हिन्दी कविता में महिला क्रान्ति का पहला बिगुल

डॉ. गीता कपिल


मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन ने भारतीय जनमानस को दूर तक प्रभावित किया। यह वह काल था जब सम्पूर्ण समाज सामन्ती श्ाृंखलाओं में जकडा हुआ था। जाति-पांति, वर्ण व्यवस्था और पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के बीज शूद्रों और नारी का जीवन अत्यन्त दयनीय था। भक्ति आन्दोलन ने सदियों से चली आ रही भारतीय समाज की इन व्यवस्थाओं को चुनौती दी और भावनात्मक धरातल पर सबको समान माना। इस ‘‘भक्ति आन्दोलन की शुरुआत दक्षिण में हुई। इसके शास्त्रकार भी सबसे पहले वहीं हुए। प्राचीन वैष्णवजन आलवार थे। प्रसिद्ध आलवारों में सात ब्राह्मण, एक क्षत्रिय, दो शूद्र और एक निम*तर जाति ‘पनर’ थे। इन्हीं में एक आलवार महिला आंदाल थी। शूद्र और महिला का इन प्राचीन वैष्णवों में होना महत्त्वपूर्ण है। यह इस तथ्य को प्रकट करता है कि भक्ति आन्दोलन का प्रारम्भ ही वर्ण व्यवस्था और नारी-पुरुष के भेदभाव को तोडने वाला था।’’१ सभी भक्तिकालीन सन्तों और कवियों ने जाति-पांति के बन्धनों की उपेक्षा करते हुए डोम, चमार व जुलाहा जैसी निम* और शूद्र समझी जाने वाली जातियों को अपने आन्दोलन में सम्मिलित किया और उनके लिए भक्ति का द्वार खोलकर अपने आन्दोलन को अधिकाधिक लोकोन्मुख और व्यापक बनाया।
तद्युगीन सामन्ती व्यवस्था नारी को शरीर मानकर उसे भोगवादी दृष्टि से देखती थी। इस व्यवस्था में उसके स्वतंत्र अस्तित्व की कल्पना भी असम्भव थी। वह अधिकार रहित, इच्छा-आकांक्षा रहित एक दास सदृश थी, जिसका एकमात्र कर्त्तव्य पुरुष का मनोरंजन और पारिवारिक मर्यादा के भार को ढोना था। इन भक्त कवियों ने नारी की दयनीय स्थिति पर भी सहानुभूतिपूर्वक विचार किया। इस आन्दोलन ने उस घटाटोप रूढिग्रस्त युग में भक्ति के नाम पर ही सही नारी को घर से बाहर निकलने में मदद की। ‘‘भक्ति आन्दोलन नारी को शरीर मात्र नहीं, मन और हृदय से युक्त मनुष्य के रूप में देखता था।२’’ इसलिए ‘‘अवर्णों की भाँति इस आन्दोलन में नारी समाज ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान किया था। भारत में यह पहला धार्मिक आन्दोलन था, जिसमें गृहस्थ नारियों ने इतना बडा हिस्सा लिया।’’३ मीरा का जन्म इन्हीं प्रतिकूल स्थितियों में हुआ, जिन्हें आजीवन सामन्तीय मूल्यों से टकराना पडा। उनकी ‘‘कविता भी भक्ति आन्दोलन, उसकी विचारधारा और तत्कालीन समाज में नारी की स्थिति से उनकी टकराहट का प्रतिफलन है। यह प्रतिफलन उस मानवीयता में प्रकट हुआ जो अपने समय की धार्मिक साधनाओं के ही सहारे रूपायित हो सकती थी।’’४
मीरा भक्तिकाल की सर्वाधिक अद्वितीय और क्रान्तिकारी भक्त नारी थी। वे राजस्थान में ‘‘मेडता के स्वामी तथा राठौडों की मेडतियां शाखा के संस्थापक राव दूदा जोधावत के पुत्र रतनसी की सन्तान थी। रतनसी दूदावत के यहाँ मीरा बाई का जन्म वि. सं. १५५५ को वैशाख सुदि ३ को हुआ था।’’५ बाल्यकाल से ही मीरा को अनेकानेक संघर्षों से जूझना पडा। जब वे ‘‘केवल दो ही वर्ष की थी कि उनकी माँ का देहान्त हो गया।’’६ उनके पिता श्री रतनसी दूदावत (जो राजा की पदवी से भी विभूषित थे) ने मीराबाई को २-३ वर्ष की अवस्था में ही, उनकी माता का देहान्त हो जाने पर, कुडकी से अपने पास मेडता बुलवा लिया था और बडे लाड और प्यार से मीराबाई का पालन-पोषण करने लगे।’’७ उनके पुत्र जयमल के साथ ही मीरा की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की गई। इसी उन्मुक्त और स्नेहयुक्त वातावरण से मीरा के व्यक्तित्व में परम्परागत सामन्ती रूढि-निषेधों के प्रति विद्रोह के बीज अंकुरित हुए। राव दूदा जोधावत की एकमात्र इच्छा थी कि वे मीरा का विवाह अपने हाथों से करें किन्तु दुर्भाग्यवश मीरा के विवाह पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गई। अतः ‘‘राव वीरमदे दूदावत ने वि. सं. १५७३ में मीराबाई का विवाह बडी धूमधाम से मेवाड के स्वामी महाराण सांगा के पुत्र भोजराज संगावत से कर दिया।’’८ मीरा का वैवाहिक जीवन सुखमय था। उनके पति भोजराज उदारवृत्ति के थे, परन्तु नियति को उनका यह सुख सह्य न हो सका अतः उनके पति भोजराज की मृत्यु उनके पिता के जीवनकाल में ही हो गई’’९ और युवती मीरा के साथ ‘विधवा’ विशेषण जुड गया। राजपूती परम्परानुसार विधवा मीरा को अपने पति के साथ सती होना चाहिए था, किन्तु अनश्वर गिरधर नागर का वरण करने वाली मीरा ने परिवार की परम्परा के प्रतिकूल सती होना स्वीकार नहीं किया। उनका यह कदम तद्युगीन समाज और पारिवारिक व्यवस्था के लिए अत्यन्त विद्रोही था। इससे राजस्थान के दो प्रतिष्ठित राजघरानों की प्रतिष्ठा खतरे में पड गई। जिसकी कीमत मीरा को निन्दा, अपमान, अनादर तथा उपेक्षा आदि अनेक रूपों में चुकानी पडी। जब तक मीरा के श्वसुर राणा सांगा और उनके पिता रतनसी जीवित थे तब तक राजघराने का विरोध स्पष्ट उजागर नहीं हो पाया था, किन्तु दोनों की मृत्यु होते ही मीरा का देवर राणा विक्रमादित्य शासक बना, जो स्वाभाव से अत्यन्त दुष्ट प्रकृति का था। ‘‘इनकी उदंडता के कारण शीघ्र ही सब सरदार इनके विरुद्ध हो गए।’’१० यही राणा विक्रमादित्य ही मीरा की सारी विपदाओं की जड है क्योंकि युवावस्था में प्राप्त इस दुःखमय वैधव्य के कारण मीरा के ‘‘जीवन में एक बहुत बडे परिवर्तन का अवसर आ उपस्थित हुआ, परन्तु मीरा इसके लिए जैसे पहले से ही तैयार बैठी थी। कहा जाता है कि विवाह के अनन्तर ससुराल आते समय वे अपने साथ ही गिरधर लाल की मूर्ति भी लेती आई थी। कुँवर भोजराज की जीवितावस्था में भी उसका विधिवत पूजन एवं अर्चन करती रही, पतिदेव के वियोग होते ही उन्होंने सारे लौकिक सम्बन्धों के बन्धन सहसा छिन्न-भिन्न कर दिए और चारों ओर से चित्त हटाकर अपने इष्टदेव के प्रति वे और भी अनुरक्त हो गई।’’११ अपने इष्ट की भक्ति के लिए मीरा ने लोकविहित मार्ग न चुनकर नितान्त भिन्न मार्ग अपनाया, जिससे शासक राणा सहित समस्त राजकुल तिलमिला उठा। ‘‘मीरा भक्त थी। भक्त होना न तो बुरी बात है न आपत्तिजनक। यदि वह सभी लोगों की तरह घर में रहकर पूजा-पाठ करके भक्ति करके अपना वैधव्य काटती रहती तो राणा को क्या आपत्ति होती। आपत्ति का कारण साधु संगति ही ज्ञात होता है। मीरा केवल भक्त ही नहीं थी, वह राणाकुल की वधू भी थी। वह सामान्य भक्तिन की तरह सामान्य लोगों से मिलती जुलती थी तो राणाकुल की मर्यादा कैसे न भंग होती?’’१२ राणा विक्रमादित्य राजघराने की एक स्त्री का सामान्य लोगों के साथ मेल-जोल स्वीकार नहीं कर सकता था। वह ‘‘बडा ही क्रूर शासक था। उसे मीरा की गतिविधियाँ अच्छी नहीं लगी और उसने मीरा को अनेक यातनाएँ दी।’’१३ राणा की इन यातनाओं का उल्लेख वे अपने काव्य में बार-बार करती हैं-
माई म्हां गोविन्द गुण गाणा।
राजा रूठयां नगरी त्यागां, हरि रूण्या कठ जाणा।
राणा भेज्या बिखरो प्यालो चरणामृत पी जाणा।
काला नाग पिटार्या भेज्या, सालगराम पिछाणा।
मीरा गिरधर प्रेम दिवांणी सावल्या वर पाणा।१४
मीरा अत्यन्त निर्भीक और धैर्यवान थी। उस युग में एक विधवा नारी का पारिवारिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर अपनी शर्तों पर जीवन जीने का संकल्प पारिवारिक ही नहीं सामाजिक दृष्टि से भी अत्यन्त विद्रोहात्मक कदम था। मीरा में विद्रोह भाव कूट-कूट कर भरा था। ‘‘स्त्री होने के कारण उन्हें समाज और तत्कालीन वातावरण से अनेक बार लोहा लेना पडा। इस संघर्ष ने उन्हें निराशा नहीं साहस दिया।’’१६ मीरा ने अपनी शर्तों पर जीवन जिया और अपने जीवन के निर्णय स्वयं लिए। प्रभु भक्ति के रूप में वे तद्युगीन नारी की मौन व्यथा को ही मुखरित करती हैं। समाज की उन मर्यादाओं और परम्पराओं का उन्हें कोई भय नहीं जो नारी के लिए बन्धन स्वरूप हैं। वे सीधे कहती हैं-
लोक लाज की काण न मानूं
निरभै निसाणा घुरास्यां हो भाई।१६
अतः राणा की यातनाओं की उन्हें कोई परवाह नहीं। वे तो मानो लुकाठी हाथ में हाथ जड मर्यादाओं को जलाने निकल चुकी हैं। यह कार्य साहसी व्यक्ति ही कर सकता है। मीरा शासक राणा को ही चुनौती दे डालती हैं-
सीसोद्यो रूठयों तोम्हांरो काँई कर लेसी।
राणो जी रूठजाँ बाँरो देस रखासी।
हरि रूठ्याँ कुम्हलास्याँ हो माई।१७
वे तो राणा से यह कहने का भी साहस रखती हैं कि-
राणाजी थे क्यांने राखो म्हांसू बैर
थे तो राणा जी म्हाने इसडा लागौ ज्यों बच्छन में कैर।।१८
मीरा किसी भी स्थिति में अपनी भक्ति के पथ को छोड नहीं सकती। उनकी भक्ति पथ के सहचर साधु-सन्त हैं। मीरा राजघराने की वधू हैं। उसी के अनुरूप उन्हें विशिष्ट आचरण करना है, किन्तु साधु-संगति के लिए सामान्य भावभूमि पर उतरना आवश्यक था। मीरा अपनी इच्छा से विशिष्टता को छोड साधु-संगति के सामान्य पथ को अंगीकार करती हैं। यह पथ बडा विकट है और निन्दा, अपमान और बदनामी से होकर जाता है, पर मीरा को तो बदनामी भी
प्रिय है-
राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूँगी चाल अपूठी।।१९
तद्युगीन परिवेश में एक नारी द्वारा अपने अनुसार जीवन जीने का यह उद्घोष उसकी निडरता का ही परिचायक नहीं वरन् युगों से नारी की दबी-कुचली आशाओं-आकांक्षाओं को सामाजिक मान्यता दिलाने का उद्घोष है। जिसमें मीरा को राणा के रूप में सामन्ती मूल्यों से ही नहीं टकराना पडा वरन् घर के भीतर की नारियों का भी विरोध सहना पडा। वैसे भारतीय समाज में यह सत्य भी है कि यहाँ नारी का उत्पीडन घर के भीतर की महिलाओं द्वारा अधिक होता है। मीरा के पदों में अनेकत्र सास व ननद द्वारा दी जाने वाली यन्त्रणाओं का भी उल्लेख मिलता है-
हेली म्हाँसूँ हरि बिनि रहयो न जाय
सास लडे मेरी ननद खिजावै, राणा रह्या रिसाय।
पहरो भी राख्यो चौकी बिठारयो, ताला दिया जडाय।२०
कितनी मार्मिक पीडा है यहाँ नारी मन की। घर के भीतर सास व ननदें उससे लडती है और बाहर से राणा ने ताला जडवा कर पहरा बैठा दिया है। ऐसे में वह कहाँ जाये? फिर मीरा तो विधवा हैं और सम्पूर्ण संघर्ष में अकेली है। उनका विरोधी बडा सबल और अधिकार युक्त है, किन्तु मीरा अकेले उससे लडती हैं और मर्यादाओं का हवाला दिए जाने पर कहती हैं-
म्हाराँ री गिरधर गोपाल दूसराँ णाँ कूयाँ।२१
मीरा के इस संघर्ष में सम्पूर्ण समाज भी उनका विरोधी है क्योंकि एक राजघराने की महिला का मर्यादा विरोधी कदम समाज की अन्य नारियों के लिए प्रेरणास्त्रोत हो सकता था। अतः इस भय से भयभीत परम्परा प्रिय लोग उनकी निन्दा करने लगे। मीरा को समाज के इन ठेकेदारों से भी टकराना पडा-
कडवा बोल डोक जन बोल्या करस्या म्हारी हाँसी।२२
लोग कह्आँ मीराँ बावरी, सासु कह्याँ कुलनासी री।।२३
डॉ. पदमावती शबनम ने लोक रूपक गायकों में जीवित मीरा के कुछ पदों का संकलन अपने ग्रंथ ‘मीरा व्यक्तित्व और कृतित्व’ में किया है। इसमें उदौ और मीरा के कुछ संवादात्मक पद हैं (उदौ को कुछ विद्वान मीरा की ननद मानते हैं, पर तथ्य इसकी पुष्टि नहीं करते) इन संवादों द्वारा स्पष्ट है कि साधु-संगति करने पर मीरा को यातनाएँ दी गई होंगी, प्रतिबन्ध लगाए गए होंगे और कभी राजकीय सुखों का प्रलोभन भी दिया गया होगा। पर मीरा के आगे सब बेकार हैं-
उदौ- थानै बरज बरज मैं हारी, भाभी मानो बात हमारी।
राणे रोस कियो था पर, साधो में मत जारी।
कुल को दाग लगे छै भाभी, निन्दा हो रही भारी।
साधो रे संग बन-बन भटको, लाज गमाई सारी।
बडा घर में जनम लियौ छै नाचो दे दे तारी।
मीराँ- राणा ने समझाओ जाओ, मैं तो बात न मानी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, संता हाथ बिकानी।२४
उदौ राजमहल के सुखों का प्रलोभन भी मीरा के समक्ष रखती है-
उदौ-भाभी बोलो बात बिचारी।
साधो की संगति दुख भारी मानो बात हमारी।
छापा तिलक गलहार उतारो, पहिरो हार हजारी।
रतन जडित पहिरो आभूषण, भोगो भोग अपारी।
मीरा जी थे चालो महल में थाने सोगन हमारी।
मीरा अपनी धुन की पक्की हैं। कोई समझौता उन्हें मान्य नहीं, न ही भौतिक सुखों की उन्हें कोई लालसा है। अतः उदौ के प्रलोभन के प्रति अपनी असमर्थता व्यक्त करती है-
मीरा- ऊदां बाई मन समझ जाओ अपने धाम
राज पाट भोगो तुम ही, हमसे न तासू काम।२५
वस्तुतः जिसने अपना सम्बन्ध अलौकिक पुरुष से जोड लिया हो उसे न तो सांसारिक प्रलोभन डिगा पाते हैं और न ही लोक व कुल की मर्यादा रोक पाती है। मीरा को भी राणा के देश से विरक्ति हो गई है-
नहि सुख भावै देसडलो रंगरूडो।
थाँरे देसाँ में राण साध नहीं छै, लोग बसै कूडो।।२६
पारिवारिक व सामाजिक प्रताडनाओं से मीरा कभी दुःखी भी हुई, परन्तु ये प्रताडनाएँ उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति अधिक सचेत और दृढ बनाती हैं। उन्हें न शासक राणा पर विश्वास है न राणा के देस में रहना है। उनका एकमात्र विश्वास अपने गिरधर नागर पर है वही उनका उद्धार कर सकते हैं। अतः मीरा उन्हें अपने अबलापन की याद दिलाते हुए उन्हीं से अपने उद्धार की कामना करती हैं-
छोड मत जाज्यो जी महाराज।
महां अबला बल म्हारो गिरधर, थे म्हारो सरताज।
मीराँ रे प्रभु और राणा काई, राखा अब री लाज।।।२७
मीरा का यह संघर्ष आज की नारी के लिए प्रेरणास्त्रोत है। वे भक्त हैं, उच्चकोटि की कवयित्री हैं, पर इससे बढकर वे हिन्दी साहित्य में पहली क्रान्तिकारी नारी दिखाई देती है जो मध्ययुग में सामन्ती मूल्यों को तोडने की हिम्मत जुटाती हैं। जो खोखली मर्यादाओं के भार तले अपनी आकांक्षाओं की बलि न चढाकर अपनी शर्तों पर जीवन जीती है। परिमाण में उन्होंने तद्युगीन भक्त कवियों की तुलना में कम लिखा है और जो लिखा है उसका फलक भी बहुत विस्तृत नहीं है, परन्तु उसमें तद्युगीन नारी मन की पीडा, उसकी छटपटाहट, उसकी विवशता-व्याकुलता, मुक्ति की प्रबल आकांक्षा व विद्रोह भाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। इस अर्थ में उनका काव्य मध्ययुगीन नारी जीवन का दस्तावेज बन जाता है। ‘‘लोक लाज कुण काण जगत की, दइ बहाइ जस पाणी।’’२८ की घोषणा ने मीरा को समाज का विरोधी बनाया और उनके संघर्षों को भी बढाया, परन्तु मीरा अपने प्रिय का नाम लेकर सम्पूर्ण समन्ती संस्कारों से अकेली टकराती है। राणा के प्रत्येक आदेश की अवहेलना करके पुरुषवादी समाज को चुनौती देती है। ‘‘मीरा जन्मजात क्रान्तिकारी नारी थी। उसने कभी किसी से समझौता नहीं किया। वह अपने स्वाभिमान और भक्ति के लिए अंत तक लडती रहीं, किन्तु कभी हार स्वीकार नहीं की।’’२९ निश्चय ही वे हिन्दी कविता में महिला क्रान्ति का पहला बिगुल बजाने वाली नारी है। ?

सन्दर्भ
१. मीरा का काव्य- विश्वनाथ त्रिपाठी, पृ. १७, वाणी प्रकाशन,
सं. २०१०
२. वही, पृ. ४१
३. वही, पृ. ४०
४. मीरा का काव्य- विश्वनाथ त्रिपाठी, प्राक्कथन से
५. मीरा ग्रंथावली- प्रो. कल्याण सिंह शेखावत, पृ. १९, वाणी प्रकाशन,
सं. २००१
६. मीरा जीवन और काव्य- डॉ. सी.एल. प्रभात, पृ. १११, राजस्थानी
ग्रंथाकार जोधपुर, सं. १९९९
७. मीरा ग्रंथावली- प्रो. कल्याण सिंह शेखावत, पृ. २२
८. वही, पृ. २२
९. देखिए मीरा व्यक्तित्व और कृतित्व- डॉ. पदमावती शबनम, पृ.
४१, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी, सं. १९७३
१०. वही, पृ. ४१
११. मीराँबाई पदावली- परशुराम चतुर्वेदी, भूमिका पृ.
२०-२१, हिन्दी
साहित्य सम्मेलन, प्रयाग चौदहवां सं.
१२. मीरा का काव्य- विश्वनाथ त्रिपाठी, पृ. ५७
१३. मीराँबाई ऐतिहासिक व सामाजिक विवेचन- डॉ. हुकुम
सिंह भाटी,
पृ. १७, राजस्थानी साहित्य संस्थान, जोधपुर, पृ. १९७७
१४. मीराँबाई की पदावली- परशुराम चतुर्वेदी, पद सं. ४१, तथा पद सं. ३६, ३७, ३८, ३९, ४० आदि भी उल्लेखनीय
१५. मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ- डॉ. सावित्रि सिन्हा, पृ. १०७
सं. २०१० वि. सं.
१६. मीराँबाई की पदावली- परशुराम चतुर्वेदी, पद सं. ३५
१७. वही, पद सं. ३५
१८. वही, पद सं. ३४
१९. वही, पद सं. ३३
२०. वही, पद सं. ४२, पद सं. १६९
२१. मीराँबाई की पदावली- परशुराम चतुर्वेदी, पद सं. ८
२२. वही, पद सं. ४५
२३. वही, पद सं. ३६
२४. मीरा व्यक्तित्व और कृतित्व- डॉ. पदमावती शबनम, पृ. २०२
पद सं. ८
२५. मीरा व्यक्तित्व और कृतित्व- डॉ. पदमावती शबनम, पृ.
२०२-२०३, पद सं. ८
२६. मीराँबाई की पदावली- आ. परशुराम चतुर्वेदी, पद सं. ३२
२७. वही, पद सं. ४८
२८. मीराँबाई की पदावली- आ. परशुराम चतुर्वेदी, पद सं. ३८
२९. मीरा का जीवनवृत्त एवं काव्य- डॉ. कल्याण सिंह शेखावत,
पृ. २३९, हिन्दी साहित्य मन्दिर, जोधपुर, सं. १९७४
५१३, रामानुज आवास, वनस्थली विद्यापीठ (राज.)
मो. ०९४६०१३३२९३