राजस्थान में दलित साहित्य ः सृजन एवं संभावनाएं

रत्नकुमार सांभरिया


अंग्रेजी साम्राज्य के वर्चस्व से देश भले ही १५ अगस्त, १९४७ को मुक्त हो गया हो, लेकिन राजस्थान जो पूर्व में राजपूताना कहलाता था को सन् १९४८ में उसके गठन के बाद ही पूर्णरूपेण आजादी मिली थी और ‘‘राजस्थान’’ प्रदेश के रूप में स्वतंत्र भारत का हिस्सा बना था। यहाँ का सामाजिक परिवेश राजसी, सामंती और ब्राह्मणवादी रहा। सामंतवाद ब्राह्मणवाद के प्रश्रय के बगैर नहीं पनपता और ब्राह्मणवाद सामंतवादी के संरक्षण के बिना विकराल नहीं बनता ये दोनों ही तत्व यथा स्थितिवाद के पोषक हैं और इनकी एक जुटता अंधविश्वास, अशिक्षा और अस्पृश्यता को बनाये रखती है। जिस क्षेत्र में अंधविश्वास, अशिक्षा और अस्पृश्यता की त्रिवेणी अविरल बहती रही हो, वहाँ दलित विमर्श, दलित अस्मिता और दलित अस्तित्व की चर्चा अस्वाभाविक थी। इस तरह का वातावरण ऊँची आवाज और कहते शब्द को भी बर्दाश्त नहीं करता।
ऐसे घोर अंधकार और गुलामी की गुहा के बावजूद यहाँ भक्तिकाल में ही वर्णवादी व्यवस्था और सामंती वर्चस्व के खिलाफ चिनगारी चटकी। यह सामाजिक क्रांति थी जो चेतना का प्रस्फुटन था। हिन्दी साहित्य के पन्नों पर साया यह तथ्य कि राजसी ठाठ-बाट और सामंती परिवेश में पली-बढी परम कृष्ण भक्त मीरा बाई ने चमार जाति में जन्मे संत रविदास को अपना गुरु मान कर भक्ति की लौ प्रज्जवलित की थी। मीरा का यह कदम विद्रोही और क्रांतिकारी था। उन्होंने अपने कवित्त में संत रैदास का ३२ बार गुरु सुमरन कर उनके प्रति शिष्य प्रदत्त आदर भाव प्रकट किया है- ‘‘गुरु मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी।’’
संत रविदास अपने अंतिम दिनों में मीराबाई के आमंत्रण पर चित्तौडगढ (मेवाड) आ गये थे। यहाँ रह कर भी उनकी वाणियों और शब्दों में ब्राह्मणवाद की मुखालफत बरकरार रही। वे गुण उपासक थे। जाति वर्चस्व उनके लिये नागवार था।
रविदास ब्राह्मण मत पूजिय, जउ होवै गुनहीन।
पूजिही चरण चाण्डाल के, जउ होवै गुन परवीन।।
तुलसीदास जो उच्च कुलोत्पन्न ब्राह्मण थे उन्होंने अपनी जातीय निष्ठा के बरअक्स इसका पुरजोर विरोध किया
और कहा-
पूजिय विप्र शील गुन हीना।
शूद्र न गुन ज्ञान प्रवीना।।
संत रविदास दलित साहित्य के आदर्श कहे जा सकते हैं। साहित्य की पारंपरिक धारा से इतर अगर हम दलित साहित्य के प्रादुर्भाव की ओर दृष्टिपात करें तो उसका बिरवा महाराष्ट्र में साठ के दशक में अंकुआया मिलता है। संदर्भ और पारिवेशिक मूल्यांकन तथा सामाजिक आकलन में साहित्य समाजद्रष्टा होता है। उत्पीडन और अन्याय के चलते वह जागृति का सेतु बन जाया करता है। महाराष्ट्र में दलित उत्पीडन और अत्याचारों की हदें लांघ गई थीं। पेशवाओं के शासनकाल में तो अन्त्यज समुदाय की यह दुर्गति रही कि जब वे राह से गुजरते तो उनके गले में हाण्डी बंधी होती थी। पीठ पीछे झाडू लटकती थी। इसका हेतु यह रहा कि अगर राह चलता अन्त्यज थूकना चाहे तो वह गले में लटकी हाण्डी में ही थूक ले और उसके पद चिह्न लटकती झाडू से मिटने चले जाये। ऐसे अमानवीय अत्याचारों के खिलाफ दलित साहित्य का उदय एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।
अन्ना भाऊ साठे, बाबूराव बागुल, राजा ढाले, ज्योति लांजेकर, दया पंवार, बंधु माधव, नामदेव ढसाल आदि की साहित्य मेधा बाबा साहब अम्बेडकर के प्रेरणादायी और समाजचेता विचारधारा की ऋणी है। यहाँ यह उल्लेख करना समीचीन जान पडता है कि महात्मा फुले ने १९वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही दलित साहित्य को अपनी अभिव्यक्ति प्रदान कर दी थी। महात्मा फुले के समाजोद्धारक कार्यों के कारण डॉ. अम्बेडकर ने उनको अपना गुरु स्वीकार किया था। महात्मा फुले के उपरांत बाबा साहब के विचारों का
दलित साहित्य पर बडा प्रभाव पडा और सृजनधर्मिता का सूत्रपात हुआ।
स्वामी अछूतानंद डॉ. अम्बेडकर के समकालीन थे। अगर हिन्दी बैल्ट में दलित साहित्य के उद्भव की चर्चा की जाये तो स्वामी जी निसंदेह इसके प्रणेता हैं। उनके ‘‘शंबूकवध रामराज्य’’ और मायानंद बलिदान दो ऐसे महत्त्वपूर्ण नाटक हैं, जिनको हिन्दी दलित साहित्य के बीजारोपण के रूप देखा जा सकता है। ठीक वैसे ही जैसे महात्मा फुले का ‘‘तृतीय रत्न’’ नाटक मराठी दलित साहित्य की नींव है।
स्वामी जी की कविताएं दलित समाज के उत्पीडन दलन, शोषण और अत्याचारों का प्रतिकार करती समाज में जागरूकता का स्नोत प्रवाहित करती है। यदि आज के संदर्भों का विवेचन करें तो हिन्दी में दलित साहित्य आठवें दशक के अंत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। डॉ. जयप्रकाश कर्दम, मोहनदास नैमिशराज, ओम प्रकाश वाल्मीकि, रत्नकुमार सांभरिया, कंवल भारती की कलम से हिन्दी दलित साहित्य सम्पन्न हुआ।
दलित साहित्य ने सदियों से चली जाती चातुर्वर्ण्यव्यवस्था की रीढ को तोडने का साहस किया है। यह साहित्य पुराने मानदण्डों पर तो चोट करता ही है, वर्जनाओं और रूढियों की नेस्तनाबूद करने, स्मृतियों (धार्मिक कानूनों) को नकारने की हिम्मत भी बटोरता है। इन्हीं स्मृतियों के माध्यम से वर्ग विशेष ने समाज पर ईश्वरीय
थोंपा है।
यदि राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में दलित साहित्य के आविर्भाव का आकलन करें तो राजस्थान में भी दलित साहित्य की पहली किरण हिन्दी दलित साहित्य के साथ ही फूटी थी। सन् १९८८ में मेरा एकांकी संग्रह ‘‘समाज की नाक’’ प्रकाशित हुआ था। आलोचकों की दृष्टि में राजस्थान में इसे दलित दस्तक के रूप में देखा जा सकता है। यहाँ प्रो. श्याम लाल, डॉ. डी. आर. जाटव, डॉ. कुसुम मेघवाल, प्रेमचंद गाँधी, डॉ. रामकुमार घोटड, योगेश कानवा, रामनिवास बायला, डॉ. अनिता वर्मा, जय प्रकाश वाल्मीकि, रमैयाराम के.पी., बाबू लाल चांवरिया, हरदान हर्ष आदि लेखक दलित साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।
राजस्थान में दो महत्त्वपूर्ण आत्मकथाएं आई हैं। डॉ. डी. आर. जाटव की ‘‘मेरा सफर, मेरी मंजिल’’ और प्रो. श्यामलाल की ‘‘एक भंगी कुलपति की अनकही कहानी।’’ डॉ. जाटव ऐसे लेखक थे, जिनका संपूर्ण जीवन बाबा साहब के साहित्य और विचारधारा में सन्नद्ध रहा। उन्होंने अपने जीवन काल में ‘‘डॉ. अम्बेडकर व्यक्तित्व एवं कृतित्व’’ सहित लगभग तीन दर्जन किताबें लिखीं। साहित्यिक प्रतिमानों की दृष्टि से उनकी आत्मकथा ‘‘मेरा सफर, मेरी मंजिल’’ विशेष स्थान पाती है। आत्मकथा व्यक्ति के अंतस की सच्चाई की मुखर अभिव्यक्ति होती है। अपनी इस आत्मकथा के माध्यम से उन्होंने अपने बचपन के उन दिनों का बेबाकी से वर्णन किया है, जो उन्होंने अभावों और गरीबी के साये में व्यतीत किये।
वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उनका जन्म २५ दिसम्बर, सन् १९३३ को उत्तर प्रदेश अलीगढ के नगला नाई गाँव में हुआ था और विवाह सन् १९४४ में हुआ। वे पढ-लिखकर नौकरी के लिए राजस्थान आ गये। और यहीं के होकर गये। इस आत्मकथा में एक अनोखी विरासत, जन्म और विवाह, शिक्षा के लिये संघर्ष, पीएच.डी. की कहानी, बाबा साहब से बुद्ध तक, मानववाद में मेरा विश्वास, कुल २२ अध्याय हैं। ये अध्याय बाबा साहब की २२ प्रतिज्ञाओं के गणनीय प्रभाव से प्रभावित नजर आते हैं। डॉ. जाटव जिस समाज से हैं, उसमें माता प्रसाद की ‘‘झोपडी में राजभवन’’ और मोहनदास नैमिशराय की ‘‘अपने अपने पिंजरे’’ (दो भागों में) प्रकाशित हुई है।
डॉ. जाटव ने अपनी इस आत्मकथा में उनके पीएच.डी करने के घटनाक्रम का इस प्रकार वर्णन किया है- ‘‘मैं डॉ. तिवारी से मिला, उन्होंने मुझे अपने महाविद्यालय निवास के बरामदे में इंतजार करने को कहा। वे अंदर गये और वापस लौटकर सफेद कागज के कुछ पन्ने मुझे थमा दिये। मैंने उनमें शोध का विषय देखा और पाया- ‘‘डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का समाज दर्शन’’। इस प्रकार वे
डॉ. अम्बेडकर पर पीएच.डी. करने वाले देश के प्रथम
शोधार्थी बने।
राजस्थान में दूसरी आत्मकथा प्रो. श्याम लाल की ‘‘एक भंगी कुलपति की अनकही कहानी’’ (ठ्ठह्लश्ाद्यस्र ह्यह्लश्ाह्म्4 श्ाद्घ ड्ड क्चद्धड्डठ्ठद्दद्ब ङ्कद्बष्द्ग ष्टद्धड्डठ्ठष्द्गद्यद्यश्ाह्म्) सन् २००४ में प्रकाशित हुई। उनकी जाति के साहित्यकारों में भगवानदास की ‘‘मैं भंगी हूँ’’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘‘जूठन’’, सूरज पाल चौहान की ‘‘संतप्त’’ और ‘‘तिरस्कार’’, डॉ. सुशीला टाकभौरे की ‘‘शिकंजे का दर्द’’ प्रकाशित हो चुकी हैं। वाल्मीकि समाज को क्षेत्र विशेष में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। यह जाति दलितों में दलित अर्थात्् महादलित रही है। फलस्वरूप सबसे ज्यादा आत्मकथाएँ इन्हीं की आई। ‘जूठन’ और ‘मेला’ इनके केन्द्र में रहा है। जहाँ मैला ढोने की बात आती है, वाल्मीकि समाज का पुरुष वर्ग इससे सर्वथा पृथक रहा है। क्योंकि घर कमाने के नाम पर दूसरे घरों की साफ-सफाई करके कूडा कर्कट और मैला ढोने का सारा कार्य वाल्मीकि समाज की महिलायें करती आई हैं। हाँ, जूठन समूचा परिवार खाता रहा। महिला और पुरुष दोनों के अनुभव भिन्न हैं।
यह जाति अन्य दलित जातियों में इतनी पिछडी क्यों रह गई, इसका हेतु यह आत्मकथाएं बयान करती हैं। अन्य दलित जातियां जहां डॉ. अम्बेडकर के आह्वान पर अपने घृणित जातीय पेशे छोड कर शिक्षा से जुड गईं, वहीं यह जाति अपने पैतृक धंधों में सन्नद्ध रही। मैला ढोने जैसे हेय पेशे को अपनाये रखने के कारण सर्वाधिक भेदभाव और अस्पृश्यता के वाकिये भी इसी जाति से होते रहे हैं।
वाल्मीकि समाज की आत्मकथा चाहे जयपुर की हो या नागपुर की उत्तर प्रदेश की हो या हिमाचल प्रदेश की, रूपरेखीय पेशागत समानता हैं। प्रो. श्याम लाल की यह आत्मकथा बडी प्रेरणादायक है। वे तीन विश्वविद्यालयों- जयनारायण विश्वविद्यालय जोधपुर (राज.)
(१९९६-१९९९), राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.)
(२००२-२००३) और पटना विश्वविद्यालय, पटना बिहार (२००८-२०११) के कुलपति रहे। विभिन्न विषयों पर उनकी अब तक १४ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो उनकी तीक्ष्ण मेधा का परिचायक है।
उनकी आत्मकथा ‘‘एक भंगी कुलपति की अनकही कहानी’’ ने उनको दलित साहित्यकारों की श्रेणी में ला खडा किया है इस आत्मकथा में कुल सोलह अध्याय हैं। उसमें दसवां अध्याय है, ‘‘उम्मेद भवन में।’’ यह अध्याय पाठक को न केवल उद्वेलित ही करता है, बल्गि रोंगटे खडे कर देता है। यह एक युग बदलने जैसा दृष्टांत है। वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्होंने मार्च १९९६ में जोधपुर विश्वविद्यालय के कुलपति का पदभार ग्रहण किया। उन्हीं दिनों जोधपुर के पूर्व महाराज गजसिंह का जन्मदिन आया। श्री गजसिंह ने उनको अपने जन्मदिन पर उम्मेद भवन में आमंत्रित किया था। वे जब वहां पधारे तो पूर्व महाराज ने उनका तहेदिल से स्वागत किया। उनसे हाथ मिलाया। अन्य विशिष्ट अतिथियों के साथ उनको राज प्रासाद के सेन्ट्रल हॉल में ले गये और सबके साथ बैठा कर भोजन कराया।
घर आकर जब उन्होंने यह सब अपनी माँ को बताया तो भावातिरेक से उनकी माँ की आँखें भर आईं। गले लगाया। सिर पुचकारा और उस हाथ को चूमा जो पूर्व महाराज के हाथ से मिलाया गया था। क्योंकि एक समय उनकी माँ महल के बाहर झाडू बुहारी का काम करती थीं और बालक श्याम लाल भी कभी कभार उनके साथ चले जाया करते थे। वे अपनी इस आत्मकथा में खिलते हैं कि उनको अपनी जिंदगी में कितनी ही बार जातीय भेदभाव और अस्पृश्यता के दौर से गुजरना पडा था।
डॉ. कुसुम मेघवाल का नाम महिला दलित साहित्यकारों में अग्रणी है। उनका लेखन बहुविध रहा है। उन्होंने कहानी, उपन्यास, कविताएं, बाल साहित्य और आलोचना सृजन का एक महत्ती कार्य किया है। ‘‘हिन्दी उपन्यासों में दलित वर्ग’’ पर उन्होंने अपना शोध कार्य पूर्ण किया है। उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियों में हिन्दी उपन्यासों में दलित नारी, इस नारी को पहचानो, अमंगली छाया, खूब लडी मर्दानी वह तो लक्ष्मी नहीं, झलकारी थी, सासू माँ की सीख, बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर, मेरी पहली उडान लंदन यात्रा और अंगारा जैसी पुस्तकें हिन्दी दलित साहित्य में अपना स्थान पाती हैं।
समाज सेवा करते जब से उनका राजनीति में पदार्पण हुआ है, वे साहित्य की मुख्यधारा से पृथक हो गईं और बार-बार उनका पार्टी बदलना न केवल उनके लिये, बल्कि उनकी सृजनात्मक मेधा के लिये भी घातक साबित हुआ है।
उनकी ‘‘अंगारा’’ कहानी काफी चर्चित रही है। यह कहानी नारी विमर्श के लिये नया आयाम स्थापित करती हई, नारी चेतना के लिए एक महत्त्पवपूर्ण कदम कहा जा सकता है। वरना अभी तक दलित स्त्रियों द्वारा दलित स्त्रियों के शोषण और उत्पीडन की मीमांसा ही पढने में आ रही थी।
डॉ. कुसुम मेघवाल के पति बी.एल. मेघवाल ‘‘भागीरथ’’ भी एक नामचीन दलित साहित्यकार हैं। यह संयोग की बात है कि राजस्थान में मेघवाल दम्पति ही एकमात्र है जो पति-पत्नी दोनों साहित्यकार हैं। उनका लेखन भी बहुआयामी है। उन्होंने कहानी, कविता, निबंध, जीवनियां तो लिखी ही हैं, वर्षों तक ‘‘परिवर्तन प्रभाकर’’ समाचार पत्र का संपादन भी करते रहे हैं। ‘‘पीढियों के सवाल’’ और उजाले की अगवानी उनके दो महत्वपूर्ण कविता संग्रह हैं। ‘‘पीडा के सेतुबंध’’ उनका उपन्यास भी प्रकाशित हुआ है। सन् १९९२ में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘‘राजस्थान ः दलित साहित्य, संदर्भ और संभावनाएं’’ राजस्थान के दलित साहित्य का परिदृश्य प्रस्तुत करती है। उनका लेखक यथास्थितिवाद से इतर समय सापेक्षता का द्योतक है। ब्राह्मणी व्यवस्था पर बराबर चोट करते हैं। संवेदना और मानवीयता के स्तर पर उनका लेखन अम्बेडकरी विचारधारा का पोषण करता है।
उनके द्वारा प्रणीत डॉ. अम्बेडकर की जीवनी-‘‘भारत रत्न डॉ. बी.आर. अम्बेडकर’’ गंभीरता लिये है। इसकी सबसे बडी विशेषता यह है कि उन्होंने बाबा साहब के जीवन संघर्ष और विचारों का बखूबी से वर्णन किया है।
‘‘यह देश डॉ. अम्बेडकर को दलितों के मसीहा के रूप में मानता है और आदर देता है। यदि उनके युग और उस युग की वास्तविकता और तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं के कार्यों का तटस्थ विश्ा*ेषण करें तो हम पाएंगे कि डॉ. अम्बेडकर केवल दलितों के ही मसीहा नहीं थे, वे इस देश के जन सामान्य के मसीहा थे।’’
राजस्थान के दलित साहित्यकारों में हरदान हर्ष भी एक हैं। उन्होंने बाल साहित्य से लेकर कविता, कहानी, एककी लिखे हैं। उनकी कविताओं में समय की जटिलताओं से जूझने की अभिव्यक्ति मिलती है। वे अपने लघु आत्मकथ्य में लिखते हैं कि ‘‘मेरी कविता यात्रा सन् १९६२ में प्रारंभ होती है। उस समय भारत चीन के बीच युद्ध चल रहा था। राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत मैं राष्ट्रीयता के गीत गाने लगा था। सन् १९६३ और सन् १९७१ के भारत पाकिस्तान युद्धों में मेरी राष्ट्रवादी भावनाओं को और बल मिला।’’ वे अपनी एक कविता में कहते हैं-
कुछ ही है,
मैदान में संघर्षरत,
बाकी ठहर गये हैं
एक एक कर
पिछले पडावों पर
बांध कर
विजय का सेहरा
मैं अग्रगामी
अब तक हूं,
जग-ए-मैदान।
यह कटुक्ति है कि साहित्य की भांति दलित साहित्य में भी नई पौधे नगण्य हैं। अर्थात् नवोदित या नवांकुर साहित्यकारों की कमी अब पूरी तरह खलने लगी है। प्रेमचंद गांधी हालांकि अब युवा नहीं रह गये हैं, लेकिन हमारे बाद की पीढी का होने के कारण और सधी कलम के धनी होने के फलस्वरूप वे एक संभावनायुक्त साहित्यकार हैं। उनका काव्य संग्रह ‘‘इस सिम्फनी में’’ काफी चर्चा में रहा है और पुरस्कृत भी हुआ है। उनके काव्य में अभिव्यंजनाओं की अभिव्यक्ति है। बिंब, प्रतीक और शब्दानुशासन का सुन्दर समन्वय प्रतिपादित हुआ है। विधागत पैरामीटर बना रहता है। उनकी भाषा, शैली, सहज और परिपक्व है। वे अपनी रचनाधर्मिता के प्रति पूरी तरह गंभीर हैं। हालांकि वे राजस्थान प्रगतिशील लेख संघ की राजस्थान इकाई के प्रदेशध्यक्ष रहे हैं, लेकिन कथित प्रगतिशील साहित्यकारों और विद्वानों के वे विरोधी हैं और उनका छद्म उन्हें स्वीकार्य नहीं है। वे अपनी डर कविता में लिखते हैं-
वे प्रगतिशील नहीं, प्रगतिकामी हैं,
जिसमें सदियों पुराने वर्चस्व की परंपरा
कुछ के हाथों में ही महफूज रहे
यही उनका सामाजिक न्याय है।
वे हर उस व्यक्ति पर संदेह करते हैं,
जो अपनी मेहनत और प्रतिभा से ऊपर उठ गया है।
रामनिवास बायला नवोदित कवि और लघुकथाकार हैं। वे दलितों में स्वालंबन पैदा करने के पक्षधर हैं। वे दलित की पीडा के उनके आज के संघर्ष के साथ बारीकी से बुनते हैं। वे वर्चस्ववादी जातिगत ढाँचे को ढहाना चाहते हैं, ताकि मानवता का संचार हर हृदय में समान रूप से हो। वे परंपरागत अवधारणा को नकार कर आज के स्थापन की वफादारी करते हैं। श्रमिक का श्रम-स्वेद इस धरती के विकास का मूल कारण है। उनकी कविताओं में आया आक्रोश और प्रतिकार विश्ाृंखल रूप धारण नहीं करता है बल्कि अपनी बात को इस तरह से प्रयुक्त करता है कि पाठक संवेदित हो उठता है और इस संवेदना के मध्य कहीं न कहीं स्वयं को खोजता है। उनकी ‘‘मजदूरन माँ’’ कविता काबिले तारीफ है-
भट्टी ज्यों धधकती भू
झुलसने वाली असह्य भू
यौवन विषादता मातृत्व,
ममता मूरत मंज लावण्य
व्यस्त पत्थर तोडने, ढेर जोडने में
टोकरी भरने उठाने में
सूना एक सदन
रोता बिलखता जीवन निर्बल
झाँकती माँ वो मजदूरन
कहा जा सकता है कि राजस्थान में आज दलित साहित्य अपने सृजनशीलता को लेकर अत्यंत गंभीर है।?
भाडावास हाउस, सी-१३७, महेश नगर, जयपुर-३०२०१५
मो. ०९४६०४७४४६५