संपादकीय... पूरे मन और खुली दृष्टि से ...............

डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’


‘‘हमारा उद्देश्य प्रान्त की सजग, जागरूक एवं त्रि*याशील साहित्यिक प्रतिभाओं को इस माध्यम से साहित्य-सृजन की ओर प्रेरित करने तथा उनकी रचनाओं का समादर करने का है। हमारा यह भी लक्ष्य है कि विभिन्न साहित्यिक प्रवृत्तियों के द्वारा प्रान्त में एक ऐसा सजग और स्वस्थ वातावरण बन सके, ऐसा अवसर उपस्थित हो सके जिसमें राजस्थान की साहित्यिक प्रतिभा को अपनी चरम सीमा तक पनपने और प्रकाशित होने का सुयोग मिल सके। (अपै*ल, 196॰) .....मधुमती मासिकी का सम्पादन-सूत्र संभालते हुए प्रयास यही रहेगा कि वह साहित्यकार की स्वतंत्रता के पीछे इतनी न भटक जाय कि सामाजिक दायित्व उपेक्षित होने लगे और न प्रतिबद्ध लेखन की लीक इतनी पीटे कि सृजन-प्रेरणा ही कुण्ठित हो जाय।(अगस्त, 1976) .....यह लेखकों , रचनाकारों एवं सुधी पाठकों की पत्रिका है जिसका स्वरूप, स्तर और यहां तक कि जीवन भी उनके योगदान, सद्भाव एवं रचनात्मक सुझावों पर निर्भर करता है। नये हस्ताक्षरों के लिए भी इस पत्रिका का द्वार उन्मुक्त है और रहेगा। रचना या लेख का मूल्यांकन उसकी मौलिकता और वैचारिक तथा साहित्यिक गुणों के आधार पर ही किया जाएगा, केवल लेखक की प्रतिष्ठा के आधार पर नहीं। (अक्टूबर, 198॰) .....साहित्येतर विषयों तथा मानव नियति से सम्बद्ध अन्य प्रश्नों तथा सामयिक ज्वलंत संदर्भों को भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाएगा। मधुमती को सृजन एवं विचारों की मिलीजुली सामग्री से भविष्य में अंलकृत करने की योजना है।(जनवरी, 1982) .....हमारी आकांक्षा है मधुमती पत्रिका का स्तर और ऊँचा उठे तथा साहित्यिक पत्रिकाओं में वह अग्रणी बन सके, प्रबुद्ध पाठकों की यह रुचिकर पत्रिका बने । प्राप्त रचनाओं का चयन गुणात्मकता के आधार पर करने का निश्चय किया गया है।(मई, 1995) .....मधुमती पत्रिका के लिए सदैव ही रचनाकारों का स्वागत रहता है। रचनाकारों से अनुरोध है कि वे अपनी मौलिक अप्रकाशित श्रेष्ठ रचना की प्रथम प्रति भिजवाने का कष्ट करें। आपका रचना सहयोग ही हमारा सम्बल है।(फरवरी, 2॰॰6) .....अकादमी को अब पहले से अधिक सृजनात्मक, प्रासंगिक और पारदर्शी भी बनाया जाएगा तथा अकादमी प्रदेश के दूर-दराज के अछूते अंचलों में भी अपनी सृजनात्मक प्रवृत्तियों को लेकर जाएगी।’’(जनवरी-फरवरी, 2॰12)
उक्त सभी उद्धरण अकादमी के संस्थापक अध्यक्ष श्री जनार्दनराय नागर से लेकर अब तक के कुछ पूर्व-अध्यक्षों (एवं संपादकों) के प्रथम सम्पादकीय लेखों के वे अंश हैं जिनमें उन्होंने अकादमी और मधुमती को लेकर अपनी-अपनी संकल्पनाएं प्रकट की है। यहां यह सब खोलने-खंगालने की जरूरत इसलिए पडी कि मेरे अध्यक्षीय दायित्व संभालते ही प्रायः सभी शुभचिंतकों और साहित्य के प्रति जागरूक मित्रों ने बधाई देने के साथ ही सबसे पहली जो बात कही वह मधुमती का स्तरोन्नयन करने और अकादमी के संचालन में सर्वस्पर्शिता लाने की थी। मुझे लगता है कि अध्यक्षीय परंपरा के इन पूर्ववर्ती महानुभावों ने जो सदिच्छाएं प्रकट की हैं यदि उनको ही साकार करने का प्रयत्न पूरे मन और खुली दृष्टि से किया जाए तो अब तक अप्राप्त रहा भी प्राप्त होगा, शिकायतें दूर होंगी एवं एक सहज-सुखद-सार्थक साहित्यिक वातावरण का निर्माण होगा।
अकादमी मूलतः राज्याधारित और स्वरूपतः स्वायत्त उपऋम है। यह एक सुविधा भी और दुविधा भी। दुविधा यह है कि एक ओर श्रेष्ठतम के चयन की आकांक्षा तो दूसर ओर लोकतांत्रिक मूल्यों के निर्वहन का दायित्वबोध। मधुमती के लिए प्राप्त रचनाओं का चयन करते हुए यह पहली बार महसूस हुआ कि जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना और उन पर चलना कितना कठिन है। किसी समूह या संस्था या विचारधारा या सिद्धांत या सम्प्रदाय पर अधिष्ठित पत्रिका होने और विधि द्वारा संस्थापित राज्य के साहित्यिक संस्थान की पत्रिका होने में कितना अन्तर होता है ! यहां सर्वोत्कृष्टता और सर्वसमावेशिता के अनिवार्य द्वंद्ध से टकराना अपरिहार्य है।
साहित्यिक पत्रिकाओं के दो तरह के पाठक होते हैं। एक वे जो केवल पाठक हैं। कुछ साहित्यिक और वैचारिक सामग्री पढने की रुचि और जिज्ञासा उन्हें इस अल्पमोली (1॰ रुपये में लगभग 15॰ पृष्ठीय सामग्री वाली ) पत्रिका से सहज ही जोडे रखती है। दूसरा वर्ग उन पाठकों का है जो स्वयं रचनाकार भी है। यह मेरा अनुमान मात्र है कि केवल-पाठक वर्ग में एक बडी संख्या उन पाठकों की होगी जो साहित्यिक पत्रिका के रूप में अकेली मधुमती पर ही निर्भर हैं। जबकि लेखक-पाठक वर्ग में अधिकांश ऐसे लोग होंगे जो मधुमती के इतर अन्यान्य पत्रिकाओं के भी नियमित-अनियमित पाठक हों। निश्चय ही इन दोनों प्रकार के पाठकों का साहित्यानुभव भिन्न-भिन्न होगा। इनकी रुचियों, संस्कारों और अपेक्षाओं में अंतर होना स्वाभाविक है। इस अंतर को महसूस करते हुए मेरा मानना है कि मधुमती में इन दोनों ही वर्गों की अपेक्षाओं के अनुरूप रचनाओं का प्रकाशन होना चाहिए इन दोनों वर्गों की संधिरेखा पर ठिठका हुआ पाठकों का एक तीसरा वर्ग भी होता है जो होता तो केवल-पाठक ही हैं किन्तु उसके अन्दर कही गहरे में एक सिसृक्षु कसमसाता रहता है। जब भी कोई अच्छी रचना पढने में आती है तो वह उमडने-घुमडने लगता है। संवेदनाओं को छू लेने वाली या बुद्धि को झकझोरती हुई कोई रचना पढ कर कुछ वैसा ही भावोत्तेजक या विचारोत्तेजक लिख डालने की हुमक-सी उठती है। पर उस हुमक के झाग थोडी ही देर में बैठ जाते हैं। कल्पना साकार नहीं हो पाती। पाठकीय ओट में दुबके बैठे इस सहमे-से रचनाकार को भी संकोचमुक्त कर सामने लाने का कार्य मधुमती कर सके, यह भी हमारे मन में है।
किसी भी पत्रिका की सृजनात्मक उत्कृष्टता की मर्यादा बनाए रखने के लिए प्रायः ऐसे संवर्गों को छोड देना पडता है जो अपनी सामाजिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक स्थितियों के कारण उस स्तर तक पहुंच नहीं पाते और श्रेष्ठता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते । सर्वस्पर्शिता की सदिच्छा के बावजूद मधुमती के स्तरोन्नयन के लिए श्रेष्ठता को वरीयता देने की हमारी विवशता रहेगी । किन्तु यह मेरी प्रस्तावना भर है, संकल्पबद्धता नहीं। अंतिम निर्णय तो सुधी पाठकों और अनुभवी रचनाकारों से प्राप्त होने वाले परामर्श और विमर्श से तय होगा। मुझे विश्वास है कि जो रचनाकार हृदय से जुडे हुए हैं, अनुभवी हैं, वरिष्ठ हैं, वे परामर्श देने में कोई कसर नहीं छोडेंगे। विश्वास यह भी है कि प्रदेश के अधिकतम रचनाकारों का अधिकतम सहयोग-सान्निध्य-सहकार लेते हुए हम कुछ नया, कुछ अनन्य और कुछ अप्रतिम रच पाएंगें। मैं एक साधारण-सा लेखक, साधारण काव्याभ्यासी और साहित्य का साधारण कार्यकर्ता हूं। एक सामान्य रचनाधर्मी। मुझे न अपने सुमान्य होने का दंभ है और न सर्वमान्य होने का भ्रम। किन्तु मधुमती को समृद्ध बनाने के लिए मधुकरी-वृत्ति से भी कोई परहेज नहीं रहेगा।
मेरे सम्पादित इस प्रवेशांक के साथ ही मधुमती में कुछ नये स्तम्भ प्रारम्भ किए जा रहे हैं। हमारी वाक परम्परा में शास्त्रकर्ताओं , मनीषियों, कवियों आदि द्वारा रचित वाङ्मय के अर्थावगाहन और विषय के विशदीकरण हेतु उनके ऊपर टीका, वृत्ति, भाष्य आदि लिखने की सुदीर्घ परम्परा रही है। संस्कृतविद् मानते हैं कि मल्लिनाथ की टीका नहीं होती तो कालिदास उतने चर्चित नहीं होते। आचार्य प्रशस्तपाद का भाष्य नहीं होता तो कणाद के अकेले सूत्रों के आधार पर वैशेषिक दर्शन का ऐसा विराट ताना-बाना नहीं रचा जा सकता था। गीता की सार्वजनीन विश्रुति में इसकी असंख्य टीकाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। इधर हमारे समकालीन साहित्य में देखें तो इस टीका परम्परा का अद्भुत , अनूठा और उल्लेखनीय उदाहरण ‘छंद-छंद पर कुंकुंम’ है, जो ख्यातनाम आलोचक वागीश शुक्ल ने महाप्राण निराला की प्राणप्रिय कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ पर लिखी है। पाठालोचन की यह पारम्परिक पद्धति रचना को न केवल अकूत अर्थविस्तार देती है, अपितु उसके बहुविध आशयों, आयामों और अधिष्ठानों को भी खोलती चलती है। महान् कविताएं इसी अर्थ में कालजयी होती हैं कि प्रत्येक कालखण्ड में उनके कथ्य की समकालीनता देखी-परखी जा सकती है। उन रचनाओं का अर्थकाश शब्दाकाश में अनंत दूरियों तक-हमारी दृष्टि की सीमाओं से परे भी- भासता रहता है। काव्य मर्मज्ञ और दृष्टि सम्पन्न आलोचक अपने युगानुरूप अर्थाशय उनमें पढ (गढ!) लेता है।
‘अन्तर्पाठ’ के नाम से प्रारम्भ होने वाले इस स्तम्भ के अन्तर्गत महान् रचनाओं अथवा उनके चयनित अंशों की टीका प्रस्तुत की जाएगी। पहला ‘अन्तर्पाठ’ हमारे सुपरिचित कवि और अन्तर्पाठीय आलोचक सवाईसिंह शेखावत ने लिखा है। तुलसी के एक दोहे पर केन्द्रित इस टीका में हम देख सकते हैं कि एक कालजयी कवि की संक्षिप्त-सी रचना में भी कितना अर्थ विस्तार और जीवन के आशय सम्भव हो सकते हैं। एक प्रकार से यह पारम्परिक पद्धति का समकालीन रूपाकार पद-टीका है, अन्तर्पाठ नाम स्वयं लेखक द्वारा सुझाया गया है, जिसकी शुरूआत उन्होंने ‘मीमांसा’ के माध्यम से की थी।
दूसरा स्तम्भ ‘पुरा-प्रसंग’ रहेगा। इसके अन्तर्गत हमारे साहित्यिक पुरोधाओं की ऐसी रचनाएं अविकल रूप से प्रकाशित की जाएगी, जो पाठकों के लिए रोचक, बोधप्रद, मार्मिक अथवा विचारों को ऊर्जा प्रदान करने वाली हो। इस बार हम ‘बिहारी सतसई’ पर लिखी गई पं. पद्मसिंह शर्मा की एक पुस्तक पर प्रेमचंद द्वारा की गई समीक्षा प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें बिहारी के दोहों के साथ उनसे मिलते-जुलते प्रसिद्ध शायरों के शेर पढना एक अलग तरह का आनंदप्रद अनुभव है।
तीसरा स्तम्भ हमारे समय के सर्वंकष लोकप्रिय माध्यम से संबंधित है। उपनिषद् में विद्या-अविद्या के युग्म को लेकर एक बहुप्रसिद्ध उक्ति है कि ‘‘जो केवल अविद्या की उपासना करते हैं, वे गहरे अंधकार में पडते हैं और जो केवल विद्या की उपासना करते हैं, वे उससे भी गहरे अंधकार में पडते हैं ’’। वहां यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि दोनों की संतुलित उपासना की जाए। एक के द्वारा मृत्यु (विनाशक बुद्धि-विनाशशील तत्व) को पार कर दूसरे के द्वारा अमृत (अविनाशी तत्व-शाश्वत विचार) को प्राप्त किया जाए। उपनिषद् की यह महत्वपूर्ण उक्ति जड और चेतन, मूर्त और अमूर्त, व्यक्ति और समाज, प्रकृति और परमात्मा, लोक और परलोक जैसे सभी युग्मों-द्वंद्वों को देखने के लिए भी मूल्यवान दृष्टि प्रदान करती है। किन्तु यहां इसे मैंने एक अन्य सन्दर्भ में स्मरण किया है। हमारे इर्द-गिर्द जीते-जागते इहलोक के साथ एक और प्रत्यय युग्मवत् जुड गया है जिसका नाम है ‘ईलोक’। इलेक्ट्राँनिक माध्यम में अवस्थित ‘सोशल मीडिया’ के नाम से जाना जाने वाला एक समानान्तर चकाचौंधमय संसार । दो दशक पूर्व तक जिसे आभासी दुनिया कहा जाता था वह अब आभासी नहीं रह कर ठोस पारभासी स्वरूप में हमारे सामने खडा है। औपनिषदीय युग्म-चर्चा पर पुनः आते हुए कहना होगा कि इस ‘कलजुग’ में जो केवल ‘ईलोक’ की उपासना करते हैं, वे तो अंधकार में रहते ही हैं, जो केवल ‘इहलोक’ की उपासना में रत रहते हैं वे भी गहरे अंधकार में पडे रहते हैं।
इस ‘ईलोक’ में विद्यमान साहित्यिक परिदृश्य को देखने-दिखान के लिए एक नया स्तम्भ ‘ईलोक चौपाल’ प्रारम्भ कर रहे हैं , जिसके अन्तर्गत सोशल मीडिया में साहित्य केन्द्रित मुद्दों पर चलने वाली चर्चाओं को प्रस्तुत किया जाएगा। साहित्यिक टिप्पणियों, गपशपों, बहसों और खींचतान का बहुत बडा हिस्सा अब ईलोक में बसता है। यह स्तम्भ ईलोक की उपासना में बहुत कच्चे मेरे जैसे अनेक पाठकों के लिए उस अमृत प्राप्ति का दरवाजा न सही तो कम से कम कुछ खिडकियां तो ताकाझांकी के लिए खोल ही देगा। इस चौपाल को प्रस्तुत करने का नारदीय दायित्व संभाल रहे हैं हमारे युवा आलोचक डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी, जो इहलोक से ईलोक की आवाजाही में पूरी सजगता के साथ निष्णात है।
सृजनात्मकता साहित्य की सबसे बडी कसौटी है, और संवेदनीयता सबसे बडी पूंजी । आनन्द साहित्य का स्थाई प्रतिफल है जो आत्मान्वेषण और आत्मपरिष्कार के जरिए प्राप्त होता है। अपने जन, लोक, परम्परा ,संस्कृति और देश के प्रति सहज और अकुंठित प्रेम इसकी जडों को सींचता है। मानवीय मूल्य इसके फैलने-फूटने के लिए हवा और प्रकाश देते हैं। रचनात्मकता के व्यापक संदर्भों में यही हमारा अधिष्ठान है और यही प्रस्थान-सूत्र। इस अंक में कविता, कहानी, निबन्ध, शोध लेख आदि सृजनपरक और अकादमिक, दोनों तरह की रचनाएं हमारे पास पहले से ढेर लगी हुई सामग्री में से चयन की गई हैं । कुछ और नई, मौलिक एवं बेहतर सामग्री के लिए रचनाकारों से रचनाएं आमंत्रित हैं। इति शुभम् ।।