फैन्टेसी के महान कवि मुक्तिबोध

जितेन्द्र निर्मोही


यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो साहित्यकार के जीवन की घटनाओं का अक्स भी जहाँ से वो होकर गुजरता होता है मुक्तिबोध हमारे बीच ऐसे समय आते हैं जब छायावाद समाप्ति की ओर था और प्रगतिवाद कुछ कहना चाह रहा था। ऐसे समय में मुक्तिबोध की कविताएँ आत्मगत घटनाओं से समावेशित हो वस्तुपरकता की ओर शीघ्रता से बढती हैं। काव्य जगत उनकी कविताओं के प्रागट््य से विस्मित हो जाता है। वो ऐसी कविताएँ सामने पाता है जिनमें भूत-प्रेत, ब्राह्मराक्षस, अंधेरा ताल, भूत की हवेली, चाँद का मुँह टेडा आदि है। उनकी कविताएँ समीक्षा और आलोचना में विस्तार पाती है। उनकी कविताओं मे वस्तुपरकता व विविधाकारों के स्त्रोत भरे पडे हैं। ‘‘अज्ञेय’’ की कविताओं में बौद्धिकता है तो उनकी कविताओं में अप्रतिम फैन्टेसी, उनकी कविता का सिरा कहाँ खत्म होगा ज्ञात नहीं। वे व्यापक, अनुभव, रचनात्मक चिंतन और एक विचित्र जीवन दृष्टि के साहित्यकार थे। उन्होंने हिन्दी कविता को एक नई दृष्टि दी। उनके द्वारा माक्र्सवाद को एक अलग पहचान दी गई। अगर उनका जीवन संघर्ष सहज होता तो हमें एक युग युगीन संदर्भ कहां दिखाई देता। वो जानते हैं ढाँचागत व्यवस्थाएं तोडना संभव नहीं हैः-
‘‘कविता में कहने की
आदत नहीं पर कह दूं
वर्तमान समय चल नहीं सकता
पूँजी से जुडा हुआ हदय बदल नहीं सकता’’
पर वो पूँजीवादी परम्परा को तोडने को प्राणपण चेष्टा कहते हैं। वे चाहते हैः-
‘‘मेरे सभ्यनगरों में
सभी मानव
सुखी सदा व शोषण मुक्त कब होंगे।’’
बहुत से बुद्धिजीवी कहते है कि वो ‘तार सप्तक’ मे न होते तो उनकी पहचान न बन पाती, परन्तु ऐसा न था समय ने उन्हें पहचान लिया था। डा. नामवर सिंह का कथन है ‘‘मुक्तिबोध उन कवियों में से नहीं जो अपने युग के सफल कवि कहलाये जाए, बल्कि वो सार्थक कवि कहलाने योग्य हैं’’।
जीवन की यायावरी व मुफलिसी ने उन्हें सबसे अलग खडा कर दिया। गजानन माधव मुक्तिबोध १३ नवम्बर १९१७ को मध्यप्रदेश के श्योपुर में जन्मते हैं, उनका लेखन १९३५ मे माधव कॉलेज उज्जैन से प्रारम्भ होता है और मृत्यु पर्यन्त ११ सितम्बर १९६४ तक चलता है। इतने कम समय में वो जय शंकर प्रसाद की तरह साहित्य में अपनी एक अलग पहचान खडी करते हैं। सच कहा जाए तो उनके जीवन संघर्ष ने ही उन्हें सबसे अलग बनाया। उनका जीवन देखा जाए तो सन् १९४२ में वे शुजालपुर छोडकर उज्जैन लौट आये १९४५ तक यही रहे। यहाँ उन्होंने ‘‘मध्य भारत प्रगतिशील संघ’’ की स्थापना की, सन् १९४५ में मुक्तिबोध ‘‘हंस’’ के सम्पादकीय विभाग में शामिल हो गये, आर्थिक-विपन्नता में काशी प्रवास पूर्ण कर कलकत्ता चले गये। वहां भी बात न बनी और १९४६-१९४७ मे जबलपुर लौटे। वहां के बाद १९४९ से इलाहाबाद की सैर कर आये। १९५४ में नागपुर, वहां से १९४९ से एम.ए. करने के बाद सन् १९५८ में राजनाँद गांव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक हो गये। उन्हें १७ फरवरी १९६४ को भीषण पक्षाघात का आघात लगा जिसने ११ सितम्बर १९६४ की रात मुक्तिबोध को हमसे छीन लिया। कहा जाता है मुक्तिबोध अत्यंत भावुक किस्म के व्यक्ति थे इस संदर्भ में देखिए उनकी कविता का अंशः
गंध के सुकोमल मेघों में डूबकर
प्रत्येक दृश्य से करता हूँ पहचान
प्रत्येक पुरुष से पूछता हूँ हालचाल
प्रत्येक लता से रखता हूँ सम्बन्ध
उनकी कविताओं में खौफनाक, पूंजीपतियों की बिरादरी का डर है वो इसे कहीं न कहीं एक समूह के रूप में देखने लगते हैंः-
विचित्र प्रोसेशन
गंभीर क्विक मार्च
कलाबत्तू वाला काला जरीदार ड्रेस पहने
चमकदार बैण्ड दल
अस्थिरूप, यकृतस्वरूप, उदर आकृति
आंतों के जालों से बाजे वे दमकते हैं भयंकर
गंभीर गीत स्वप्न तरंगें
उभारते रहते
ध्वनियों के आवर्त मंडराते पंथ पर
बैण्ड के लोगों के चेहरे
मिलते हैं मेरे देखे हुओं से
लगते हैं उनके कई प्रतिष्ठित पत्रकार
इसी नगर के।
वो जाने किस किस लोक में रहते हैं। वह रक्तालोक भी है अंधेरे में उनकी फेण्टेसी में कई चित्र उभरते हैं, गुजरते जाते हैं, जैसे कोई भंयकर सपना आता हो और चला जाता हो। वो शब्द चित्र कहां से खडे करते हैं पता नहीं चल पाता पर उनकी कविताओं में अक्सर देखे हुए लोक ही होते हैं।
‘‘पहचानता हूँ
बाहर जो रहता है
यह वही व्यक्ति है, जी हाँ
जो मुझे तिलस्मी खोह
में दिखा था’’
वो कहते हैं बचपन में मेरा एक दोस्त मुझे प्राईमरी स्कूल मे लौटते हुए एक खंडहर मे पास ‘‘ब्रह्म राक्षस’’ दिखाने की बात करता था, मैं बहुत डर जाया करता। शायद उनके बाल मनोविज्ञान में भी ऐसा ही कुछ रहा होगा, जिसे उन्होंने परिपक्व उम्र होने पर ‘‘ब्रह्म राक्षस’’ को इसी रूप देकर एक नई व्याख्या दीः-
‘‘सुमेरी बेबिलोनी जनक कथाओं से
मुधर वैदिक ऋचाओं तक
व तब से आज तक के सूत्र
छन्दस मंत्र, थियोरम
सब प्रमेयों तक
कि माक्र्स, ऐंजेलो, रसेल टाएन्बी
कि हिडेग्गार व स्पेंगलर, गांधी भी
सभी के सिद्ध अंतों का
नया व्याख्यान करता वह’’
यही कारण है कि मुक्तिबोध ब्रह्मराक्षस शिष्य बनना चाहते हैं। सच कहा जाए तो ये कविताएं रहस्यवाद के आगे की यात्रा है। ‘‘भूल गलती’’ हमारी ज्ञान प्रक्रिया का सत्य है। सल्तनतें हमेशा से अपना जिंदाबाद कहाती आयी है कोई जिंदा रहे न रहे उससे उन्हें लेना देना नहीं होता, वो चाहती रही है जनता उनके सामने बेजुबान रहे, उन्हें बेजुबान कराती रही है सल्तनों की दहशतः-
‘‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक
चिंतक, शिल्पकार नर्तक सब चुप हैं’’
उसका कारण है शासक जो सामने सत्ता पर हैः-
‘‘भूल गलती है
आज बैठी है जिरह बस्तर पहनकर
तश्त पर दिल के
चमकते है खडे हथियार उसके दूर तक
आँखें चिलकती हैं नुकीली तेज पत्थर सी
खडी हैं सिर झुकाए
सब कतारें
बेजुबां बेबस सलाम में
अनगिनत खंभों मेंहराबों में
दरबार ए आम में’’ (भूल गलती)
काव्य संग्रह के नाम पर मुक्तिबोध के दो काव्य संग्रह है ‘‘चाँद का मुँह टेढा है’’ (१९६४) व ‘‘भूरी भूरी खाक धूल’’ (१९८०) जो उनकी मृत्यु के बाद में प्रकाशित काव्य संकलन ‘‘भूरी भूरी खाक धूल’’ में प्रथम संकलन से पूर्व समय की कविताएं प्रकाशित हैं। उनकी प्रसिद्धि कविताएं अंधेरे में, ब्रह्म राक्षस, पूंजीवाद समाजवाद के प्रति, भूल गलती, दिमागी गुछांधकार हैं। उनकी गंध रचना ‘‘भारत इतिहास व संस्कृति’’ (१९६२) है जिस पर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया। ‘‘कामायनी’’ पर उन्होंने युगीन समीक्षा लिखी जो ‘‘कामायनी’’ एक पुनर्विचार के नाम से चलित हुई। अपने पहले प्रकाशन से ही वो रातों रात चर्चित हो गये। उनकी तरह की काव्य रचना के अनेक कवियों ने प्रयास किये पर वो सफल न हो सके। शमशेर बहादुर सिंह ने सच ही कहा है उनका काव्य शिल्प एक वास्तुकार जैसा काव्य शिल्प था।
उन्हें विद्वानों ने तीव्र इन्द्रिय बोध वाला कवि भयानक खबरों का कवि और फैन्टेसी के कवि की उपमाएं दी। उन्होंने कला के तीन रूण स्वीकार किये हैं (१) अनुभव का फैंटेसी में रूपान्तरण (२) फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया (३) जीवन का उत्कृष्ट तीव्र अनुभव श्रण।
उनकी कविताओं में विचलन की तीव्रता है उन्हें कहीं भी नम्रता, विनय शीलता और मानवीयता कहीं भी दिखाई नहीं देती। उन्होंने जीवन में विद्वेषतायें देखी हैंः-
संस्कृति के कुहरीले धुँए से भूतों के
गोल गोल मटकों से चेहरों ने
नम्रता के छिछियाते स्वाँग में
दुनियाँ को हाथ जोड कहना शुरू किया
बुद्ध के स्तूप में
मानव के सपने गड गये
गाडे गए।
ईसा के पंख सब झड गये
सत्य की
देवदासी चोलियाँ उतारी गयीं
उघारी गयी
सपनों की आते सब
चीरी गयी, फाडी गयी
बाकी सब खोल है
जिंदगी में झोल है (चाँद का मुँह टेडा है)
इस प्रकार उनका काव्य जमीनी हकीकत है, दिखावटी नहीं। मुक्तिबोध की कविता में नाट््यात्मक है, वह संगीत की विरोधी है। यद्यपि उनकी बहुत सी कविताएं छंदबद्ध दृष्टिगत होती हैं। उनकी कविताओं में घटनाओं की बहुलता है और कहीं कहीं वो विशिष्ट हो जाती है। उनकी काव्यानुभूति ही उन्हें स्वतः बिम्ब प्रतीक का विधान तदानुरूप देती है। वे बेहद फैंटेसी के कवि ही नहीं महान् कवि थे जो कविता में एक अनुपम शि5ल्प विधान की प्रस्तुति देते हैं। ?
बी-४२२, आर. के. पुरम, कोटा (राज.)-३२४०१०
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