बिहारी सतसई

प्रेमचंद


पुरा-प्रसंग में इस बार प. पद्मसिंह शर्मा कृत पुस्तक ‘बिहारी सवसई’ की मुंशी प्रेमचंद द्वारा की गई समीक्षा प्रस्तुत की जा रही है।
यह समीक्षा ‘*ामाना’, फरवरी १९२० अंक में प्रकाशित हुई है, जिसे हमने प्रेमचंद रचनावली खंड-९ से लिया है।
‘बिहारी सतसई, मुसन्निफा (लिखित)-प. पद्मसिंह शर्मा, मतनूआ (प्रकाशक)-ज्ञानमण्डल, काशी, कीमत-दो रुपया।
उर्दू नाजरीन (पाठक) बिहारी के नाम से बेगाना नहीं है। बिहारी के कई पुरनामे (अर्थवान) दोहे उर्दू में मुरव्विज (प्रचलित) हैं। हजरज नियाज फतेहपुरी ने अपने ‘जज्बात भाषा‘ में बिहारी के दोहों की तशरीह (व्याख्या) की है और राकिम ने कई साल हुए रिसाला ‘तर्जुमान‘ में बिहारी के हालात लिखे थे। यहां सिर्फ इतना कह देना जरूरी है कि बिहारी हिन्दी का जिन्दा जावेद (अमर) और हुस्न-ओ-इश्क के रंग में बेमिस्ल (अनुपम) शायर है। हिन्दी में इसके कलाम का पाया (दर्जा) कितना ऊँचा है, इसका सुबूत यह है कि इस पर कम-ओ-बेश बीस शरहें (टीकाएं) निकल चुकी हैं, जिनमें कई संस्कृत जबान में हैं। यह कहना मुबालगा (अतिरंजनापूर्ण) नहीं है कि इस खास रंग में बिहारी संस्कृत के अक्सर असाति*ाा (गुरुओं) से आगे निकल गया है। मगर अब तक ‘बिहारी-सतसई‘ पर जितनी शरहें (टीकाएं) मौजूद थीं, वो कदीम तर्ज (पुरानी शैली) की हैं, जिनके समझने के लिए खुद उनकी तशरीह (व्याख्या) की जरूरत है। अलावा बरी (इसके अलावा), इनमें बिहारी के कलाम की खुसूसियात (विशेषताओं) से बहस नहीं की गई है। न किसी दूसरे हिन्दी शायर से इसका मुआजमा (तुलना) किया गया है। पंडित पद्मसिंह शर्मा ने ये किताब तस्नीफ करके (लिखकर) हिन्दी लिट्रेचर की यह कमी पूरी कर दी है। हिन्दी में ऐसी मब्सूत (विस्तृत) तनकीद (समीक्षा) दूसरी नहीं है। उर्दू लिट्रेचर में मौलाना हाली, गाालिब और सादी से इसका मुकाबला हो सकता है, लेकिन बसीत (फैला हुआ) के एतबार से उसे उन पर भी तफ व्वुक (श्रेष्ठता) है। इस काम के लिए पंडित पद्मसिंह खासतौर पर मौंजू हैं। इन्हीं बिहारी के कलाम का सच्चा जौक (रसानुभव) है। उनकी तबियत सुखन-फ हम (काव्य-मर्मज्ञ) वाकै (घटित) हुई है, और वो महज हिन्दी और संस्कृत पर कादिर (समर्थ) नहीं, उर्दू और फ ारसी पर भी इन्हें उबूर (सिद्धहस्तता) है। इस किताब की नुमायां (स्पष्ट) खुसूसियत ये है कि इसमें बिहारी के दोहों से टक्कर खाते हुए अक्सर उर्दू शुअरा (कवियों) के अशआर (बहुत-से-शेर) भी दे दिये गये हैं, जिनसे तनकीद (समीक्षा) और तशरीह (व्याख्या) का लुत्फ दुबाला (दुगुना) हो जाता है। शर्मा जी का तर्जे-बयान निहायत चुस्त, फ सीह (रोजमरा के शब्दों का प्रयोग करने वाली लेखन-शैली) और दिलकश है। महज इंशा परदाजी के एतबार से भी ये किताब हिन्दी लिट्रेचर में बेमिसाल है, वसअतए मालूमात (ज्ञान की गंभीरता), शायरान सुखन-फ हमी (कवियों जैसी काव्य-मर्मज्ञता) लुत्फ ाए-तनकीद (समीक्षा का आनंद) इस पर मजीद (अतिरिक्त) है।
बिहारी की सतसई (सात सौ दोहों का मजमुआ) से पहले दो हस्तियां और भी मशहूर हैं। एक प्राकृत में मौसूम-बा (नामधारी), ‘गाथा-सप्तशती‘ दूसरी संस्कृत में मौसूम-बा ‘आर्या सप्तशती‘। हिन्दी में ‘तुलसी सप्तशती‘ और ‘रहिमन- सप्तशती‘ भी मौजूद हैं और बिहारी की सतसई के बाद तो सतसइयों का तांता बंध गया। कितने ही शुअरा (शायरों) ने इसके ततब्बे (अनुकरण) में तबअ-आजमाई (काव्य-रचना की कोशिश) की, मगर मुसन्निफ (लेखक) ने इन तमाम मुकद्दम-व-मुवख्खर (पूर्वापर) सतसइयों से बिहारी के सतसई का मुआ*ाना (तुलना, समानता) करके इसकी फजीलत (प्रतिष्ठता, श्रेष्ठता) पायाए-सुबूत (प्रमाण की पराकाष्ठा) तक पहुंचा दी है। मारिफ त (अध्यात्म) और अखलाक (शिष्टाचार), बैराग (वैराग) और धर्म-जैसे मजामीन (विषयों) में तुलसी और रहीम ने जरूर कमाल किया है, लेकिन हुस्न-ओ-इश्क के रंग में बिहारी फर्द (अद्वितीय) हैं और इसके सतसई का यही माबउल इम्तियाज (सन्देहविहीन) है।
शर्मा जी ने इसके तस्नीफ (कृति) में ऐसी तलाश और तहकीक (गवेषणा) से काम लिया है कि बेइख्तियार (सहसा) दाद देनी पडती है। इसमें शक नहीं कि बिहारी ने मुतकद्दिम (प्राचीन) ‘गाथा-सप्तशती‘ और ‘आर्या-सप्तशती’ का कदम-कदम पर ततब्बे (अनुकरण) किया है, लेकिन इन मजामीन (विषयों) में कुछ ऐसी कुदरत पैदा कर दी है, इन्हें कुछ ऐसा चमका दिया है कि तक्लीद (अनुकरण) में ईजाद (आविष्कार) का मजा आता है। मजमून आफ रीनी (नये विषयों का अविष्कार) का बिहारी के खुसूसियत है और इस एतबार से उर्दू के गालिब के सिवा कोई दूसरा शायर उसके जोड का नहीं है। मुलाहिजा फ रमाइए, तस्वीरकशी (चित्रण) के फ रसूदा मज्मून (पुराने विषय) पर बिहारी ने जितनी जिद्दतराजी (आविष्कार) की है-
लिखन बैठी जाकी सबी, गहि गहि गरब जरूर।
भये न केते जगत के, चतुर चितेरे कूर।।
यानी सारी दुनिया के मूसव्विर (चित्रकार), जो अपने फन में कमाल का दम रखते थे, बार-बार तस्वीर खींचने बैठे और नाकाम रहे।
जनाब अकबर फरमाते हैं-
लहजा-लहजा है हुस्न तरक्की पे तेरा हुस्न-जमाल,
जिसको शक हो, तुझे देखे तेरी तस्वीर के साथ।।
बिहारी ने मुसव्विरों (चित्रकार) की नाकामी की तवज्जो (ध्यान देना) नहीं की मसलन रुखए-रौशन (सदर मुख) के नजारे की ताब ना लाना (देख ना पाना), या लहजा-लहजा (क्षण-क्षण) हुस्न का बढना, या खुद ही जौकए-नजारा (दृश्य के आनन्द से तस्वीर बन जाना या बकौल मसहफी-
न हो महसूस जो श कि तरफ नक्शे में ठीक उतरे,
शबीहे यार खिंचवाई, कमर बिगडी, दहन बिगडा।।
उसने उसकी तौजीह (विवरण, स्पष्टीकरण), फेले-अबस (व्यर्थ का काम) समझकर खामोशी इख्तियार करना ही मुनासिब (उचित) समझा। उसके खयाल में मुसव्विरों (चित्रकारों) की नाकामी के बेशुमार असबाब (कारण) हो सकते हैं। एक-दो नहीं कि उनका शुमार किया जा सके।
हिन्दी शुअरा (कवियों) के साथ-साथ हजरत मुसन्निफ (लेखक) ने बिहारी का उर्दू शुअरा (शायरों) से मुआजना (तुलना) किया है, इससे साबित होता है कि इन्हें उर्दू शायरी का कितना सही मजाक (रुचि, रसिकता) है।
बिहारी
जौ वाके तन की दशा, देखौ चाहत आप।
तौ बलि नेकु बिलोकिए, चलि अचकां चुपचाप।।
यानी जो आप उस सितमजदा (पीडित) की हालत देखना चाहते हैं तो जरा अचानक और चुपचाप चलकर देखिए। अगर आफ आने की उसे खबर हो जाएगी तो उसकी हालत रूबए-इस्लाह (ठीक होने की तरफ) हो जायेगी।
गालिब
उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
बिहारी
दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर चित प्रीति
परति गांठ दुरजन हिये, दई नयी यह रीति।।
कायदा है कि जो धागा उलझता है वही टूटता है, वही जोडा जाता है, और उसी में गांठ पडती है, मगर मुहब्बत का रिश्ता अजीब-ओ-गरीब है, उलझती आंख है, और टूटता है खानदान। साफ-दिलों के दिल में वो रिश्ता जुडता है और गांठ पडती मुफ्सिदों (छलियों, शरारतियों) के दिल में।
बिहारी
डर न टरै नींद न परै, हरै काल बिपाक।
छिनक छाकि उछकै न फिरि, खरो विषम छवि छाक।।
यानी, नश-ए-मुहब्बत दीगर नशों से कितना जाइद (बढा हुआ) है, न वो खौफ से उतरता है, न उसमे नींद आती है, और वक्त ही उसकी कुछ इस्लाह (सुधार, शुद्धि) कर सकता है। एक बार पढा, फिर एक लम्हे के लिए कभी
नहीं उतरता-
मय में वो बात कहां जो तेरे दीदार में है
जो गिरा, फिर न कभी उसको संभलते देखा।।
बिहारी
जो न जुगुति पिय मिलन की, धुरि मुकुति मुख दीन।
जो लहिए संग सजन तो, धरक नरक हू की न।।
यानी, अगर जन्नत में विसालए-यार (प्रेमी से मिलना) नामुमकिन है, तो तुफ (धिक्कार) है ऐसी जन्नत पर। अगर यार साथ हो तो दोजख भी जन्नत है-
जौक
मुझको दोजख रश्काए-जन्नत है गर मेरे लिए,
वहा भी आतिश हो किसके रूए-आतिशनाक का।
बिहारी
देखौं जागि त बैसिए, सांकर लगी कपाट।
कित ह्वै आवत जाति भजि, कौ जानै केहि बाट।
यानी, जागकर देखता हूं तो दरवाजा वैसे ही बंद है और जंजीर लगी हुई मालूम होती है, वो महारू (चन्द्रमुखी) किस रास्ते से आता है और भाग जाता है।
जौक
खुलता नहीं दिल बन्द ही रहता है हमेशा
क्या जाने कि आ जाता है तू उसमें किधर से
बिहारी
भूषन भार संभारि है, क्यो यह तन सुकुमार।
सूधे पाय न परत घर, सोभा ही के भार।।
हजरत अकबर
नाज कहता है कि जेवर से हो तजकीने-जमाल
नाजुकी कहती है, सुरमा भी कहीं बार न हो।।
यह एक मुहक्किकाना (शोधपुरक) और अदीबाना (साहित्यिक) तस्नीफ (रचना है) हजरत मुसन्निफ ने हिन्दी लिट्रेचर की ये बेशकिमती (बहुमूल्य) खिदमत अंजाम दी है। उर्दू में अगर्चे मआसिराना मजाक (समकालीन सुरुचि) हिन्दी में कुछ मुतागायर (अजनबी) है, लेकिन उम्मीद है कि जमाना अनकरीब में दोनों जबाने पहलू-ब-पहलू (साथ-साथ) बज्मआरा (सुसज्जित) होंगी और उर्दू नाजरीन (पाठकगण) भी ऐसी तसानीफ (कृति) से मुस्तफीद (लाभान्वित) होंगे। किताब चंद आखरी सफ ात में मुसन्निफ ने पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र मरहूम मुरादाबादी की तसनीफकदा (लिखित) ‘बिहारी-सतसई‘ की टीका की जो अदबी तनकीब की, वह एक नादिर मिसाल (अनुपम उदाहरण) है, तहकीक (शोध) और तौजीह (व्याख्या) के साथ-साथ जराफत (मनोरंजन) की ऐसी चाशनी है कि वो इजालाए इंकबाज (संभावित त्रुटियों को दूर करने का अच्छा नुस्खा है। ?
(पुस्तक समीक्षा (तनकीद)। ‘जमाना‘ फरवरी, 192॰ में प्रकाशित। ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य‘ खण्ड-2 में संकलित)