निगुर्ण भावों का रूप थी निर्गुनियाँ

डॉ. अन्नपूर्णा शुक्ला


नागर जी की निर्गुनियाँ भावरूपा और अदृश्य में छिपी वह नारीशक्ति है, जिसे नागर जी की लेखनी ने पतित से पावन बना दिया और निर्गुनियाँ में जितने रंग धूमिल पड गये थे परत-दर-परत उनको चमका दिया।
नागर जी की रचना ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ दशकों पहले पढा था, यह उपन्यास पढने के पश्चात निर्गुनियाँ कहीं हमारे अन्तस् की तलहटी में जोंक की तरह चिपक गयी थी और आज भी हर पल हर क्षण निर्गुनियाँ के बहुरंगीय चित्र चलचित्र की भाँति मेरे मानसपटल पर एक के बाद एक अवतरित होने लगते हैं जिसमें हर उस पल की रंग और रेखाएँ साकार हो एक नवीन निर्गुनियाँ के सौन्दर्य का सृजन करती हुई प्रतीत होती हैं। समय का चक्र चलता गया, किन्तु निर्गुनियाँ कहीं अन्तस् में जीवित होती रही बार-बार नागर जी की पैनी दृष्टि और शब्दों के अदम्य थाह और अद्भुत सौन्दर्य के कारण।
मैंने सोचा कि कुछ शब्दों के संयोजन से नागर जी की परम श्रद्धेय निर्गुनियाँ को पुनः एक विशाल फलक पर रंगमय किया जाय। वैसे नागर जी ने स्वयं ही अपने विशाल फलक की चर्चा की है। परन्तु मैं अपने फलक पर निर्गुनियाँ के विविध रूपों के कई रेखांकन अंकित करना चाहती थी। जो सामान्य से सामान्य होकर भी विशेष हो सके। कहने का उद्देश्य मेरा यह है कि नागर जी ने जिस निर्गुनियाँ को सम्पूर्ण रंग, रेखाओं और भाव के द्वारा अंकित किया है, वह वास्तव में ‘लियोनर्डो’ की ‘मोनालीसा’ से और ‘किशनगढ’ की ‘बनी ठनी’ से कहीं भी कम नहीं है। नागर जी की निर्गुनियाँ को शब्दों से निकलकर फलक पर टांग दिया जाये तो वह विश्व फलक की दोनों कालजयी रचना के समतुल्य ही प्रतीत होती है। क्योंकि जितने रंगों और रेखाओं से इन चित्रकारों ने अपनी अपनी रचनाओं को सृजित किया था वह दर्शकों को आनन्दित कर भाव और रंग रेखाओं में समेट लेती हैं किन्तु नागर जी की निर्गुनियाँ तो रंग, रेखाओं के साथ ही साथ शब्दमयी थी। जिस तरह ‘मोनालीसा’ और ‘बनी ठनी’ अद्भुत सौन्दर्य से मण्डित हैं उसी प्रकार निर्गुनियाँ भी अद्भुत सौन्दर्यमयी है। उसका सौन्दर्य तूलिका सम लेखनी से किया है। निर्गुनियाँ ऐसा चरित्र है जो बचपन से गहन संस्कारों के पश्चात, सारी जिन्दगी कीचड का ही हिस्सा रही किन्तु नागर जी की अभेददृष्टि ने उसके अतिन्द्रीय सौन्दर्य को पहचाना और व्याख्यायित किया। इस प्रकार निर्गुनियाँ चिन्तन से परे शब्दों के ताने-बाने से मुक्त हो; अपनी विभिषिकाओं से जूझती हुई सौन्दर्य मुग्धा है। वह चरित्रहीन होते हुए भी चिन्तशील सौन्दर्यमयी कबीर के ताने-बाने और आध्यात्म की रागनी से गुम्फित है। जिस मजबूती से आध्यात्म को कबीर ने जन-जन के अन्तस् की गहनता से मण्डित किया था, उसी ताने-बाने के कुछ अवशेषों से नागर जी ने निर्गुनियाँ की मानसिक बुनावट को संयोजित किया था। ‘लियोनार्डो’ ने जिन परिस्थितियों में जिस सौन्दर्यमुखी मूर्त रूपा को सौन्दर्य से लबालब हो अंकित किया। ‘निहालचन्द’ ने बनीठनी के रूप में साक्षात् सौन्दर्य को मूर्तमान किया, ठीक उसी प्रकार नागर जी ने ईमानदारी से समय की अनगिनत रेखाओं की उलझनों से उलझते हुए तूफानों और बवण्डरों को झेलते हुए किस प्रकार तार-तार हो; रंग और रेखाओं की तासीर से कोसों दूर छटपटाती मछली-सी होने के बावजूद भी जो वेगमय चेतनायुक्त सौन्दर्यमयी सौन्दर्य रूपा को शब्दों की गांठों से कई-कई बार सहेजा है। मेरी दृष्टि में सौन्दर्य प्रवीणता की थाह कुछ अद्भुत है। जो आज के सौन्दर्य के मायाजाल से बिल्कुल अलग यथार्थरूपा है। मैं मेरी दृष्टि से निर्गुनियाँ का चित्र खींचने का अदम्य साहस कर रही हूँ जो मुझे दशकों-दशक से अन्दर ही अन्दर गहरा और गहरा किये जा रहा था। जहां रंग रेखाएँ तो थी ही, शब्दों का जन्जाल भी समाहित था। मैं नागर जी की वेदनामयी सौन्दर्य दृष्टि की अदम्य चाह को किस तरह और किन शब्दों में सम्मान दूं, जबकि मैं तो उनके अन्तस् की थाह से बहुत ही दूर हूँ। उन्होंने स्वयं निर्गुनियाँ को कई-कई बार सहेजा है। उसकी चरित्रहीनता को संवारा हैं साथ ही साथ उस ममतामयी विदुषी को अन्दर ही अन्दर शत्-शत् प्रणाम किया है। -मैंने अपने इस लेख में जानकार ‘मोनालीसा’ और ‘बनीठनी’ को समानता के लिए नहीं वर्णित किया है बल्कि नागर जी की ‘निर्गुनियाँ’ भी उसी श्रेष्ठता की सूची में मेरी दृष्टि से है, यह बात में स्पष्ट करना चाह रही थी। इसलिए विश्व फलक पर इन दो श्रेष्ठ रचनाओं की बात की है।
चाणक्य ने कहा था कि ‘‘शिक्षा ही एक ऐसी चीज है जो सौन्दर्य और यौवन दोनों को मात दे सकते हैं।’’ यह पंक्तियां नागर जी की निर्गुनियाँ पर सर्वथा शत् प्रतिशत खरी उतरती है क्योंकि नागर जी ने तो शब्दों की दृष्टि से निर्गुनियाँ के अन्तस् तक जाकर, भावों से गुनकर उनको अंकित किया है और कहा है कि ‘‘चेहरे पर जमाने की कडी मार से बनी कुछ रेखाएँ अवश्य थी पर झुर्रियां अभी तक नहीं पडी थी। आंखों में चुम्बक था।’’ यह चुम्बक उसकी बचपन की उदात्त शिक्षा का था, यह आंखों की चमक उस बचपन का दृढ आत्मविश्वास था। जिनमें प्रौढ संस्कार समाहित थे। नाना और नानी का गूढ वेदान्त दर्शन, तुलसी की रामचरिमानस एवं अन्य संस्कारयुक्त कहानियां आदि सभी उसकी दृढ इच्छाशक्ति के सूचक थे। अगर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी निर्गुनियाँ का विश्लेषण किया जाये तो और भी स्पष्ट हो जाता है कि बचपन के संस्कार जीवन के अन्तिम पडाव तक सहयात्री बने रहते हैं। फ्रायड, युंग, यडलर सभी ने बचपन की सार्थक स्पष्टता के साथ दमित भावों के साथ अन्य स्थितियों को महत्व दिया है। इसमें ही चाणक्य के शिक्षा भाव की प्रबल सार्थकता भी प्रतीत होता है। क्योंकि निर्गुनियाँ में पतिता की पराकाष्ठा थी, तो उदात्त भावों की भी पराकाष्ठा थी। फिर भी संस्कारी निर्गुनियाँ का अन्तस् अडिग था। वह पतिता थी पर पूज्य थी। वह मल ढोती थी पर माननीय थी। इतनी ही व्याख्या अन्तस् चेतना बिन्दुओं के लिए और उसके उच्च सौन्दर्य को स्थायित्व देने के लिए मील के पत्थर रहेंगे। नागर जी की दूर दृष्टि की बात करें तो कितना स्पष्ट, क्षितिज उनको दिखायी दे रहा था- ‘‘नाच्यो बहुत गोपाल’’ में एक जगह कहा कि ‘‘पंक तो मुझे दिखलाई भी नहीं देता, निर्गुनियाँ जी मेरे सामने पंकजा है। सहस्र दल वाली साक्षात प्रज्ञालक्ष्मी। कैसी दिव्य लग रही थी वह स्त्री! कितनी तेजोमयी।’’
यही निर्गुनियाँ जो अति सगुण की माया से लबालब होते हुए भी निगुर्णा भाव से मण्डित थी। यही नागर जी की लेखनी की सहज विशेषता रही है। तभी वे अति वेदना से चुनकर लाया गया अमूल्य रत्न ही प्रस्तुत करते हैं। यही निगुर्ण भाव, अदृश्य भाव जो पवित्र है, पुनीत है।
इसी भाव को मैंने दशकों दशक से साध रखा था क्योंकि वह नागर जी की तो निर्गुनियाँ थी ही वह हमारे अन्तस् की ‘मोनालीसा’ और ‘बनीठनी’ के समकक्ष भी थी। यह हमारी सोच है यह हमारी अपनी दृष्टि की निर्गुण सार्थकता है। नागर जी के इसी भाव को आधार बनाते हुए, इसी निर्गुण भाव से निर्गुनियाँ की पतित जिन्दगी को पतिता से अलग किया है। मैंने जो अलग किया है उसके मूल में स्वयं निर्गुनियाँ का उदात्त सोच है जिसके कारण वह आज मेरी दृष्टि में मेरे सोच में विश्व फलक पर स्थापित है। दशकों दशक बाद भी मैंने उसे ही गुना है। उसी तरह उसे विश्व पटल पर स्थापित किया है।
नागर जी ने कितनी बार इस निर्गुनियाँ को योगिनी का दर्जा दिया है। नागर जी ने अपने विषय में कहा है कि मैं अपने पात्रों के अन्दर विस्थापित होकर उनके आनन्द, उनकी वेदना को आत्मसात करता हूँ तब उस पर शब्दों का मायाजल बिखेरता हूँ। इसी बात को निर्गुनियाँ ने नागर जी से कुछ इस प्रकार कही थी ‘‘शर्मा जी पराये पैरों की फटी हुई बिवाइयों की पीर अपने भीतर पहचानना चाहते हैं? बडा मुश्किल काम है।’’ किन्तु इस मुश्किल काम को बखूभी निभाया है। नागर जी की इसी भाव प्रवीणता को सदियों पहले चित्रकारों ने सहज आत्मसात किया था। जैसे वानगो, गोगा, निराला आदि।
जिस निर्गुनियाँ की शारीरिक, भौतिक पराकाष्ठा की बात मैं कर रही थी उसको नागर जी ने निर्गुनियाँ के निर्गुण भाव को सहेजते हुए कितने स्पष्ट लहजे में कहा है कि- ‘‘इस चरित्रहीनता नारी के जीवन की चरित्र निष्ठा देखकर मेरे मन में समुद्र की लहरों की तरह अनगिनत वैचारिक तरंगें उठ आती है। मन श्रद्धा से भर जाता है। पर श्रद्धा किस पर करता हूँ मैं? श्रीमती निर्गुनियाँ पर या उनके जन्म के ब्राह्मण होने पर, या उनके अपने हाथ से उजाडे चमन में आई हुई इस चरित्र निष्ठा की ताजा बहार के प्रति मेरी श्रद्धा है। ..... इस स्त्री ने जीवन की घोरतम कुरूपता में अपना स्वरूप देखा और पहचाना है?’’
सदियों से कहा जाता रहा है कि धर्म और कला जब-जब अलग हुये हैं तब-तब अन्तस् वेदना का विस्तार दिखाई दिया है। यही धार्मिक भाव बोध इस निर्गुनियाँ की जीवन शैली पर देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि बचपन के कूट-कूट कर भरे गये धार्मिक भाव बोध मरते दम तक डिगे रहे निर्गुनियाँ के अन्तस् में, यही उसका पतिता भाव पुनीत बोध के रूप में अन्तकाल तक स्थायी रहा।
नागर जी ने इसी उपन्यास में लिखा है कि ‘‘इतना ही नहीं, गोस्वामी तुलसीदास जी की भक्तिमयी काव्य प्रतिभा का सांस्कृतिक सहारा लेकर रामरूप परम सत्य को अपने हित में बसाने के लिए प्रार्थनारत भी हैं अजब है ये तुलसीदास की रामायण जिसमें मेरी पीढी तक के लोगों के बचपन में ही इस तरह सांस्कृतिक छाप छोडी थी! काम क्षुधा से टूटी हुई अपनी जनमपत्री को अपने हाथों बिगाडने वाली इस मदन दीवानी स्त्री में आज के लगभग अडतीस चालीस वर्ष पूर्व भी तुलसीदास की रामायण के संस्कार गहराई से जमे हुए थे।’’
इन्हीं संस्कारों ने निर्गुनियाँ को निर्गुण भाव से भर दिया था। नागर जी ने इसी उपन्यास में लिखा है कि निर्गुनियाँ ‘‘अवसर पा जाती तो कदाचित यह अनोखे हरिभक्त के रूप में भी चमक सकती थी।’’ हमारी दृष्टि में यह चमकी भी, तभी मैंने इस निर्गुनियाँ को विश्वफलक पर ‘मोनालीसा’, ‘बनीठनी’ के समकक्ष स्थापित किया है। नागर जी ने निर्गुनियाँ के निर्गुण भाव को पहचाना और यह पवित्र अदृश्य, अमूर्त नाम दिया। निर्गुनियाँ के अन्तस् में बसे चेतना के दो रूपों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि ‘‘मैं समझता हूँ कि मनुष्य की चेतना के दो रूप होते हैं- एक सुप्त, दूसरा जाग्रत। जाग्रत व्यक्तित्व में कभी-कभी अजब खेल दिखलाई देता है। उपर से सधा बांध परम पवित्र शुद्ध आचरण युक्त प्राणी एक दिन सहसा कोई ऐसा कार्य कर बैठता है जो उसके लिए नितान्त अकल्पनीय, अकरणीय लगता हो! तब कौनसी कल्पना सुप्त मानी जायेगी और कौनसी जाग्रत? मैं समझता हूँ कि सोती जागती भावात्मक चेतना मस्तिष्क के ज्ञान केन्द्र के कपाट खुलने तक हर हालत में लंगडाकर ही चलती है। चेतना का जाग्रत तत्व नीर-क्षीर विवेकधारी ज्ञान ही जब वह जागता है तो चेतना भी सजग होती है। अडतीस चालीस बरस पहले निर्गुनियाँ का अविवेकी मान भी जाग्रत-सुप्त अवस्था में अपने जी का नरक लिखने से पहले गोसाई जी के शब्दों में हंसिनी बनकर नीर-क्षीर विवेक के लिए पुकारता हैं शायद इसी प्रकार के आग्रह से ही उसे यह वर्तमान व्यक्तित्व मिला है पतन से उत्थान, प्रसुप्ति में जागरण इसी को कहते हैं। ‘‘वाह! री निर्गुनियाँ तुझे हम ‘वली’ समझते जो न वादाख्वार होती!’’ वह वली तो थी और आज भी हमारे अन्तस् में समाहित है। नागर जी की नवीन रचना के रूप में। यहां यह भी सिद्ध हो जाता है कि धर्म ही आध्यत्मिक सौन्दर्य का आधार बिन्दु है। इसी आधार बिन्दु की सार्थकता को और स्पष्टता निर्गुनियाँ के इन शब्दों से मिलती है- ‘‘चिन्ताओं से जकडकर जो एक आठों पहर की ठीस मन में उठती है वह बिना एक-एक खूंटे से बंधे गहराती नहीं। टीस जब गाढी हो जाती है तो अमरित बन जाती है।’’ यह अमृत ही धार्मिक संस्कारों का सार तत्व है। वेदना की थाह न पाने वाली घिनौनी पीडा निर्गुनियाँ के अन्तस् में व्याप्त थी। उसका अपना दर्शन बिल्कुल अलग ही था। नागर जी लिखते हैं- ‘‘अद्भुत लगता है। मुझे आफ मुख से संस्कृत के श्लोक, सूर, तुलसी, नानक आदि संतों की पंक्तियां और उसके साथ ही साथ बेखटक, बेझिझक मुंह से निकलने वाली अश्लील गालियाँ। .....आप ने बडी उम्दा बात कही ‘‘बाबूजी! इस बात में चमत्कार ही चमत्कार भरे हैं। अरे कमल और कीचड साथ ही साथ तो रहते हैं। सवेरा रात के ही गरभ से पैदा होता है और रात सवेरे के गरभ से। बोलिये, भला किसको किसकी माँ कहें। और किसको किसका बेटा?’’ इस तर्क युक्त बातों से निर्गुनियाँ के बचपन के अन्तस् में गहरे पैठे धार्मिक संस्कार ही थे। जिन्होंने नागर जी के ‘‘नाच्यो बहुत गोपाल’’ की सशक्त काव्यमयी योगिनी को फलक तक पहुँचाने का कार्य किया।
निर्गुनियाँ मोहनमय थी वह भाव विभोर हो कहती थी ‘‘अब के नाच्यौ बहुत गोपाल।’’ नागर जी ने अपनी इस रचना में सम्मानपूर्वक निर्गुनियाँ के निर्गुण भाव को स्थान दिया है। यही निर्गुण भाव अन्त में नागर जी से अपनी व्यथा कथा एक डायरी के माध्यम से कहकर मूक हो जाती है और मुझे फिर याद आ जाती है। ‘मुक्तिबोध’ की रचना ‘‘ब्रह्म राक्षस’’ वह इस संदर्भ में कि निर्गुनियाँ ने अपने अन्तस् में कितनी वेदना कितना अपमान, कितनी जिल्लत, कितना ज्ञान, सभी कुछ अपने अहम् के साथ नागर जी को बोलकर समर्पित किया। तब वो मुक्त हुई। उसके अन्दर के पाण्डित्य को अगर किसी ने सम्मानपूर्वक सहेजा था तो वह नागर जी ने। उन्होंने उसके हीन बोध की अपेक्षा उसके पाण्डित्य को समझा और अहम् को सम्मान दिया। तब वह मूक्त हो पायी। मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह और हमारे भी अन्तस् की दशकों दशक की पली बढी निर्गुनियाँ विश्वपटल पर मेरी नजरों में ‘मोनालीसा’ और ‘बनीठनी’ के समकक्ष स्थापित हुई।
अन्त में मैं यह कहना चाहूँगी कि दशकों दशक पहले की निर्गुनियाँ आज भी हमारे समाज में विद्यमान है, बल्कि पहले से ज्यादा। बस रूप बदले हैं, वेदनाएँ आज और भी प्रचुर मात्रा में समाहित हैं। जबकि ‘मोनालीसा’ और ‘बनीठनी’ को रचने वाले विश्व प्रसिद्ध चित्रकार थे। ना आज वैसा चित्रकार पैदा हुआ, न ही ‘मोनालीसा’ और ‘बनीठनी’ जैसी कृतियाँ। हर दिन हजारों निर्गुनियाँ पैदा हो रही हैं, बस अन्तर वेदनाओं के रूपाकारों में। तभी चिरकल से चली आ रही निर्गुनियाँ को ‘मोनालीसा’ और ‘बनीठनी’ के पुनीत सौन्दर्य के समतुल्य स्थापित करना हमारा भाव रहा है। जिसमें नवीन रंगों का संचार करना है और इस नवीन विशाल फलक को साधना है। इसलिए मैंने मोनालीसा, बनीठनी और निर्गुनियाँ को एक फलक पर टांगने की कोशिश की है जबकि निर्गुनियाँ की धारा ही अलग है, पर नागर जी इतना सशक्त चित्रण किया है कि मैंने सहर्ष दोनों के साथ निर्गुनियाँ को स्थापित किया। यह स्थापना निर्गुनियाँ के भाव के अन्तस् में हिलकोरे लेती दिव्य सौन्दर्य की लहरें बार-बार मुझे उसके उस सौन्दर्य तक पहुंचाती थी जिसके वर्णन के लिए ना शब्द हैं, ना मूर्त भी। इसलिये नागर जी ने निर्गुण भाव से उन्हें सुशोभित किया है। इसी भाव के कारण मैंने उनके पतित भावावेग से पुनीत सौन्दर्य को कई रंग और रेखाओं के साथ विश्वफलक पर स्थापित किया। किन्तु उसको समझना स्वयं में निर्गुण भाव को लाना है। तभी नागर जी की निर्गुनियाँ के निर्गुण सौन्दर्य को आत्मा की तलहटी पर अनुभव किया जा सकता है।
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