जादुई यथार्थवाद के प्रथम लेखक काफ्का

डॉ. प्रभा दीक्षित


सम्पूर्ण विश्व के इतिहासकार इस सिद्धान्त को मानते हैं कि इतिहास किंचित परिवर्तन के साथ अपने आपको दोहराता है। परिवर्तन मानव संस्कृति का आवश्यक गुण है। यद्यपि वैज्ञानिकों के अनुसार मानव-जाति का इतिहास बीस लाख वर्ष भी मान लिया जाये तो इस कालावधि के इतिहास को क्रमबद्ध ढंग से जानने का कोई कारगर तरीका नहीं है। हाँ सीमित इतिहास की जानकारी उक्त दोहराव का समर्थन करती है। तथा सम्पूर्ण विश्व की मानव संस्कृति अपनी भौगोलिक भिन्नता के बावजूद एकरूपता में रंगी दृष्टिगत होती है क्योंकि सभी देशों के इंसानों की मूलभूत आवश्यकतायें एक जैसी है। चिंतन या साहित्य के क्षेत्र में भी यह अवधारणा लागू होती है। बहरहाल आश्चर्य होता है कि ऐसे मिथकीय प्रतीक भारतीय साहित्य में भरे पडे हैं किन्तु यहाँ की धर्मभीरु, अशिक्षित जनता ने जहाँ उन्हें सत्य मान लिया है वही शिक्षित वर्ग ने अलौकिक, अवैज्ञानिक समझकर साहित्य के रूप में खारिज कर दिया है।
काफ्का का जन्म १८८३ में जर्मनी के एक यहूदी परिवार में हुआ था। १९२४ में तपेदिक के मरीज के रूप में मृत्यु को प्राप्त करने वाला यह लेखक एक दुनियादार, सख्त, क्षमतावान पिता का अव्यवाहारिक, अतिभावुक बेटा था जो पिता की दहशत में जीता हुआ संशय, भय और अवसाद में डूबा निराशा की अतियो को स्पर्श करता रहा। प्राग विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद वह बीमा कम्पनी में नौकरी करता रहा। आत्म निर्भरता और दृढता की कमी के कारण वह अपने प्रेम में भी असफल रहा। १९१४ में उसकी सगाई हुई जिसे उसने तोड दिया। पिता से तनावपूर्ण सम्बन्ध और ईमानदारी के प्रति संवेदना के कारण वह मानसिक रूप से अवसाद ग्रस्त (डिप्रेस्ड) रहने लगा। १९१८ के बाद बर्लिन में बेकारी, भूखमरी के कारण अपने आप से टूट कर हीनता बोध का शिकार हो गया। वह शब्दों (भाषा) का पुजारी होने के बाद भी शब्दों से अपना भरोसा खो चुका था। उसने अपने दोस्त मैक्स ब्रांड से कहा था, ‘‘क्या लिखे हुये शब्दों से कुछ पाया जाता है, क्या वह कुछ होता है?’’ सारी उमर जीवन की सफलता के लिये प्रयासरत यह लेखक जिम्मेदारियों से भाग कर घर बसाने से भयग्रस्त रहा। वह अपने लेखन में एक सृजन की दुनिया बसाना चाहता था, मगर यहाँ भी वह भ्रम एवं संशय का शिकार रहा तथा भीषण अवसाद की स्थिति में अपने मित्र से अपना साहित्य जला देने का आग्रह करते हुए एक तपेदिक के रोगी के रूप में मृत्यु को प्राप्त हुआ। अवसाद, कुंठा, निराशा, भय के अतिरिक्त इस महान् लेखक के जीवन में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है। मित्र ने साहित्य जलाया नहीं प्रकाशित करा दिया, मगर जर्मनी के लोगों ने कोई नोटिस नहीं लिया। जीवन के तीन दशक गुमनामी में जीने वाला काफ्का एक महान् लेखक के रूप में कैसे चिह्नित हो गया, यह एक सुखद आश्चर्य का विषय है? कैसे आत्महीनता, कातरता, निर्भरता की कमी महानता में बदल गई।
अवसाद (डिप्रेशन) एक मानसिक रोग है जो भ्रम या चिंतन की अतियों को महसूस करता है। मेरे विचार से कई बार यह रोग साहित्यकार (कलाकार) के लिये वरदान प्रमाणित होता है। भारतीय साहित्य में आत्महन्ता निराला और मुक्तिबोध को इस रूप में चिह्नित किया जा सकता है। जिस प्रकार मुक्तिबोध के काव्य को अनेक दृष्टियों से देखा गया। काफ्का के साथ भी यही हुआ। बौद्धिकता, कवित्वपूर्ण भाषा, भयावह फंतासी, अद्भुत कल्पनायें खण्ड-खण्ड असुरक्षित जिन्दगी के शब्द चित्रों को द्वितीय विश्व युद्ध की त्रासदी के बाद यूरोपीय आम जन ने जहाँ अपने जीवन की अनुकृति के रूप में देखा वहीं धुरंधर चिंतकों ने काफ्का के साहित्य में अस्तित्ववाद या जादुई यथार्थवाद के पूर्वाभास का एहसास किया। कहा जा सकता है कि काफ्का को जर्मनी की आगामी स्थिति का पूर्वाभास हो गया था। उसका परिवार भी नाजी अत्याचारों का शिकार हुआ था।
काफ्का के-रचना-संसार के मूल्यांकन में हमें द्वितीय विश्वयुद्ध की भयावह स्थिति पर दृष्टि रखनी होगी। यह वह काल था जब जीवन और मृत्यु तीव्रता के साथ अनुभूति में उतर रहे थे। धर्म, दर्शन, नैतिकता के मूल्यों का अवमूल्यन हो चुका था। असहाय लोक जीवन बिखरकर पल-पल जिंदगी और मौत के झूले में झूलता हुआ गहरी दुविधा का शिकार, पाप पुण्य की मानसिकता से विरत त्राहि-त्राहि कर उठा था। प्यार और नफरत के रूप की पहचान खो चुकी थी। कब क्या होगा? मानव जीवन का त्रासद प्रश्ा* बन चुका था। भूख, बेकारी, भय जोखिम, का एक खौफनाक वातावरण घोर निराशा में डूबा था। ऐसी स्थिति में लोगों ने एक ऐसे लेखक को खोज लिया जो पहले से ही भयग्रस्त एवं भ्रमपूर्ण था, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। यूरोपीय लेखक एवं पत्रकार जिन्हें अनुवाद के रूप में काफ्का का कुछ साहित्य प्राप्त हुआ था, उन पर बौद्धिक विमर्श कर रहे थे और जर्मनी के बुद्धिजीवी (लेखक) आश्चर्यचकित थे कि उनके समाज के घोर उपेक्षित लेखक की ऐसी ख्याति! स्पष्ट है कि काफ्का का सम्पूर्ण साहित्य खोज-खोज कर प्रकाशित किया गया, जिसके बारे में डब्ल्यू. एच. ऑडेन ने कहा ‘‘काफ्का का हमारी सदी से वही सम्बन्ध है जो दांते, शेक्सपियर और गेटे का अपने युग से था।’’
काफ्का के साहित्य को तद्युगीन परिस्थितियों के कारण एक नये अंदाज में देखा गया। यूरोप और अमेरिका के समकालीन बडे लेखकों ने काफ्का की प्रशंसा की और अपने सपनों को दफ* करने वाला यह आत्महन्ता लेखक अपनी मृत्यु के तीस वर्षों बाद साहित्य-जगत में एक महान् लेखक के रूप में पुनः जीवित हो उठा। हाँ ऐसे लेखक भी थे जो यह कहते हुये काफ्का की आलोचना कर रहे थे कि ‘‘ऐसा भ्रमवादी लेखक जो स्वयं संशयग्रस्त व निराश है, समाज को क्या दे सकता है?’’
एडमेड विल्सन ने कहा था, ‘‘काफ्का मानसिक तौर पर अपंग कमजोर इच्छाशक्ति का शख्स था। देश विहीन हतोत्साहित टूटा हुआ काफ्का चाहे पल दो पल के लिये हमें भयभीत करे या मनोरंजन दे, किन्तु अन्तत्वोगत्वा निराश ही करता है। वह अपने देश काल के प्रति प्रामाणिक जरूर था किन्तु वह एक ऐसा देशकाल था जहाँ हममें से शायद कोई रहना चाहे।’’
इसी भांति कुछ दूसरे लेखकों ने भी उसे निराशावादी, नकारात्मक प्रवृत्तियों का लेखक ठहराया है। मगर यह तो सभी ने माना है कि वह एक सिद्धहस्त लेखक था, जो अपनी कल्पना की दुनियाँ और छवियों के प्रति ईमानदार था। एडमंड विल्सन को जवाब देते हुये रोनाल्ड ग्रे ने कहा ‘‘कोई कलाकार वही चित्रण या लेखन करता है जो उसकी भीतरी अनिवार्यता होती है। न कि जो उसे करना चाहिये और यदि उसकी दृष्टि नैराश्यपूर्ण, विखण्डित या भयावह है तो यह उसके समय का अंकन है न कि कोई नैतिक संदेश।’’ ध्यातव्य है कि कम आयु में नोबुल पुरस्कार पाने वाले कामू ने भी काफ्का के साहित्य की प्रशंसा की है। काफ्का स्वयं अपने पिता को पत्र में लिखता है- ‘‘आखिरकार यह जरूरी तो नहीं कि कोई सूरज के बीच उडान भर सके। यह भी तो कम नहीं कि हम धरती के उस साफ चप्पे पर घडी भर रेंग सके, उसकी गरमाहट महसूस कर सके जहाँ कहीं सूरज की धूप पड जाया करती है।’’
काफ्का की सर्वश्रेष्ठ कहानियों के रूप में तीन लम्बी कहानियों की गणना की जाती हैं। (१) कायांतर (२) चीन की दीवार (३) दंडद्वीप।
कायान्तर एक अजीब गरीब फंतासी है जहाँ एक अच्छा खासा युवक एक बडे कीडे में बदल जाता है। इस कहानी में काफ्का शायद यह कहना चाहते हैं कि एक गैर कमाऊ व्यक्ति परिवार के लिये कीडे की भांति होता है। चीन की दीवार में मानव श्रम की गरिमा को नकारते हुये चंद लोगों की महत्वाकांक्षा के लिये लोगों को व्यर्थ का काम करते दिखाया गया है तथा दंडद्वीप में एक पिछडे द्वीप की कहानी है, जहां अपराधी को आरामशीन में रेतकर
धीरे-धीरे मारा जाता है।
काफ्का का साहित्य प्रतीक प्रधान है जिसके अनेक अर्थ लगाये जा सकते हैं। कभी काफ्का के उपन्यासों को व्यंग्य माना गया, कभी उनके मित्र मैक्स ब्राड ने इसे आध्यात्मिक दृष्टि से देखा। मार्टिन व्यूअर ने इसे यहूदी धर्म की संकल्पनाओं से जोडकर देखा। कुछ ने यौन प्रतीक मानकर इसकी व्याख्या की। जार्ज लुकाच ने काफ्का साहित्य को समाज का नर्क बताया है। जो भी हो काफ्का एक सामर्थ्यवान भाषा-शैली का लेखक था। हाँ उसकी दृष्टि में स्वयं उसके साहित्य का कोई मूल्य नहीं था। भले ही उसने यह तथ्य अत्यन्त अवसाद ग्रस्त मनः स्थिति में स्वीकार किया हो।
गुमनामी में मरने वाले काफ्का के निराशा भरे साहित्य में एक काल खण्ड के निराश यूरोप ने अपना दर्द देखा और महसूस किया और उसे एक महान् लेखक घोषित किया। काफ्का का भाषाई निहितार्थ कुछ भी कहता हो किन्तु उसके साहित्य को सामाजिक सरोकारों की प्रतिबद्धता से जुडा साहित्य तो नहीं कहा जा सकता। भयावह फंतासी, निराशा की अतियाँ एक कवित्वपूर्ण शैली काफ्का को एक सिद्धहस्त लेखक के रूप में स्थापित करती है। ?