लघु कथा की विधागत शास्त्रीयता के सम्मुख चुनौतियाँ

रमेश खत्री


लघुकथा साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा है। यह कथा का अति लघुतम स्वरूप है जो त्वरित ही अपना असर दिखा देता है। जिस तरह से साहित्य की अन्य विधा, फिर चाहे वह कोई भी हो जब विकास के पथ पर अग्रसर होती है तो वह रास्ते में अनेक पडावों से गुजरती है। वो पडाव ही उसके विकास को गति देते हैं। लघुकथा इस मामले में अपवाद नहीं है। निसंदेह यह भी अपनी विकास यात्रा में अनेक पडावों से गुजरी है। इसे हम इस रूप में भी देख सकते हैं कि कहानी का विकास ही लगभग लघुकथा का विकासपथ है। हम अच्छी तरह से जानते हैं कि ‘कहानी’ या ‘कथा’ का शाब्दिक अर्थ है ‘कहना’ इस अर्थ को यदि हम पकडते हैं तो जो कुछ भी कहा जाये क्या वह कहानी है; किन्तु विस्तृत अर्थ में यदि हम देखें तो कह सकते हैं कि ‘किसी विशेष घटना के रोचक ढंग से किये गये वर्णन को ‘कहानी’ कहा जा सकता है। यहाँ यह दृष्टव्य है कि कथा और कहानी एक दूसरे के पर्यायवाची होते हुए भी इन दोनों के अर्थ में कितना सूक्ष्म अंतर है। ‘कथा’ व्यापक है, इसमें सभी तरह की कहानियाँ तथा उपन्यासों का समावेश किया जाता है, जबकि कहानी के अन्तर्गत लघुकथाओं को ही लिया जाता है।
हम जानते हैं कि मानव सभ्यता के विकास यानी कि आदि काल से ही कहानी कहने की परम्परा किसी न किसी रूप में रही है। विश्व के प्राचीनतम उपलब्ध गं*थ ऋग्वेद में भी यम-यमी, पुरूरवा-उर्वशी आदि संवादात्मक आख्यानों का मिलना कहानी होने की पुष्टि करता है। इससे आगे चलकर हमारे विभिन्न ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों, महाकाव्यों, पुराणों, जैन, बौद्ध साहित्य में भी कहानी का अगाध भंडार मिलता है। संस्कृत में रचित पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियों का प्रचार-प्रसार दूर-दूर तक होने तथा पंचतंत्र का अनुवाद दूसरी भाषाओं में होने के कारण हमारी कहानी का प्रचार-प्रसार दूर दूर तक हुआ। हम निसंकोच कह सकते हैं कि विश्व के कथा साहित्य में हमारे कथा साहित्य ने यथोचित योगदान दिया है।
अब रही बात आधुनिक कहानी की तो हम जानते ही है कि आधुनिक कहानी का आरम्भ यूरोप के विभिन्न लेखक समूहों के द्वारा उन्नीसवीं सदी में हुआ था। इस लेखक समूह में सर्वप्रथम उल्लेखनीय है जर्मनी के ई टी डब्ल्यू हॉफमैन जिनके कहानी संग्रह उन्नीसवीं सदी में प्रकाशित हुए। जैकब और बिल्हेल्म गिम के परियों और पुराणों की कथाओं के संग्रह भी इसी दौरान प्रकाशित हुए थे। किन्तु इस दौर की सर्वोत्तम कहानियाँ एडगर एलन पो की लिखी प्रकाश में आई। उनकी कहानियों में पूर्व निश्चित प्रभावान्विति सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होती थी। उनकी लिखी कहानियाँ इसी प्रभावान्विति को ध्यान में रखकर लिखी गई थी। जो उन्हें एक सूत्रता में गूंथती है। इससे थोडा आगे चलकर मोपासां, चेखव, ओ’ हेनरी जैसे कई लेखकों ने कहानी कला के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप का और भी अधिक विकास लिया। यूरोप के इसी विकसित कहानी का स्वरूप अंग्रेजी और बंगला के माध्यम से बीसवीं शताब्दी के आरंभ में हिन्दी में आया।
हम यह भी जानते हैं कि हिन्दी गद्य में कहानी शीर्षक से प्रकाशित होने वाली सबसे पहली कहानी ‘रानी केतकी की कहानी’ है जो सन् १८०३ में लिखी गई थी। इसके बाद राजा शिव प्रसाद ‘सितारे हिन्द’ की ‘राजा भोज का सपना’ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘अद्भुत अपूर्व स्वप्न’ का भी उल्लेख किया जा सकता है। जिसमें कहानी की सी रोचकता मिलती है। किन्तु आधुनिक कहानियों का आरंभ आचार्य शुक्ल ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रकाशन काल से माना है। हालांकि मशी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में मानवीय भावनाओं का सूक्ष्म विवेचन किया, वातावरण की सघनता और शैली की गंभीरता के साथ स्थूल समस्याओं पर सरल विचारों का प्रतिपादन करने के कारण उनकी कहानियों ने पाठकों में गहरी पैठ पैदा की। निसंदेह उन तक आते-आते कहानी ने अपनी एक महत्त्वपूर्ण यात्रा को पूरी कर लिया था और वह अपनी आगे की यात्रा पर निकलने के लिए छटपटा रही थी।
जब हम लघुकथा के विकास काल पर न*ार दौडाते हैं तो हमें इसके दो व्यापक काल खंड न*ार आते हैं। स्वतंत्रता के पहले का काल और स्वतंत्रता के बाद का काल। लघुकथाओं की उपस्थिति स्वांतत्रोत्तर काल के पूर्व भी मिलती है जिसकी ओर इशारा कई आलोचकों ने किया है। कतु हम जिस शिल्पगत निकष पर उसे कसना चाहते हैं और उसे स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करना चाहते हैं उसका विकसित अस्तित्व तो स्वांत्रयोत्तर काल में ही मिलता है। हमें यह भी निर्विवाद रूप से स्वीकार करना होगा कि उस समय लघुकथा का कोई लक्षण निकष या आलोचना शास्त्र न तो संस्कृत में उपलब्ध था और न ही अंग्रेजी में। साहित्य विधा के रूप में इसका स्वतंत्र अस्तित्व केवल हिन्दी में ही है। यही कारण है कि लघुकथाओं का शास्त्रीय आधार मानदण्ड हिन्दी की अपनी जमीन पर ही निर्मित हुआ है। लघुकथा के अपरिष्कृत मूल में इसका आरंभिक अस्तित्व ऋग्वेद की उन लघुकथाओं में देखा जा सकता है जिन्हें हम यम-यमी, पुरूरवा-उर्वशी, सरमा-परिगण संवाद कहते हैं और जिनकी स्थापना लाक्षणिक कथ्य स्थापन के लिए हुई थी। गुणाढ््य की वृहत्कथा भारतीय कथा और लघुकथाओं का आदि ग्रंथ माना जाता है जो अपनी विशालता, रोचकता और सम्प्रेषणीयता के कारण आज भी विश्व का प्राचीनतम और महत्त्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इस एक आदि गं*थ के ही रूपातंरण क्रम में अनेक कथा ग्रंथों का प्रादुर्भाव हुआ।
‘लघुकथा’ की विधागत शास्त्रीयता के विश्ा*ेषण के क्रम में यह संक्षिप्त रूप रेखा का समझा जाना अति आवश्यक है। जिससे कि लघुकथा को स्वतंत्र साहित्यक विधा के रूप में विवेचित किया जा सके। हम यह भी भलीभांति जानते हैं कि उपन्यास के विविध रूप हैं किन्तु कहानी का विकास तो स्वतंत्र रूप से ही हुआ है। कहानी और उपन्यास दोनों ही स्वतंत्र साहित्यिक विधाएं हैं। जिस तरह से उपन्यास को संक्षिप्त करके कहानी का स्वरूपण नहीं हो सकता उसी तरह से कहानी फैलकर उपन्यास बन जाए वह कहानी थी ही नहीं। दरअस्ल ये दोनों ही साहित्य के दो अलग-अलग रूप हैं। कहने का तात्पर्य इतना ही है कि लघुकथा भी एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा है। जिस तरह से कहानी, लम्बी कहानी, छोटी कहानी, नई कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी इत्यादि विभिन्न नामों से विभूषित की गई और वह सम्पूर्ण रूप में साहित्य में कहानी विधा में ही स्थापित हुई है। इनमें किसी भी तरह का विधांतर नहीं है। किन्तु ‘लघुकथा’ को कहानी विधा में स्थापित करने में भारी कठीनाई होगी। लघुकथा कहानी का विकास चरण नहीं अपितु स्वतंत्र संचरण ही है। क्योंकि कहानी और लघुकथा में कथा, कथ्य, भाषा, शैली, प्रतीक, संवाद आदि अनेक आधारों पर कई भिन्नताएं हैं। हम यह भी जानते हैं कि लघुकथा को न तो कहानी में बदला जा सकता है और न ही कहानी को लघुकथा में रूपांतरित किया जा सकता है। क्योंकि दोनों में रूप, रंग, गंध स्वाद एवं भाव-विभाव में अंतर ही नहीं है अपितु इन दोनों में स्वतंत्र अस्तित्वशीलता भी साफ दृष्टिगोचर होती है।
कहने का अभिप्राय यह है कि लघुकथा की रचनाधर्मिता, रचना प्रक्रिया, आस्वादन प्रक्रिया तथा मूल्यांकन में कहानी के आलोचना शास्त्र से ही काम नहीं चलेगा। क्योंकि सोना परखने वाले पत्थर से सोना तो परखा जा सकता है किन्तु उससे हीरा नहीं परखा जा सकता। उसके लिए अलग निकष का अनुसंधान करना पडेगा। क्योंकि मूल पहले बनता है और मूल्यांकन परवर्ती प्रक्रिया है। इसलिए वह बाद में बनते हैं।
आज हिन्दी साहित्य के इतिहास में लघुकथा स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है पर इसका मूल्यांकन शास्त्र, लक्षण ग्रंथ, रचना प्रक्रिया इत्यादि कसौटियाँ अभी भी उपलब्ध नहीं हैं। इसके लिए भी चिंता की कोई बात नहीं है। क्योंकि पाठक, विचारक और लघुकथाकार स्वयं भी अपने स्तर पर अपने उदार और द्वंद्वशील विचारों के माध्यम से इसको सृजित कर लेंगे।
जब हम लघुकथा में ‘कथा’ तत्व की व्याख्या करते हैं तो पाते हैं कि इसमे कथा का तीखापन होना अत्यन्त जरूरी है। जिसे हम ‘कथाकथ्य’ भी कह सकते हैं। इसमें अर्धनारीश्वर भाव का होना आवश्यक है। जिस तरह से कहानी में कथा और कथ्य स्पष्ट दिखते हैं, शब्द और अर्थ की भूमि को थामे हुए कालबोध को अपने में समाहित किये हुए। किन्तु लघुकथा में तो सम्पूर्ण कथा ही कथ्य बन जाती है, इसे हम दूसरी तरह भी कह सकते हैं कि पूरी कथा ही कथारूप ले लेती है। इसमें व्याप्त अविभाज्यता, परस्पराश्रयण अन्यत्र दुर्लभ है। हम यह भी जानते हैं कि गुलाब, रजनीगंधा तथा कमल में लताएं और फूल अलग अलग रूप में दिखाई देते हैं किन्तु गुलमोहर के पेड में जिस तरह से अलग से फल नहीं लगते वह समय आने पर पूरा का पूरा वृक्ष ही फूल बन जाता है। दोनों के मिलन से जिस तरह से उसमें विलक्षण सौंदर्य पैदा होता है ठीक ऐसे ही ‘लघुकथा’ भी साहित्य की ऐसी विधा है जहाँ पर प्रत्येक शब्द भाव बन जाता है और सम्पूर्ण लघुकथा एक शब्द की तरह संधान करती है और वह ठीक उस तरह से अपने लक्ष्य को बेधती है जिस तरह से परीक्षा के क्षण में अर्जुन को वृक्ष नहीं दिख रहा था, उसे पक्षी भी नहीं दिख रहा था। उसे तो बस प्रत्यंचित बाण की नोक पर पक्षी का केवल नेत्र दिख रहा था। जिस तरह से संधान साधना में पक्षी का तन और वृक्ष का फैलाव लुप्त हो गया था उसी तरह से लघुकथा के उत्तप्त क्षण में पृथक भाव विलुप्त हो जाता है उसमें सभी तत्व और भाव, कथा शिल्प इत्यादि में एकात्म हो जाते हैं। दरअस्ल, लघुकथा वह एटम है जिसमें विस्फोट तत्व सन्निहित होता है। जो उसके पठनयात्रा के अंत में विस्फोट होता है। हम इसे प्रथम दर्शन प्रेम के रूप में भी देख सकते हैं। इसीलिए कह सकते हैं कि लघुकथा को सुंदरी नहीं अपितु त्रिपुरसुंदरी होना चाहिए।
इस सबके बावजूद बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक लघुकथाओं ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। और इस दशक में इसका अस्तित्व स्वीकार किया जाने लगा। यह सर्वस्व लोकप्रिय होने लगी। इसी कालखंड में कई लघुकथा संग्रह प्रकाश में आये और इस विधा पर विचार विमर्श होने लगा। यह पत्र पत्रिकाओं में स्थान पाने लगी। और तो और कई पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांक इसी कालखंड में प्रकाशित हुए जिन्होंने अपनी प्रसिद्धि का परचम भी लहराया। किन्तु अभी तक भी इसका समीक्षाशास्त्र या आलोचना शास्त्र निर्धारित नहीं हो सका इसका खेद है। किन्तु निःसंकोच हम कह सकते हैं कि लघुकथाओं की यात्रा अरबी घोडी पर सवार हो काफी आगे निकल चुकी है। क्योंकि इसकी ‘नाविक के तीर सी’ प्रकृति ही इसे अपनी पहचान दिलवाने के लिए किसी परोपजीवी व पराश्रितता नहीं है वरन् अपनी ही स्वतंत्र और स्वावलंबी साहित्यिक विधा है जो अपने तेवर के साथ परोक्ष और प्रत्यक्ष शल्यक्रिया करती है।
आज हम जिस युग में जीवन जीने को विवश हैं इसे बा*ाार का युग भी कहा जा सकता है जिसे चलते व्यस्तता, शीघ्रता और समय की अल्पता का हर समय सामना करना पडता है। इसी के कारण हमारे सम्मुख नैनो टेक्नोलॉजी ने अपने पंख फैलाये और हमारे जीवन को आसान किया। तो हमें लघुकथाओं को भी नैनो टेक्नालॉजी ने अपने पंख फैलाये और हमारे जीवन को आसान किया। तो हमें लघुकथाओं को भी नैनो टेक्नालॉजी का ही हिस्सा मानना चाहिए। क्योंकि आदमी का मन तो साहित्य के आंगन में ही रमता है। यहीं पर समन्वय, जीवन के समीकरण, समागम और अर्थवत्ता को देखा जा सकता है। यहीं पर हमें संधि और समास के स्पष्ट चिह्न दिखाई देते हैं, विग्रह और विन्यास के नहीं। क्योंकि हम अच्छी तरह से जानते हैं कि साहित्य का लक्ष्य आनंद वितरण का है। इसी आनंद में विनोद, विरेचन, मनोरंजन जैसे भावों को और समाहित कर लेना चाहिए।
लघुकथाओं में जहाँ एक और करुण,श्ाृंगार और शान्त रसों का समावेश होता है वहीं दूसरी और मानव के मन की सम्पूर्ण मनोभूमि को तलाशने की कोशिश की जाती है। निश्चित तौर पर इसमें समाहित जीवन का रस कथा के सभी सौपानों को छूते हुए एक अनूठे सहृदयता, सामाजिकता का बाना तैयार करता है। और मानव मन में व्याप्त साधारणीकरण को सहजता से उजागर करने में कामयाब होता है। यही लघुकथा का कौशल भी है और इसकी ताकत भी। जब हम इसकी व्यापकता पर विचार करते हैं तो यथार्थदृष्टि खोजबीन में भटकने लगती है और हमारे हाथ में आती है राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की विविधता और उनके अन्तर्विरोधों को अपने सम्मुख पाते है जिनसे रिसते तनावों और मार्मिक चित्रों को कुछ ही क्षणों में इनकी द्वन्द्वात्मकता से जूझते हुए उस एकमेव रास्ते पर पहुँचते हैं जहाँ ये रचनाएं अपनी उत्कृष्टता का प्रतिमान लिए खडी न*ार आती हैं।
और यह भी तथ्य सर्वमान्य है कि लघुकथा का आलोचक स्वयं लघुकथाकार को ही होना पडेगा। क्योंकि जिन पत्रिकाओं में लघुकथा को पत्रिका में स्थान भरने के रूप में भी खपाया जाता है। इसे लेकर किसी भी तरह का मुगालता पालने की जरूरत नहीं है कि स्वनामधन्य रचनाकारों के साथ छपी हुई रचना बडी और महान् ही होती है। कई बार इनका प्रकाशन संपादक की विवशता का भी परिणाम हो सकता है क्योंकि संपादक को तो अपनी पत्रिका को सुव्यवस्थित रूप में निकालना है इसके लिए जो भी रचना सम्मुख होती है उन्हीं में से चयन करना होता है। कहने का तात्पर्य बस इतना ही कि लघुकथाकार को बहुत ही बारीक आत्मपरीक्षण करने की जरूरत है तभी वह इसके विकास में महत्ती योगदान दे पायेंगे। इसके लिए आवश्यक है कथ्यों का सही व सटीक चयन, और तथ्यों का रोचक प्रस्तुतीकरण, शब्दों और दृश्यों का स्पष्ट दृश्याकंन और इस सबके बीच सतर्कता बस इतनी कि ली गई विषयवस्तु विश्वसनीय बनी रहे साथ ही कथ्य का इस तरह से संयोजित हो कि वह कभी भी पकड में बाहर न जाने पाये। वह पाठक के मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोडे और उनसे जीवन संघर्ष का सबक मिले। इसके लिए जरूरी है कि रचनाकार को ऐसे पात्रों का चयन करना चाहिए जो अपनी लघुता में ही स्पष्ट छाप छोड जाये। पात्रों के प्रति बेवजह की हमदर्दी से बचना चाहिए। और वह अंत तक आते आते इतनी सारगर्भित हो जाये कि उसकी प्रामाणिकता की पडताल करने की पाठक को जरूरत ही महसूस न हो। निश्चित तौर पर ऐसी लघुकथाएं अपने समय को फंलागते हुए भविष्य की छाती पर अपनी छाप छोडेगी और उनकी अनुगूँजें दूर तक सुनाई देगी।
हम जानते हैं कि समय परिवर्तनशील है और यही परिवर्तनशीलता इनमें नई घटना और नये पात्रों, नई स्थितियों से नई दृष्टि प्रदान करेगी। निश्चित तौर पर लघुकथाओं का भविष्य अपनी लघुता के कारण और विषयों की विविधता के कारण, कल्पना की ऊँची उडान के कारण इसके सम्मुख कभी भी संकट उत्पन्न नहीं होगा। इस सदी और आनेवाली सदियों की गंभीर चुनौतियों के रूप में जिस तरह से हम बाजारवाद, वैश्वीकरण, उदारीकरण, औद्योगिकरण, व्यापारिक उपनिवेशीकरण और इनसे जुडी तकनीकियों को आसन्न संकट के रूप में देख रहे हैं किन्तु इनके बरअक्स आरोपित उत्तर आधुनिकता के विचारों की गाद भी इन्हें बरगलाने में कामयाब नहीं हो पायेगी ऐसा विश्वास है। आने वाले समय में यह निश्चित तौर पर कविता के नजदीक जाकर अपनी विश्वसनीयता को और अधिक वेग से पुष्ट ही करेंगी। ऐसी आशा है। ?
५३/१७, प्रतापनगर, जयपुर ३०२०३३, मो. ९४१४३७३४१८८