्द संसार
प्रतिपल बदल रहा,
शब्द स्वयं उच्चारण से
अर्थ बदल रहा। ?
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