क्या है ‘हरि-रस’?

स्वामी खुशालनाथ ‘धीर’


‘हरि रस’ क्या है? एक जाति विशेष वर्ग व कुछ साहित्य में रुचि रखने वाले लोगों को ही पता है कि ‘हरि रस’ क्या है। यह एक कटु सत्य है कि अधिकांश ने तो केवल इसका नाम सुना है, देखा तक नहीं? जिन लोगों के घरों में यह है वहां भी लाल कपडे में बंधा, पूजा स्थान पर रखा है। वे भला इसकी महिमा क्या जाने। हरि-रस बाडमेर जिले के भादेरस गांव के चारणवंशीय संत महाकवि ईसरदास कृत एक ईश आराधना का धार्मिक ग्रंथ है। ग्रंथ के पद (३५६) में इसका उल्लेख दोहा छंद में इस प्रकार है- ‘हरि रस’ हरि रस हेक है, अनरस अन रस मान। बिन हरि रस हरि भगत विन जनम वृथा नर जान।।’’
हरि रस डिंगल का राजस्थानी भाषा का एक अनुपम काव्य ग्रंथ है। इसमें विभिन्न राजस्थानी छंदों में रचना है। इसका गुजराती व राजस्थानी में अनुवाद हुआ है। विद्वानों ने टीका, भाष्य, भावानुवाद भी अपनी श्रद्धा के साथ किया है। श्रीमद्भगवद् गीता (६ः४७) में भी कहा है कि ‘‘श्रद्धावान् भजते यो मां स में युक्तमो मनः’’।
संत शिरोमणि महाकवि ईसरदास कृत गं*थ ‘हरि-रस’ पर अनेकानेक विद्वानों ने अध्ययन-मनन किया है। उनकी स्वतंत्र पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं।
राजस्थानी भाषा के विविध छंदों व डिंगल काव्य पाठ की ध्वनियों का ज्ञान नहीं होने से बहुत से लोग चाहकर भी ‘‘हरि रस’’ ग्रंथ का सदुपयोग नहीं कर पाते हैं। वयोवृद्ध राजस्थानी भाषा के डिंगल व अन्य भाषा (हिन्दी-गुजराती) के जानकार कवि-लेखक महादान सिंह बारहठ, भादरेश (बाडमेर) ने इस पीडा को समझा है। फलतः इन्होंने मूल ग्रंथ ‘‘हरिरस’’ का शुद्धिकरण के साथ हिन्दी भाषा में अनुवाद किया है। यह पुस्तक ‘‘हरि-रस’’ नाम से ही राजस्थानी ग्रंथाकार जोधपुर ने (ई. सन् २०१७) प्रकाशित की है।
मैंने इस अनुदित पुस्तक को पढा तो मुझे ‘‘हरि-रस’’ की सहज अनुभूति हुई। अनुवादक ने श्रद्धायुक्त भाव (गीता १२ः२०) से ग्रंथ का अनुशीलन कर हिन्दी में अनुवाद पद्यमय न करके गद्य-भावानुवाद किया है। इस भावव्याख्या से पाठक सहज सरल भाषा में कृति को हृदयंगम कर लेता है। इस दृष्टि से विवेच्य पुस्तक अनुवाद नहीं है। यह मूल ग्रंथ का भावानुवाद है, अर्थात् छंद ‘हरि रस’ का सरलार्थ है। विश्वग्रंथ श्रीमद्भगवद् गीता (मूल संस्कृत) के गीताप्रेस, गोरखपुर की पुस्तक भी हिन्दी में अनुवाद नहीं है। वह मूल श्लोक के हिन्दी भावसरलार्थ सहित है, अतः सर्वप्रिय है। सहज है। राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर का विवेच्य प्रकाशन इसी लकीर का अनुगामी है। यहां यह भी विचारणीय है कि हरि रस का सर्वप्रथम सिन्धी भाषा में मिठी चेलार (अब पाकिस्तान में) हुआ था। तब से लेकर अब तक ईसरदास के मूल ग्रंथ ‘‘हरिरस’’ में न जाने कितने शुद्धिकरण हुए हैं। हो सकता है। इसमें भी कुछ क्षेपक जुड गये हों। यह गंभीर शोध का कार्य है जो कोई विज्ञ भाविक विद्वान ही बीडा उठा सकता है। मारवाड में भक्त संत कवियों की निर्बाध श्ाृंखला रही है। राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा २०-२१ फरवरी १९८२ में आयोजित आंचलिक राजस्थानी समारोह, सिरोही में सीताराम लालस (जोधपुर) ने कहा था कि ‘‘अपने मारवाड (राजस्थान) में भी ऐसे सद्पुरुष हुए हैं उनमें से चार शीर्षस्थ सद्पुरुषों बांकीदासजी, ईसरदासजी, हीरानाथजी, डूंगरपुरीजी, बांकीदास जी में से एक स्वामी हीरानाथ है, जिन्हें मैं मालानी में नाथ-पंथ का हीरा कहना गर्व की बात समझता हूँ।’’
महाकवि ईसरदास रचित ग्रंथ ‘हरि रस’ (मूल राजस्थानी) के अध्ययन से यह बात खुल कर सामने आती है कि ईसरदास नाथ-पंथ से अनुप्रणित रहे थे। यथा-छप्पय (३३६) में ईसरदास उवाच है कि-
‘‘आदि पुरुष अदिस, मात विण-तात उपन्नो,
धात जान धन बिना आप आपेज उपन्नो।
इल रचण त्रिगुण शिव सक्ति अज, अलख निरंजण आप हुव।
घणा घणा घाट भांजणा घडण, आदि पुरुष आदेश तुव।।’’ ३३६
(और)
आदेस करां इण नामनाँ, जो जोनौ संकट हरै।
आदेस अहो निस अलख ने, कर जोड ईसर करै।।३३७
(और) मालानी के नाथ संतशिरोमणि स्वामी हीरानाथ (वि.सं. १९३२ से २०१५) भक्ति रस के ग्रंथ ‘‘हीरानाथ ग्रंथावली’’ में (पृ. १०९) कहते हैं कि-
‘‘उंनमुंन साजै सब घट राजै, न्हीं जुग वैर सनेहा।
हीरानाथ कहै कर जोडी, मोय जिनको आदेश।।’’
इसी भांति गुरुग्रन्थ साहिब, महला २, पृष्ठ ४६९ में सिक्खों के धर्मगुरु नानक कहते हैं-
‘‘आई पंथ सगल जमाति माने जीते।
जुग जीते आदेश तिसे आदेसु।।’’
यह आदेश क्या है? यह नाथ पंथ का वंदन उद््बोधन (परस्पर प्रणाम अभिवादन) है। आदेश शब्द घोष नाथ-पंथ का परिचायक है। ‘आदेश’ परमात्म स्वरूप का प्रतिपादन करने वाली गुरु गोरखनाथ की सद््वाणी है। गुरु गोरखनाथ प्रणीत’’ सिद्ध सिद्धान्त पद्धति’’ में (मूल संस्कृत) उल्लेख है कि-
‘‘आत्मेति परमाज्मेति जीवात्मेति विचारेण।
त्रयाणामैक्य संभूतिरा देश इति कीर्तितः।।’’
आदेश इति सद्वाणी सर्व द्वन्द क्षयापहाम्।
यो योगिनं प्रति वंदेत सयात्यात्मान मैश्वरम्।।’’
विवेच्य अनुवाद कृति ‘‘हरि रस’’ के लेखक संकलन, व्याख्याकर्ता महादान सिंह बारहठ, भाददेश ने अपनी पूर्व प्रकाशित पुस्तक महाकवि ईसरदास बारहठ की प्रामाणिक जीवनी (प्र. ई. सन् २०१५) में भी ईसरदास के संदर्भ में- गुरु बालक नाथ के दर्शन व सँवाद (पृ. २२) का वर्णन किया है।
जहां तक मूल ग्रंथ ‘‘हरि रस’’ की बात है, वहां यह उल्लेखनीय है कि इसकी रचना में ईसरदास को लगभग ४-५ साल का समय लगा होगा। द्वारिका में गोमती नदी के तट पर वि. सं. १५९१ में ईसरदास ने ग्रंथ ‘‘हरि रस’’ का लेखन कार्य पूर्ण किया जाने हेतु मंगलाचरण के इस दोहे से रचना का श्रीगणेश किया-
पहिलो नाम प्रमेशरो, जिण जग मंडियों जोय।
नर मूरख समझे नहीं, हरि करै सो होय।।
गं*थ में कुल ३६० छंद है। जिसका इति छंद ३६० इस प्रकार है-
तनक भनक हरिरस तणी, कंठ प्राण सुनि कान।
महा पाप सह मोच ही, आवे जनम न आन।। ३६० श्रीमद्भगवद् गीता के श्ा*ोक (८ः५) के श्री कृष्ण उवाच को ही ईसरदास ने हरि रस के उक्त दोहे में सदत्त कही है। गीता कथन है।
‘‘अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेकरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय।।
महादानसिंह बारहठ ने भी यथोक्त अनुवाद कृति ‘‘हरि रस’’ में दोहा छंद में इसकी इतिवृतात्मक बात
कही है-
‘‘कवि ईसर हरि रस कियो, छंद तीन सौ साठ।
महा दुष्ट पावै मुगति, जो नित कीजै पाठ।।
एक इतर उक्ति में कवि कहता है-
हरि हर हीरानाथजी, ईसर ईसर दास।
स्मृतगामी संत जन, ‘मधु’ घट करै सुवास।। ?
संदर्भ-
१. महाकवि ईसरदास बारहठ, हरिरस पृ. ३५६
२. श्रीमद्भगवद्गीता ६ः४७/१२ः२०/८ः५
३. महादानसिंह बारहठ ‘मधु’ भाषा टीका-हरिरस
४. सीताराम लालस, जोधपुर, सिरोही २०-२१, फरवरी १९८२
५. हीरानाथ ग्रंथावली पृ. १०९
६. गुरुग्रंथ साहिब
७. सिद्ध सिद्धान्त पद्धति
८. महाकवि ईसरदास की प्रामाणिक जीवनी

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