कबिरा खडा बाजार में

कमलाप्रसाद चौरसिया


आम आदमी में खरी-खरी कहने में प्रसन्नता का अनुभव होता है। वह गर्व का अनुभव करता है जब कहता है कि उसने तो खरी-खरी सुना दीः फिर चाहे सुनने वाले को भला लगे या बुरा। वह वाणी के महत्त्व को समझता ही नहीं कि आज जो भी बिगाड हो रहा है, उसके मूल में यह वाणी ही है। वाणी ही उसे तत्त्वशील बनाती है। वाणी का तप परमात्मा तक पहुँचने का माध्यम ही नहीं, आत्मसंस्कार का उपक्रम है, मनुष्य को मनुष्य बनाने का अस्त्र है। ‘कबिरा खडा बाजार में’ आम आदमी के लिए कण्ठहार बन गया है। खरी-खरी कहने वाला इस तरह खरी-खरी कहता है कि उनका अपनापन ही बिसूरने लगता है। वह आहत है, इसका अहसास सामने वाले को कराकर दम लेना चाहता है। उसी के लिए कबीर बाजार में आ खडा हुआ है, और मस्ती से झूमता हुआ कहता हैः- ‘प्रीति उसीसे कीजिये जाम ओड निभावै। बिना प्रीति के मानवा कहीं ठौर न पावै।। रामसनेही जब मिलै तब ही सचु पावै। अजर अमर घर ले चलै भव-जल नहिं आवै।। ज्यों पानी दरियाव का, दूजा न कहावै। हिल-मिल एकौ ह्वै रहै, सतगुरु समुझावै।। दास कबीर विचार कै, कहि कहि बतलावै। आपा मिटि साहिब मिलै, तब वह घर पावै।।’
आदमी खरी-खरी कहने का तात्पर्य न समझते हुए भी खरी-खरी कहकर अपने को विशिष्ट और अद्वितीय समझने लगता है। बहुत अच्छा लगता है कहने में कि उसने अपने मन की कह ली और संतोष प्राप्त कर लिया किन्तु ‘स्वान्तःसुखाय’ कह लेने का उसका सुख तत्काल ही प्रभाव दिखाता है जब वह अनमना अनुभव करने लगता है, संग के अभाव से जूझने लगता है। कबिरा जो खरी-खरी कहता है, वह सर्वजनसुखाय कहता है। इसीलिए मस्ती में हैः- हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या। रहैं आजाद या जग में, हमन दुनियाँ से यारी क्या।। जो बिछुडे हैं पियारे से, भटकते दर-बदर फिरते। हमारा यार है हममें, हमन को इंतिजारी क्या।। खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है। हमन गुरुनाम साँचा है, हमन दुनियाँ से यारी क्या।। न पल बिछुडे पिया हमसे, न हम बिछुडै पियारे से। उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या।। कबीरा इश्क का नाता, दुई को दूर कर दिल से। जो चलना राह नाजुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या।।’ आज आदमी आक्रोश में है क्योंकि उसने अपने सिर पर ऐसा बोझ बाँध रखा है जिसका कोई बोझ ही नहीं है। अनावश्यक रूप से व्यवस्था के विरोध में खडा है। वह कबीर की नहीं सुनता कि ‘मन दस नाज, टका चार गठिया, टेढौ-टेढौ जात।। कहा नर गरबनि थोरी बात। कहा लै आयौ यहाँ धन कोऊ लै जात। दिवसचारि की है पतिसाही, ज्यूँ बनि हरियल पात।। राजा भयो, गाँव सौ पायो, टका लाख दस लाख। हवन होत लंक कौ छत्रपति, पल में गई बिहात।। माता पिता लोक सुत बनिता, अति न चले संगात। कहै कबीर राम भजि बौर, जनम अकरारथ जात।।
लोकतंत्र में गाँव में, शहर में, कस्बे में, तहसील में, जिले में, प्रान्त में और देश में चुने हुए राजाओं की आशाएँ, आकांक्षाएँ ही सब कुछ हो गई हैं। आदमी में विभिन्न-भिन्न विचारधाराओं का चेला बन गया है और सत्ता पाने के लिए युवाओं को, बेकारों को, मजदूरों और मजबूरों को बहकाकर अशांति और अराजकता में जीने के लिए विवश कर रहा है। भूल गया है कि हमारी संस्कृति एका की पक्षधर है। वह अपने में सबको और सबको अपने में अनुभव करता है, यहाँ तक कि पशुपक्षियों तक में उसकी ममता ‘सीय राम मय सब जग जानी’ जैसी बसती है। फिर भी वह अकारण ही ठगी से राजमद प्राप्त करने के चक्कर में ठगों के हाथों का खिलौना बन गया है। समझता है कि वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति में तभी सफल हो सकता है जब विरोध में खडे होकर अहंकार का प्रदर्शन कर अपनी निजता स्थापित कर सकता है। उसे कौन समझाए सिवा कबीर के कि अपने अन्तःकरण का संस्कार कर स्वान्तःसुखाय की बजाय शब्द को सर्वजनसुखाय अभिव्यक्ति प्रदान कर ही वह अपनी अस्मिता बनाए रख सकता है। स्पष्ट है कि उनके पास अपनी निज की कोई विचारधारा नहीं जो समाज को दिशा दे सके। वास्तविकता यह है कि ये पूरा दोहा कहने में, समझकर भी नासमझ बनकर अर्थ लगाने में संकोच का अनुभव करते हैं जो वास्तव में अन्तस् के रिसाव को व्यक्त करता है यथा- ‘कबिरा खडा बाजार में, सबकी माँगे खैर। न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।।’ न काहू से बैर में ही कबीर का संतत्त्व प्रतिभासित है। उसका व्यवस्था ही क्यों, किसी व्यक्ति से भी विरोध नहीं है। कबीर अपने स्वत्त्व का ही परिचय देता है जब कहता है कि ‘निर्वैरी निहकामता साई सेती नेह। विषया सूं-न्यारा रहे, सन्तन को अंग एहि।’ उसे व्यवस्था से क्या लेना! कुंभनदास का कहना ही हैः संतन को कहाँ सीकरी सों काम। कबीर इसीलिए कहने की सामर्थ्य रखता है कि ‘शून्य मरै,’ अजपा मरै, अनहद हू मरि जाय। राम सनेही ने मरै, कहँ कबीर समुझाय।।’ कबीर विशुद्ध सन्त, विशुद्ध मानव है। उसका अन्तस् मानवीय है। वह तो मानव-मात्र में वह अनुभूति भरना चाहता है जिसके प्रभाव में वह मानव, मानव एक है, मनुष्य में मनुष्यता का मूल अनस्यूयन होना चाहिए और यह अनुस्यूयन मानव का मानव के प्रति प्रेम ही कर सकता है। इसके लिए उसे अपने अन्तस् में ‘राम-स्नेहित्व’ अन्तर्भाव करना होगा, सबमें परमात्मा को अन्तर्हित अनुभव करना होगा। ‘राम सनेही’ न मरै कहकर वह यही तो कहना चाहता है जो गीता कहती हैः ‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।’ यही दर्शन कराने के लिए वह बाजार में खडा है।
समानता के इसी भाव के लिए कबीर कहीं भी व्यवस्था के विरोध में खडा नहीं है, विरोध नाम का शब्द उसके शब्दकोष में हो ही नहीं सकता। विरोध विध्वंस ही करता है, मानव को दानव बनने के लिए उत्साहित करता है। विरोधभाव के तिरोभाव के कारण ही वह निर्भय है, खरी-खरी कहकर मानव-मात्र ही नहीं, व्यवस्था में बैठे महामहिमों में सोए हुए अध्यात्म को जगाने का प्रयत्न करता है। वह किसी को आहत नहीं करता, और न ही किसी के प्रति कटु-शब्द का प्रयोग करता है। वह तो सीधे-सीधे प्रेम को पुलकाने के लिए उसका उसके अन्तस् में ही नहीं, शासित और प्रताडित में भी एक ही परम तत्त्व का दर्शन कराकर उनके मन से बैर-विरोध हटाकर एक दूसरे के प्रति पूज्य भाव रखने के लिए प्रेरित करता है, भटके हुओं को राह दिखाना चाहता है, उनके अन्तस् का कलुष मिटाकर उनका संस्कार करना चाहता है। इसलिए उसके लिए शब्द बहुत ही महत्त्वपूर्ण रहा है। वह कहता हैः ‘सती संतोषी सावधान, सबद भेद सुविचार। सतगुर के प्रसाद थैं, सहज सील मत सार।। सतगुर ऐसा चाहिए, जैसा सिकलीगर होई। सबद मसकला फेरि करि, देह द्रपन करै सोई।।’
शब्द को साधना आसान नहीं होता। उसकी साधना करना होती है। इसके लिए गुरु के पास सजाकर सीखना होता है। गुरु को भी सिकलीगर की तरह होना चाहिए जो शब्दों को शान पर चढाकर, रगडकर इतना चमका दे कि शिष्य का अन्तःकरण दर्पण के समान चमक उठे। इसी का परिणाम है कि कबीर कह सका कि ‘कबीर सबद शरीर मैं, बिनि गुण बाजै तंति। बाहरि-भीतरि भरि रह्या, ताथैं छूटि भरंति।।’ जन-मन-तन में जो शब्द है वह बिना तारों के झनझना रहा है। वह भीतर-बाहर, सब जगह व्याप्त है। जिसे इस शब्द का ज्ञान हो जाता है, वह मायाजनित भ्रम से मुक्त हो जाता है। गीता इसी माया से मुक्ति हेतु कहती है ‘त्रिविधा नरकस्येद द्वारं नाशनमात्मनः। कामः कोधस्तथा लोभः तस्मोतत् त्रयं त्यजेत्।। इन्हें त्यागना तभी संभव है जब शब्द का महत्त्व जन मन में पैठ बनाए और कबीर की तरह आदमी कह सके कि ‘सारा बहुत पुकारिया, पीड पुकारै और। लागी चोट सबद की, रह्या कबीरा ठौर।।’ सुखी बहुतों को पुकार लेता है। पीडा और को पुकारती है। कबीर को तो शब्द को छोर ऐसी लगी है कि ................. है जब वह सन्तों की भाँति ‘अनुद्वेगकरं वाक्य सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङमयं तप उच्यते।। कबीर ने यही वाणी का तप किया है जिसके कारण उसकी वाणी में खाटी का प्रभाव है। इसके लिए साधक को अपनी अस्मिता का विसर्जन करना होता है। कबीर इसी स्थिति का बखान करता हुआ कहता हैः ‘सीतलता तब जांणिये, समिता रहै समाई। पख छाडै निरपख रहै, सबद न दूष्या जाई।। जब तक आदमी अपनी अस्मिता, अहता का विसर्जन नहीं करता, तब तक उसमें सबमें राम देखने की सामर्थ्य नहीं आ सकती और मानव मात्र में प्रेम की अनभूति और भाई चारे की अभिवृद्धि संभव नहीं हो सकती जो आज सर्वाधिक काम्य है।
कबीर मानव-मात्र की पीडा को भली प्रकार अनुभव कर रहा है। वह इस जगत् की स्थिति को अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए कहता हैः ‘दाघ बली ता सब दुखी, सुखी न देखौं कोइ। जहाँ कबीरा पग धरै, तहँ टुक धीरज होइ।।’ बैर, विरोध, क्रोध और निर्दयता की ज्वाला सब ओर धधक रही है। इससे सब प्रताडित है। कोई सुखी नहीं दिखाई देता। बैर-विरोध, क्रोध और निष्ठुरता से दग्ध इस संसार में कबीर जहाँ-कहीं भी पैर रखता है, उन स्थानों पर ही उसे धैर्य का अनुभव हो रहा है। इसके मूल में उसका आत्म-स्वरूप के ज्ञान का प्रबल होना ही है। वह चाहता है कि सब अपने को पहचाने अपने में सबको और सबमें अपने को देखने लगे। लोगों की इस अज्ञानता से वह त्रस्त है और उन्हें समझाते हुए कहता हैः ‘आपनपौ न सराहिए, और न कहिये रंक। ना जाँणौ किस बिरख तलि, कूडा होई करंक।।’ वह कैसे समझाए दुनियाँ वालों को कि उन्हें सम्यक बोध हो सके कि ‘नां कुछ किया, न करि सक्या, नां करणें जोग शरीर। जे कछु किया सु हरि किया, ताथै भया कबीर कबीर। अच्छे हैं की स्थिति में आत्मश्ा*ाषा, अपनो पीठ मत ठोकिए और न हो दूसरे को रंक’ तुच्छ समझिए। समझने का यत्न कीजिए कि हाड-माँस का यह तन कब उसी वृक्ष के नीचे पडा दिखे जिस तुच्छता को, रंकता का आज उपहास कर रहे हो, उसी दशा को प्राप्त हो जाओ।
मनुष्य की इसी समझ के अभाव के कारण वह अत्यन्त ही सन्तप्त मन से कह रहा हैः- ‘हद में रहे सो मानवी, बेहद रहे सो साधु हद बेहद दोनों तजै, तिनका मता अगाधु ।। मानव के हित मे वह बाजार में आ खडा हुआ है और चीख-चीखकर कह रहा हैः ‘हमारे राम रहीम करीमा केसो, अलह राम सति सोई। बिसमिल मेटि बिसम्भर एकै, और न दूजा कोई।। तुरक मसीति देहुरे हिन्दू, दहूठा राम खुदाई। हिदू तुरुक का करता एकै, ता गति लखी न जाई।।’ दुनिया में आज जो भी उत्पात हो रहा है, उसके मूल में वाणी का असंयमित व्यवहार ही है। आज हर कोई अपने साँई की सराहना और दूसरे के साँई का तिरस्कार कर रहा है। कोई भी यह समझने के लिए प्रस्तुत नहीं है कि सबका साँई एक है और वह प्राणिमात्र, मनुष्य ही नहीं, जीव-जन्तु और जड-चेतन में भी विद्यमान है। कबीर इसको समझाने के लिए सन्नद्ध है और इसीलिए साधु की, मनुष्य की पहचान बताते हुए कहता हैः ‘हद में रहे सो मानवी, बेहद रहे सो साधु। हद-बेहद दोनों तजै, तिनका मता अगाधु।।’ कबीर के इस कथन को गहराई में समझने और आत्मसात् करने की आवश्यकता है। ?