पुस्तक ः कागज के पर सूरज

दुलाराम सहारण


पुस्तक ः कागज के पर सूरज/ओम पुरोहित कागद/कविता संग्रह/दिसम्बर २०१५/मूल्य-१०० रूपये/पेपरबैक
संस्करण, पृष्ठ-१२०/२०१६/बोधि प्रकाशन, जयपुर।
पुस्तक ः चीत्कार उठी किलकारी/विमला महरिया/कविता संग्रह/संस्करण-२०१६, हार्ड बाउडिंग पृष्ठ-१०४/
मूल्य-१६० रूपये/प्रकाशक-साहित्यागार, जयपुर।
कमजोर तुम नहीं, मैं था
ओम पुरोहित कागद का काव्य संग्रह ‘कागज पर सूरज’ कवि की अनुभूतियों का जीवन्त दस्तावेज है। घर-परिवार से निकलती हुई संग्रह की कविताएं प्रकृति की अनन्त धाराओं में स्नान करते हुए पौरूषीय दम्भ को झकझोरती हैं। प्रेम के चश्में में अठखेलियां करता कवि का मन स्त्री को प्रकृति, मां, पत्नी और बेटी के रूप में उच्चारित करता है। समाज के रिश्तों में जीता कवि मन व्यवस्था के आडम्बारों को नकारता-सा लगता है। व्यवस्था में दोयम दर्जे पर बैठा व्यक्ति कवि को बार-बार याद हो आता है।
संग्रह की पहली ही कविता व्यवस्था में जड जमाएं बैठी परम्पराओं की बखिया उधेडती है। समय के साथ बहने वाला व्यक्ति नदी के मानिन्द कुछ पाता चलता है, कुछ दूसरों को बांटता चलता है, मगर कुछेक पत्थर की तरह जड जमाए रहते हैं जो ना देना जानते हैं और ना लेना-‘‘हम/पानी की तरह/बहते रहे/तुम/पत्थर की तरह/लुढकते रहे/हम/नदी की तरह/सिकुडते रहे/तुम/आकार पाते रहे/तुम्हें मंदिरों में मिली जगह/हमें/बादल ले गए/देव होकर भी/नहीं बरसे/हम/बरस कर/फिर पानी हो गए!’’ (पृष्ठ-११)
कवि समाज की मुख्यधारा में जीया मगर हाशिए का दर्द महसूस किया। ‘शब्द तो ब्रह्म होता है’ के बहानें हाशिए से दरकाए हुए व्यक्ति की पीडा एवं जीजिविषा को व्यक्ति किया है-‘‘एक दिन आएगा/हम उठेंगे हाशिये से/अर्थाएंगे उन शब्दों को/जो बंद हैं आज/बडी मोटी जिल्दों में/फिर देखना टूटेगा/उन शब्दों का मौन।’’ (पृष्ठ-१२)। व्यक्ति की स्वार्थी प्रवृत्ति हो या समय, स्थान, परिवेश का प्रभाव, वह अक्सर अपने दृष्टिकोण को दूसरों पर थोपता रहता है। कवि का जीवनानुभव व्यक्ति की इसी प्रवृत्ति को व्यक्त करने के लिए विवश हो उठता है-‘‘किसी के हाथ/आसमान की ओर उठे/लोगों ने समझा/मांगेगा/या/मारेगा/कोई न था वहां/जो समझता/हाथ/कभी-कभी/दुआ में भी/उठते हैं।’’ (पृष्ठ-१७)। समाज की विडम्बनाओं को निस्पृह भाव से देखता हुआ कवि मन गरीबी-अमीरी में बंटे व्यक्ति की अनुभूतियों को दृश्य रूप में खडा कर देता है। सम्भ्रांतों के पाखंडों नीचे दबे व्यक्ति की याचना पेट की अंतडियों को गिन जाती है। आभिजात्य को तार-तार करती यह पंक्तियां-‘‘पाषाणी पेट वाले/देवता पा रहे हैं/धूप-दीप हवियां/तैत्तीस तरकारी...../आज निकले हैं/लाव-लाव करते/कुलबुलाते पेट/बचा-खुचा-बासी/पेट भर पाने...।’’ (पृष्ठ-२०)
इतिहास का सम्मोहन व्यक्ति को कालचक्रों में भटकाता है तो बचपन की मचलती हुई-सी स्मृतियां कहीं दूर ले जाकर एकाग्रता में जमा देती हैं। ना यह भटकाव जीवन है, और ना ही जमाव जीवन है। मन में आग की एक लौ का जलना जरूरी है, जो उसे बढना सीखाती है। आग पेट की भी होती है, मगर वह तो सिर्फ दिशाएं ही दिखाती है, उसे जीवन तो नहीं कहा जा सकता-‘‘तन ढंकना/पेट भरना/छत ढांप लेना/यही तो नहीं/जीवित होने का साक्षी!’’
(पृष्ठ-६८)। आशा-निराशाओं में डूबता-उतरता जीवन पता नहीं कब नदी बन जाता है और बहने लगता है, भले ही जमीन पत्थरीली हो या मैदानी। कवि के मन में रेगिस्तान गहरे तक समाया है और सागर भी। प्रकृति का सहचर बना हुआ कवि पता नहीं कैसे स्त्री की अनन्त गहराईयों में उतरता रहता है। पूरे काव्य संग्रह में कवि इन दोनों के मध्य खडा है या कहें अपने अंदर दोनों को जी रहा है। जीना सीखना भी चाहता है-‘‘आओ!/सतत बहती नदी से/सीख ले/निरपेक्ष बहना/जिसे मिल ही जाता है/अंत में/अथाह समुद्र...’’(पृष्ठ-८३)। जीवन तथा जीवन में स्त्री-पुरूष का सहचर भाव, इसी भाव में एक तरफ प्रेम और त्याग, और दूसरी तरफ प्रेम एवं बल का दम्भ। पता नहीं क्यों यह दम्भ पुरूष को खुद से ही डराता रहता है। शायद वह खुद को किसी को सौंप नहीं पाता।उसके अंदर रिक्त होने का भय बना रहता है-‘‘बहुत दूर से/मेरे घर आई तुम/निपट अकेली/फिर भी/कितनी बेखौफ थी।/मैं असंख्य अपनों के बीच/अपने ही घर/कितना आशंकित था ?/कमजोर तुम नहीं,/मैं ही था।’’ (पृष्ठ-९४)।
मृत्यु का शाश्वत भाव सीखने वाले शास्त्रीय ज्ञान को यर्थाथ की जमीन पर लाकर कवि ने सामने खडे जीवनांत का दृश्य दिखाया है-‘‘जब भी उठे/मृत्यु के विरूद्ध ही उठे/मेरे कमजोर कदम/कर आए हैं पार/मृत्यु की पचपन सीढियां/आवाज गूंजती है/मेरे कानों में/और आगे नहीं/आगे खडी है मृत्यु/ मुझे लगता है/उत्सव नहीं/भय ही है मृत्यु।’’ (पृष्ठ-३३)।
एक तरह से देखा जाए तो प्रकृति-परिवेश में रची ये कविताएं कवि को जीवन से जोडती हैं। थार, थार में घर, और घर में मां, जीवन मृत्यु के बीच नदी, और आशाओं में बढती खेजडी की जडें हमें कवि के यथार्थ का सहचरी बनाती हैं।
स्त्री के सहज भाव निर्मल नदी से बहते हैं
दुनिया के किसी भी कोने की स्त्री ने गीतों के माध्यम से अपनी सम्वेदनाओं को जन-जन तक पहुंचाया है। वह मूक थी, मगर गा रही थी। वह अनपढ थी, मगर लिख रही थी। वह बंधी थी, मगर आजाद थी। सृजक थी, क्योंकि वह मां थी। वह एक झरने की मानिंद थी, क्योंकि वह प्रकृति थी। स्त्री के इन्हीं रूपों को उकेरती हुई विमला महरिया की कुछ कविताएं ‘चीत्कार उठी किलकारी’ में संकलित हैं। यह कविता संग्रह एक सामान्य स्त्री की अनुभूतियों को व्यक्त करता है।
कन्या भ्रूण हत्या को केन्द्र में रखकर लिखी गई इन कविताओं में स्त्री का सृष्टा रूप साकार हुआ है। वह एक बालक का निर्माण करती है, अपने शरीर में दूसरा शरीर सृजित करती है। पता नहीं क्यों उस सृजन को कभी-कभी वह बीच राह में भी खत्म कर देती है, या खत्म हो जाने देती है। कवयित्री ने बार-बार इसको व्यक्त किया है, मगर इसके कारणों की तरफ वह नहीं जा पाईं। शायद वह व्यवस्था के उस ताने-बाने को नहीं पहचान पा रही, जिसने उसे अपने ही खून का कातिल बनाकर छोड दिया। वह किसके आगे हार जाती है, पता नहीं। मगर हार जाती है। उसे इसी हार से मुक्त करती हुई कवयित्री की पंक्तियां गा उठती हैं-‘‘मत हार सखी!/हिम्मत अपनी/जीवन तेरा/कोई हार नहीं।/हर सांस बनी है/जीने को/तेरा एक पल भी/बेकार नहीं।’’ (पृष्ठ-१७)
‘नन्हीं की शादी’ कविता के माध्यम से कवयित्री जानवरों में मानवता ढूंढती है। ममता की अंगडाई लेती इन कविताओं में बेटी की पुकार है। वहीं व्यवस्था की जकडन से मुक्ति की आशा है। घर-बाहर काम करती हुई स्त्री किस तरह अपने चारों तरफ से संभावनाएं जुटाती है और उन संभावनाओं से जीवटता हासिल करती है। इस संग्रह की सभी कविताएं इस चिंतन का परिणाम है।
सभी कविताओं में स्त्री के सहज भाव निर्मल नदी से बहते हुए एक मकसद तक पहुंचते हैं और पाठक को सीधा मानवता से जोडते हैं। कविताओं से इतर रचनात्मकता यहां प्रभावित करती है। ?
प्रयास भवन, ताजूशाह तकिये के सामने, धर्मस्तूप, चूरू(राज.)-३३१००१