सम्पादकजी,




मधुमती, फरवरी - १७ अंक आद्योपांत पढा। इसमें आई अनेक विधाओं की रचनाएं सशक्त और ज्ञानवर्द्धक है। मुख्य पृष्ठ का चित्रांकन और भीतरी रेखांकन भी मनोहारी लगे। आवरण २-३-४ पर प्रख्यात कथाकार अमृतलाल नागर जी के ‘हिन्दी कथा-यात्रा पर आए विचार, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को पूर्ण रूप से उद्भाषित करते हैं।
-भावना देवडा, तराना, उज्जैन
मधुमती का फरवरी अंक प्राप्तु हुआ। इस अंक में प्रकाशित लेख प्रकृति की खूबसूरती का संकल्प है। बसंत ऋतु, बहुत पसंद आई। बाल जगत की कविताएं प्रिय लगी। बाल जगत में- बच्चों की कहानी भी प्रकाशित कीजिए। मधुमती एक अच्छी और प्रिय साहित्य पत्रिका है। जिसे पढकर मन खुश हो जाता है।
-बद्री प्रसाद वर्मा ‘अनजान’, गोरखपुर
कलेवर से लेकर आवरण पृष्ठ एवं रेखांकन मनोहारी है। बालकवि बैरागी जी पर ग्यारसी लाल सेन प्रणीत आलेख श्रमसाध्य है। कवि के हर पहलू को सूक्ष्मता से छुआ है एवं जानकारियों से भरपूर है। सेन स्वयं प्रतिष्ठित कवि एवं
समीक्षक है।
डॉ. प्रणव, देव का महाराज राणा राजेन्द्र सिंह ‘सुधाकर’ कवि शायर पर आलेख विद्वतापूर्ण एवं कितने ही संदर्भ ग्रन्थों का निचोड है। दुखद सत्य है कि अप्रतिम तीनों राजाओं का देहावसान हृदयाघात् से हुआ। भवानी सिंह जी का अदन में, राजेन्द्र सिंह जी का झाालवाड में एवं हरिशचन्द्र जी का दिल्ली में। इन्ही राजाओं के काल (१८९९-१९४९) में भवानी नाट्य शाखा रैन बसेरा, गढ द्वार पर प्रेमचन्द जी द्वारा बनाएं हाथी बेजोड कला वस्तुएं है।
-बृजमोहन शर्मा, कोटा
एक अर्से से मधुमती पत्रिका पढने का अवसर मिलता रहा है, निःसंदेह प्रथम बार वैचारिक अभिव्यक्ति के अहसास के अन्तर्गत......
श्री बालकवि वैरागी-हिन्दी साहित्य सजृन के आराधक के संदर्भ में देश को दिये गये नारे एवम् प्रेरक प्रसंग-दो दिन और बनाए रखते उस बलिदान दौर को... वर्णन निसंदेह प्रशंसनीय एवं गौरवान्ति स्थिति का अभास है।
श्री अखिलेश निगम की कृति बूढे लोग, वर्तमान परिपेक्ष्य की एक ज्वलंत समस्या की ओर इंगित करती प्रस्तुति है, साथ ही पूर्ण प्रस्तुति में शिष्य राजन की यादें एक बेहतर उजले पक्ष की वस्तुस्थिति को बयां करती है, इसे कुछ विस्तार दिया जाता तो शायद अनुचित नहीं होता।
श्री भवानीसिंह ‘भानु’ की लघुकथा अप्रत्याशित एवं खरा ईलाज कटु सत्य को इंगित करती एक शाश्वत को उजागर करती एक सच्चाई है। साथ ही डॉ. श्री रामगोपाल शर्मा ‘दिनेश’ की अपराध का सच निःसंदेह समय के सच के रूप में प्रस्तुत कविता है।
-चिंताश रमेश भटनागर
मधुमती पत्रिका का फरवरी २०१७ का अंक प्राप्त हुआ। पत्रिका की सभी कहानियाँ, लघु कथाऐं, लेख शिक्षाप्रद हैं। डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदीजी का संस्मरण पढ कर ज्ञान कोष में वृद्धि हुई। डॉ. देवेन्द्र इन्द्रेश जी का मूँछविहीन नर पुंगव अच्छा व्यंग्य बन पडा है। सूर्य प्रकाश अस्थाना की ग*ाल ‘शायरी से गए’ और ‘घर बसाने दो इन्हें’ अच्छी लगी। शेष कहानियाँ कविताएं लेख भी उच्च कोटि के हैं।
-सुलोचना शर्मा ‘लोचन’, नई दिल्ली