प्रेमचंद के कथा साहित्य में ‘देशप्रेम’

पवनेश ठकुराठी ‘पवन‘


प्रेमचन्द हिन्दी कथा साहित्य में युग-सृष्टा कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। हिन्दी उपन्यास और साहित्य को तिलिस्मी और जासूसी कथा-कहानी के तिलिस्म से बाहर निकालकर उसे जीवन के यथार्थ से जोडने वाले वे हिन्दी के प्रथम कथाकार हैं। उन्होंने भारतीय समाज को जिस रूप में देखा-परखा, उसका यथावत् चित्रण अपने कथा साहित्य में किया और ऐसा करने में उन्हें पूर्ण सफ लता हासिल हुई, यही कारण है कि समीक्षकों ने उन्हें कथासम्राट कि उपाधि से विभूषित किया। 31 जुलाई, 188॰ को बनारस के पांडेपुर गांव के एक छोटे से पुरवा ’लमही’ में जन्मे प्रेमचंद की कथा यात्रा वर्ष 19॰3-॰5 में प्रकाशित ’असरारे मआबिद उर्फ देवस्थान रहस्य’ उपन्यास से शुरू होकर उनके जीवन के अंतिम पडाव; 8 अक्टूबर, 1936 तक चलती है। प्रेमचंद ने कुल 15 उपन्यास और 3॰1 कहानियां लिखकर हिंदी साहित्य को अपनी सृजनशीलता से समृद्ध किया।
प्रेमचंद के ’प्रेमा’ ’वरदान’, ’सेवासदन’, ’रंगभूमि’, ’कायाकल्प’, ’प्रतिज्ञा’, ’गबन’, ’कर्मभूमि’, आदि उपन्यासों तथा ’सांसारिक प्रेम और देशप्रेम’ ’यही मेरी मातृभूमि है।’ ’वियोग और मिलाप’, ’बौडम’ ,’धिक्कार’, ’जुलूस’, ’पत्नी से पति’, ’समर-यात्रा’, ’आहुति’, ’जेल’, ’तावान’, आदि कहानियों में राजनीति के देशप्रेम आयाम का उद्घाटन हुआ है।
इनके ’प्रेमा’ उपन्यास में अमृतराय के माध्यम से देश व जाति प्रेम की अभिव्यंजना हुई है, क्योंकि इस उपन्यास में अमृतराय स्वयं को जाति पर न्यौछावर करने की प्रतिज्ञा करते हुए चित्रित हुए है; ‘‘न्यौछावर कर दूंगा। तन, मन, धन सब अपनी गिरी हुई जाति की उन्नति के निमित्त अर्पण कर दूंगा। मैं सब जानता हूं कि मैं कोई उच्च पदवी नहीं रखता हूं। मेरी जायदाद भी कुछ अधिक नहीं है। मगर मैं अपनी सारी जमा-जथा अपने देश के उद्धार के लिए लगा दूंगा। इतना ही नहीं वह वे देश-प्रेम की खातिर अपने वैयक्तिक प्रेम की कुर्बानी दे डालते हैं ‘‘मगर अब प्रेमा की मोहिनी सूरत मुझ पर जादू नहीं चला सकती। जो देश और जाति के नाम पर बिक गया, उसके दिल में कोई दूसरी चीज जगह नहीं पा सकती। देखिये यह वह फ ोटो है जो अब तक बराबर मेरे सीने से लगा रहता था। आज इससे भी अलग होता है, यह कहते-कहते उन्होंने तसवीर जेब से निकाली और पुरजे-पुरजे कर डाले।’’२ इनके ‘वरदान’ उपन्यास में प्रतापचन्द्र एक देशप्रेमी चरित्र के रूप में सामने आते हैं, जो संन्यास लेने के बाद बालाजी बनते हैं और समाजसेवा का कार्य करते हैं। इनके ‘सेवासदन’ उपन्यास के बाबू विट्ठलदास और पद्मसिंह शर्मा जी भी देशप्रेमी और समाजसेवी चरित्र हैं। बाबू विट्ठलदास की कर्मठता और देशप्रेम को व्यक्त करता एक उदाहरण दृष्टव्य है। ‘‘विट्ठलदास जाति-सेवा की धुन में अपने सुख-स्वार्थ को भूल गये थे। कहीं अनाथालय के लिए चंदा जमा करते फि रते हैं, कही दीन विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति का प्रबंध करने में दत्तचित्त हैं। जब जाति पर कोई संकट आ पडता, उनका देशप्रेम उमड पडता था। अकाल के समय आटे का गट्ठर लादे हुए गांव-गांव घूमते थे। हैजे और प्लेग के दिनों उनका आत्मसर्मपण और विलक्षण त्याग देखकर आश्चर्य होता था। अभी पिछले दिनों जब गंगा में बाढ आ गयी थी, तो महीनों घर की सूरत नहीं देखी थी। अपनी सारी सम्पत्ति देश पर अर्पण कर चुके थे, पर इसका तनिक भी अभिमान न था।’’३ इस उपन्यास के पद्मसिंह शर्मा के जाति प्रेमी और समाजसेवी चरित्र होने का पता जिन दो बातों से चलता है, पहली यह कि वे सुमन सहित अन्य वेश्याओं के उत्थान में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, दूसरी यह कि वे अपने भाई मदनसिंह को सदनसिंह के विवाह के अवसर पर पांच सौ रुपये के कंबल लेकर अमोला के दीन-दरिद्रों में बांट देने का सुझाव देते हैं। इस उपन्यास में ’संगीत-पाठशाला’ के गायनाचार्य का गीत ’ दयामती भारत को अपनाओ’४ भी उनके देशप्रेम को व्यक्त करता है।
इनके ’प्रेमाश्रम’ उपन्यास के प्रेमशंकर भी एक जातिसेवी और देशप्रेमी चरित्र है, जो अपना संपूर्ण जीवन किसानों के उत्थान में व्यतीत कर देते हैं। इनके ’रंगभूमि उपन्यास में सूरदास, विनयसिंह, रानी जान्हवी, कुंवर भरतसिंह, इंद्रदत्त आदि चरित्रों के माध्यम से देशप्रेम व्यक्त हुआ है। सूरदास पांडेपुर गांव के किसानों की खातिर अपनी जमीन जॉन सेवक को बेचने से न सिर्फ मना करता है, बल्कि उस जमीन की रक्षा हेतु आजीवन संर्घष करता है। इसी तरह इंद्रदत्त और विनयसिंह भी जनता के हितों की रक्षा हेतु अपने प्राण त्याग देते हैं। इस उपन्यास में विनयसिंह को देशप्रेमी चरित्र के रूप में विकसित करने में उसकी माता रानी जान्हवी का हाथ होता है। वह एक बार सोफिया से कहती हैः ‘‘मैं विनय को ऐसा मनुष्य बनाना चाहती हूं, जिस पर समाज को गर्व हो, जिसके हृदय में अनुराग हो, साहस हो, धैर्य हो, जो संकटों के सामने मुंह न मोडे, जो सेवा हेतु सिर को सदैव हथेली पर लिए रहे, जिसमें विलसिता का लेश भी ना हो, जो धर्म पर अपने को मिटा दे। मैं उसे सपूत बेटा, निश्छल मित्र और निःस्वार्थ सेवक बनाना चाहती हूं।’’ इनके इस उपन्यास में भारतीय जनता के अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश और भारतीय जनता एवं युवाओं के देशप्रेम को उद्घाटित करने वाले अनेक संदर्भ व्यक्त हुए हैं। दो उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैंः-
1. कई आदमी सितार, बेला, मृदंग ले, आ बैठे, और इन साजों के साथ स्वर मिलाकर कई नवयुवक एक स्वर में गाने लगे-
शांति-समर में कभी भूलकर धैर्य नहीं खोना होगा,
मातृभूमि के लिए जगत में जीना और मरना होगा।
2. राष्ट्रीय गान हो रहा था, माली नंगे सिर, नंगे पैर, एक-एक कुर्ता पहने, हाथ में लकडी लिए, गर्दनों में एक-एक थैली लटकाए चलने को तैयार थे। सब-के-सब प्रसन्न वदन, उल्लास से भरे हुए, जातीयता के गर्व से उन्मत्त थे।
इसके ‘कायाकल्प’ उपन्यास में चक्रधर, ’प्रतिज्ञा’ उपन्यास में अमृतराय और ’गबन’ उपन्यास में जालपा के माध्यम से देशप्रेम से संबंधित संदर्भ व्यक्त हुए है, क्योंकि ये स्वयं देशप्रेमी चरित्र है। जालपा अपने पति रमानाथ को अंग्रेजों के लिए झूठी शहादते देने से रोकने के लिए भरसक प्रयास करती है। इतना ही नहीं वो अंग्रेजों के द्वारा फाँसी पर चढा दिए गये दिनेश के परिवार कि तन-मन-धन से सेवा करती है। इनके ‘कर्मभूमि’ उपन्यास के समरकांत का पूरा परिवार ही देशप्रेम के भावों से ओत-प्रोत है। इस परिवार के अमरकांत, समरकांत, सुखदा, नैना, रेणुका आदि सभी चरित्र नगरपालिका और ब्रिटिश सरकार के अन्याय के विरुद्ध एक-एक कर मैदान में कूद पडते हैं और ग्रामीणों को न्याय दिलाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इस उपन्यास में इन चरित्रों के अतिरिक्त प्रो॰ शांतिकुमार, मुन्नी, सलोनी काकी, सकीना, सलीम आदि चरित्रों के माध्यम से भी देशप्रेम की भावनाएं व्यक्त हुई हैं। वस्तुतः इस उपन्यास में अमरकांत और अमरकांत से संबद्ध सभी चरित्र चाहे वह ग्रामीण जन ही क्यों न हो, सभी जागरूक होकर जातीय एवं देशप्रेम का परिचय देते चित्रित हुए हैं।
इनकी ‘‘सांसारिक प्रेम और देश-प्रेम’’ नामक पहली कहानी म इटली के नागरिक मैजिनी का राष्ट्रपे*म व्यक्त हुआ हैः- जवानी की पुरजोर उम्मीदें दिल में लहर मार रही थी, मगर उसने संकल्प ले लिया था कि मैं देश और जाति पर अपने न्यौछावर कर दूंगा।’’८ इनकी यही मेरी मातृभूमि है, कहानी का कथावाचक जब अमेरिका से भारत अपने गांव लौटता है, तो फि र वह यही रहने का संकल्प लेता हैः ‘मेरी स्त्री और मेरे पुत्र बार-बार बुलाते हैं’, मगर अब मैं यह गंगामाता का तट और अपना प्यारा देश छोडकर वहां नहीं जा सकता। मैं अपनी मिट्टी गंगाजी को ही सौपूंगा। अब संसार की कोई आकांक्षा मुझे इस स्थान से नहीं हटा सकती, क्योंकि यह मेरा प्यारा देश और यही प्यारी मातृभूमि है। बस, मेरी उत्कट इच्छा यही है कि मैं अपनी प्यारी मातृभूमि में ही अपने प्राण विसर्जती करूं।’’ इस प्रकार ‘यही मेरी मातृभूमि है‘ प्रेमचंद की पहली कहानी है, जो उनके स्वदेश (भारत) प्रेम पर केंद्रित है। इनकी ‘वियोग और मिलाप‘ कहानी में जानकीनाथ के पुत्र दयानाथ का राष्ट्र-प्रेम व्यक्त हुआ है। उनका राष्ट्र-प्रेम इस बात से व्यक्त होता है कि वो होमरूल आंदोलन में सक्रिय भाग लेने की खातिर अपने पिता-परिवार का भी त्याग कर देते हैंः ‘‘वे कहते हैं, या तो होमरूल को त्यागो या मेरे घर से निकलो। मुझे होमरूल इस घर से कहीं प्रिय है। मेरी रात आज किसी दूसरे घर में कटेगी।’’१० वस्तुतः पुत्र से प्रेरित हो कर अंततः जानकीनाथ भी ‘भारतदास’ के छद्म नाम से देश सेवा का कार्य करते हैं। वे ही स्वराज सभा के मंत्री के नाम समय-समय पर धनराशि भेजते हैंः ‘‘एक सप्ताह के पश्चात् सभा के मंत्री को पांच सौ रुपयों का नोट मिला।’’११ इनकी ‘बौडम’ कहानी म खलील नामक युवक और धिक्कार कहानी में पासोनियस कि माँ का देश-प्रेम व्यक्त हुआ है। पासोनियस की माँ एक ऐसी नारी चरित्र है, जो देश-प्रेम की खातिर अपने पुत्र-प्रेम कि बलि दे देती है, क्योंकि उसका पुत्र देशद्रोही होता है। इनकी ’जुलूस’ कहानी में इब्राहिम और स्वराजियों के माध्यम से, ’पत्नी से पति’ कहानी में अंधे लडके और गोदावरी के माध्यम से तथा ’समर यात्रा’ कहानी में कोदई और नोहरी के माध्यम से देश-प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है। इनकी ’आहुति’ कहानी की रूपमणि भी देशभक्त नारी चरित्र है, इसलिए तो वह नित्य स्वराज-भवन जाती है, जलसों में शरीक होती है और स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करती हैः ‘‘दिन में एक बार स्वराज्य-भवन जाना उसका नियम हो गया। जलसो में भी बारबार शरीक होती, विलास की चीजें एक-एक करके सब फेंक दी गई। रेशमी साडी की जगह गाढे की साडियाँ आई। चरखा भी आया। वह घंटों बैठी सूत काता करती। उसका सूत दिन-दिन बारीक होता जाता था। इसी सूत से वह विशंभर के कुर्ते बनवाएगी।’’१२ इनकी ‘जेल‘ कहानी मृदुला और क्षमा जैसी नारी चरित्रों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में नारियों की भूमिका का अंकन करती है, साथ ही इस बात को भी स्पष्ट करती है कि देश की खातिर अपना सर्वस्व लुटाने में महिलाएं पुरुषों से कम नहीं थी इनकी ‘तावान‘ कहानी भी अंबा नामक नारी चरित्र के स्वदेशी प्रेम का निरूपण करती है।
इस प्रकार प्रेमचंद के कथा साहित्य म भारतीयों के राष्ट्र-प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है। इनके कथा साहित्य से ज्ञात होता है कि ब्रिटिशकालीन भारत के जन-आंदोलन में पुरुषों के साथ-साथ भारतीय महिलाएं, वृद्ध और बाल-वृंद भी बढ-चढकर हिस्सा लेते थे। ?
संदर्भ
1. मंगलाचरण, पृ॰146
2. वही, पृ॰148
3. सेवासदन, पृ॰6॰
4. वही, पृ॰226
5. रंगभूमि, पृ॰119
6. वही, पृ॰28
7. वही, पृ॰79
8. प्रेमचंद कहानी रचनावली (खंड-एक), पृ॰64
9. वही, पृ॰95
1॰. प्रेमचंद कहानी रचनावली (खंड-दो), पृ॰158
11. वही, पृ॰163
12. प्रेमचंद कहानी रचनावली (खंड-पांच), पृ.28॰
एस.एस.जे. परिसर, अल्मोडा, कुमाऊं विश्वविद्यालय
(उत्तराखण्ड)-2636॰1 मो. 7351178355