पुस्तक ः चुप बोलती है, लेखक ः राज गुप्ता

डॉ. मधु अग्रवाल


पुस्तक ः चुप बोलती है, लेखक ः राज गुप्ता, प्रकाशक श्रीमती सुधा तोलानी, मूल्य ः २०० रु.
पुस्तक ः समसामयिक हिन्दी लघुकथाएं, सम्पादक ः त्रिलोक सिंह ठकुरेला, प्रकाशक ः राजस्थानी ग्रंथागार,
जोधपुर, मूल्य ः २०० रु.
चुप बोलती है
श्रीमती राज गुप्ता का ‘चुप बोलती है’ काव्य संग्रह वर्तमान के विरोधाभास को उजागर करता सार्थक शीर्षक से लिखी गयी सामाजिक सरोकारों से संबंधित काव्य संग्रह है। १०१ कविताओं में प्रेम, उत्साह, प्रगतिशीलता, मानवता का संचार करती हैं तथा मानवीय मूल्यों को पुनः जीवंत करने का प्रयास करती हैं। यह कविता संग्रह सरल तथा ग्राह्य योग्य है। इसमें बिम्ब प्रतिबिम्ब का समुचित मिश्रण है। कहीं-कहीं इसमें भावात्मकता, रचनात्मकता अत्यन्त प्रभावशाली
दिखाई देती है।
‘चुभने दो कांटे/जीवन में कांटें ही फूल बने हैं’। यह पंक्तियां राज गुप्ता के सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती है तथा जीवन का अर्थपूर्ण तरीके से जीने का हौंसला देती है।
पगचिन्ह उनके यत्नपूर्वक खोज लेने चाहिए/निज पूर्व गौरव दीप को बुझने न देना चाहये। इसमें कवयित्री अपने पूर्वजों के त्याग को अन्तस में समेटना चाहती है तथा उनकी रोशनी की किरण का दूर तक प्रसार चाहती है जो उनकी संवेदनशीलता का साक्ष्य है।
फासलों में क्या रखा है/दूरियों में भी प्रेम का शजर सजाकर तो देखो। में कवयित्री प्रेम को ही धर्म का प्रतिरूप समझती है। ‘सच की जयकार’ में नई कोंपलों से दृढ विश्वास एवं साहस की कल्पना करती है, जिनके हाथों की नरमाई से पत्थर पिघल जाय उस नये युग का सृजन करना चाहती है।
यह छटपटाहट/बेचैनी/ऐसी नहीं रहेगी/ इसमें छुइमुई लडकी के जुझारूपन का संकेत है जो निराशाओं, तकलीफों की याद को चीर नया इतिहास रचने की प्रतिज्ञा करती है।
‘प्रकाशपुंज’ में कवयित्री जीवन से हारना नहीं चाहती। वह संघर्ष को अपनी ताकत बनाना चाहती है। वह स्वयं मिट कर आशा, उजास को जीवित रखना चाहती है। बिम्ब तथ प्रतिबिम्ब का प्रयोग सहज है।
हम जिधर से निकलेंगे/हवा का रूख बदल देंगे/ की भावना ‘गति’ कविता के माध्यम से सम्प्रेषित की गई है। साथ ही वतन के लिए जोश, जुनून की बात करती हुई रोशनी की मशाल लेकर चलती सी प्रतीत होती है।
यौवन में उन्माद चाहिए/नैतिक मूल्य जगाने को/एक बार राम चाहिये/यह पंक्तियां समृद्ध संस्कारशील मातृभूमि के लिए दुराचारों से संघर्ष की प्रेरणा देती है।
मरते बाप की लाश देख/पहला बेटा बोला/दाह संस्कार मैं करूं/लेकिन शमशान घाट दूर था। इन पंक्तियों में भौतिकवाद तथा गिरते हुए मूल्यों पर गहरा कटाक्ष है तथा समाज की विद्रुपता का निरुपण तथा भावशून्यता को प्रभावपूर्ण रूप से दर्शाया है।
जिंदगी के छोटे-छोटे अनुभव से साक्षात्कार कराता यह काव्य संग्रह पठनीय तथा संग्रहणीय हैं। इस सराहनीय प्रयास के लिए राज गुप्ता बधाई की पात्र हैं।
समसामयिक हिन्दी लघुकथाएं
प्रस्तुत ‘समसामयिक हिन्दी लघुकथाएं’ पुस्तक में ‘१०’ लेखकों की छोटी-छोटी लघुकथाओं में प्रासंगिक तथा सामयिक विषयों पर बहुत तल्ख और मार्मिक अभिव्यक्ति है। इस संग्रह में समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, रूढिवादिता, स्त्री शोषण पर लेखक ने गहरी टिप्पणी की है।
प्रो. रूपदेवगुण की लघुकथाएं अर्थप्रधान तथा समसामयिक हैं। पोटली में मौत के सामने पोटली को अर्थवान बताना सुसंस्कृत समाज पर करारा तमाचा है। परिपक्वता उम्र की मोहताज नहीं होती, शब्दों का वजन व्यक्ति को उम्रदराज बना देता है जिसका लेखक ने ‘नदारद’में सटीक चित्रण किया है।
व्यंग्य से भरी मुरलीधर वैष्णव की लघुकथाओं में निर्लजता, भ्रष्टाचार, व्यक्ति के आचरण का अहम हिस्सा प्रतीत होती हैं। कहीं-कहीं पर असंवेदनशीलता, परपीडा पर लेखक के विषादपूर्ण स्वर ध्वनित होते हैं। व्यक्ति की तुच्छ मानसिकता को लेखक ने अंतरमन के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया है। बडों का आचरण बच्चों के लिए पहला सबक है जिसे गोविन्द शर्मा ने ‘तमीज’ में बडी ईमानदारी से उद्धृत किया है। ‘नया जवाब’ में लेखक उजाले से कुछ रोशनी ले अंधेरे को समर्पित करना चाहता है। ‘हेलमेट’ लघुकथा का यह अंश-नहीं पिताजी/मैं भूलक्कड हो गया हूं उस दिन पितृ दिवस था/मैं आपको हैप्पी फादर्स डे कहना भूल गया था। पश्चिमी संस्कृति के अन्धानुकरण से हमारे मूल्यों के ह्रास को चित्रांकित करता है। लेखक म कम शब्दों में व्यंजना के माध्यम से विचारों को अभिव्यक्त करने की क्षमता है।
संवेदनशीलता से साक्षात्कार कराती ‘स्मृति शेष’ प्रभात दुबे की सशक्त लघुकथा है। ‘अंतर’ लघुकथा के माध्यम से इंसान में होते चरित्र हनन तथा जानवर में चरित्र उत्थान का अच्छा प्रस्तुतीकरण है। ‘खुशखबरी यही है कि बेटी पैदा हुई है/मरी नहीं/बेटियां अभिशाप नहीं वरदान है, यह कथन जमीनी हकीकत से काफी दूर है।’
रमेश मनोहरा ने ‘माँ की पीडा, छुआछूत, बिके हुए लोग’ जैसी शीर्षक लघुकथाओं में बिखरते रिश्त पर व्यंग्य किया है। क्या बताऊं बिमला/उन गुण्डों से तो बच गई/मगर अब नहीं बचूंगी यह पतीत पुलिस ढांचे के प्रति आक्रोश को व्यक्त करती प्रभावी कहानी है। ‘पद’ किशनलाल शर्मा के दोहरे चरित्र को अभिव्यक्त करती सशक्त कथा है। ‘बंटवारे’ में संतान की दायित्वों से विमुखता तथा पिता-पुत्र के रिश्तों में बिखराव की पराकाष्ठा है। कानून सबके लिए एक है/ में लेखक कानून के प्रति आस्था रखने हेतु व्यक्ति को कर्त्तव्य का संदेश देता है।
डॉ. रामकुमार घोटड ने कुत्तापन में कुत्ते की तुलना फिकरे कसने वाले आसामाजिक तत्त्वों से की है त वर्तममान समय की ज्वलंत समस्याएं जब तक मैं कमजोर नहीं पडूंगी/ये काटने से रहे/स्त्री की निडरता तथ आत्मविश्वास का प्रतीक है। ‘चुग्गा दाणा’ में स्त्री का आशंकित मन पुरुष में छिपी पाश्विक प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है। ज्योति जैन ने ‘फेस बुक’ संस्कृति के घिनौने रूप को वर्णित किया है।
समाज में व्याप्त विसंगतियों तथा वर्गगत विषमता पर तीखा व्यंग्य करती त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कथाएं मौन, ढोंग, रीति-रिवाज में किरदारों के दोहरे चरित्र को बेनकाब करने का प्रयास उल्लेखनीय है। इनकी अधिकतर कथाएं यथार्थ के निकट महसूस होती हैं। इनमें अभिव्यक्ति की गरिमा है तथा समाज में व्याप्त विसंगतिय को दूर करने के प्रति कटिबद्ध है।
‘मास्टर साहब हमारी जाति की औरत होने के कारण बात यहीं खत्म करते हैं/वरना खून की नदियां बहा देते’ नदीम अहमद नदीम की जातिवाद के कारण उत्पन्न ऊंच-नीच की मानसिकता पर व्यंग्य हैं। ‘लिंग परीक्षण’ इनकी प्रभावी रचना है। पंकज शर्मा की ‘दिशा’ भाई के लिए अटूट प्रेम को सहजता से प्रेषित करती है। ‘खानदान’ में लेखक का यह कथन ‘‘बेटियां बेटों से बढकर सेवा करती हैं’’ बेटियों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण को रेखांकित करता है प्रशंसनीय है। आदमी, जैसे को तैसा सटीक, सरल, सहज कथाएं हैं।
सभी लेखकों ने सामाजिक सरोकारों के प्रति ईमानदारी से लेखन किया है। भ्रष्टाचार, वर्ग भेद प्रमुख विषय रहे। आवरण पृष्ठ आकर्षक है तथा सुधी पाठकों के लिए
उद्देश्यपूर्ण है। ?
५११, पंचरत्न कॉम्पलेक्स, उदयपुर (राज.)